श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५२ जीव, वन, जीवन… ?

एक पाठशाला के परिसर की दीवार खड़ी करने का काम चल रहा है। इस प्रक्रिया में उसकी सीमा पर उगे छोटे-बड़े‌ पौधे उखाड़ दिए गए हैं। वर्षों से खड़े कुछ वृक्ष भी काट दिए गए हैं। यद्यपि इन वृक्षों को सुरक्षित रखते हुए भी दीवार बनाई जा सकती थी। वृक्षों को काटने का कारण पूछने पर उत्तर मिला “जंगली थे, इसलिए हटा दिए। यहाँ आर्नामेंटल ट्री लगाएँगे। सुंदर दिखेंगे।”

‘जंगली’ शब्द सुनकर मैं हँस पड़ा। संस्कृत में ‘अरण्य’ या ‘वन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इसी के चलते ‘नैमिषारण्य’ शब्द का उल्लेख हमारे ग्रंथों में मिलता है।

जीवन पर विचार करें। जीव और वन के अतर्संबंध को प्रतिपादित करने के लिए यह शब्द पर्याप्त है। वन है तो जीव है। जीव के लिए वन अनिवार्य है। दोनों का सम्मिलन ही जीवन है। विज्ञान इसे कुछ इस तरह से कहता है कि ऑक्सीजन है तो जीवन है। ऑक्सीजन के लिए वृक्ष महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र या इकोसिस्टम के लिए वृक्ष अनिवार्य हैं। वृक्ष, जिन पर पक्षी घोंसले बना सकें। वृक्ष, जो वर्षा को आकर्षित कर सकें। वृक्ष जिनके तनों पर जाने कितने ही प्रकार के छोटे-बड़े जीव अपना निवास बनाते हैं। वृक्ष जिनके फल खाकर  कितने ही पंछी अपना पेट भरते हैं। वृक्ष जिनकी छाया के नीचे पथिक विश्राम करते हैं। वृक्ष जिनसे जंगल बनते और बसते हैं।

वस्तुत: ‘जंगली’ शब्द का उपयोग ऑक्सीजन से घिरे वातावरण में रहने वाले के लिए किया जाना चाहिए था, प्रकृति के सानिध्य में निवास करने वालों के लिए किया जाना चाहिए था। बाज़ारवाद ने जंगली शब्द को अनुपयोगी, क्रूर, हिंसक और असभ्य के संदर्भ में परिवर्तित कर दिया।

यूँ देखें तो न्यूनाधिक जंगली तो हम सब हैं। जिन्हें ‘जंगली’ शब्द अपशब्द लगता है, उन्हें ज्ञात हो कि हम सब के पूर्वज भी कथित जंगली ही थे। हम सब ने विद्यालयीन जीवन में ‘रेफरेंस टू कॉन्टेक्स्ट’ अर्थात संदर्भ के अनुसार आकलन करने को समझा है।  इस प्रक्रिया के अंतर्गत देखें हमारे लिए अंडमान-निकोबार के वनों में निर्वस्त्र रहने वाली जारवा जाति के लोग जंगली हैं। सिक्के का दूसरा पहलू है कि बहुत हद तक संभव है कि उनके लिए हम वस्त्रधारी जंगली हों। अपनी छोटी-सी त्रिज्या से एक वृत्त खींचकर उसे अंतरिक्ष मान लेना हास्यास्पद है। प्रकृति ने देह के कर्म सबके लिए समान रखे हैं। आहार, निद्रा, मैथुन, आभिजात्य  और कथित आदिम दोनों के लिए समान हैं। प्रकृतिगत समानता को अपनी सुविधा के आधार पर वर्गों में नहीं बाँटा जा सकता।

‘जंगली’ कहकर हम आज ऑक्सीजन के स्रोतों का नाश कर रहे हैं। कल जब हमारे गले प्राणवायु के अभाव में सूखेंगे तो जंगली बहुत याद आएँगे।

अपनी एक कविता स्मरण हो आ रही है-

काट दिये गए हैं

पेड़ों के मुंड,

छील दी गई है

पूरी की पूरी छाल,

धरती को

पच्चीस-पचास मीटर तक

घनी छाँव से ढकनेवाले,

अब स्वयं खड़े हैं

निर्वस्त्र और विवश,

इनकी असहाय देह पर

घातक रंगों से

पोती जा रही हैं

रंग- बिरंगी पत्तियाँ,

उकेरे जा रहे हैं

कई तरह के फूल,

एल.ई.डी.की रोशनी में

प्रदर्शन के लिए रखी

अनावृत लाज पर

चस्पां हो रहे हैं

कई स्लोगन,

और इनके इर्द-गिर्द

फल-फूल रही है

बेख़ौफ़ ब्यूरोक्रेटिक घास,

सारा माज़रा

आशंका मिश्रित भय से

निहार रहे हैं

जवानी की दहलीज़ पर खड़े

आसपास के कच्चे पेड़,

मैं लिखता हूँ ख़त

आयोजकों को-

माफ कीजियेगा

हरित शहर अभियान के

उद्घाटन के लिए

नहीं आ पाऊँगा।

मतभिन्नता हो सकती है तथापि मनुष्य जाति की  अब तक की यात्रा के अनुभव से स्थूल रूप से यह देखने में आया है कि आभिजात्य के प्रदर्शन के विरुद्ध जंगली का दर्शन, जीवन से अधिक जोड़े रखता है। इति‌।

 

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 7:36 बजे, 14 जून 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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