श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३० ☆

?  आलेख – हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी दिवस पर हम प्रायः एक ही बात कहते हैं, हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारी पहचान है, हमें हिंदी का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी को बचाने की आवश्यकता नहीं बची है। फिल्मी गीतों में , लोक व्यवहार में वह सुरक्षित है। आज हिंदी को सक्षम बनाने की आवश्यकता है।

लेकिन एक प्रश्न अवश्य है, क्या हिंदी भविष्य की भाषा बन रही है?

इसका उत्तर हमारी भावनाओं में नहीं, हिंदी की उपयोगिता में छिपा है।

आज यदि किसी बच्चे को हिंदी में अच्छी शिक्षा मिले, किसी युवा को हिंदी में रोजगार मिले, किसी वैज्ञानिक को अपना शोध हिंदी में दुनिया तक पहुँचाने का अवसर मिले, किसी उद्यमी को हिंदी में अपना बाजार मिले और किसी नागरिक को तकनीक अपने ही शब्दों में उपलब्ध हो , तभी हिंदी का वास्तविक विस्तार होगा।

इसलिए हिंदी के लिए हमें तीन काम करने होंगे।

पहला, हिंदी को ज्ञान की भाषा बनाना होगा।

विज्ञान, चिकित्सा, कानून, तकनीक, प्रबंधन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—इन क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सामग्री हिंदी में तैयार करनी होगी। केवल अंग्रेजी शब्दों का हिंदीकरण नहीं, बल्कि हिंदी में मौलिक ज्ञान-सृजन करना होगा।

दूसरा, हिंदी को डिजिटल भाषा की पूरी ताकत देनी होगी।

आज भाषा का भविष्य पुस्तकालयों से अधिक मोबाइल और स्क्रीन पर तय हो रहा है। हमें अच्छे हिंदी ब्लॉग, पॉडकास्ट, वीडियो, ई-पुस्तकें, डिजिटल पाठ्यक्रम और एआई आधारित हिंदी उपकरण बनाने होंगे।

हिंदी जितनी अधिक टेक्नोलॉजी फ्रेंडली होगी, उतनी ही अधिक भविष्य की भाषा होगी।

तीसरा, हमें हिंदी का बाजार बनाना होगा।

 यह बात थोड़ी कठोर लग सकती है, लेकिन जरूरी है।

 जिस भाषा में आर्थिक अवसर नहीं होंगे, युवा उस भाषा से भावनात्मक रूप से जुड़कर भी व्यावहारिक जीवन में दूसरी भाषा की ओर चले जाएंगे।

 इसलिए हिंदी में कंटेंट क्रिएशन, अनुवाद, प्रकाशन, विज्ञापन, सॉफ्टवेयर, शिक्षा और एआई, इन सबको रोजगार से जोड़ना होगा।

 और एक बात और।

हिंदी का विस्तार दूसरी भाषाओं को हटाकर नहीं होगा।

हमें अंग्रेजी से डरने की नहीं, उससे संवाद करने की आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा की नहीं, सहयोग की आवश्यकता है।

 हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ग्रहणशीलता है। वह संस्कृत से लेती है, उर्दू से लेती है, अंग्रेजी से लेती है और लोकभाषाओं से भी सीखती है।

 हम हिंदी के केवल अच्छे वक्ता न बनें,

हिंदी के अच्छे निर्माता बनें।

एक अच्छी किताब लिखें।

एक अच्छा डिजिटल पाठ तैयार करें।

एक उपयोगी हिंदी ऐप बनाएँ।

एक वैज्ञानिक विषय को सरल हिंदी में समझाएँ।

एक बच्चे को हिंदी में कुछ नया सिखाएँ।

क्योंकि भाषा केवल बोलने से नहीं बढ़ती।

भाषा तब बढ़ती है, जब उसमें नया ज्ञान, नया विचार और नया भविष्य लिखा जाता है।

 

आइए, हिंदी को केवल अपनी पहचान न बनाएँ।उसे अपनी सृजन-शक्ति, अपनी तकनीक और अपने भविष्य की भाषा बनाएँ।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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