सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – छलनी सूप…।
रचना संसार # १११
☆ गीत – छलनी सूप… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
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नित्य नए
कानून बनाते
नए-नए ये भूप।
रोज दिखावा
जग में करते,
चलते नंगे पाँव।
मन में पाले
लौकिक छलना,
रहते भ्रामक ठाँव।।
शिक्षा अब उद्योग बनी है,
बदल गया है रूप।
मासूमों को
निगल रहा है,
राक्षस बनकर नीट।
नहीं योग्यता
को है मिलती,
वर्तमान की सीट।।
सफल नहीं है श्रम बच्चों का,
छलनी होता सूप।
मध्य परीक्षा हों घोटाले,
पैसों का सब खेल।
बिकता सुन्दर कल भारत का,
डाले कौन नकेल।।
छिन्न-भिन्न सपनों को लेकर,
मानव गिरते कूप।
लालच की इस
प्रभुताई में,
आकुल व्याकुल सूर।
लोग विकल हैं
गिरिधर गोपी,
लक्ष्य बहुत है दूर।।
टूटी निष्ठाओं
की डोरी ,
मुखमंडल पर धूप।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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