श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चिंगारी…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८० ☆
☆ # “चिंगारी…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆
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चेहरे को चमकाने यह खेल सारा है
ना कभी वह तेरा था
ना कभी वह मेरा है
माया जाल में उसके
हर कोई फँसा है
उसने ऐसा प्रपंच रचा है
उलझ गए हैं धागों में सब
छोटा बड़ा कोई नहीं बचा है
वह बेच रहा है रंगीन सपने
सोची समझी साजिश से अपने
खाकर यह मादक अफीम
सब लगे हैं माला जपने
चारों तरफ फैला है अंधेरा
सूरज भी अब नहीं है तेरा
दीपों पर भी है पाबंदी
कैसे रोशन होगा घर तेरा
चल उठ अपनी मुट्ठियाँ भींच
पत्थर पर पत्थर को घिस
जो निकली है यह चिंगारी
इस रोशनी से आंखों को मीच
अब तू सपनों से जाग
मृगतृष्णा के पीछे मत भाग
तेरा मुकद्दर यही बनेगी
जब चिंगारी बनेगी आग
तू चिंगारी को बचा के रखना
रोशनी का यह शस्त्र है अपना
पराजित होगा डरपोक अंधेरा
बस चिंगारी को मशाल है बनना /
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© श्याम खापर्डे
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