श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय  पर आधारित एक कविता “हिन्दी अनुरागी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७८ ☆

🌻कविता🌻 हिन्दी अनुरागी🌻

हिन्दी अनुरागी बनें, रहे हिन्द का नाम।

हिन्दी में बातें करें, भारत भूमि धाम।।

*

है सुघर मधुर सुंदर बोली, बावन सखियों की हमजोली।

इत -उत डोले पल-पल बोले, हिन्दी शब्द मकरंद घोले।।

हलचल करती पवन हिलोरें, मात्रा सुंदर लगती डोरे।

इन्द्रधनुष सी आभा न्यारी, भाषा लय बाधी है प्यारी।।

*

भाषा इसकी है भली, करें सदा सम्मान।

ह्दय भाव से जोड़ती, सबका रखती ध्यान।।

**

ज्ञानी कहते महिमा जानो, हिन्दी को सब अपना मानों।

खूब करें जन-जन की सेवा, छंद विधा के गणपत देवा।।

कोकिल कंण करें उच्चारण, गीत संगीत की है तारण।

माँ की ममता होती लोरी, लचक- मचक चलती है गोरी।।

*

भाव भरी ये पावनी, सहती हरदम पीर।

कब आयेगा पावन पल, हिन्दी होगी हीर।।

**

नैन निहारे तकती राहें, भरती रहती अपनी आहें।

कलम चलाओ हिन्दी धारी, तुम अब बन जाओ गिरधारी।।

कसकस थाथें हिन्दी आशा, राष्ट्र बचायें हिन्दी भाषा।।

धर्म कर्म की सुंदर वाणी, हिन्दी है जग की कल्याणी।।

*

कानों में रस घोलती, मीठी सी पहचान।

आओं गढ़ ले आज हम, गर्वित दृढ अभिमान।।

**

छम-छम बाजें पांवो झांझर, सात सुरो की पहनी घाघर।।

बैलों की घंटी की छुन- छुन, मीठी हिन्दी बाजें रुनझुन।।

लिख- लिख बांचे कविवर प्यारा, बढ़ता हिन्दी भाईचारा।

निकली लेकरआँचल ममता, इसकी नजरों में है समता।।

*

धूँ- धूँ जलती आग में, देख रही सब ओर।

 अपने मुझको थाम ले, लाज बचाओं छोर।।

**

बना देह कंचन है मोती, पावन रिश्ते यही पिरोती।

आओं कर ले मीठी बातें, खूब कटेगी अपनी रातें।।

गंगा यमुना रेवा सरिता, बनी श्रेष्ठ हिन्दी शुभ वरिता।

चरण पखारे श्री नारायण, साधु संत करते है पारण।।

*

नील गगन से बाँधती, बारिश मोती धार।

ले गल बहियाँ डाल के, आओं कर ले प्यार।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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