आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – दोहा ग़ज़ल।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९४ ☆
☆ दोहा ग़ज़ल ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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ख्वाब सुनहरे देखते, जागे सारी रात।
हुई दोस्त से गुफ्तगू, यादों की बारात
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फतह तुम्हारी हुई तो, हमने पाई जीत
बनीं दोस्त की हार ही, यारों अपनी मात
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गले मिला फिर पीठ में, छुरा दिया था भोंक
मिली दोस्त से दोस्त को, यह कैसी सौगात
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तुम तो थे मुस्का रहे, कर नज़रों के वार
हुआ शहादत के लिए, दिल हँसकर तैयार
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खेलो खेल न तुम रुको, हम लेंगे चुप झेल
हमें मिले या ना मिले, मिले तुम्हें तो प्यार
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प्यार अगर हो दोस्त से, झट कह दे मत सोच
प्यार अगर तू दोस्त का, बन जा खिदमतगार
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तू तू मैं मैं थे, न हैं, हम होकर हैं एक,
तूतूमैंमैं कर रहे, खुद को खुद ही मार
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
२२.९.२०२६
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