स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०३ ☆

☆ –  ठंडे ये ज्वालामुखी करो…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

आहत लोग

कैसे खुश हो सकते हैं

उड़ाकर शान्ति कपोत को?

काश!

हम दिये की जोत होते

कपोत होते

तब हम अपने होंठ सी लेते

जी लेते।

मगर

हम जोत या कपोत नहीं

आदमी हैं।

और आज

आम आदमी दुखी है

इसलिये वो आदमी नहीं

ज्वालामुखी है।

आदमी पिस रहा है

ऐसा न हो कि

ज्वालामुखी के लावे में

सब कुछ हो जावे गुम

न शेष रहें हम, न तुम।

सुनो,

सुख का सूरज उगाओ

आदमी को सूरजमुखी करो,

समय रहते

ठंडे ये ज्वालामुखी करो।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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