श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बेचकर ईमान आया हूँ…”।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६३ ☆

☆ बेचकर ईमान आया हूँ… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

फिर भँवर में फँस गई कश्ती हमारी

हो गई है ज़िंदगी सस्ती हमारी।

*

उठ रहा है हर तरफ़ अब तो धुआँ सा

मिल गई है ख़ाक में बस्ती हमारी ।

*

रोटी कपड़ा एक छप्पर के लिए

घुट के मन में रह गई मस्ती हमारी।

*

बेचकर ईमान आया हूँ अभी मैं

झूठ के हाथों लुटी हस्ती हमारी।

*

किसने सूरज रख दिया है सामने ये

बूँद बन खोई है तर-दस्ती हमारी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२७.१.२६

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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