श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३३ ☆
व्यंग्य – जैसा बोओगे, वैसा काटोगे
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
गलती उनकी कतई नहीं है।
वे भी हमारे जैसे ही इंसान हैं। वही दो आँखें, दो कान, दो हाथ-पैर और सबसे बढ़कर वही दिमाग। हार्डवेयर में कोई खास फर्क नहीं।
फर्क केवल सॉफ्टवेयर का है।
दुनिया भर के बच्चों को बचपन में दिमाग में कहानियाँ, कविताएँ, संस्कार और सवाल अपलोड किए जाते हैं।
पर कहीं-कहीं सवाल पूछने की जगह जवाब पहले ही इंस्टॉल कर दिए जाते हैं। फिर रोज पाँच बार उसका अपडेट होता है। कभी पैकेज में नफरत होती है, कभी श्रेष्ठता का भ्रम, कभी दूसरे को मिटा देने का अंधा जुनून।
कमाल यह है कि सॉफ्टवेयर पुराना होता जाता है और उसे ‘अपडेटेड विचार’ बताया जाता रहता है!
पीढ़ियाँ कन्फ्यूज्ड हैं।
नतीजा सामने है।
इंसान आधुनिक हो गया, तकनीक अत्याधुनिक हो गई, हथियार स्मार्ट हो गए ,लेकिन सोच का ऑपरेटिंग सिस्टम अब भी पिछली कई सदियों में अटका हुआ है।
फिर हम आतंकवाद को देखकर पूछते हैं, ये लोग ऐसे क्यों हैं?
सवाल थोड़ा बदलकर पूछिए, इनके भीतर ऐसा बनने की प्रोग्रामिंग किसने की?
हवाई जहाज हाईजैक करने वाले दिखाई देते हैं।बम बनाने वाला हाथ दिखाई देता है, कोड लिखने वाला दिमाग दिखाई नहीं देता।
आतंकवादी दिखाई देता है, आतंक की मैन्युफैक्चरिंग फैक्टरी दिखाई नहीं देती।
इसलिए यदि दुनिया से आतंकवाद मिटाना है तो केवल सुरक्षा घेरा कुछ नहीं कर सकता।ट्रिगर पर उँगली रोकना पर्याप्त नहीं होगा। उँगली से पहले दिमाग तक पहुँचना होगा।
सॉफ्टवेयर बदलना होगा।
और यह काम किसी बाहरी इंजीनियर से नहीं होगा। जिसे बचपन से कोई विचार हर दिन समझाया गया है, उसे ही यह शिक्षा बदलने की असली जिम्मेदारी, उसी समाज को उठानी होगी, जिसने वह विचार डाला है।
जो लोग दुनिया बदलने निकले थे, उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि दुनिया बदलने से पहले अपने भीतर का वायरस निकालना जरूरी है।
वे दूसरों को मिटाने निकले और धीरे-धीरे अपने ही समाज की शांति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और भविष्य को मिटाने लगे।
नफरत की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह जिस घर से निकलती है, लौटकर उसी घर की खिड़कियाँ तोड़ती है।
एक दिन शायद उन्हें भी समझ आएगा कि आतंक का कारोबार पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने वाला है।
क्योंकि गोली यह नहीं पूछती कि सामने वाला शरीर किसका है।
बम यह नहीं देखता कि मलबे में कौन-सा धर्म दबा है।
आग को पासपोर्ट पढ़ना नहीं आता।
और मौत किसी विचारधारा की सदस्य नहीं होती।
इसलिए लड़ाई किसी धर्म, जाति या देश से नहीं, उस खतरनाक सॉफ्टवेयर से है जो इंसान को इंसान से नफरत करना सिखाता है।
हार्डवेयर वही रहेगा।
प्रोग्राम बदलना होगा।
और शायद बदलाव की सबसे बड़ी मजबूरी भी वहीं से आएगी, जब उन्हें दिखाई देने लगेगा कि जिस नफरत को वे दूसरों के लिए डाउनलोड कर रहे थे, उसका वायरस उनके अपने घरों में फैल चुका है। पर्दे के भीतर घुटन है।
“गलती उनकी कतई नहीं है।” आत्मघाती हौसला बिरला होता है।
यह जज़्बा इंसानी बेहतरी के लिए अपडेट किया जाए तो यह इतिहास का सबसे बड़ा अपडेट होगा ।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





