डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भजन – नवरात्रि।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३४१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भजन – नवरात्रि ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं,

खुशियों के दीप जले घर-घर, मैया के भक्त आए हैं।

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए है।

* 

ओढा दो माँ को तुम चुनरी, फूलों के हार चढ़ाए हैं,

बजे है ढोल-नगाड़े माँ, भक्तों ने भजन सुनाए हैं।

गूंजेगी जयजयकार तो, माँ के दर्शन पाए हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

 *

मैंने मनमंदिर में माँ को, लाखों दीप जलाए हैं,

जिसने भी माँ को है पुकारा, किरपा माँ की पाई है।

तेरे चरणों में माँ हमने, अपना शीश झुकाया है,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं। 

 *

नहीं लौटे कोई खाली, भरी झोली बहुत सारी,

तुझे देखूं लगे प्यारी, चुनरी मैया की लगे न्यारी ।

तेरी ज्योत जगाने हम, दौड़े तेरे दर पर आए हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

 *

भरो झोली आशीषों की करूँ तुझसे  मै अरदास,

तेरे चरणों में जीना है, बस इतनी-सी है आस।

लगाते तेरा जयकारा, गूँजे है सारी  दिशाएँ हैं,

सजा है दर मेरी माँ का, नवरात्रे माँ के आए हैं।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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