स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सेतु की नियति दो…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०५ ☆

☆ – सेतु की नियति दो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

वैसे कुछ लोग

बखूबी निभा लेते है

शिष्टाचार

कहने वालों के मुँह कौन सिये

कहकर बौनों को वामन का अवतार।

वे हजार ढंग से कह सकते

हज़ार बात,

मगर हम जानते हैं अपनो की औकात।

अपनी औकात जानना कम नहीं है

हमें इस बारे में भ्रम नहीं है।

ये भी सही है, सचाई है पीढ़ी-पीढ़ी के दरम्यान खाई है।

पितृ पीढ़ी के

कतिपय ययातिधर्मियों की दृष्टि में

 हमारा अस्तित्व बेकार है, व्यर्थ है, परशुप्रिय स्वात्र्योत्तरों के लेखे-

‘हम गुलामी के अवशेषों का क्या अर्थ है?’

दो पीढ़ियों द्वारा अनादरित अपमानित हमारी पीढ़ी अब क्या करे ?

यह एक जलता हुआ सवाल है ?

एक पीढ़ी अँधेरा आंज रही है दूसरी के हाथों में मशाल है।

कौन समझेगा

 हमारी पीड़ा और संताप ?

जन्म लेना हो गया अभिशाप ! अरे ओ अँधेरा आंजने वालों !

तुम्हें क्या हो गया है ?

विवेक कहाँ सो गया है ?

क्या वो तुम नहीं थे जिसने हमें दुलराया था,

हमारी दूधिया आँखों मे

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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