श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पर्व कहाँ ?” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १६४ ☆
☆ पर्व कहाँ ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(दशहरे के अवसर पर एक नवगीत)
☆
पर्व कहाँ हैं
आडम्बर हैं
या हैं केवल
दंभ कथाएँ।
शरशैया पर
भीष्म मरण की
करें प्रतीक्षा
रावण जिंदा
है सीता की
अग्नि परीक्षा
अर्जुन का
गांडीव टूटता
बिकी राम की
मर्यादाएँ ।
बिछी हुई
चौसर बाजी पर
अब भी नारी
धर्मराज की
सत्य-झूठ में
हिस्सेदारी
पत्थर हुई
अहल्या फिर से
उद्धारों में
छिपी व्यथाएँ ।
उजियारे की
कोख पल रहे
अँधियारे हैं
दीप धरूँ किस
द्वारे रक्तिम
गलियारे हैं
मैली सरयू
डरी अयोध्या
मूक बधिर सी
आशंकाएँ ।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
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