श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कलियुग में धन ही सदा…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २४० ☆
☆ कलियुग में धन ही सदा… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
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कलियुग में धन ही सदा, आता सब के काम।
सदियों से हर आदमी, इसका रहा गुलाम।।
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धन ही सबकी चाह है, सदा रहा सिरमौर।
घर में कितना हो भरा, सभी चाहते और।।
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धन लूटन को हैं खड़े, सारे चोर डकैत।
सुख की नींद न सो सकें, पालें सभी लठैत।।
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धन सहेजना है सरल, अधिक कठिन है ज्ञान।
धन अनुगामी ज्ञान का, यही सत्य है जान।।
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शुभ धन कहलाता वही, नेक रहें जब श्रोत।
गलत राह से जब मिले, सुख की नींद न सोत।।
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धन से होता है बड़ा, जीवन में सद्ज्ञान ।
सके बल पर आदमी, बन जाता इन्सान ।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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