श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुद्धिहीन-बुद्धिजीवी…“।)
अभी अभी # ८४५ ⇒ आलेख – बुद्धिहीन-बुद्धिजीवी
श्री प्रदीप शर्मा
बुद्धिमान तो सभी होते हैं, लेकिन सभी बुद्धिमान बुद्धिजीवी नहीं होते! एक श्रमजीवी की तरह जिसकी आजीविका ही बुद्धि से चलती हो, वह बुद्धिजीवी। शेष को आप चाहें तो बुद्धिवादी कह सकते हैं।
हमारे यहाँ मनीषी और विद्वान होते थे, ये बुद्धिजीवी कब चले आए, कुछ पता ही नहीं चला। चाय की क्रांति के साथ ही अंग्रेज़ कॉफ़ी भी ले आए। हम कहवा, काढ़ा तो पीते ही थे, कॉफ़ी हाउस में जाकर कॉफ़ी भी पीने लगे। इस कॉफ़ी के कप में से ही नशीली जिन की तरह कॉफ़ी का जिन्न भी निकल आया। कांग्रेस के ज़माने में इन प्यालों में कई क्रांतियाँ हुईं।।
क्या दिन थे वे! कॉफ़ी हाउस में बैठकर काँग्रेस को कोसा करते थे। जॉर्ज, अटल, लोहिया और चारु मजूमदार की बातें होती थी। वह दिनमान, धर्मयुग और ज्ञानोदय का युग था। साप्ताहिक रविवार जब तक हाथों में नहीं आ जाता, Sunday नहीं मनता था। वह शौरी, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी और एम जे अकबर का युग था। विपक्ष एकजुट नहीं था, लेकिन जगन्नाथराव जोशी और अटल बिहारी बाजपेयी की आम सभाओं में भारी भीड़ रहती थी। सरकार बुद्धिजीवियों को पुरस्कार और सम्मान दोनों प्रदान करती थी।
लोहिया के अंग्रेज़ी विरोधी आंदोलन ने अंग्रेज़ी के भाव और बढ़ा दिए। वह एनआरआई का नहीं, ब्रेन ड्रेन का ज़माना था। विदेश प्रवास की खबर अखबार में छपती थी, फ़ोटो सहित। अंग्रेज़ी के प्रोफेसर धड़ल्ले से हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास लिख रहे थे, और साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के चहेते बने हुए थे।।
अंग्रेज़ी सहित्य पर अमेरिकन साहित्य का साया मंडरा रहा था। युद्ध की त्रासदी का असर विश्व साहित्य पर पड़ रहा था। दोस्तोवस्की, सार्त्र, काफ्का और कामू बुद्धिजीवियों की एक नई जमात खड़ी कर रहे थे। कुंठा और संत्रास ने शून्यवाद (nihilism) को जन्म दे दिया था। हेमिंग्वे हीरो wining, dining और concubining का प्रतीक बनकर रह गया था। भारतीय लेखन में भी ये प्रतीक घर कर गए थे। लेखक प्रगतिशील और जनवादी हो चले थे।
ऐसे वक्त में आपातकाल लगा और जेपी ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल बजा दिया। दूसरी आज़ादी को लोग ज़ल्द ही भूल गए और अंततः सन 2014 में कांग्रेस-युग का अंत हो गया। देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत वाली बीजेपी सरकार का गठन हुआ।।
तब तक गंगा नें बहुत पानी बह चुका था। जेपी की तरह अन्ना भी नेपथ्य में चले गए थे। केजरीवाल दिल्ली में बैठ बीजेपी से किला लड़ा रहे थे। गुजरात का चायवाला 56 इंच का सीना लेकर बनारस पहुँच चुका था। गंगा की सफाई अभियान के साथ स्वच्छ भारत अभियान और कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखा जाने लगा था।
सरकार का समर्थन और विरोध लोकतंत्र में कोई नई बात नहीं! लेकिन लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार सत्ता ने विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। बुद्धिजीवी भरमाने लगे। विश्व हिंदी सम्मेलन सांस्कृतिक सम्मेलन कहलाने लगे तथा अय्याश मार्क्सवादी बुद्धिजीवी साहित्यकारों से दूरी बनाई जाने लगी।।
बुद्धिजीवी भी सरकार के समर्थन और विरोध में खड़े हो गए। पुरस्कार वापसी ने आग में घी का काम किया और सरकार के समर्थक पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित हो गए। आज बुद्धिजीवी मात्र एक गाली बनकर रह गया है। भोली-भाली जनता को सरकार के खिलाफ करने वाला अर्बन नक्सल नहीं तो फिर और क्या है।
समझदारी में कितनी बुद्धि और कितने विवेक का मिश्रण होना चाहिए, 40-60 के अनुपात में जिस देश में ईमानदारी-बेईमानी का मिश्रण होता हो, कहना मुश्किल है। आप अगर समान अनुपात में, बुद्धि का सदुपयोग करते हैं, तो व्यावहारिक और समझदार हैं। इससे कम ज़्यादा में आपके बुद्धिहीन अथवा बुद्धिजीवी होने का खतरा है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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