डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख फ्रेम में सजी तस्वीर। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०२ ☆

☆ फ्रेम में सजी तस्वीर… ☆

सुगंधा तीन विषयों में एम•ए• थी तथा हर कला में पारंगत थी।वह स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी।उसका विवाह एक बैंक कर्मचारी के साथ हुआ था।भरा-पूरा परिवार पाकर वह बहुत प्रसन्न थी।वह दिन भर घर के कामों में व्यस्त रहती तथा सबको खुश रखने की चेष्टा करती। वह सब की आशाओं पर ख़रा उतरने का भरसक प्रयास करती।

एक माह पश्चात् उसने स्कूल जाना प्रारंभ कर दिया। इसी बीच उसके पति ने एक योजना बनाई और उसे कार्यान्वित करने का अवसर तलाशने लगा। एक दिन उसने सुगंधा से कहा कि उसका मित्र मेडिकल अस्पताल में दाखिल है, उसे देखने चलेंगे।सो! उस दिन वह स्कूल से जल्दी लौट आई और तैयार होकर  पति के साथ जल दी।

वह बहुत खुश थी कि आज उसकी पिकनिक हो जाएगी और पति के साथ अकेले समय गुज़ारने का अवसर भी प्राप्त होगा। वे सीधे उसके मित्र के पास गये और उसका पति सुगंधा को अपने मित्र के पास छोड़कर उसकी दवाइयां लेने के बहाने, वहां से चला गया। इसी बीच वह सुगन्धा की पर्ची बनवा कर व उसका ट्रीटमेंट लिखवा कर लौट आया।   

सुगन्धा पति की प्रतीक्षा करते-करते थक गई थी। उसने आते ही पति से शिकायत की और उस ने क्षमा-याचना करते हुए उसे वापस घर चलने को कहा। रास्ते में उन्होंने होटल में खाना खाया और उससे कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा। रास्ते में उसने उसे बताया कि वह उसके नाम कुछ पैसा जमा कर पा रहा है… यह कागज़ उसी पॉलिसी के हैं।

वह मन ही मन फूली नहीं समा रही थी कि उसका भाग्य कितना अच्छा है… कितना अच्छा जीवन साथी मिला है उसे, जो उसका आवश्यकता से अधिक ख्याल करता है। वे दोनों हंसी-खुशी से देर रात घर लौट आए।

एक सप्ताह के पश्चात् सुगन्धा के श्वसुर ने उसके माता-पिता को बुलवाया तथा उसे घर ले जाने का फरमॉन सुनाया, जिसे सुनकर वे सकते में आ गये। उन्होंने उन पर इल्ज़ाम लगाया कि ‘उनके साथ धोखा हुआ है…उन्होंने अपनी पागल बेटी को उनके माथे मढ़ दिया है। इसलिए वे उसे अपने घर में नहीं रख सकते। इसके साथ ही उन्होंने उस पर यह भी आरोप लगाया कि उनकी बेटी चरित्रहीन है तथा वह स्वयं उनके बेटे से तलाक़ लेना चाहती है, जिसका प्रमाण वे अपनी आंखों से देख सकते हैं।

सुगन्धा के माता-पिता की बातें सुनकर उनके पांव तले से ज़मीन खिसक गयी। वे ग़ुहार लगा रहे थे कि उनकी बेटी सुशील है, पढ़ी-लिखी है, नौकरी भी करती है। सो! वे उस पर ऐसे घिनौने इल्ज़ाम लगा कर उन्हें शर्मिंदा न करें।

सुगंधा के आते ही उन्होंने उसे घर से निकल जाने को कहा। उसे काटो, तो खून नहीं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था– कि आखिर माज़रा क्या है? उसके नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। सुगंधा उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयास कर रही थी कि वह तो कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती। वह तो यहां पर बहुत खुश है।

इसलिए सुगन्धा ने अपने माता-पिता से लौट जाने का कहा कि वह स्वयं ही सब ठीक कर लेगी।उसने अपने पति के आने पर उससे सब कुछ कह डाला, परंतु ढाक के वही तीन पात। यह सब तो उनकी चाल थी। उसका पति किसी अन्य लड़की से विवाह करना चाहता था। इसलिए उसने माता-पिता की आज्ञा पालन हेतु उससे विवाह तो कर लिया, परंतु वह अपनी प्रेयसी को धोखा नहीं देना चाहता था। सो! उससे मुक्ति पाने के लिए उसने सुगन्धा को पागल करार कर दिया तथा कोर्ट में तलाक़ की अर्ज़ी लगा दी। रात के घने अंधकार में सुगन्धा को घर से बाहर निकाल दिया।

सुगन्धा के माता-पिता भारी मन से लौट गये, परंतु वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ यह सब क्यों और कैसे हो गया? उनका अनुमान था कि उसने पैसा देकर उसके पागल होने का प्रमाण-पत्र बनवाया होगा तथा पालिसी के बहाने तलाक़ के कागज़ों पर दस्तख़्त करवा लिए होंगे और सुगंधा ने पति पर विश्वास कर, आँखें मूंद कर उन कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे, जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ रहा है। एक पत्नी अपने पति से ऐसे विश्वासघात की कल्पना भी कैसे कर सकती है कि उसका जीवन-साथी उसके साथ ऐसा व्यवहार- विश्वासघात कर सकता है… जो सर्वथा ग़लत है, अशोभनीय है, अविश्वसनीय है, असंभव है। परंतु कलयुग में सब चलता है… ख़रा-खोटा, अच्छा-बुरा, मीठा-कड़वा।

गहन कालिमामयी अमावस्या की रात, आकाश में बादलों का गर्जन, सांय-सांय करती तेज़ हवाएं  सुगन्धा को भयभीत कर रही थीं। वह दरवाज़े की चौख़ट पर सिर टिकाए रात भर बैठी अपनी नियति के बारे में सोच रही थी और वह समझ नहीं पा रही थी कि विधाता ने उसे किस जन्म के कर्मों की सज़ा दी है? इस जन्म में तो उसने कभी कोई ग़लत काम किया नहीं, उसने तो कभी किसी के सामने अपनी ज़ुबान भी नहीं खोली… किसी को अप-शब्द तक नहीं कहे…घर से बाहर कदम भी नहीं रखा और न ही किसी के बारे में गलत सोचा है।

सुगन्धा पति के क़ारनामे को देख बहुत परेशान थी। अचानक एक कार वहां आकर रुकी, उसमें से एक व्यक्ति उतरा और उसने उसके श्वसुर का नाम लेकर घर का पता पूछा। सुगन्धा को काटो, तो खून नहीं।

वह असमंजस में थी कि वह उस अजनबी को वांछित पता बताए या चुप रहे। कार के मालिक ने पुन: प्रश्न दोहराया, परंतु उसने अनजान होने का नाटक किया।उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? मूसलाधार वर्षा में वह कहां जाए? वह अजनबी लौटकर वहीं आएगा और उसे घर के बाहर बैठा देख, प्रश्नों की झड़ी लगा देगा। सो! उसने निर्णय लिया कि वह वहां से चली जाएगी। पड़ोस के घर में जाकर दस्तक देगी और उनसे वहां रात गुज़ारने का अनुरोध करेगी। बहुत देर तक वह दरवाज़ा खटखटाती रही, परंतु कोई बाहर नहीं निकला। इसका कारण शायद तेज़ गति से होने वाली वर्षा रही होगी।

रात सुरसा के मुख की भांति लंबी होती जा रही थी। सुगन्धा सूर्य देवता के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रही थी। विवाह के बाद का एक-एक दृश्य सिनेमा के रील की भांति उसकी आंखों के सामने घूम रहा था। वह उस चक्रव्यूह से बाहर आने की कोशिश कर रही थी, परंतु उसे सफलता नहीं मिल पा रही थी।

वह रात भर सर्दी से कांपती रही। यह कंपन केवल ठंड की नहीं थी, भय व आतंक की थी। वह जानती थी कि रईसज़ादे, गुंडे, मवाली सब रात को अपने- अपने शिकार की तलाश में निकलते हैं। वह भगवान से ग़ुहार लगा रही थी कि जिस प्रकार उसने द्रौपदी की लाज बचाई थी; गज को मगर के पाश से मुक्त कराया था; होलिका की गोद में बैठे प्रह्लाद को अग्नि की लपटों से बचाया था… उसी प्रकार वे स्याह काली रात में, विचरण करने वाले निशाचरों से उसकी रक्षा कर अभयदान प्रदान करें।

सूर्य की प्रथम रश्मि ने भोर होने का संदेश दिया और उसके मन में विश्वास ने करवट ली। उसने पति के घर पर पुन: दस्तक दी। दरवाज़ा खुला और उसे सामने देख बंद कर लिया गया। उसने साहस बटोर कर दोबारा द्वार खटखटाया तो उसके पति ने उसे फटकारते हुए कहा कि ‘कितनी निर्लज्ज हो तुम… फिर लौट आई…लगता है अब तुम्हें धक्के मार कर  इस गली से बाहर करना पड़ेगा।’ उसने रोते हुए क्षमा -याचना की तथा घर के भीतर प्रवेश पाने की ग़ुहार लगाई।

परंतु उस घर के लोग तो थे संवेदनशून्य ‘औ’ हृदयहीन… शायद उनके दिल पत्थर के हो चुके थे, किसी को उस पर तरस नहीं आया। पैदल चलते- चलते स्टेशन पहुंच कर  उसने किसी यात्री से अनुनय-विनय की…वह उसे कोलकाता जाने का टिकट दिलवा दे। पहले तो उसने आश्चर्य से उसे देखा। परंतु उसके भीगे वस्त्र तथा अश्रुसिक्त नेत्रों को देख वह समझ गया कि वह मुसीबत की मारी हुई है। उसने उसे लोकल ट्रेन का टिकट दिलवा दिया।

वह हैरान-परेशान सी अपने माता-पिता के घर पहुंची, जहां से चंद दिन पहले ही वह रुख़्सत हुई थी। माता-पिता भाई-बहन सब ने उसे बड़े अरमानों से विदा किया था। उसने अपनी व्यथा-कथा उन्हें सुनाई और वहां से लौटने की हक़ीक़त से अवगत कराया।

घर में मातम-सा पसर गया। पिता सकते में आ गये और अपने भाग्य को कोसने लगे कि कितनी मुश्किल से उन्होंने पहली बेटी का विवाह किया था, जो ससुराल से लौटा दी गई। ‘लोग क्या कहेंगे… कैसी-कैसी बातें बनाएंगे और उसकी अन्य तीन बेटियों का क्या होगा?

एक महीने पश्चात् उसके पिता ने पंचायत में अर्ज़ी लगाई, परंतु कोई समाधान नहीं निकला। कोर्ट में दर्ज मुकदमे के फैसले का वे तीन वर्ष से इंतज़ार कर रहे हैं… शायद उसे दोबारा उसी नरक में धकेलने के लिए, क्योंकि बेटियां माता-पिता के घर आंगन में अच्छी नहीं लगतीं।

सब कुछ जानते हुए भी माता-पिता ऐसे विश्वासघाती लोगों के यहां पुन: भेजने में तनिक भी संकोच नहीं करते। भले ही वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि उनके चंगुल से बच कर उनकी बेटी कभी ज़िंदा नहीं लौटेगी। परंतु वे अपनी झूठी आन-बान-शान व मान-मर्यादा के लिए उसे नरक में धकेल देते हैं, क्योंकि वे समाज के खोखले नियमों व दकियानूसी मान्यताओं के आतंक से डरते हैं।

सुगन्धा स्वयं को असहाय व फ़ालतू वस्तु-मात्र अनुभव कर रही थी, जो निरुद्देश्य व निष्प्रयोजन होती है और उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि ‘जैसे वह एक तस्वीर है, जिसे सुविधानुसार दो-चार दिन बाद, घर की सफाई करते हुए कभी एक कमरे के कोने में और कभी दूसरे कमरे के कोने में टांग दिया जाएगा।’

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments