श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५८ ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय गणित दिवस : 22 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆
प्रातः काल समाचार पत्र से ज्ञात हुआ कि आज देश में गणित दिवस मनाया जाता है। गणित जैसा विषय जिसको याद कर हमारे पसीने छूट जाते हैं। पाठशाला के दिनों में क्या ही हाल हुआ करता होगा?
हमारी गणित की कमजोरी का लाभ सब से अधिक हमारे करीबियों ने उठाया था। बाल्य काल में मोहल्ले के बच्चे “छुपन छुपाया” के खेल में अस्सी, नब्बे गिन कर हमेशा, हम से ही ढूंढने का कार्य करवाया करते थे। बाकी सभी बच्चे मस्ती कर कहीं छुप जाते थे।
घर में जब सर्दी के दिनों में देसी घी और मेवे से बने लड्डू (पिन्नी) बनती थी, तब हमारे बड़े भाई अपनी गणित विषय की प्रवीणता के कारण हेरा फेरी कर हमारे हिस्से से टी डी एस काट कर अपने हिस्से में रख लेते थे।
घर आए मेहमान जब भी दो रुपए देकर जाते थे, बड़े भैया तीन भाई बहन में पता नहीं कौन से फार्मूले से बांटते थे, हम सब से कम राशि प्राप्तकर्ता हुआ करते थे। हो सकता है, दो बिल्लियों में बंदरबांट वाली कहानी उन्होंने बहुत पहले पढ़ रखी होगी।
आज भी बाज़ार में 70% तक की सेल का ऑफर हो या 10%+10% की छूट के गणित को बिना समझे ठगे चले आ रहें हैं।
गणित की कमजोरी का लाभ हमारे जिगरी दोस्त भी खूब उठाते हैं। ठेले पर जब गोल गप्पे खाने जाते है, हमारे हिस्से के एक दो गोल गप्पे, मित्र डकार ही जाते हैं।
अब और अधिक नहीं बताऊंगा, लेकिन पिछले चार दशकों से धर्मपत्नी भी हमारे द्वारा उनको दी गई धन राशि को कभी जरूरत के समय मांगने पर मय सूद वसूल ही लेती हैं, वैसे इस गणित से तो हम सब ही पीड़ित हैं।
© श्री राकेश कुमार
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