श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०४ ☆

?  आलेख – बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की धरती पर प्राकृतिक रूप से कभी शेरों का बसेरा नहीं रहा लेकिन वहां के इतिहास और संस्कृति की रगों में शेर किसी स्वदेशी जीव से कहीं अधिक गहराई तक समाया हुआ है। यह एक अद्भुत विरोधाभास है कि जिस देश के जंगलों में भेड़-बकरियां और लोमड़ियां घूमती थीं वहां की राजमुद्रा पर बबर शेर की दहाड़ अंकित है। वास्तव में शेर का ब्रिटिश साम्राज्य में आगमन सैन्य वीरता और शाही गौरव की चाहत का परिणाम था।

मध्यकाल के दौरान इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने अपनी अदम्य वीरता के कारण शेर को अपने ढाल पर स्थान दिया और वहीं से यह जीव ब्रिटेन की पहचान बन गया। तब शेर केवल एक पशु नहीं बल्कि एक ‘मेटाफर’ यानी रूपक था ,  संदेश था कि ब्रिटिश साम्राज्य शेर की तरह शक्तिशाली और निडर है। आज भी शाही प्रतीक चिन्ह में सुनहरी आभा लिए खड़ा शेर ब्रिटेन के आत्मविश्वास का परिचय देता है।

अनेक भव्य भवनों के प्रवेश द्वार पर प्राचीन दो  शेरों  की मूर्तियां नजर आती हैं।

ब्रिटेन के अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों की बात करें तो वहां की विविधता और भी रोचक हो जाती है। जहां इंग्लैंड का प्रतीक शेर है वहीं स्कॉटलैंड ने एक काल्पनिक जीव ‘यूनिकॉर्न’ को अपना राष्ट्रीय पशु चुना है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यूनिकॉर्न ही वह एकमात्र जीव है जो शेर को टक्कर दे सकता था। इसी प्रकार वेल्स का राष्ट्रीय पशु ‘ड्रैगन’ है जो वहां की लोककथाओं और संघर्ष की कहानियों का नायक रहा है। पक्षियों में ‘रॉबिन’ को वहां का राष्ट्रीय पक्षी माना जाता है जो अपनी सुरीली आवाज और लाल छाती के कारण सर्दियों के मौसम में भी जीवंतता का संचार करता है।

शेर का बाल कहानियों में नायक बनना भी इसी सांस्कृतिक सोच का रोचक विस्तार है। असल दुनिया में भले ही वह एक हिंसक शिकारी पशु हो लेकिन कहानियों में उसे एक न्यायप्रिय जंगल के राजा और नैतिकता के रक्षक के रूप में ढाला गया है। ब्रिटिश लेखकों ने शेर को शक्ति के ऐसे स्वरूप में पेश किया जो अन्यायी नहीं बल्कि अनुशासित है। यही कारण है कि लंदन के ट्रैफल्गर स्क्वायर पर बनी शेरों की विशाल मूर्तियां हों या बच्चों की कहानियों के पात्र यह जीव अब विदेशी नहीं बल्कि पूरी तरह ब्रिटिश मानस का हिस्सा बन चुका है। शायद शेर का ऐसा महत्वपूर्ण वर्णन वहां के शासकों को अलिखित शिक्षा देने की प्रेरणा भी सदियों से बना हुआ है।

लायंस क्लब की स्थापना में बबर शेर का नाम सिंह के राजसी सेवा भाव को प्रतिबिंबित करता है।

यह गौरवमयी यात्रा बताती है कि कोई जीव किसी देश का प्रतीक बनने के लिए वहां के भूगोल में मौजूद हो यह अनिवार्य नहीं है बल्कि वह वहां के लोगों के आदर्शों में जीवित होना चाहिए। ब्रिटेन ने शेर की हिंसक छवि के बजाय उसके राजसी गौरव को अपनाकर उसे अमर बना दिया है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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