सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मौन अंबर…।
रचना संसार # ७८ – गीत – मौन अंबर… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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तरस रहे बर्षा को हम सब,
मौन मगर बैठा अंबर है।
सूख गए आँखोँ के आँसू,
मन की धरती भी बंजर है।।
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दूर हुई परछाई अपनी,
अंतर्मन की पीर बढ़ी है।
मंजिल मिलना बहुत कठिन है,
झुलसाती तन धूप चढ़ी है।।
काँटों भरी डगर मिलती है,
दर्द भरा दिखता मंजर है।
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तरस रहे वर्षा को हम सब,
मौन मगर बैठा अंबर है।।
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तेज रवानी लहरों की है,
ओझल हुआ किनारा भी है।
मार्ग रोकती रात -दिवस है,
विकट समय की धारा भी है।।
फँसे हुए हम बीच भँवर में,
चुभा घात का भी ख़ंजर है।
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तरस रहे वर्षा को हम सब,
मौन मगर बैठा अंबर है।।
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व्यथित हुआ है जीवन सारा ,
बनी शूल की सेज हमारी।
झेल रहे हम विरह दंश नित,
चलती दिल पर रोज कटारी।।
हमको ताने का विष दे जग,
मार रहा मंथर-मंथर है।
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तरस रहे वर्षा को हम सब,
मौन मगर बैठा अंबर है।।
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रिक्त नेह के घट सारे हैं,
कुटिल मलिनता भरी हुई है।
पत्थर हृदय जमाना सारा ,
मानवता भी मरी हुई है।।
चातक मन नित प्यासा तरसे,
सूख हुआ तन भी पंजर है।
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तरस रहे वर्षा को हम सब,
मौन मगर बैठा अंबर है।।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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