डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख वर्तमान : सुंदरतम उपहार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०६ ☆

☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆

‘अतीत लैसन है, वर्तमान गिफ़्ट और भविष्य मोटिवेशन’…इस वाक्य में ज़िंदगी का यथार्थ अथवा प्रयोजन निहित है। अतीत हमें शिक्षा देता है; पाठ पढ़ाता है; अच्छे-बुरे की पहचान कराता है। सो! अतीत से लगाव मत रखिए … उसकी स्मृतियों को अपने ज़हन से निकाल बाहर फेंकिए, क्योंकि वे आपके विकास में बाधक-अवरोधक  होती हैं… आपको पथ-विचलित करती हैं। हां! अतीत में झांकिए, परंतु उसमें लिप्त मत रहिए… जो अच्छा है, उसे ग्रहण कीजिए; संजोकर रखिए और जो बुरा है, उसे सदैव के लिए त्याग दीजिए। अतीत अर्थात् जो गुज़र गया, कभी लौटकर नहीं आता…फिर उसके लिए शोक क्यों?

वर्तमान अर्थात् आज गिफ़्ट है, उपहार है…उसकी महत्ता समझिए; उसका सम्मान कीजिए और उसे प्राप्त कर खुशी का इज़हार कीजिए…जो भी आपको वर्तमान में मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ अभिवादन-अभिनंदन कीजिए… उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए और मासूम बच्चे की भांति निरीह-निश्छल भाव से प्रसन्नता प्रकट कीजिए। वास्तव में वर्तमान ही सत्य है, क्योंकि अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अर्थात् कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस! यही एक पल है। आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने न तू’ इस भाव को सार्थक करती हैं यह पंक्तियां… आज की अथवा वर्तमान की उपादेयता पर  प्रकाश डालती हैं। बुद्धिमान लोग आज में अर्थात् वर्तमान में जीते हैं; समय की महत्ता को स्वीकारते हैं और एक भी पल व्यर्थ नहीं जाने देते। चार्वाक दर्शन भी ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ सिद्धांत का पक्षधर है, संदेश-वाहक है और प्रयोगवाद व नयी कविता का क्षणवादिता का दृष्टिकोण भी हर पल को खुशी से जीने व भोग लेने की सीख देता है, क्योंकि वे नहीं जानते कि अगला पल आएगा या नहीं…यह शाश्वत सत्य है; परंतु अनास्था की पराकाष्ठा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वर्तमान की सार्थकता दर्शाते हुए हर पल को अंतिम पल  स्वीकार, कर्म-निष्ठता का संदेश दिया है। संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सो! वर्तमान में जीना सीखिए, यही ज़िंदगी का सार है।

भविष्य अनिश्चित है, परंतु वह हमारा प्रेरक है…जिससे तात्पर्य है कि मानव को जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और यह जानने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘वह कौन है और उसका संसार में आने का क्या प्रयोजन है? उसका लक्ष्य क्या है? लक्ष्य निर्धारण के पश्चात् ही आप उस लीक पर चल सकते हैं अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति में स्वयं को जी-जान से जुटा सकते हैं। इसके लिए हमारे पूजनीय माता-पिता, गुरुजन व धार्मिक ग्रंथ ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। सो! उनके प्रति श्रद्धा भाव रखना अपेक्षित है। परंतु आजकल तो यह ‘दूर के ढोल सुहावने’ वाली बातें मात्र जुमले बन कर रह गयी हैं। पहले वे हमारे आदर्श होते थे और हम उनके व्यक्तित्व को देख स्वयं को उसी रूप में ढालने में प्रयासरत रहते थे।

परंतु आजकल तो जीवन-मूल्य दरक़ रहे हैं…

उनका निरंतर पतन हो रहा है। सो! ‘यथा राजा तथा प्रजा’ चारों ओर अराजकता का वातावरण छाया हुआ है। सो! किसी से आस्था व विश्वास की अपेक्षा करना व्यर्थ है, निष्फल है, निष्प्रयोजन है। हिंसा, लूटपाट, अनाचार, अनास्था व भ्रष्टाचार के वातावरण में, जहां इंसान किसी भी कीमत पर अधिकाधिक धन कमाना चाहता है; वहीं उसके हृदय से स्नेह, प्रेम व सौहार्द के भाव नदारद होते जा रहे हैं। वह रिश्तों की अहमियत को नकार, परिवार की खुशियों को अपने हाथों बेदर्दी से रौंद डालता है और दूर… बहुत दूर निकल जाता है, जहां उसे अपने सभी बेग़ाने नज़र आते हैं। इस मन:स्थिति में वह केवल धन की महत्ता को सर्वोपरि मानता है और अपने परिवारजनों और परिजनों की अहमियत व अपेक्षा-आवश्यकता नहीं महसूसता।

धन-संपदा हमेशा साथ नहीं देते। लक्ष्मी स्वभाव से चंचल है… ‘आज यहां, कल वहां।’ सो! एक लंबे अंतराल के पश्चात् उसे अपने आत्मजों की याद आती है, जिन्हें समय की आंधी बहा कर बहुत दूर ले जा चुकी होती है। अब वे उसे लेशमात्र अहमियत भी नहीं देते और वह एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाता है। समय नदी की भांति सदैव बहता रहता है, कभी रुकता नहीं। इसलिए मानव को समय के महत्व व अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त करता व सचेत रहता है तथा उस ग़लती को नहीं दोहराता… ग़लत राह का अनुसरण भी नहीं करता। भविष्य हमें प्रेरणा देता है। सो! लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होना श्रेयस्कर है, जिसके लिए दरक़ार है… आत्मविश्वास व दृढ़ निश्चय की। हां! रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पाँव रखकर आगे बढ़ना ही हमारे धैर्य की परीक्षा है।

अब्दुल कलाम जी इसलिए ‘खुली आंखों से  सपने देखने की बात कहते हैं; बंद आंखों से नहीं।’ आप स्वयं को परिश्रम की भट्ठी में झोंक डालिए…अच्छे-बुरे का ध्यान रखते हुए, स्व-पर, राग-द्वेष व लाभ- हानि से ऊपर उठ जाइए… यही सफलता की कसौटी है। दूसरे शब्दों में संसार में आप व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बन कर जिएं, क्योंकि व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, व्यक्तित्व की  नहीं…वह अपने आदर्शों के रूप में सदैव ज़िंदा रहता है। परंतु यह तभी संभव है, जब हमारा लक्ष्य सामान्य मानव की तरह जीने का न हो अर्थात् संसार के समस्त प्राणी-जगत् में खाना-पीना सोना व सृष्टि-संवर्द्धन में सहयोग देना–तो सामान्य क्रियाएं हैं; परंतु मानव को प्रदत्त सोचने-समझने की शक्ति उसे  श्रेष्ठता प्रदान करती है। मानव का मस्तिष्क अर्थात् बुद्धि उसे शेष प्राणी-जगत् से अलग स्वरूप प्रदान करती है, जिसके बल पर वह सृष्टि पर आधिपत्य स्थापित कर सबको उंगलियों पर नचा सकता है। परंतु उसकी सकारात्मक सोच उसे ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ बनाने का सामर्थ्य रखती है। व्यक्तित्व अर्थात्  जिस पर दुनिया नाज़ करती है; उसके गुणों की चर्चा समस्त विश्व में होती है।  सब उसके गुणों का अनुसरण करते हैं; वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं और उसका सानिध्य पाकर वे स्वयं को धन्य अथवा सौभाग्यशाली स्वीकारते हैं। ऐसा व्यक्ति भले ही दुनिया से रुख़्सत हो जाए, परंतु वह मानव-मात्र के हृदय में समाया रहता है; सबके दिलों पर राज्य करता है। इसलिए मानव को व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बनकर जीने का सार्थक संदेश दिया गया है।

सोना अग्नि में तप कर ही कुंदन बनता है तथा उसकी चमक कीचड़ में गिरने के पश्चात् भी कम नहीं होती। इसलिए मानव का चरित्र भी कुंदन की भांति होना चाहिए, जिस पर आलोचनाएं प्रभावी न हो पाएं। सो! उसे स्थितप्रज्ञ होना चाहिए, जिस पर सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मान-अपमान व निंदा-स्तुति का लेशमात्र भी प्रभाव न हो। शायद! इसीलिए आलोचनाओं को साबुन स्वीकार कर उनसे अपने अंतर्मन में निहित अहं को धोने व त्यागने की सीख दी गयी है, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए उस से अपने भीतर छुपी दुष्प्रवृत्तियों …काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से मुक्ति पाने का आग्रह किया गया है। सो! हमें आलोचकों अर्थात् निंदकों को जीवन में श्रेष्ठ स्थान देना चाहिए तथा सबसे बड़ा हितैषी स्वीकारना चाहिए, क्योंकि वे ही तो अपना सारा समय आपको, आपके दोष-दर्शन कराने में नष्ट करते हैं। वे अपने समय को आपके हित व समुन्नत करने में प्रयोग करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन-कुटी छ्वाय’ अर्थात् निंदक को सदैव अपने निकट रखना चाहिए। इस तरह वे आप के विकास के निमित्त सदैव चिंतित रहते हैं और आपको व्यक्ति से व्यक्तित्व बनाने में उनका योगदान श्लाघनीय है, अविस्मरणीय है।

मानव को इन हितैषियों द्वारा सुझाए गए रास्तों का अनुसरण कर, अपने अंतर्मन को निर्मल रखना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग बिना साबुन पानी के आप को दोषों व अवगुणों से अवगत करा कर प्रसन्न होते हैं। वे आपके प्रति ईर्ष्या-भाव नहीं रखते, क्योंकि वे आपके हित-चिंतक होते हैं। वास्तव में मानव को ऐसे लोगों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जो नि:स्वार्थ भाव से आपको सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोत्कृष्ट बनाने में अपने जीवन का अनमोल समय रूपी धन निवेश करते हैं, जिसका लाभ आपको मिल सकता है। यदि आप सजग व सचेत होकर स्वयं में परिवर्तन व सुधार लाएंगे, तो आपकी गणना उत्तम श्रेणी के लोगों में होने लगेगी।

इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं, वे पंक्तियां ‘जो बाहर की सुनता है, उसका बिखरना निश्चित है और जो भीतर की सुनता है, उसका निखरना व संवरना निश्चित है, अवश्यंभावी है’…उपरोक्त विचारों की पोषक हैं। सो! आप व्यर्थ की आलोचनाओं से हताश-निराश न हों, बल्कि उनसे प्रेरित होकर स्वयं में सुधार लाएं। हां! लोग तो आपको बातों में उलझा कर आपको पथभ्रष्ट करना चाहते हैं। परंतु वही मनुष्य वास्तव में महान् है, जो उनके कटाक्षों व निंदा से विचलित होकर बिखरता नहीं… बल्कि अपने अंतर्मन की पुकार सुन कर संवर जाता है, निखर जाता है। सो! माया रूपी सांसारिक आकर्षणों के पीछे न भागें और न ही दूसरों की आलोचना, व्यंग्य- बाण व कटाक्षों से हैरान-परेशान हों, बल्कि उनकी उपेक्षा कर निरंतर आगे बढ़ते जाएं … यही मानव का लक्ष्य है। हमें अपने अतीत से सीख लेकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि वर्तमान ही सत्य है…उसे सुंदर बनाना अत्यंत कारग़र है, क्योंकि जो सुंदर होगा, कल्याणकारी अवश्य होगा। वर्तमान वह उपहार है, जो प्रभु-प्रदत्त है और आप उसे अपनी इच्छानुसार रूपाकार प्रदान करने में सक्षम हैं, समर्थ हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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