डॉ. मीना श्रीवास्तव
☆ कथा-कहानी ☆
☆ मेहनत की रोटी – भाग – २ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
श्री सचिन वसंत पाटील
‘हमें आप जैसे पढ़े लिखे उम्दा व्यक्ति की ही आवश्यकता थी। हम आपको खुशी-खुशी नौकरी पर रख लेते। लेकिन हमने अभी-अभी दो नए लोगों को नियुक्त किया है। देखते हैं, आगे चलकर जैसे ही हमें आप जैसे व्यक्ति की जरुरत महसूस होगी तो हम आपको तुरन्त सूचित कर देंगे’…… ऐसे ही कई मीठे शहद में घुले चिकने-चुपडे जवाब सुनकर विनायक बौखला गया। कितनों के नकारते शब्दों को पचना लिखा था किस्मत में कौन जाने!
उसके बचपन के लँगोटी-यार और कॉलेज के ज़माने के शहर एवं दूसरे गांवों के दोस्त, सब उससे कब के दूर हो गए थे। मुश्किल समय में और जरुरत के वक्त कोई उसे अपने पास खड़ा तक नहीं करता था। उसके जिन दोस्तों विश्वास था कि अंगूर का बाग लगाने के बाद विनायक को बहुत धन मिलेगा और वे उसे स्वार्थवश खाना खिलाते रहते थे, अब वे भी उससे कतराने लगे थे और दूरी बनाए रखने लगे थे। एक दिन विनायक की घरवाली ने उससे कहा,
“यह सब यूँ ही कितने दिन चलेगा?”
“मैं भी क्या करूँ, देख तो रहा हूँ।”
“ऐसा महज देखने से नहीं चलेगा। बच्चों की परीक्षाएं सर पर हैं| उनकी फीस भरनी है। रसोई का नमक मिर्च मसाला सब कुछ खत्म हो गया है …”
“जैसे मुझे यह सब मालूम ही नहीं!…..”
“पड़ोस के राजमिस्त्री चचा कहा रहे थे, ‘मेरे साथ, मिस्त्री के हाथ के नीचे काम करने को तैयार हो तो बता! तीन सौ रुपये रोजनदारी मिलेगी’।
“बड़ी सयानी बन गई हो! बी.कॉम. किया है मैंने…… राजमिस्त्री के हाथ के नीचे काम करूँ, यह कह रही हो?”
“तो फिर क्या करना ऐसे आड़े वक्त पर? आए वक्त के मुताबिक अपना ब्योहार नहीं बदलोगे क्या? जैसी जैसी हवा बहे, वैसे वैसे अपना रुख पलटते आना चाहिए……”
“अरी भागवान! मेरी शिक्षा तो देख! कहाँ तक पढ़ा हूँ!”
“आग लगे ऐसी शिक्षा को, क्या करूँ उसका? क्या मेरा चूल्हा जल पाएगा उस डिगरी के कागज से? पैसे के आगे आपकी शिक्षा की क्या खाक कीमत है?”
विनायक के पास इस सटीक सवाल का कोई जवाब नहीं था। उसे राजमिस्त्री के अधीन काम करना अपनी बेइज्जती लगती, और फिर खुद की शिक्षा देखते हुए यह काम बड़ा ही शर्मनाक लगता! कभी-कभी वह ताव में आकर कहता रहता, “शेर भूख से मर जाता है, लेकिन क्या कभी घास को मुंह लगाता है?”
विनायक की घरवाली रोज़मर्रा की पैसों की तंगी से बेहद क्लांत हो चुकी थी। उसने आजतक किसी तरह हर विपदा झेलते हुए यहाँ तक गृहस्थी धक्का मार मार कर खींचने का यथाशक्ति प्रयास किया है! लेकिन अब यहाँ से आगे घसीटना असंभव लग रहा है। उसका मानना है कि अब घर परिवार के वास्ते उसके पति को जो भी काम मिले, उसे कर लेना चाहिए।
नौकरी की तलाश में विनायक कई कारखानों, फाउंड्री (ढलाईघर), शोरूम, गोदाम एवं पुराने यारों के घरों के चक्कर लगाते लगाते थका हारा सांझ को घर लौटता था। हर शाम, उसकी पत्नी और बच्चे उदास चेहरों के साथ दरवाजे के चौखट से टिककर उसका इंतजार करते थे। आज की शाम हमारे जीवन में आशा की किरण लेकर आएगी। बाबा ने कहीं से पैसे लाए होंगे, हमारे लिए कुछ खाने की चीजें लाए होंगे, इसी उम्मीद से बच्चे उसकी बाट जोहते रहते। लेकिन हताशा में डूबकर पैरों को घसीटते आते विनायक गली के छोर पर देखकर पत्नी और बच्चे समझ जाते कि उसके पास अभी भी उनका पेट पालने के लिए कोई नौकरी नहीं है। पैसों का भी कोई ठिकाना नहीं है। पर उनके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकलता था। जो भी छोटा बड़ा निवाला रसोई में होता उसे मिल बांट कर पानी के साथ पेट में धकेलते।
इस विपन्नावस्था में विनायक को एक भयानक लत लग गई। वह हर सुबह-शाम टपरी पर जाने लगा। उसने टपरीवाले मालिक से दोस्ती करते हुए उसके साथ मटका जुआ खेलना शुरू कर दिया। उसकी सोच अब पक्की हो चुकी थी कि झटपट पैसा कमाने का यही एकमात्र तरीका था। खेती और नौकरी से तो यह कई गुना बेहतर था। आज की महंगाई के दौर में, एक रुपये के बदले साठ रुपये मटके के सिवाय ऐसे झटपट मिलने वाले और कोई सौदेबाज हैं ही नहीं। और तिसपर इसमें जोखिम भी कम है। अगर मैं दस रुपये दांव पर लगाऊँ, तो उसमें से छह तो निश्चित रूप से वापस मिल ही जाएंगे। अब तो विनायक का दृढ़ मत हो गया कि, मटका जुए के आलावा उसके पास अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालने का कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन विनायक को इस बात का रत्ती भर भी एहसास नहीं हुआ कि, यह तो अमीर बनने की उम्मीद में धीरे-धीरे गरीब होने का एक खतरनाक और गलत रास्ता था। हताशा के घेरे से बाहर निकलने की आशा में वह आंकड़ों के जाल में उलझ कर दांव पर दांव लगाए जा रहा था, इस उम्मीद में कि उसे चार पैसे मिल जाएंगे।
पहले दिन जब उसने मटके के आंकड़ों पर पैसे लगाए तब उसे दस रुपये की लागत पर सवा सौ रुपये मिले। यह देखकर उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। आई हुई सारी धनराशि उसने फिर आंकड़ों पर लगा दी। अब तो दिन रात वह आंकड़ों के बारे में ही सोचता रहता। उसके दिलो-दिमाग में आंकड़े इस कदर धूम मचाने लगे कि उनके आलावा उसे कुछ और नजर ही नहीं आता। सुबह सुबह उठते ही एक ही विचार का भूत उसपर सवार रहता कि आज ओपन क्या आएगा? शाम के ढलते ही क्लोज क्या आया यह देखकर ही वह निद्राधीन होता। उसकी जिंदगी अब इस ‘ओपन’ और ‘क्लोज’ के छोटेसे दायरे में कैद हो कर रह गई थी।
आजकल वह घर पर कभी कभार ही आता था। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा था। बुरी संगत के चक्कर में आकर अब तो उसने शराब पीना भी शुरू कर दिया था। वह घर में कभी कभार ही किसी से बातचीत करता; जब पत्नी की किचकिच शुरू हो जाती तो चुपचाप टपरी की ओर भागता। जब आंकड़ों पर लगाने के लिए यहाँ -वहाँ से पैसे मिलना बंद हो जाते, तो वह घर की चीजें चुराकर बेच देता था। इस कारण घर का सामान हौले हौले कम होता चला गया। पत्नी को शक के घेरे ने जकड लिया। घर में भी बात-बात पर कहा-सुनी होने लगी। नतीजन उसने घर आना ही बंद कर दिया। बस, फटी जेब के पैसे खत्म हो जाते, तभी वह घर आने लगा, पत्नी से झगड़ते हुए पैसे मांगने लगा। बच्चे मुंह लटकाए हैरान होकर अपने बाप की यह घिनौनी बहादुरी देखने पर मजबूर हो जाते। उसकी पत्नी के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया। पड़ोसी भी देते-देते थक चुके थे। रोज के मरे पर कौन आंसू बहाए?
बालों का जंगल बिखरा हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई! इस दयनीय अवस्था में विनायक गाँव में निरुद्देश भटकने लगा। उसके दिमाग में आंकड़ों के सिवा कोई अन्य विचार घुस नहीं पा रहा था। मानों वह बाढ़ के गहरे पानी में गोते लगा रहा था। वह एक ऐसे विकराल बवंडर में फँस गया था, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था। तेज तूफान उसके चारों ओर घूम रहा था। वह अपने होशोहवास पूरी तरह खो चुका था। आंकड़ों की मजबूत श्रृंखलाओं की भारी पकड़ में वह कैद हो गया था।
आंकड़ा निश्चित रूप से लगने के बारे में एकाध सही और अधिकतर गलत अनुमान लगाए जाते। सुबह उठते ही नाई का चेहरा देखना, या फिर किसी अखबार में छपे कार्टून की चौखट के अंदर एक गुप्त आंकड़ा दिखाई देना, जो अधिकांश रूप से सही बैठने का अंदेशा होता। बारम्बार हिसाब में आनेवाला एक ही आंकड़ा, सड़क पर दिखाई देनेवाले कारों के नम्बर, उन्हें जोड़कर आने वाला भाग्यशाली अंक, और ऐसे कितने ही आंकड़ा लगाने वालों के बेहिसाब तर्क-वितर्क लगते रहते।
विनायक का लगाया आंकड़ा कभी-कभी सही नहीं बैठता था। इस हार के ग़म को भुलाने हेतु वह खूब छककर शराब पीता था और कभी कभार नंबर लग जाने पर जश्न मनाने के लिए भी शराब ही पीता था। मतलब यह कि, शराब उसके हर मर्ज की दवा थी। अधिकतर मौकों पर उसका आंकड़ा ठीक बैठता नहीं था। फिर पिछले दिन की हार की भरपाई करने हेतु वह दोबारा ही नहीं बल्कि बारम्बार खेलता और उतनी ही बार हारता। आंकड़ों के मायाजाल ने उसे पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया था।
घरवाली उसके व्यवहार से बेहद तंग आ चुकी थी। बच्चे बेचैन और व्याकुल थे। कौन जाने उनकी सुचारु रूप से चलती सुन्दर गृहस्थी को किस मनहूस की नजर लग गई थी। कुछ ही दिनों में, काम से गए हुए एक बेकार, व्यसनी शराबी के रूप में उसकी बदनामी पूरे गाँव में फैल गई। कोई भी उसे अपने जूतों के पास तक फटकने नहीं देता था।
बीच-बीच में कभी कभार जब उसे होश आता, तो वह काम ढूंढने लगता। लेकिन एक पक्के शराबी और जुआरी आदमी को कौन काम देगा? जिसकी फूटी कौड़ी की भी आमदनी न हो, और तो और, जिसके मटके का और दारू का खर्चा सर पर चढ़ा हो! आखिरकार, उसने अपना खुद का घर बेचने का फैसला किया। सोचा, रहेंगे किसी सस्ते किराये के घर में या फिर गांव के बाहर की झोपड़पट्टी में। परन्तु यहाँ भी उसकी किस्मत रूठी हुई थी। घर बेचने में कई दिक्कतें आने लगीं। उसके चचेरे चचा ने होशियारी दिखाते हुए खेत के साथ साथ उसका घर तक अपने नाम करवा लिया था।
एक दिन उसके चचेरे चचा ने उसे घर से भगा दिया। उसने विनायक को धमकाते हुए कहा, “यह घर मेरा है। फिर कभी इस घर में कदम रखने की हिम्मत की, तो टाँग तोड़ कर रख दूंगा”; ऐसा कहते हुए उसके टूटे फूटे बर्तन बाहर फेंक दिए। अब तो विनायक बीवी-बच्चों समेत सड़क पर आ गया। उसने इस पर विरोध जताने की कोशिश की, लेकिन उसकी ताकत काफी कम थी। अपने चचेरे चचा के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर करना जरुरी था। लेकिन उसके पास पैसे थे ही नहीं। गांव का सरपंच भी चचा के पक्ष में हो गया था। ग्रामसेवक (‘ग्राम विकास अधिकारी’) भी उसकी बात तक सुनने को तैयार नहीं था। उसे गांव का कोई आदमी दरवाजे पर खड़े रहने नहीं दे रहा था। भला एक शराबी की बात कौन सुनता? कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने के लिए पैसा नहीं, ऊपर से अदालती मामले में बहुत समय लगना तय था। घर बेचकर पैसे जुटाने दूर रहे, उससे अधिक तो मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ रही थी। जितना सरदर्द बढ़ रहा था, उतनी शराब की लत भी बढ़ती जा रही थी।
घर हाथ से निकल गया, इसलिए बीवी-बच्चे बेघर हो गए। हताशा की पराकाष्ठा हो गई थी। उसकी पत्नी ने अपना सर फोड़ फोड़ कर लहू लुहान कर लिया। बच्चों ने रो रो कर बवाल मचाया। आखिर विनायक ने गांव के बाहर एक बड़ी ही गलिच्छ झुग्गी बस्ती में एक कमरा किराए पर लिया। पत्नी ने टूटे फूटे बर्तनों को जोड़कर किसी तरह अपनी गृहस्थी जोड़ी।
लेकिन इतनी बर्बादी होने पर भी विनायक का सिर अभी भी ठिकाने पर नहीं था। एक दिन वह अपनी पत्नी के गले का हार खींच कर ले गया। उसे सुनार को बेचने पर कुछ पैसे मिले। ‘आर या पार’ इस अंतिम विचार के साथ उसने वे सारे पैसे मटके में लगा दिए। उसे पूरा यकीन था कि आज मेरा आंकड़ा जरूर लगेगा। उसके एक ‘मटकेबाज’ दोस्त ने उसे यह ‘सलाह’ जो दी थी! अब वह नतीजे का इंतजार करने लगा।
दरअसल, आज वह बिलकुल ही नशे में नहीं था। उसकी बेचैनी चरमसीमा पर थी। उसने अपनी पत्नी के सुहाग का अंतिम गहना तक तुड़वा कर जुए में लगा दिया था। अगर आज आंकड़ा लगा तो लाखों रुपये मिलेंगे। अपनी सम्पूर्ण निर्धनता दूर हो जावेगी। बच्चों की परीक्षा की फीस, उनके कपड़े-लत्ते, घर का बाजार-हाट, घरवाली को साडी, और मैं भी टकाटक बनकर रहूँगा। ऐसा लिबास पहनूंगा कि, गांव वाले मुझे पहचान तक नहीं पाएंगे। कमीज पर नए फैशन का जैकेट, पैरों में चमकीले पॉलिश से दमकते चमड़े के भारी जूते…….. ऐसा बहुत कुछ तय कर रखा था विनायक ने! अब तो बस जेब गर्म होने की देरी थी! …..लेकिन ये तमाम सपने तब सच होंगे, जब आंकड़ा ठीक से बैठेगा…….. और अगर न लगा तो? उसका दिमाग ठंडा पड गया। उस डरावनी अवस्था के बारे में वह सोचना तक नहीं चाहता था…….. उसकी समूची दुनिया का विध्वंस हो जायेगा।
दूसरे दिन की सुबह का उजाला कुछ मटमैला ही लग रहा था……
वह पूरी रात करवटें बदलता रहा। सुबह होते ही बिना एक भी मिनट गंवाए सबसे पहले वह टपरी पर चला गया। बेक़रार दिल की धड़कनें तेज हो गईं थीं। मानों उनकी गिनती लगाते लगाते उसने ललचाई नज़रों से आंकड़े को देखा। वह पूरी तरह से सदमे से हिल गया, जैसे तेजी से बहते पानी के भंवर में उसकी जान फँस गई हो। उसे ऐसा लग रहा था मानों उसके पैरों तले ज़मीन खिसक रही है। उसने लागत का पैसा पूरी तरह खो दिया था। उसके सारे अनुमान बुरी तरह गलत साबित हो गए थे। एक एक पाई आंकड़े के चक्कर में डूब गई थी। उसका पूरा भरोसा आज के आंकडे पर टिका था, वहीं ध्वस्त हो गया। वह गलितगात्र होकर जमीन में धंसता जा रहा था। वह कुछ भी सोचने की स्थिति में नहीं था। उसका दिलोदिमाग सुन्न पड गया। कितने सुनहरे सपने देखे थे, वे सब चुटकी भर में चूर चूर हो गए थे… सोच सोच कर माथा घूमने लगा, अब घरवाली और बच्चों को कैसे मुंह दिखाऊं? उनका भरण-पोषण कैसे करूँ?
वह तंद्रा से जागा। नाक की सीध में दिखने वाली सड़क पर चलने लगा। उसे अपने गाँव से कहीं दूर भाग जाने की इच्छा थी। अनमनासा होकर वह काफी देर तक अकेला चलता रहा। नंगे पैर…
दोपहर बीत गई। शाम तक ढलने लगी। एक के बाद एक गाँव पीछे छूटते गए। लेकिन रास्ता खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। उसके पेट में खाने का एक दाना तक नहीं था। यूँ ही निरुद्देश चलते-चलते उसके हाथ-पैर थकावट के मारे चूर चूर हो गए थे। उससे एक भी कदम चला नहीं जा रहा था, सो वह सड़क के किनारे बैठ गया। दूर कहीं से ट्रेन की आवाज़ आ रही थी। अनायास ही उसके मन में बिजली की तरह एक विचार कौंधा! अभी, इसी वक्त रेल की पटरी पर अपने आप को झोंक दूँ और इस बदकिस्मत जीवन का अंत कर दूँ। आखिरकार ऐसे जीते जी मरने का क्या फायदा? रोज रोज तिल-तिल से मरने की बजाय एक ही बार मरना कहीं बेहतर है। हाय री मेरी फूटी किस्मत, जो मुझे ढंग से अपनी गृहस्थी चलानी नहीं आती, बच्चों की परीक्षा की फीस तक मैं भर नहीं पाता! और तो और बीवी के सामने अब यह मनहूस चेहरा लेकर कैसे जाऊँ? इससे तो बेहतर है कि इस व्यर्थ जीवन का अंत ही कर दूँ…….
उसके मन में छाया अँधेरा चहुँ ओर फैले अंधःकार को और भी गहराई प्रदान कर रहा था। दसों दिशाओं को आगोश में लेते अंधियारे में सर्प के समान सोयी रेल की पटरियों पर वह लेट गया। दिनभर सूरज की गर्मी और रेल गाड़ियों के आवागमन की तपिश को झेलती रेल की पटरियाँ अच्छी खासी गर्म हो गई थीं। उसे अपनी गर्दन पर उन पटरियों का गर्म स्पर्श महसूस हो रहा था। तभी एक विशालकाय रेलगाड़ी अपने विस्तीर्ण बाहु फैलाती उसीकी दिशा में बड़ी तेजी से बढ़ रही थी। रेलगाड़ी की आवाज़ एकदम नज़दीक आती जा रही थी। उसकी छाती की धड़कन उसी रफ़्तार से बढ़ती जा रही थी। एक पल के लिए मानों समूचा विश्व स्तब्ध हो उठा। उसका सम्पूर्ण शरीर उसे एक खोखले कंकाल की भांति प्रतीत हो रहा था। ….. रेलगाड़ी का धड़धड़ करता कम्पन……… बस कुछ पल और…… मृत्युदूत के पाश उसकी गर्दन को जकड़ने ही वाले थे…… भयग्रस्त होकर उसने अपनी आँखें मूँद लीं और एक ही क्षण में, उसकी आँखों के सामने चीथड़ों में लिपटी तस्वीरें कौंध गईं…हमारा घर…मेरी सोने जैसी अनमोल गृहस्थी…घरवाली और मेरे दो नन्हे-नन्हे लाडले बच्चे… मेरे जाने के बाद लावारिस होकर रह जाएंगे। वे गली-गली भटकते भीख मांगने पर मजबूर हो जाएंगे।
अचानक घबराकर वह रेल की पटरियों से एक तरफ हट गया मानों बिजली का जोरदार झटका लगा हो! कुछ ही क्षणों में, उस विकराल रेलगाड़ी का ढाँचा कर्णकर्कश सीटी बजाकर खड़खड़ाता हुआ उसके नजदीक से गुज़र गया।
वह कुछ देर तक यूँ ही आंखें मूँदकर सर को हाथों में थामे बैठा रहा। ट्रेन की धड़धड़ाती गूँज तो धीरे धीरे धीमी हो कर थम गई, लेकिन उसकी दिल की तेज धड़कन अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी…….. अपने घुटनों के बीच गर्दन दबाकर वह काफी देर तक अंधियारे में ख़ामोशी से बैठा रहा… मन के कोने में आशा का दीपक जलाए वह कुछ दृढ़ निश्चय करते हुए उठ खड़ा हुआ। अब वह घर की ओर चल पड़ा……. उसकी चाल में आत्मविश्वास था… वह हर कदम के साथ अपने सुनहरे भविष्य की दशा और दिशा माप रहा था।
वह सुबह जल्दी उठ गया। उसने घर के छत पर रखी कुदाल ढूंढकर निकाली। नहाते समय ही उसने उसे पानी में सलीक़े से धोकर साफ किया। आज उसने जो रास्ता चुना था, वह मेहनत से भरपूर था, उसके हर कदम पर कांटे बिछे थे। लेकिन वह ऐसा रास्ता था जिसपर चलने से उसके पसीने की एक एक बून्द में मोती जैसा निखार आने वाला था। लोग उपहास करेंगे तो क्या? चार दिन हंसेंगे, लेकिन ईमानदारी से कष्ट झेलने वाले हाथों को किसका डर होगा भला?
विनायक अपनी कुदाल कंधे पर रखकर राजमिस्त्री चचा के घर की ओर चल पड़ा। अब वह अपनी मेहनत से कमाई रूखी सूखी रोटी का मीठा स्वाद चखना चाहता था। उसकी पत्नी उसमें आए इस बदलाव से मन ही मन आनंदित होकर दूर जाती हुई उसकी स्वाभिमान से तनी हुई सुघड़ आकृति को अपलक निहारते जा रही थी। उसे भी बड़ी बेसब्री से इंतजार था आज की सुहानी रंगभरी शाम का!
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मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील
संपर्क – विजय भारत चौक, मु. पो. कर्नाळ, ता. मिरज, जि. सांगली. मोबा. ८२७५३७७०४९.
हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






