श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

सहस्त्रधारा देहरादून

सुबह दस बजे गेस्ट हाऊस से रवाना हुए। देहरादून से राजपुर सड़क से दाहिनी तरफ़ के रास्ते पर 16 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है रामपुर। इस गांव में बहने वाला गंधक झरना अपनी औषधीय गुणों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है की त्वचा से जुड़ी बीमारियों के लिये इस झरने से बहने वाला पानी बहुत उपयोगी होता है। विश्वास है कि इस झरने के पानी से नहाने पर कई तरह के त्वचा रोगों को खत्म किया जा सकता है।

पहाड़ियों के बीच से रिमझिम बारिश के साथ चलते हुए सहस्त्रधारा पहुँच गए। इस जगह का नाम सहस्त्रधारा रखे जाने का कारण बहुत रोचक है, इस जगह के पास स्थित पहाड़ो में बहुत छोटी-छोटी गुफाएं बनी है। इन सभी छोटी-छोटी गुफाओं के अंदर से बूंदों के रूप मे लगातार पानी टपकता रहता है। यह पानी एकत्र होकर बहुत सारी छोटी-छोटी धारा के रूप में आगे बढ़ता है। यहाँ बहने वाली पानी की छोटी-छोटी धाराएँ तलहटी में पहुंच कर एक बड़ी धारा का रूप ले लेती है इस वजह से इस जगह को सहस्त्रधारा कहा जाता है। पहाड़ो की तलहटी में बसे होने की वजह से प्राकृतिक रूप से भी बहुत ज्यादा सुंदर और मनमोहक जगह है। वर्तमान में सहस्त्रधारा एक पारिवारिक पिकनिक स्पॉट के रूप में बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है।

मालसी डियर पार्क देहरादून

सहस्त्रधारा से देहरादून वापस लौटते समय राजपुर सड़क पर स्थित मालसी डियर पार्क पहुँचे। 22 एकड़ में फैला हुआ यह डियर पार्क परिवार और बच्चों के लिए सबसे शानदार जगहों में से एक है। इस पार्क के अंदर डियर के अलावा अन्य वन्यजीवों में मोर और नीलगाय, जैसे जानवर और पक्षी दिखाई देते है। बच्चों के मनोरंजन के लिए पार्क कुछ झूले भी लगाए हुए है। सप्ताहांत में स्थानीय निवासी मालसी डियर पार्क में आना बेहद पसंद करते है।

रोबर्स केव (गुचुपानी) देहरादून

रोबर्स केव देहरादून से 8 किलोमीटर दूर अनारवाला गांव में स्थित देहरादून का सबसे ज्यादा रोमांचक पर्यटक स्थल है। स्थानीय निवासी रोबर्स केव को गुचुपानी के नाम से पुकारते है। रोबर्स केव एक प्राकृतिक गुफा है जिसकी लंबाई लगभग 600 मीटर है।

इस गुफा की सबसे रोमांचक बात यह है की इस गुफा में पूरे साल घुटनों तक पानी बहता रहता है, इसलिए जब आप इस गुफा में प्रवेश करते है तो आपको एक अलग ही रोमांच महसूस होता है। आप जैसे-जैसे रोबर्स केव में अंदर जाते है तो कई जगह गुफा सँकरी हो जाती है। इस गुफा में वैसे तो पानी के मुख्य स्त्रोत अभी तक पता नहीं चला है लेकिन गुफा के अंदर लगभग 10 मीटर ऊंचाई से एक झरना गिरता है।

स्थानीय निवासियों का ऐसा मानना है की बहुत पहले इस जगह का उपयोग चोर और डाकू छुपने के लिए किया करते थे इस वजह से इस गुफा को रोबर्स केव के नाम से जाना जाने लगा। रोबर्स केव के आसपास स्थानीय निवासियों ने खाने पीने की दुकाने लगा रखी है। गुफा में आप के जूते या सैंडल खराब ना हो इसलिए अंदर पानी में चलने के लिए रोबर्स केव के पास आपको चप्पल भी किराए पर मिल जाएगी।

टपकेश्वर मंदिर देहरादून –

देहरादून से 5.5 किलोमीटर दूर गढ़ी केंट में एक प्राचीन शिव मंदिर है। यह प्राचीन शिव मंदिर गढ़ी केंट में बहने वाली एक छोटी नदी के किनारे पर बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। टपकेश्वर मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।

आज भी इस प्राचीन शिवलिंग पर चट्टान से लगातार पानी की बूंदे टपकती रहती है इसलिये इस मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से पुकारा जाता है। टपकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक छोटी नदी भी बहती है जिसमें यहाँ आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु नहाने का आनदं भी ले सकते है।

इस मंदिर और इस स्थान को लेकर गुरु द्रोण और उनके पुत्र अश्वथामा को लेकर एक रोचक कथा प्रचलित है। एक बार की बात है गुरु द्रोण के पुत्र अश्वथामा को एक बार बहुत जोर से भूख लगती है तो वह अपने माता पिता से पीने के लिए दूध मांगते है। गुरु द्रोण अपने पुत्र के दूध की मांग को पूरा करने में असमर्थता दिखाते है। गुरु द्रोण की इस बात से दुखी होकर अश्वथामा उसी समय भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लग जाते है। कुछ समय के बाद अश्वथामा की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव तपस्या स्थल पर पर दूध की धारा बहा देते है और इस प्रकार अश्वथामा की भूख शान्त होती है। कहते हैं उस समय के बाद से ही यहाँ स्थित गुफा की चट्टान से शिवलिंग पर दूध की बूंदे टपक रही है। हमें दूध की बूँदें नहीं दिखीं। वहाँ एक पंडित जी ने बताया कि पापियों को दूध की बूँदें नहीं दिखतीं।

फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट देहरादून

देहरादून में स्थित वन अनुसंधान संस्थान भारत का सबसे बड़ी प्राकृतिक अनुसंधान संस्थान है। देहरादून के घण्टाघर से वन अनुसंधान संस्थान की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है। भारत में इसका निर्माण 1906 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान किया गया था। इस संस्थान की इमारत अपने ग्रीक-रोमन वास्तुशैली में बने हुए होने के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्घ है। वन अनुसंधान संस्थान की इमारत का आकार भी इसकी प्रसिद्ध का बहुत बड़ा कारण है, यह इमारत लगभग 450 हेक्टेयर क्षेत्र में बनी हुई है।

वन अनुसंधान संस्थान में वानिकी से जुड़े छह संग्रहालय बने हुए है। इन छह संग्रहालय में जंगल-विज्ञान, कीट-विज्ञान, सामाजिक वानिकी, गैर-लकड़ी से बने वन उत्पाद, प्रकृति विज्ञान और लकड़ी की अलग-अलग किस्म का प्रदर्शन किया गया है। इस संस्थान में संग्रहालय के अलावा यहाँ बना हुआ उद्यान भी पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र रहता है। फ़िल्म इंडस्ट्री की कुछ बड़ी फिल्मों का फिल्माकंन भी इसी वन अनुसंधान संस्थान में किया गया है। वनस्पति विज्ञान और जंगल विज्ञान से जुड़े हुए लोगों के लिए यह संस्थान किसी खजाने से कम नहीं है। वन अनुसंधान संस्थान के अंदर फोटोग्राफी पूरी तरह से प्रतिबंधित है। 

झंडा जी दरबार साहिब

देहरादून में झंडा दरबार साहिब सिख समुदाय की धार्मिक आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है, और देहरादून के नामकरण का इतिहास भी झंडा गुरु दरबार साहिब से जुड़ा हुआ है। बाबा राम राय (1745-1687) सातवें सिख गुरु हर राय के सबसे बड़े पुत्र और आठवें गुरु हर कृष्ण दास के भाई थे। औरंगज़ेब ने आठवें गुरु हर कृष्ण दास और राम राय में फूट डालने के उद्देश्य से राम राय को दिल्ली में सिक्ख पंथ की जड़ें मज़बूत करने हेतु कई सहूलियतें दीं और जिस जगह आज देहरादून आबाद है वहाँ गुरुद्वारा स्थापना हेतु मदद दी।

मंदिर का केंद्रीय परिसर गुरु राम राय की मृत्यु के बारह साल बाद 1699 में पूरा हुआ था, और पूरा संरचनात्मक कार्य 1703 और 1706 के बीच समाप्त हो गया था; माना जाता है कि संरचना के पूरा होने के बाद भी अलंकरण और पेंटिंग का काम लंबे समय तक चलता रहा। गुरु राम राय की पत्नी माता पंजाब कौर ने निर्माण कार्य की देखरेख की और 1741/42 में अपनी मृत्यु तक दरबार के मामलों का प्रबंधन किया।

राम राय सिख धर्म में एक अपरंपरागत संप्रदाय, रामरायस के संस्थापक थे। उन्होंने गुरु राम राय दरबार साहिब की स्थापना की, जो देहरादून में एक गुरुद्वारा है जिसे इंडो-इस्लामिक वास्तुकला शैली में बनाया गया था। उन्होंने गढ़वाल के समकालीन महाराजा फतेह शाह से राम राय को हर संभव मदद देने के लिए कहा। प्रारंभ में, धमावाला में एक गुरुद्वारा (मंदिर) बनाया गया था। वर्तमान भवन, गुरु राम राय दरबार साहिब का निर्माण 1707 में पूरा हुआ था। दीवारों पर देवी-देवताओं, संतों, संतों और धार्मिक कहानियों के चित्र हैं। फूलों और पत्तियों, जानवरों और पक्षियों, पेड़ों, नुकीली नाकों वाले समान चेहरे और मेहराबों पर बड़ी-बड़ी आँखों के चित्र हैं जो कांगड़ा-गुलेर कला और मुगल कला की रंग योजना के प्रतीक हैं। ऊंची मीनारें और गोल शिखर मुस्लिम वास्तुकला के नमूने हैं। सामने 230 गुणा 80 फीट का विशाल तालाब वर्षों से पानी की कमी के कारण सूख गया था। लोग कूड़ा फेंक रहे थे; इसे पुनर्निर्मित और पुनर्जीवित किया गया है। मुगल शैली से बनी हुई एक इमारत है।

झंडा गुरु दरबार साहिब में प्रत्येक वर्ष झंडा पर्व मनाया जाता है। देहरादून में होने वाला यह झंडा पर्व होली के दिन से पांच दिन बाद मनाया जाता है जो आठ दिन तक चलता है। यहाँ होने वाले झंडा पर्व में लाखों की संख्या में गुरु राम राय के अनुयायी और सिख धर्म से जुड़े हुए श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते है।

बुद्ध मोनेस्ट्री

देहरादून से 11 किलोमीटर दूर स्थित बुद्ध मोनेस्ट्री जिसे Mindrolling Monastery के नाम से भी जाना जाता है। बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने के लिये इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कुछ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा गया। जापानी वास्तुशैली में निर्मित इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कार्य 1965 में पूरा हुआ।  

बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले और बहुत सारे देशी और विदेशी पर्यटक आते है। इस बौद्ध मंदिर के प्रमुख आकर्षण केन्द्र यहाँ स्थित 103 फ़ीट ऊंची भगवान बुद्ध की प्रतिमा और मंदिर के अंदर बनाई गई सुंदर पेंटिंग्स है। इन पेंटिग्स में भगवान बुद्ध के पूरे जीवन को बहुत ही सुंदर तरीके से उकेरा गया है।

इसके अलावा इस मंदिर की पांच मंजिला इमारत भी अपने वास्तुकला की वजह से पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। इस मंदिर की इमारत की ऊंचाई कुल 220 फ़ीट है और मंदिर की चौथी मंजिल से बहुत ही मन मोहक प्राकृतिक दृश्य दिखाई देते है। यहाँ आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिये मंदिर के परिसर में ही खाने पीने की दुकानें बनी हुई है और अगर आप की बौद्ध धर्म में रुचि है तो आप यहाँ से बौद्ध धर्म से जुड़ी पुस्तकें भी खरीद सकते है।

देहरादून के आस पास घूमने के लिए कुछ प्रसिद्ध पर्यटन स्थल  – धनोल्टी, नई टिहरी, टिहरी झील, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, नाग टिब्बा, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान, मालसी डियर पार्क, मसूरी, हरिद्वार, चम्बा, दशावतार मंदिर, जोरांडा फाल्स, बरेहिपानी और न्यू टेहरी टाउनशिप, माताटीला डैम और देओगढ़ किला है। पर्यटक यहाँ पर कई एडवेंचर स्पोर्ट जैसे रिवर राफ्टिंग, बंजी जम्पिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, हाईकिंग और ट्रैकिंग का आनंद भी ले सकते हैं। पेशेवर कैंप पर्यटकों को रुकने के साथ साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करते है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments