डा. विजय चौरसिया
☆ पुस्तक चर्चा ☆ टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ समीक्षा – डा. विजय चौरसिया ☆
पुस्तक – टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड
लेखक – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
प्रकाशक – ज्ञानमुद्रा, भोपाल
☆ भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा ☆ डा. विजय चौरसिया ☆
भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा पुस्तक एक एतिहासिक कथा साहित्य है। यह उपन्यासिक कृति 19वीं सदी के महान आदिवासी जननायक के संघर्ष, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनके विद्रोह और गरीबों के प्रति उनकी दरियादिली को रेखांकित करती है। यह भारत के आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा, देश भक्त स्वतंत्रता सेनानी की खोई पहचान को सामने लाती है। विवेक रंजन श्रीवास्तव ने राबिनहुड टंट्या मामा को एक योद्धा, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और दूरदर्शी नेता के रुप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में दमनकारी जमींदारी प्रथा और अंग्रेजी शासन के खिलाफ आदिवासी समुदाय के एकजुट संघर्ष को दर्शाया गया है। वह राबिनहुड की तरह जंगलों में रहता है। उसके साथी भो वैसे ही गरीब, वंचित जुल्म के शिकार पर अदम्य साहसी लोग हैं। वह अमीरों और अंग्रेज अधिकारियों पर धावा बोलता है और उनकी दौलत लूटकर आदिवासी बस्तियों में बांट देता है।
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र”
टंट्या मामा को लोक मानस में एक ईश्वर तुल्य जननायक, मसीहा और आदिवासी नायक के रुप में जो पहचान मिली थी उसे उसी स्वरूप में सफलता पूर्वक प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी है बल्कि यह अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रतीक को सजीव करती है। टंट्या ने जल-जंगल-जमीन की लडाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था, किन्तु उन पर अब तक कोई भी कथा साहित्य नहीं था, परिचयात्मक जीवनीयों को पढ़कर उसे कथा रूप में लेखक ने रोचक प्रवाहमान प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है।
पुस्तक की भाषा सरल है, जिससे यह बच्चों और किशोरों के लिए भी पढ़ने योग्य है। पुस्तक आज के समय भी आदिवासी अधिकारों और अस्मिता के संघर्ष को उजागर करती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए आवश्यक है, जो भारतीय स्वतंत्रता सग्राम के अनसुने नायकों और आदिवासी संघर्षों के बारे में जानना चाहते हैं।
भारत के बहुसंख्यक बहुजनों के न केवल इतिहास बल्कि उनके बेहतर भविष्य की चाहत रखने वाले हर व्यक्ति को यह किताब जरुर पढ़ना चाहिए, पुस्तक भारतीय इतिहास को देखने के लिए नई दृष्टि प्रदान करती है।
भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा के लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव ने कठिन परिश्रम कर टटया मामा का इतिहास खोजकर उसका पुस्तक रुप दिया है, मैं उन्हें इस कार्य की बधाई देता हूं।
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© डा. विजय चौरसिया
लोकसंस्कृतिकार
चौरसिया सदन, गाडासरई जिला – डिन्डौरी (मध्यप्रदेश)
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/ सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







