प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
☆ संस्मरण ☆ गाँव से शहर तक ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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तब मैं गाँव के स्कूल से पढ़कर नया-नया शहर कालेज की पढ़ाई करने पहुँचा था। चूंकि मुझे कविताएं लिखने का शौक था, इसलिए मैं शहर आने के बाद विभिन्न अवसरों पर कविताएँ लिखकर अखबारों -पत्रिकाओं में छपने भेजने लगा। ऐसे ही क्रिसमस पर मैंने ईसामसीह पर कविता लिखकर “करुणा के मसीहा- ईसामसीह” अखबारों को छपने भेज दी। जो ठीक क्रिसमस के दिन प्रकाशित हुई, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।
शाम को मुझे उसी शहर के चर्च के फादर का अर्जेंट बुलावा आया। इस पर मैं चिंतित हुआ कि कहीं मुझसे कोई मिस्टेक तो नहीं हो गई। तो मैं डरता-झिझकता शाम को चर्च के फादर से मिलने पहुंचा। वहां मेरे पहुंचते ही फादर ने पूछा कि तुम मिस्टर खरे हो। मेरे हां करते ही वे बोले आपने ही ईसा मसीह जी पर कविता लिखी है। मेरे हां कहते ही वे बोले वेरी नाइस। आपने बहुत ही शानदार कविता लिखी है। आपको यहाँ अभी होने जा रहे कार्यक्रम में सम्मानित करने बुलाया गया है। आपको अपनी कविता स्टेज से सबके सामने पढ़ना है, और सम्मान भी लेना है।
स्टेज से मैंने कविता सबको तरन्नुम में सुनाई, सबसे खूब वाहवाही मिली, और बुके के साथ मोमेंटो भी मिला, जो ईसा की कांच के शो-केस में मढ़े ईसा मसीह की फायबर की मूर्ति थी।
यह सम्मान पाकर मैं हर्ष में भर गया। आज भी उस क्रिसमस की याद आने पर मैं झूम उठता हूं। इस तरह मेरा गाँव से शहर आना मेरे लिए बहुत बड़ा वरदान बन गया।
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© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661
(मो.9425484382)
ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






