श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “संस्कारधानी मेरा अपना शहर ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ ☆

🌻आलेख🌻संस्कारधानी मेरा अपना शहर 🌧️

आइये जबलपुर के बारे में कुछ अंश  आपको बता रही हूंँ। ताल तलैया से घिरा हुआ माँ नर्मदा तट पवित्र स्थल जहाँ की संगमरमर की चट्टानें विश्व प्रसिद्ध है।

यहाँ के घाट, गौरी घाट, उमा घाट, तिलवारा घाट, भेड़ाघाट, ऐसे घाटों से सजा जिसमें 52 ताल और 84 छोटी तलैया शामिल है। इस कारण इसे तालों का शहर भी कहा जाता है।

इसका मुख्य नाम जाबालिपुरम था। जो हमारे जाबालि ऋषि के नाम पर पड़ा। इसे त्रिपुरा और गढा नाम से भी जाना जाता है।

मूलतः कलचुरी काल में त्रिपुरा उनकी राजधानी थी और गोड काल में गढ़ा प्रमुख  स्थल था। ऋषि जाबालि की तप स्थली होने के कारण इसे जाबालिपुरम कहा गया जो बाद में रूप बदलते- बदलते जबलपुर हो गया।

जबलपुर को हमारे संत श्रद्धेय विनोबा भावे जी ने संस्कारधानी घोषित किया। उनका दिया हुआ यह उपहार जीवनपर्यंत जबलपुर वासी अपने नाम और पता के साथ संस्कारधानी लिखते हैं।

पौराणिक गाथा है रानी दुर्गावती का साम्राज्य जिन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हुए रानी दुर्गावती का साम्राज्य इसे कहा जाता है और जबलपुर में संस्कार, प्रीत, गीत, जीव, जल और सुंदर से सुंदर मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है। यहाँ पर माँ भगवती की तीन मुँह वाली मूर्ति जो तेवर में भी विराजी है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध है।

यहां पर माँ भगवती महाकाली महालक्ष्मी मां सरस्वती के एक ही पत्थर पर तीनों देवियों का मुँह जुड़ा हुआ है। हजारों की संख्या में रोज यहाँ दर्शन करते हैं। सुबह से शाम तक माँ भगवती का प्रसाद भंडारा के रूप में प्राप्त होता है।

चारों तरफ पहाड़ से घिरे होने के कारण इसे जल संग्रहण का मुख्य स्थल माना गया। माँ नर्मदा की असीम कृपा यहाँ पर बहुत सारे ऐसी अनुसंधान और योगशाला भी बनाई गई और जगह-जगह जल संरक्षण को महत्व दिया गया। एक प्रकार से पर्यावरण को बढ़ाया गया।

यहाँ पर भारत में युद्ध में होने वाले ट्रक,  गोला बारुद का निर्माण होता है। और यह निर्माण खमरिया फैक्ट्री जबलपुर में होता है। आज भी जब  सैनिक युद्ध के लिए निकलते हैं तो जबलपुर का ट्रक ट्रैक्टर और बड़ी-बड़ी तोप गाड़ी जबलपुर के ट्रेडमार्क से दिखाई देती है।

मध्य प्रदेश का हृदय स्थल बीच में होने के कारण जबलपुर सारी जगह से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर हमारे महाभारत काल के साम्राज्य को भी शताब्दी कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है।  गौड़ शासको के समय संग्राम शाह का यहाँ पर अधीनस्थ ग्रह मंडल का निर्माण भी बताया गया है जो हमारे समृद्ध और प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं।

रेल मार्ग बस सेवा और वायु सेवा निरंतर चारों दिशा और चारों ओर जाने का मुख्य जंक्शन स्टेशन जबलपुर है। यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण किला मदन महल का किला है जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। 11वीं शताब्दी का गोंडवाना साम्राज्य के विरासत को आज भी दर्शाता है। इसका निर्माण गोड़ राजा मदन सिंह ने करवाया था।

यहाँ पर भेड़ाघाट में कई फिल्मों की शूटिंग पहले भी हुई अब भी होती है और लगातार फिल्मी दुनिया को भेड़ाघाट की संगमरमर की दुनिया पसंद आती है। यदा कदा छोटी बड़ी फिल्में यहाँ हमेशा बनती दिखाई देती है।

दुर्गावती का किला और दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की शान को और भी बढ़ता है। यहाँ पर नित्य प्रति मां नर्मदा की आरती इतनी सुंदर होती है कि हजारों की संख्या में यहाँ के श्रद्धालु नियमित शामिल होते हैं और पुण्य के भागीदार होते हैं।

जबलपुर का क्षेत्रफल 5211 वर्ग किलोमीटर है और यह पूर्ण रूप से नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक विरासत, जबलपुर को माँ नर्मदा के कारण अत्यंत धरोहर के रूप में मिला है। आज भी यहां पर 64 योगिनी मंदिर अपनी कहानी 11वीं सदी के विरासत को दर्शाता है।

जबलपुर का खानपान रहन-सहन अत्यंत सादगी और रुचिकर है। दूसरे शहरों में आप दिनचर्या में ₹500 में आप दिन भर नहीं बिता सकते यहाँ पर खाने की इतनी अच्छी व्यवस्था है और साधु संतों के डेरो पर तो भोजन प्रसादी मुफ्त में। बस आप माँ नर्मदा की आश्रय में हो जाइए।

विदेशी पर्यटक का विशेष आकर्षण भेड़ाघाट की संगमरमर वादियाँ है। जहाँ सदैव नौका विहार होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर चाँदनी रात का नौका विहार प्रसिद्धि और समृद्धि को दर्शाता है।

जबलपुर तीनो जल सेना थल सेना और वायु सेवा की टुकड़ी का केंद्र है। जहाँ पर आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर शानदार परेड और उनकी कलाकारी देखने को मिलती है।

वायुयान सेवा में सुविधाजनक यात्रा कर सकते है। जबलपुर की सबसे ऊंची इमारत कटंगा टीवी टावर के नाम से प्रसिद्ध है। जो 1992 में दूरदर्शन टेलीविजन नेटवर्क के लिए तैयार किया गया था और इसे ही  सैनिक को सलामी देने के लिए विशेष अवसरों पर इसे रोशन किया जाता है।

जबलपुर की रानी दुर्गावती यहाँ की गौड़ साम्राज्ञी थी। उनकी समाधि पर  भी श्रद्धा से गौड़ समाज ही नहीं वरन संपूर्ण जबलपुर वासी नतमस्तक होते हैं।

सदियों से इस शहर पर कई राजवंशों का शासन रहा है। जिसमें गोड़ मराठा और ब्रिटिश भी शामिल है। वास्तु कला खानपान संस्कृत साहित्य और सादगी से परिपूर्ण जबलपुर एक अनूठी छाप छोड़ता है।

जो एक बार आता है यहाँ का होकर ही रह जाता है। राजनीति से संबंधित इसे बीजेपी का गढ़ कहा जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान जबलपुर की धरती को जब भी आते हैं चंदन जैसा लगाना कहते हैं। जबलपुर का मौसम बहुत ही सुहाना होता है। जब बारिश होती है तो ताल तलैया नदी नाले सब भरे हुए और उस पर हमारा जबलपुर एक सीप की तरह दिखाई देता है।

भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है कहा जाता है यहाँ के तट से भी आप कंकर पत्थर उठाकर ले जाएं उसे विधिवत पूजा नहीं करना पड़ता उसे स्थापित कर – – – हर कंकर शंकर होता है। माँ नर्मदा जी के तट को भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है।

नगरी चुनाव उपनगरी चुनाव ग्राम पंचायत सांसद विधायक सभी जबलपुर की शान को और भी बढ़ा देते हैं। लिखने को तो बहुत सारी बातें हैं जबलपुर पर जितना लिखूं काम ही होगा। परसाई महादेवी वर्मा हिंदी के प्रसिद्धता को बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान और अमिट छाप छोड़ गए हैं। जिसके कारण जबलपुर को साहित्यिक धरोहर भी कहा जाता है। घर-घर में तीज त्यौहार उतने ही शौक से मनाया जाता है जितना मंदिर पर भगवान की आरती।

यहां का दशहरा यानी क्वार की नवरात्रि पर माँ भगवती दुर्गा की आराधना जो होती है अतुलनीय अद्भुत और स्मरणीय होती है।

हर बार बृहद और नया। कभी समय मिले या घूमने का मन बन जाए तो जबलपुर जरूर आईयेगा। हमारे जबलपुर की शान भंवर ताल गार्डन शंकर चौरा जहाँ पर भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। सप्त ऋषियों का मूर्ति गार्डन पर विराजित हुआ हुआ है।

और मेडिकल कॉलेज से लेकर, अस्पताल रेलवे अस्पताल मिलिट्री अस्पताल और सुख सुविधा पूर्ण सभी प्रकार के वातावरण से संपूर्ण हमारा जबलपुर बहुत ही शानदार जानदार ईमानदार और सबसे बड़ी बात मेहमान बाजी करने पर कभी भी कोई भी प्राणी चुकता नहीं है।

दिल खोलकर सभी को अपना मानते हैं और उसे हृदय पर बसाते हैं।

यह माँ भगवती की आराधना नर्मदा की सेवा दीपदान की सुंदरता और यहां के संस्कार की अमिट कहानी है जो शब्दों से नहीं केवल भाव से समर्पित की जा सकती है।

यहाँ पर खोवे की जलेबी जीवन पर्यन्त स्वाद याद रहता है।

पहाड़ी पर मां शारदा मैहर

त्रिपुर सुंदरी बसी तेवर

नारी को भाये है जेवर

भाभी का लाडला देवर

गुड़ की चाशनी सेवर

सेवा भाव संस्कारी मेयर

मिलता है घी प्योवर

जबलपुर महिमा लिखते मिलूँ

आप सभी को प्रणाम करते

सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जीवन भर, माँ नर्मदे हर

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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