श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆ बादल का एक टुकड़ा (लघुकथा संग्रह) – श्रीमती छाया त्रिवेदी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
जब साहित्यिक क्षेत्र में लघुकथा लेखन की बात आती है तो जबलपुर से अपने समय के प्रतिष्ठित शिक्षाविद और साहित्यकार स्व. पं. आनंद मोहन अवस्थी का समर्पित योगदान अपने आप मानस पटल पर उभर कर सामने आ जाता है। मेरी जानकारी के अनुसार शायद जबलपुर से लघुकथा लेखन की शुरुआत आनंद मोहन अवस्थी ने ही की थी और उसके बाद यहां से अन्य कथाकारों ने भी लघु कथा लेखन की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया ।इसी तारतम्य में महिला कथाकारों ने भी अत्यंत प्रभावी और सार्थक रुप से लघुकथाएं लिखीं और पाठक वर्ग ने इसे काफी पसंद भी किया।
लघुकथा लेखन के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाली सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार और शिक्षाविद श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाएं भी पाठकों के बीच काफी चर्चित हुईं । उनका कहानी संग्रह और यशोदा हार गयी भी अपनी विषय सामग्री, शैली और रोचकता के कारण भी पाठक वर्ग के बीच लोकप्रिय रहा और उसके बाद लघुकथा संग्रह बादल का टुकड़ा ने भी आज साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पठनीयता सिद्ध की है।लघुकथा संग्रह बादल का टुकड़ा की अधिकांश कहानियां हमारे लिए इसलिए भी उत्सुकता उत्पन्न करती हैं क्योंकि छाया जी ने अत्यंत सरल भाषा और प्रभावी विषय सामग्री को लेकर ये कहानियां लिखी हैं। जब हम इस पुस्तक की कहानियां पढ़ते हैं तो वे हमें अपने जीवन के आसपास के प्रसंगों पर आधारित कहानियां प्रतीत होती हैं।इस संग्रह की लघुकथाएं अपनी डफ़ली अपना राग, दथरथ, ऐसा क्यों, मां, सफलता की उड़ान, देहरी, सीढ़ी, बादल का एक टुकड़ा, मानस पुत्र, मुआवजा, पीहर का नेग , आधुनिक गांधारी, प्रतीक्षा, विद्या मंदिर, किसका घर, कबाड़ वाला, ढोंगी, भूल सुधार, हम पांच, उपहार, गंगा जल, संकल्प, हमें कुछ करना है, संकट की पाठशाला, मैं नेता नहीं हूं इत्यादि ऐसी ही लघुकथाएं हैं जिन्हें पाठक वर्ग बार बार पढ़ना चाहता है और ये रचनाएं पाठकों को कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे की इस कृति में प्रकाशित प्रतिक्रिया अत्यंत प्रभावी है जो पुस्तक की पठनीयता को सिद्ध करती है । उन्होंने लिखा है कि प्रस्तुत संग्रह की यह रचनाएं अपना विशेष संदर्भ रखती हैं।इन रचनाओं में समाज है, समाज के कसाव हैं, संबंधों की कसमसाहट है और तद्जन्य पीड़ा के परिणाम,प्रभाव , भी परिलक्षित होते हैं । दिव्यांगो की बात स्पष्ट करती स्पर्श की आंखें हैं तो देहदान पर आभार जैसी रचनाएं हैं तो मूक पालतू पशुओं का पक्ष स्पष्ट करती असंभव सी लघुकथाएं संजोई गई हैं।महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाओं को प्रेरक और प्रभावी निरुपित किया है। पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि नियमबद्ध और अनुशासन प्रिय छाया त्रिवेदी ने अपनी लघु कथाओं में समाज के विविध विषयों पर दिशाबोधक दृष्टि प्रदान की है। उनकी लघुकथाओं में लघुकथा के मूल भाव का सार्थक प्रस्तुतिकरण है ।
प्रतिष्ठित शिक्षाविद डा. इला घोष भी छाया जी की लघुकथाओं से प्रभावित दिखती हैं। उन्होंने भी इस संग्रह में अपनी बात कही है कि छाया जी के पास सूक्ष्म दृष्टि, संवेदनशील हृदय और अभिव्यक्ति की क्षमता है जिसका परिचय उनकी उनके इस लघुकथा संग्रह में मिलता है।
साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं की विकास शील गतिविधियों के लिए समर्पित, साहित्य साधक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने भी लघु कथाओं को सामयिक और सराहनीय बताते हुए लिखा है कि विदुषी साहित्यकार, समता, ममता, सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति, सम्माननीया श्रीमती छाया त्रिवेदी की लघुकथाएं बिन्दु में सागर को समोए हैं। सामाजिक आलोक के लिए विकल इन लघु कथाओं की हृदय स्पर्शी पृष्ठभूमि सामाजिक संस्कार का आव्हान करती है।श्रीमती छाया त्रिवेदी जी के लघुकथा संग्रह बादल का एक टुकड़ा में 90 लघुकथाएं सम्मिलित हैं।
सुप्रसिद्ध साहित्य मनीषी श्री कृष्णकांत जी चतुर्वेदी, और अपने पूज्य पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. श्री रेवा प्रसाद दीक्षित, पूज्य मां स्व. श्रीमती सुशीला देवी दीक्षित को समर्पित यह पुस्तक साहित्यिक क्षेत्र की एक श्रेष्ठ और संग्रहणीय कृति साबित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





