श्री संभाजी बबन गायके

 

☆ जीवन यात्रा ☆ “तुम गये…सब गया!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके

सपनों की उडान भरना कोई गुनाह तो नहीं! भला आसमां को हमारी उडान से क्या दिक्कत थी? हम सिर्फ आसमां छूना चाहते थे! हमारा आशियाना तो हम जमींपर बनाने वाले थे…या किसी पेड पर! आसमां अच्छी तरह जानता है…यह सफर अकेले तय नहीं किया जा सकता!

उसके साथ हाथों में लिये हाथ…अग्नि के फेरे लगाने के ख्वाब मन में लिये मैं प्रतीक्षा कर रही थी. खबर मिली की वो आ रहा है…! यह किसी ने नहीं बताया… कि कैसे?

अग्नि तो प्रदीप्त हुई… और वह आगे भी बढा…लेकिन मैं उसके साथ फेरे नहीं ले सकती थी. पहले चिता से धुआं उठा…और मैंने देखा.. .मेरे अरमां जल रहे थे! उसको गले लगा भी लेती तो कैसे? अब तो वह अग्नि की बाहों में था…शांत, क्लांत! उसकी बंद आंखों के पीछे उसने क्या कुछ संजो कर रखा होगा…शायद परिवार की यादे…और मेरी याद भी! उसका देखना अब खत्म…और मेरा देखते रहना आरंभ हो चुका था… लेकिन यह मोहलत कुछ पलों में थम जानी थी… आग की लपटे… न जाने उन्हें किस बात की जल्दी थी… कि उसे राख बनाने में जरा भी देर उन्हें मंजूर न थी!

वह मेरा भी था… लेकिन दुनिया की व्यवस्था की दृष्टि से उस पर मेरी मुहर लगी नहीं थी… इसलिये उसकी चिता से दूरी बनाकर खडी रही मैं… जो तस्वीर दिल में थी… उसका भौतिक रूप मेरे हाथों में धर चुपचाप खडी रही! लेकिन आंसू बतिया रहे थे… बयां कर रहे थे… जो मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती थी.

बदन पर हमने ऐसा कुछ पहन रखा होता है… जो हमें खुलकर रोने की इजाजत नहीं देता. और उसे भी तो रोना रुलाना पसंद नहीं था… उसकी हंसी हवा का वो झोंका होती था… जो दिल को पल में आसमां छूने ले जाता था… अब उसके दामन से हवा भी नहीं आ रही… जिसे मैं सलाम पेश करूं!

उसकी राख मांग में भरने का इंतजार करवायेगी यह चिता… अगली सुबह तक. बीच में एक लंबी रात तो होगी… जो शायद कभी खत्म ही नहीं होगी अब!

हिसाब लगाने बैठ जाऊं तो पता है… हाथों में कुछ न बचेगा… तुम गये… सब गया… यही अब सच है!

जी तो करता है कि मैं भी तुम्हारे साथ हो लूं… लेकिन मेरा धर्म इसकी इजाजत नहीं देता… कर्तव्य का धर्म!

हम वर्दी वाले जानते है… ऐसा भी हो सकता है… कि जिंदगी का दामन हाथों से छूट जाये! या फिर कोई साथी बिछड जाये… हम उडान रोक नहीं सकते!

अग्नि शांत होगी… मैं माथे पर मांग में उसकी राख रच लूंगी और दुसरे ही क्षण एक लंबी, उंची उडान भरूंगी… वो आसमां में तारा जो बन गया है… उसे नजदीक से देखना जो है!   

(कुछ दिन पूर्व देश ने दो वीर वैमानिक खो दिये. Flight Lieutenant पूर्वेश दुरगकर और Squadron Leader अनुज वशिष्ट. इन में से अनुज जी का विवाह एक पायलट युवती से निश्चित हुआ था, पर दुर्भाग्य से उनका यह सपना अधुरा रह गया. खैर, जिंदगी तो चलती रहेगी… निर्णय लिये जायेंगे. लेकिन देश सेवा में रत सैनिक और उनके परिजन जो त्याग करते है… उसकी किसी से भी तुलना नहीं हो सकती. मां-बाप, भाई-बहन का दुख तो बडा हैं ही… पर जिस युवती ने अपने सुखी जीवन के सपने संजोये होते है… उस पे क्या बीतती है… यह वही जान सकता है. इस लेख में उसकी मनोदशा चित्रित करने की कोशिश की गयी है… सिर्फ यह कहने के लिये… कि हमारे देश की रक्षा करने वाले अपने निजी जीवन में क्या क्या खोते हैं? हमें उनके प्रति सदैव आभारी रहना चाहिये. इन दोनों सपूतों को भावभीनी श्रद्धांजली. उनके परिवार के प्रति संवेदना और उस युवती के उज्ज्वल भविष्य के लिये शुभकामनाएं! 💐)

जय हिंद. जय हिंद की सेना!

 साभार – चित्र इन्टरनेट से

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Dr Bhavna Shukla
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मार्मिक अभिव्यक्ति जय हिन्द