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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)
☆ बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की कार्यशाला संपन्न ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
बच्चों के संवेगात्मक विकास में कहानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं – ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
भोपाल। बाल साहित्य शोध सृजन पीठ, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् द्वारा आयोजित बाल साहित्य लेखन कार्यशाला बड़ी सफलता के साथ संपन्न हुई। इस एक दिवसीय कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और अभिभावकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बच्चों के लिए रोचक, मनोरंजक, उपदेशात्मक और ज्ञानवर्धक साहित्य सृजन को प्रोत्साहित करना था।
मुख्य अतिथि शासकीय कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. मंगलेश्वरी नेशी ने अपने उद्बोधन में कहा कि बच्चों का साहित्य रोचकता से भरपूर, मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक होना चाहिए, ताकि बच्चे स्वाभाविक रूप से पढ़ने और सीखने की ओर आकर्षित हों।
बीज वक्तव्य देते हुए बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने कहा कि बाल साहित्य में कहानी, कविता, लोरी, पहेलियाँ, गीत आदि सभी विधाएँ शामिल हैं। इसमें बच्चों की बाल-सुलभ जिज्ञासाओं, कल्पनाओं और अभिव्यक्ति का स्थान होना चाहिए। यह रोचक और मनोरंजक होने के साथ-साथ उनके संवेगात्मक विकास में सहायक होना चाहिए।
प्रथम सत्र कहानी लेखन कार्यशाला पर केंद्रित रहा है। वरिष्ठ बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ने कहा कि कहानी बच्चों के संवेगात्मक विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने रोचक ढंग से दो-तीन कहानियाँ सुनाकर समझाया कि कहानी कैसे लिखी जाती है। बाल मन की कहानियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बच्चों से विविध विषयों पर कहानी लेखन करवाया। बच्चों ने मंच पर आकर अपनी रचनाएँ पढ़ीं। उनकी प्रेरणा से हिंदी की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. अर्चना भट्ट ने भी एक बाल कहानी सुनाकर सभी को चकित कर दिया।
द्वितीय सत्र कविता और बाल गीतों पर आधारित था। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेक्षा सक्सेना ने बाल गीतों पर दिशा-निर्देश दिए और क्षेत्रीय बोलियों के गीतों के माध्यम से बच्चों से सीधा संवाद किया। बच्चों ने विविध विषयों पर कविताएँ लिखकर मंच पर उत्साह से पाठ किया।
कार्यक्रम के संचालनकर्ता डॉ. शोभना तिवारी ने कहा कि बच्चों का साहित्य ज्ञानवर्धक होने के साथ उपदेशात्मक भी होना चाहिए, जिससे जीवन की नींव मजबूत हो और संस्कारों की अभिवृद्धि हो। रहीम और कबीर के दोहे इसके सशक्त उदाहरण हैं, जो प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक जीवन की संचित निधि बने रहते हैं।
वैदेही कोठारी ने पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति संरक्षण पर जोर देते हुए प्रकृति-परक रचनाओं के लेखन को रेखांकित किया। श्वेता नागर ने पढ़ने की अभिरुचि बढ़ाने के लिए पुस्तकालय सृजन उत्सव आयोजित करने और डायरी लेखन के दिशा-निर्देश दिए। रश्मि पंडित ने मुहावरे और लोकोक्तियों की कार्यशाला चलाई तथा कहा कि ये शिक्षाप्रद, रोचक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक होते हैं।
कार्यशाला में शहर के विभिन्न विद्यालयों और महाविद्यालयों के 55 से अधिक छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहभागिता की। सभी प्रतिभागियों का स्वागत हिंदी पंचांग से समन्वित पॉकेट डायरी और कलम भेंट करके किया गया। प्रमाण-पत्र भी वितरित किए गए। अर्थ दशोत्तर प्रतिष्ठा तिवारी और हार्दिक अग्रवाल ने डॉ. मीनू पांडे को शाल, स्मृति चिन्ह और साहित्य भेंट कर स्वागत किया। सरस्वती वंदना प्रिया उपाध्याय ने प्रस्तुत की।
विभिन्न विद्यालयों के पचपन से अधिक छात्र-छात्राएं, उनके अभिभावक, माता -पिता, शिक्षक-शिक्षिकाएँ, महाविद्यालय के प्राध्यापक आदि सौ से भी अधिक सहभागी उपस्थित रहे। आभार ज्ञापन डॉ. मीनू पांडे ने किया। यह कार्यशाला बाल साहित्य सृजन में नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाली सिद्ध हुई।
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




