श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३२ ☆ श्री सुरेश पटवा
अनवरत परम्परा
नर्मदा परिक्रमा के विषय में प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल बेगड़ ने अपने अनुभव साझा किए हैं। जेडीए अध्यक्ष डॉ. विनोद मिश्रा ने भी अपनी पुस्तक में नर्मदा परिक्रमा के अद्भुत अनुभवों को साझा किया है। रमनगरा निवासी वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य पं.मोतीराम शास्त्री की रचना पय: पानम् को राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। मनीषियों ने लिखा है कि नर्मदा का स्वरूप आल्हादित करने वाला है। नर्मदा के कल-कल निनाद में शिवत्व का बोध होता है। नर्मदा की उछलती लहरों का नृत्य अंत:पुर के दरवाजों को खोल देता है। इसका आध्यात्मिक सुख अवर्णनीय है। वहीं भू-जल विद विनोद दुबे का कहना है कि नर्मदा जल में वैक्टीरिया को खत्म करने की अद्भुत शक्ति है। नर्मदा घाटी में युगीन सभ्यता बिखरी पड़ी है। लोगों की इस पर नजर पड़े, वे इसके महत्व को समझें। संभवत: इसलिए ही नर्मदा परिक्रमा की परम्परा प्रारंभ हुई होगी। पाषाण में तब्दील हो चुके नर्मदा के किनारे पेड़-पौधों व पत्थरों के अलावा नर्मदा घाटी के रहस्यों पर आज भी अनेक शोध चल रहे हैं। तीन बार नर्मदा परिक्रमा कर चुके रामदास अवधूत का मानना है कि आज भी कई अदृश्य शक्तियां और देवता नर्मदा की परिक्रमा करते रहते हैं। नर्मदा की परिक्रमा उद्गम स्थल अमरकंटक से या फिर ओंकारेश्वर से प्रारंभ की जाती है, जो पैदल तीन साल, तीन माह और तेरह दिन में (दोनों तट) पूर्ण होती है। वाहनों पर लोग इसे 108 दिन में भी पूरा कर लेते हैं। परिक्रमा प्रारंभ करने से पहले श्रद्धालु इसका संकल्प लेते हैं और फिर पूजन के बाद मां नर्मदा को एक कड़ाही प्रसाद भेंट करते हैं। कड़ाही प्रसाद से ही कन्याओं और सुपात्र ब्राम्हणों को भोजन कराया जाता है।
हमारी पहली परिक्रमा रामलला के आशीर्वाद और शनि महाराज के दर्शन से शुरू हुई। पुराने साथी मित्र और पड़ौसी श्री एल पी दुबे जी ने पुष्पमालाओं और मिठाई से परिक्रमा वासियों को विदाई दी। उनका प्रेममय व्यवहार आज की पूरी यात्रा मे परिक्रमा वासियों के बीच चर्चित रहा। अरुण श्रीवास्तव, आर.व्ही. अग्रवाल, एल.एन. अग्रवाल, अनिल मिश्रा, के.एल, सोनीजी आदि भी ग्वारी घाट मिलने और सद्भावना व्यक्त करने आये। अमृत लाल बेगड की धर्मपत्नी श्रीमती कांता बेगड के ममतामयी सानिध्य से परिक्रमा की शुरुआत हुई। उन्होंने सर्वाधिक मान बढ़ाया, जब हम और अरुण दनायक उनसे आशीर्वाद लेने पहुँचे तब उन्होंने छोटी-छोटी अनेक बातें नर्मदा यात्रा को लेकर बताई। श्री टी. पी. चौधरी दम्पत्ति ने तिलवारा घाट पर पहुँच कर अत्यंत प्रेमपूर्वक परिक्रमा वासियों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने सपत्नीक फूल मालाओं से परिक्रमा वासियों का स्वागत किया। फल नारियल भेंट किए। स्नेही जनों का प्रेम इस यात्रा मे मिलना अपने आप मे आह्लादकारक रहा। हमारे मित्र श्रीवर्धन नेमा जी स्टेट बैंक अधिकारी संघ के उप-महासचिव हैं। उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक जबलपुर में रहवास भोजन की व्यवस्था कराई और ग्वारीघाट से तिलवारा घाट तक परिक्रमा यात्रा में साथ चले। उनके विनम्र स्वभाव से हमारा मन अभिभूत हो गया।
नर्मदा परिक्रमा:पहला चरण
ग्वारी घाट से झाँसी घाट
पहली यात्रा 13 अक्टूबर 2018 को ग्वारी घाट से प्रारम्भ हुई। हमारे दल में एक रिटायर्ड सैनिक कोलिता थे। वे अपनी उम्र 100 से ऊपर बताते थे, परंतु लगते नहीं थे। बुज़ुर्ग लोगों को अक्सर अपनी उम्र बढ़ाकर बताने की आदत हो जाती है। फिर भी वे 80-90 के बीच के तो थे। उनके दाहिने पैर में गोली लगी थी। उनका बैग सबसे भारी था। चैन भी ख़राब हो गई तो सेफ़्टी पिन लगाकर बैग पीछे डंडे में फँसाकर थोड़ा लँगड़ा कर चलते थे। फिर भी कई बार सबसे आगे निकल जाते थे। उनकी याददाश्त कमज़ोर हो गई है। अक्सर भूल जाते थे। हर बार पूछते थे कि अब होशंगाबाद आएगा। चलते-चलते जब लोग चिड़चिड़े हो जाते तो भुनभुनाने लगते। जगमोहन अग्रवाल कई ट्रैकिंग अभियान में जा चुके हैं। वे कोलिता जी को साथ लाए थे। दनायक जी ने अग्रवाल जी से कहा कि यार अगली बार इनको मत लाना। कहीं भी आगे निकल जाते हैं, भूल जाते हैं। अग्रवाल जी ने कोलिता जी को झिड़की पिलाई कि बीच में चला करो। जब थकान उतरती तो सब सामान्य हो जाते थे। लेकिन तब से कोलिता जी मेरे के पीछे चलने लगे। कोलिता जी सेना की ट्रेनिंग के हिसाब से क़दम गिन कर किलोमीटर का हिसाब लगाने में माहिर हैं। उनका अन्दाज़ कभी ग़लत नहीं हुआ। एक बार मैंने उनको जानबूझकर बातों में लगा लेने के बाद तय दूरी किलोमीटर में पूछी तो उन्होंने कहा कि क़दम गिनना भूल गए। अन्दाज़ से दूरी बताई वह वास्तविक दूरी के आसपास थी। एक बात है यदि क़दम गिनते रहो तो थकान का अहसास नहीं होता।
एक जगह भूख पर चर्चा चल पड़ी। सृष्टि का आधार भूख है। ऋग्वेद में ऋचाओं के सूत्र हैं कि कहीं कुछ नहीं था, अंतरिक्ष भी नहीं, ब्रह्माण्ड भी नहीं। सब कुछ शून्य था। एक शून्य हिरण्य गर्भ कहा गया है। दूसरा ब्रह्म अस्तित्व शिव तत्व। बिग बेंग सिद्धांत से हॉकिंग ने इसी की पुष्टि की है। गैसों का एक महावलय पूरी तीव्रता से गोलाकार घूमने लगा। उसकी गहराई में सृष्टि का अंड जन्मा। शिव के बीज तत्व ने पूरी तीव्रता से उसके अंदर प्रवेश किया तब वह अंड प्रस्फुटित हुआ और ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया, अंतरिक्ष में ऐसे कई ब्रह्माण्ड हैं। हम सब सृजन करने के लिए उसी प्रक्रिया को दोहराते हैं। अंड की फूटने की भूख और शिवतत्व की सघन ऊर्जा की सृजन भूख से जगत निर्माण हुआ है। ब्रह्म का अंड से मिलन हुआ ब्रह्माण्ड। सृष्टि का यह विधान हम सब अनिवार्यत: पूरा करने को प्रकृति के वशीभूत हैं। परिक्रमा यात्रा में सुबह से भूखे पेट आठ-दस किलोमीटर चलने के बाद भी भूख का अहसास न होना चमत्कारी तो है ही, वैज्ञानिक भी है। सूर्य ऋग्वेद का देवता है। ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का सबसे बड़ा श्रोत सूर्य है। जिसमें अणुओं के खंडन-विखंडन की सतत प्रक्रिया चल रही है। वह बिना कुछ खाए ऊर्जा पैदा कर रहा है। परिक्रमा यात्री जब लगातार चलता है तब उसकी देह सूर्य के समान सतत ऊर्जा पैदा करने लगती है। सूर्य जैसा हो जाना ही सूर्योंपासना है। यात्री की अस्थियाँ, मांसपेशियाँ, स्नायुतंत्र और ग्रंथियाँ ऊर्जा का सघन वलय बनकर शरीर में शक्ति पैदा करतीं हैं। विजातीय पदार्थ द्रव्य बनकर पसीने के साथ देह से बाहर होता जाता है। मनुष्य की भूख के कई स्तर हैं। पेट की भूख, शरीर की भूख, मन की भूख, मस्तिष्क की भूख और आत्मा की भूख। पेट की भूख पूरी होते ही शरीर की भूख जागती है। शरीर की भूख पूरी होने पर मन की भूख जागती है। अंत में आत्मा की भूख अन्तरात्मा को जानने की जागती है। भूखों का नियोजन ही मानव जीवन है। इसी भूख के नियोजन में छुपे हैं पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता और सदाचार-भ्रष्टाचार के मूल्य। देह की भूख भोजन की भूखी है, मस्तिष्क की भूख प्रशंसा माँगती है। मन की भूख रंजन की और आत्मा की भूख समर्पित आस्था की दरकार है। भूख से आध्यात्म का यह अर्थगहन नर्मदा यात्रा की अद्भुत उपलब्धि है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





