श्री संजय भारद्वाज
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३३६ ☆ दशपुत्रसमो द्रुम:…
हमारा फ्लैट हाउसिंग सोसायटी की ऊपरी मंज़िल पर है। सोसायटी के सामने सड़क है। सड़क के दूसरी ओर शिरीष का विशालकाय वृक्ष है। इस पेड़ की फुनगियाँ गुलाबी रंग के फूलों से लकदक हैं।
यह वृक्ष लगभग 70 फीट ऊँचा और अपनी डालियों के माध्यम से लगभग इतना ही चौड़ा हो चुका है। तेज़ हवा, बरसात के साथ इसके फूल उड़ते हैं, यहाँ-वहाँ बिखरते हैं। उसमें से कुछ हमारी बालकनी में रखे पौधों के गमलों में भी गिरते हैं।
पिछले दिनों एक गमले में इसी शिरीष की एक संतान ने जन्म लिया। धरती पर खड़ा 70 फीट का विशाल पेड़ और उसके सामने गमले में जन्मा और बढ़ा लगभग 1 फुट का यह पौधा। देखता हूँ कि पेड़ की फुनगियाँ निरंतर हमारे बालकनी के निकट आ रही हैं। दूरी लगभग 10 फीट की रह गई है।
सोचता हूँ, सड़क के उस पार लगा 70 फीट का यह पेड़ भी कभी अंकुरित हुआ होगा, ऐसे ही पौधा बना होगा। धीरे-धीरे बड़ा हुआ होगा। आंधी, तूफान, भीषण गर्मी सब सहन किए होंगे। पशुओं का भक्ष्य होने से बच गया होगा। इसकी आयु कितने वर्ष है, यह तो पता नहीं पर इसे विकसित होने के समुचित अवसर मिले, फलत: यह 70 फीट का हो चला है।
सही शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक पोषण और उचित परिवेश मिले तो मनुष्य भी इसी तरह विकास कर सकता है। प्रकृति में हरेक अनुपम है। अतः अपने बच्चों पर अपने अधूरे सपने थोपने के बजाय उन्हें विकास के लिए समुचित वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। आगे वे अपने स्वभाव और अपनी मूल प्रकृति के अनुसार स्वयं विस्तार करेंगे।
नन्हा शिरीष थोड़ा बड़ा हो जाए तो किसी सुरक्षित स्थान पर इसे रोप आऊँगा। ऐसे स्थान पर जहाँ इसे विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।
इन दिनों गर्मी चरम पर है। सामान्यत: हमारी वृत्ति वृक्षों को काटकर बढ़ते तापमान पर सेमिनार आयोजित करने की रही है। यदि 25 से 50 वर्ष के आयुसमूह का हर भारतीय नागरिक दो पौधे भी रोपे, उनका ध्यान रखे, तो 45 डिग्री का औसत तापमान कम करने में समय नहीं लगेगा। पंछी लौटेंगे, अपने घोंसले बुनेंगे, कीटक पेड़ की खोह में घर बसाएँगे, जड़ों में सरीसृप भी बिल बनाएँगे। जैव विविधता का खंडित चक्र फिर अखंड होने की राह पर चल पड़ेगा।
कहा गया है,
दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥
दस कुओं के समतुल्य एक बावड़ी, दस बावड़ियों के समतुल्य एक सरोवर, दस सरोवरों के समतुल्य एक सुयोग्य पुत्र और दस पुत्रों के समतुल्य एक वृक्ष कल्याणकारी होता है।
पर्यावरण के संरक्षण के लिए अथवा पुण्य के लिए अथवा अकारण, पौधारोपण अवश्य करें। इन पौधों से विकसित होनेवाले वृक्ष, देश को हरा-भरा रख सकते हैं। अनुभव बताता है कि मनुष्य जीवन को भी पल्लवित, पुष्पित एवं सुरभित रखने में हरियाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रयास करें कि प्रकृति हरी रहे, परिसर हरा रहे, मन हरा रहे।
© संजय भारद्वाज
(14:09 बजे, 23 मई 2026)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
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