श्री संजय भारद्वाज
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४० ☆ सबसे बड़ा रुपैया…
समाचारपत्र में संबंध विच्छेद के एक मुकदमे का निर्णय छपा है। उच्च शिक्षित युगल में विवाह के लगभग दो वर्षों के भीतर ही संबंध विच्छेद हो गया। समाज में निरंतर बदलते मूल्य और अपने तक सीमित रहने की वृत्ति के चलते आजकल दो वर्ष भी दांपत्य के लिए उल्लेखनीय अवधि मानी जा सकती है। तथापि इस मामले में चौंकाने वाला तथ्य संबंध-विच्छेद का कारण था। समाचार में बताया गया कि कि पति हर व्यय में पत्नी से पचास प्रतिशत की अपेक्षा रखता था। यह अपेक्षा सुबह के नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक हर छोटे-बड़े व्यवहार में थी। समाचार कह रहा था कि विवाह से पूर्व उसके द्वारा दिये गए उपहारों की आधी कीमत भी उसे चाहिए थी। उधर दूसरे पक्ष का कहना था कि पत्नी की आमदनी, पति की तुलना में कम है, अतः यह विभाजन तर्कसंगत नहीं है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समय में मनुष्य की संवेदनाओं के आर्टिफिशियल होने की पराकाष्ठा है यह। भौतिक जगत में भौतिकता का चरम बिंदु है यह। समाचारपत्र में छपे कुछ पंक्तियों के समाचार के आधार पर इस घटना में किसी को दोषी या निर्दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। इस तरह की विवेचना इस लघु आलेख का उद्देश्य भी नहीं है। माननीय न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत तथ्यों के आधार पर गुण-दोष के धरातल पर निर्णय दिया होगा। दोषी जो भी रहा हो, यहाँ संबंधों में बढ़ती असुरक्षा और संदेह विचारणीय हैं।
नीतिसूत्र कहता है कि शक्ति का केंद्रीकरण निरंकुशता को जन्म देता है। निरंकुशता अविवेक को जनती है। अविवेक बहुधा आत्ममोह का कारण बनता है। आत्ममोह अपने अलावा दूसरा कुछ नहीं देख पाता। इस स्वानुभूत दृष्टिहीनता की परिधि में संबंध, संवेदना, सामाजिकता, सामंजस्य, साहचर्य सभी आ जाते हैं।
मनुष्यजीवन के सारे व्यवहार के केंद्र में पैसे का आ जाना मनुष्यता का अवमूल्यन है या अधिमूल्यन, इस पर भिन्न-भिन्न मत हो सकते हैं। कुछ लोग इसका नामकरण ‘नई मनुष्यता’ भी कर सकते हैं। सारे बौद्धिक विलास के परे ‘ना बीवी ना बच्चा, ना बाप बड़ा ना मैया, द होल थिंग इज़ दैट कि भैया सबसे बड़ा रुपैया’ का यूँ साकार होना हर विचारवान के मन में गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
प्रकृति में अंतिम कुछ भी नहीं है। पैसे को सर्वोच्च समझने की वृत्ति भी अंतिम नहीं रहेगी। मनुष्य को मिले बौद्धिकता के वरदान के चलते उससे वांछित है कि वह जीवन में मूल्यों के बीच भी सामंजस्य और संतुलन रखना सीखे। यह घटना इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि यंत्रमानव बनाने वाले मानव में धीरे-धीरे यंत्र अपने को स्थापित करता जा रहा है। क्या निकट भविष्य में माता- पिता, सगे-संबंधी, मित्र- आत्मीय, पति-पत्नी सभी आर्थिक आधार पर आँके जाने लगेंगे? ऐसी स्थिति में शब्दकोश से इन शब्दों के विलुप्त होने में समय नहीं लगेगा।
कुछ लोगों को यह विचार अतिरेक लग सकता है। कुछ लोग इस घटना को अपवाद के रूप में देख सकते हैं। तथापि अपवाद जब निरंतर घटने लगे तो मान लीजिए कि वह परंपरा होने के मार्ग पर अग्रसर है। ऐसे समय में परंपरा, अपवाद कहलाने लगती है।
उपरोक्त घटना के अपवाद को परंपरा बनने से रोकना है तो विचार को व्यवहार में उतारना होगा। घर, परिवार, समाज हर स्थान पर संबंधों की अनुभूति, महत्व और अनिवार्यता को रेखांकित करना होगा, अपने-अपने स्तर पर संबंधों को सच्चाई से जीना होगा। अन्यथा की स्थिति में संभव है कि भविष्य में व्यय में पचास प्रतिशत की भागीदारी ना कर सकने वालों को अमनुष्य करार दिया जाने लगे।
अनुरोध है कि हर मनुष्य विचार करे।
© संजय भारद्वाज
(15:51 बजे, 13 जून 2026)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
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