श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गो ब र।)

?अभी अभी # १०२८ ⇒ आलेख – गो ब र ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गो ग्रीन के बाद जब गो ऑर्गेनिक का अभियान चला तब मुझे गाय,गोबर और गांव की याद सताने लगी । हम नर्मदा का जल पीने वाले नल से नहाते वक्त नर्मदे हर और कभी कभी हर हर गंगे बोल लेते हैं । यहां गांव में गौरी आसानी से मिल जाती है,गंगा नहीं । गांव में हमने कभी गोबर से परहेज़ नहीं किया ,क्योंकि पूरा कच्चा घर गोबर से ही लीपा जाता था । जब से शहर आए,आज यह हालत है कि गाय और गोबर दोनों के लिए तरस गए ।

शुरू में कुछ पता नहीं चला ! धीरे धीरे सब्जियों से स्वाद गायब होता चला गया । जो सब्जियां बिना मसाले के अच्छी और स्वादिष्ट बनती थी,उनकी गुणवत्ता छुपाने के लिए तरह तरह के मसाले डाले जाने लगे । लोग सब्जियों का स्वाद भूल गए बस मसालों में उलझ गए । होटलों में गए,मलाई कोफ्ता और काजू करी बुलाई,दो तीन नान बुलाई,और उंगलियां चाटते हुए घर आ गए । इसमें सब्जी कहां,बस घी,मक्खन और मलाई । तभी मोटे हो रहे हैं मोटा भाई ।।

रासायनिक खाद अपना ज़हरीला प्रभाव तो छोड़ेगी ही । खाने के साथ वही ज़हर शरीर में जाता है,और बीमारियां पनपने लगती हैं । पता ही नहीं चलता,और अन्दर ही अन्दर कैंसर जैसी बीमारी घर कर लेती है । आर्थिक अभाव और जागरूकता की कमी के कारण जो मिल गया,उसी को मुकद्दर समझ कर खा लिया और प्रभु का गुण गा लिया ।

गाय का गुणगान करिये,भैंस का दुग्धपान करिये । भैंस के दूध की हमारे देश में ज़्यादा खपत है । उसमें मलाई अधिक जो आती है । देसी गाय का स्थान जर्सी गाय ने ले लिया,क्योंकि वह दूध अधिक देती है । दुधारू गाय किसे बुरी लगती है ।

दूध पर गाय का कॉपीराइट नहीं ! दूध तो बकरी भी देती है और ऊंटनी भी । सुना है,शेरनी भी अपने बच्चों को दूध ही पिलाती है,इसीलिए उसके बच्चे शेर बच्चे निकलते हैं । गोबर पर गाय का कॉपीराइट है । गोबर शब्द में ही गो समाया हुआ है । यों तो भैंस भी गोबर ही देती है लेकिन वह भी गोबर ही कहलाता है । जिसमें अक्ल ज़्यादा होती है, दुनिया में उसी की पूछ होती है । बस एक इंसान ही ऐसा प्राणी है, जिसकी पूंछ न होते हुए भी इतनी पूछ परख होती है ।।

सुना है इस बार की होली लकड़ी से नहीं, गोबर के कंडों से जलाई गई । अगर पर्यावरण बचाना है,तो वृक्षों को काटने से बचाना होगा । बचपन में बड़ा बुरा लगता था,जब सबक याद नहीं होने पर मास्टरजी क्लास में खड़ा करके कहते थे, तुम्हारे दिमाग में गोबर भरा है । आज सोचता हूं,जिस दिमाग में गोबर भरा होगा,वह कितना उर्वरक यानी fertile होगा । गो ऑर्गेनिक, ग्रो ऑर्गेनिक, थिंक ऑर्गेनिक …!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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