श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९५ ☆
☆ गुरु : जीवन पथ के आलोक स्तम्भ… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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चरण वंदना आपकी , करता सकल जहान ।
तीन लोक भी कर रहे, नित्य सतत गुणगान ।।
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बिन गुरुवर नहि मिल सके,कभी किसी को ज्ञान ।
प्रीत हृदय प्रिय धारते, शिष्य लगा कर ध्यान ।।
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काज सहज बनने लगे, जब हो गुरु आशीष ।
इनके पूजन से मिलें, जगदीश्वर जगदीश ।।
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सम्पूरण विश्वास से, सहज साधना साध्य।
ज्योतित जलती लौ रहे, गुरुवर को आराध्य।।
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गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह उस दिव्य चेतना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है, जो अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करती है। गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञान नहीं देते, वे जीवन को देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। उनके सान्निध्य में व्यक्ति स्वयं को पहचानता है, अपने भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत करता है और सत्य की ओर अग्रसर होता है।
भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष स्थान इसलिए मिला है, क्योंकि वे मनुष्य के व्यक्तित्व का पुनर्जन्म कराते हैं। वे केवल शब्दों से नहीं, अपने आचरण, तप, त्याग और करुणा से शिक्षा देते हैं।
आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने जीवन के प्रत्येक गुरु—माता-पिता, शिक्षक, प्रकृति और उन सभी अनुभवों—के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें, जिन्होंने हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा दी। यही सच्ची गुरु वंदना है, और यही ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का श्रेष्ठ मार्ग भी।
साचे मन आराधिए, गुरुवर गुण की खान ।
पूरण सारे काज हों, बढ़े मान सम्मान ।।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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