श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
साँकल से घुग़री 10 नवम्बर 2019
जबलपुर जिले की सीमा तक सतपुड़ा नर्मदा का बायाँ हाथ पकड़े हुए चलता है धरतीकछार गाँव के नज़दीक सनेर नदी संगम पर सतपुड़ा नर्मदा का हाथ छोड़कर आज़ाद कर देता है। झाँसीघाट से साँकल घाट तक नर्मदा स्वतंत्र प्रवाहित होती है फिर दमोह जिले से विन्ध्याचल आकर नर्मदा का दाहिना हाथ हीरापुर रेंज के रूप में बढ़कर थाम लेता है। यदि विन्ध्याचल महाशय रास्ते में न आते तो नर्मदा रायसेन जिले से होती हुई भोपाल जिले निकल जाती या बेतवा से मिलकर यमुना से भेंट करके गंगा से गले मिल गंगासागर में एकाकार हो जाती। साँकल से अविनाश बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अपना केमरा सभी के लिए भोजन, दवाई और विभिन्न खाद्य वस्तुएँ और हमारा चार्जर, चड्डी और बानियान लेकर जुड़ गए।
अब हम लोग बरगी बाँध से आती नहर के किनारे-किनारे चलते हुए गुड़वारा पहुँचे। गाँव का नाम गुड़वारा बिलकुल सही है क्योंकि वहीं से करेली तहसील शुरू होती है चारों तरफ़ गन्ने के खेतों का सिलसिला पूरे इलाक़े में नज़र आता है। गुड़वारा के पहले एक किसान कैलाश दांगी किसानी का काम करते मिले उन्होंने हमें चाय पीने का निवेदन किया हम लोगों ने तत्काल उनके निवेदन को स्वीकार कर लिया उनके निवास स्थान पर उनके साथ चाय पीने के लिए चल दिए। उनका लड़का आईपीएस परीक्षा की तैयारी इंदौर में रहकर कर रहा है, वह गांव आया था उसके साथ उनका एक दोस्त भी आया हुआ था तीन-चार दिन पहले उनका दोस्त नर्मदा में स्नान के लिए उनके साथ गया और वह गहरे पानी में डूबने से उसकी मृत्यु हो गई इसलिए इस परिवार के सभी लोग दुःखी थे। उनके घर पहुँचकर चाय ग्रहण की, बरंडा में एक बड़ी गागर में इलेक्ट्रिक मथनी से मक्खन निकाला जा रहा था उसमें से निकला मही दो लीटर की बोतल में भरवा कर चल पड़े। जो दोपहर की बाटी-दाल के बाद गटक लिया। गुड़वारा से उतरकर नीचे नर्मदा घाट पर पहुँच स्नान करके साँकल से जुड़े नए साथी अविनाश दवे के द्वारा लाईं मैथीपूड़ी आँवला आचार के साथ खाईं और चल पड़े अगली मंज़िल की ओर, रास्ते में बुधघाट में एक किलोमीटर ऊँची पहाड़ी चढ़कर एक आश्रम पहुँचे वहाँ पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। एक सेवक ने पानी पिलाया। थोड़ी देर में साधु लिबास में शैतान नज़र आया, उसने आते ही घुड़कियाँ देनी शुरू कीं, और साफ़तौर से कह दिया कि न आप यहाँ नहा सकते हैं और ना भोजन परसादी की कोई व्यवस्था है। हम लोग नीचे उतर कर अगले पड़ाव की खोज में चल दिए। शाम को पाँच बजे घुग़री पहुँचे। जिस घाट रुकने की सोचते हैं वहीं घाट पर दो-तीन कुत्ते स्वागत करते हैं, फिर वे आपके साथ आश्रम तक आकर वहीं अड्डा जमा लेते हैं मानो हम उनके पाहूँने हों। दूसरे दिन सुबह थोड़ी दूर विदाई देने साथ आते हैं। साधु लिबास में शैतान से कुत्ते समझदार हैं, बेचारे स्वागत-विदाई में पूँछ हिलाते हैं।
घुग़री में एक परकम्मा कर चुके बम-बम बाबा के नाम से आश्रम चलाते हैं। वे गाँव से दान लेकर भोजन का सामान देते हैं। उन्हें मेहनताना पर भोजन बनाने की बात कही तो वे आटा-दाल एक गौंड़ के घर दे आए। आठ बजे भोजन बनकर आया तब ग्रहण किया। आश्रम के सामने चार विशाल बट वृक्ष आश्रम को एक छतरी की तरह ढँके हुए है, वृक्षों के पत्तों से छनकर आती चाँदनी की रोशनी एक अजीब सी रूमानियत पैदा कर रही थी, लिहाज़ा परकम्मा वासियों का प्रेमिल हृदय गीत-ग़ज़ल की लहरियों में गोते खाने लगे।
पिछले बीस-पच्चीस सालों में भारत के गाँवों का जीवन तेज़ी से बदला है। खेतों को बैलों से बखरने और बैलगाड़ी की जगह ट्रैक्टर और लोडिंग वाहन ने ली है, हरेक किसान के घर एक-दो मोटर साइकिल और समृद्ध किसानों के पास जीप-कार आ गईं हैं। पुरुषों के पहनावे से धोती-क़मीज़ या कुर्ता ग़ायब हो चुके हैं। उनकी जगह जींस टी-शर्ट स्पोर्ट बानियाँन ले चुके हैं। लड़कियाँ जींस टाप पर आ गईं हैं। लड़के-लड़कियाँ आपस में खुले हैं, अब वे आपस में बातचीत करने लगे हैं। सरकारी स्कूल में सह-शिक्षा और मध्याह्न भोजन से खुलापन आया है लेकिन विकृति नहीं आई है इसका कारण घरों का सांस्कृतिक वातावरण और धार्मिक आस्था में पिरोए नैतिक मूल्य है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





