श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२७ ☆
यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लंदन में चलते हुए मेरी एक आदत बन गई है। सड़क पर चलते हुए अब मैं केवल सामने नहीं देखता, कभी ऊपर भी देखने लगता हूं। यह आदत इस शहर ने ही डाली है।
किसी पुराने भवन की खिड़की के ऊपर अचानक कोई पत्थर का चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी दरवाजे के दोनों ओर दो छोटे सिंह बैठे मिल जाते हैं। कहीं छत के किनारे कोई पक्षी पंख समेटे बैठा है और कहीं भवन की दीवार पर कोई विचित्र सा जीव मानो सदियों से आने जाने वालों को देख रहा हो।
पहले मुझे लगता था कि यह सब वास्तुशिल्प की सजावट भर है। लेकिन थोड़ा खोजने पर पता चला कि लंदन के इन पत्थर और धातु के जीवों की भी अपनी एक भाषा है।
मिसाल के लिए सिंह।
लंदन में सिंह केवल चिड़ियाघर में नहीं मिलते। वे भवनों की रखवाली भी करते हैं। Bank of England की वास्तुकला में सिंहों की उपस्थिति को शक्ति का प्रतीक माना गया है और उन्हें बुरे इरादों से रक्षा करने वाली छवि से भी जोड़ा गया है। वहां सिंह दरवाजों, दीवारों और भवन के भीतर तक दिखाई देते हैं। उसी भवन में उल्लू भी हैं, जिन्हें ज्ञान और विवेक का प्रतीक माना गया है।
यहां एक तथ्य खास तौर पर ध्यान खींचता है। सिंह लंदन या ब्रिटेन के जंगलों का स्वाभाविक प्राणी नहीं है। ब्रिटेन में सिंह कभी जंगली पशु के रूप में नहीं रहे। फिर भी ब्रिटिश प्रतीक संसार में सिंह की उपस्थिति इतनी गहरी है कि वह राजसत्ता, शक्ति, साहस और संरक्षण का मानो स्वाभाविक प्रतीक बन गया है। शायद इसी कारण लंदन की इमारतों पर पत्थर के सिंह इतने सहज दिखाई देते हैं, जैसे वे इस शहर के पुराने निवासी हों। Bank of England स्वयं सिंह को शक्ति का प्रतीक और बुरे इरादों से रक्षा करने वाली स्थापत्य छवि के रूप में बताता है।
अर्थात भवन भी शायद कह रहा होता है, बाहर से मजबूत दिखो पर भीतर से समझदार रहो।
लंदन में सिंहों की कहानी इससे भी पुरानी और रोचक है। Trafalgar Square में Nelson’s Column के नीचे बैठे चार विशाल कांस्य सिंहों को Sir Edwin Landseer ने बनाया था और 1867 में उन्हें वहां स्थापित किया गया। उनकी भूमिका केवल सौंदर्य बढ़ाने की नहीं, बल्कि Nelson की स्मृति की रक्षा करने वाले प्रहरी जैसी कल्पित की गई।
Oxford Street के पास Stratford Place के प्रवेश द्वार पर सिंह की मूर्ति लगी है। अठारहवीं शताब्दी में बने इस परिसर के प्रवेश पर सिंहों की मौजूदगी मानो आने वाले को बता रही थी कि भीतर कोई साधारण जगह नहीं, एक विशिष्ट आवासीय संसार है।
और फिर है South Bank Lion,
कभी यह सिंह Lambeth की Lion Brewery की छत के ऊपर बैठकर Thames की ओर देखता था। 1837 में William Frederick Woodington ने इसे Coade Stone में बनाया था। Brewery खत्म हुई, भवन भी चला गया, लेकिन सिंह बचा रहा। वह लंदन में इधर से उधर घूमता हुआ अंततः Westminster Bridge के पास पहुंच गया। आज वह Grade II* listed ऐतिहासिक मूर्ति है।
एक सिंह ने मानो नौकरी बदल ली, लेकिन शहर नहीं छोड़ा।
उल्लुओं की कहानी कुछ और दिलचस्प है।
Southwark में एक पुराने मकान की ऊपरी मंजिल की दीवार पर एक उल्लू और एक बिल्ली की छोटी मूर्तियां लगी हैं। स्थानीय तौर पर यह जगह “Owl and the Pussy-Cat” house के नाम से जानी जाती है। इन मूर्तियों का वास्तविक कारण आज भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। अनुमान लगाया जाता है कि शायद इनका संबंध Edward Lear की प्रसिद्ध कविता से हो, लेकिन यह भी केवल संभावना है।
मुझे लंदन की यही बात अच्छी लगती है। यहां हर चीज का अर्थ जरूरी नहीं कि एक ही हो।
कभी मूर्ति वास्तुशिल्प है, कभी प्रतीक, कभी इतिहास की बची हुई निशानी और कभी किसी व्यक्ति की निजी शरारत।
सबसे बड़ी बात आम लोग भी अपने घरों में ये प्रतीक मूर्तियाँ लगवाये हुए हैं।
हमारे यहां भी घरों के बाहर हाथी, सिंह, घोड़े, हंस और देवी देवताओं की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। उनके पीछे अक्सर धार्मिक विश्वास, वास्तु संबंधी धारणाएं या शुभता की कामना होती है। लंदन में भी प्रतीक हैं, लेकिन उनका अर्थ अधिक बार इतिहास, शक्ति, पेशे, कला, स्मृति या निजी रुचि से जुड़ता दिखाई देता है।
और शायद इसीलिए यहां चलते हुए ऊपर देखना भी एक तरह का इतिहास पढ़ना है।
नीचे फुटपाथ पर आज का लंदन चल रहा है। लोग मोबाइल पर बातें कर रहे हैं, बसें आ जा रही हैं, साइकिलें निकल रही हैं, कोई टु गो कप कॉफी लेकर जल्दी में है।
और ठीक उनके ऊपर, किसी पुराने भवन की छत पर बैठा एक पत्थर का उल्लू चुपचाप सब देख रहा है।
वह न मोबाइल देखता है, न घड़ी।
सिंह भी वहीं है, अपनी जगह अडिग।
सदियों से शायद उसका काम ही यही है, शहर को मूक रहकर देखते रहना।
मैं सोचता हूं, लंदन के भवन केवल ईंट, पत्थर और शीशे से नहीं बने हैं। उनके चेहरे भी हैं, कान भी हैं, आंखें भी हैं और कभी कभी छत पर बैठे हुए उल्लू भी।
बस फर्क इतना है कि लंदन की इन मूर्तियों से दोस्ती करने के लिए आपको ऊपर देखना पड़ता है।इस शहर में इतिहास अक्सर संग्रहालय में बंद नहीं मिलता।कभी वह आपके सिर के ऊपर छत पर बैठा होता है।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
लंदन प्रवास पर
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






