डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय – लघुकथाः ये जीवन है…!
☆ लघुकथा – लघुकथाः ये जीवन है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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सालों बाद राघव और रागिनी का माल में अचानक आमना-सामना हो गया। राघव के साथ उसकी पत्नी, बेटे और बेटी थी, पर रागिनी निपट अकेली। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। नज़रें मिली और पल भर के लिए एकबारगी अतीत की स्मृति में कौंध खो गए। चंद लम्हों के लिए दोनों की नज़रें मानो थिर हो गई।
तभी राघव ने अपने समक्ष जड़वत खड़ी रागिनी का अपनी धर्मपत्नी से परिचय कराते हुए- यह रागिनी है। दोनों ने परस्पर औपचारिक अभिवादन किया। राघव ने बात को आगे बढ़ाते हुए बताया कि हम कभी एक कॉलेज, एक क्लास में पढ़ा करते थे। रागिनी ने कॉलेज में होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिता में अव्वल ख़िताब जीता था। इसके अनगिनत चाहने वाले थे, पर इसने सबकी चाहत को दरकिनार करते हुए शहर के नामी-गिरानी रईस के बेटे से शादी कर अपनी पढ़ाई अधबीच में ही छोड़ दी थी।
कुछ पल के लिए राघव रूका। रागिनी के चेहरे को गौर से देखा और हाल-चाल पर टिप्पणी करते हुए पूछा- ‘तुम्हारी जिंदगी, तो बड़े मौज में गुजर रही होगी और हाँ! तुम्हारे श्रीमान के क्या हाल-चाल हैं।’ रागिनी दुखी और थकी हुई आवाज़ में बोली- ‘पिछले साल पति महोदय की दिल का दौरा पड़ने से आकस्मिक मृत्यु हो गई और पंद्रह दिन पहले बेटा कार दुर्घटना में अपनी एक पाँव गँवा बैठा है। भौतिक सुख-सुविधाओं का अंबार है, बावजूद कहीं कुछ कमी सी खलती है।’ अब तुम अपने बारे में बताओ कि तुम्हारी जिंदगी कैसी गुजर रही है।
राघव ने पहले रागिनी के दुख के प्रति खेद प्रकट किया। फिर अपने बगल में खड़े बेटे-की ओर इशारा कराते हुए- ‘यह मेरा बेटा है इसने हाल ही में इसी शहर में कलेक्टर का कार्यभार ग्रहण किया है और बेटी व दामाद का अपना हास्पीटल है। बाकी सब ईश्वर की कृपा है।’
तभी रागिनी के मोबाइल में ‘’पिया का घर’’ फिल्म के गीत के बोल सुनाई दिए- ‘ये जीवन है, इस जीवन का, यही है यही है यही है रंग-रूप।’
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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