श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता – शाश्वत सत्य…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७३ ☆

✍ शाश्वत सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

यहाँ कुछ भी रहता नहीं

अनंत काल तक।

 

जब उठेगी दृष्टि, पीछे की ओर

तो सम्मुख होगा शाश्वत सत्य

कि,

बीता हुआ कल,

उसके पहले का कल,

या अभी- अभी बीता पल

अलग था

उससे जो दिख रहा है आईने में अभी।

 

क्या अमीबा ने सोचा होगा कभी

कि, उसके एककोषीय दुर्बल शरीर से

जन्म लेंगे कभी

जिराफ, हाथी, मगरमच्छ, अजगर

और घड़ियाल।

 

जीवन की इसी अनवरत यात्रा में

आदम की जात भी आई

उसी

एककोषीय जीवन से,

सतत बदलते रहने की

उस पुरातन परंपरा से।

 

कुछ भी नहीं बचा

जो रह गया हो

जैसा का तैसा।

विराट पहाड़ भी

किसी भूगर्भीय हलचल की

संतान हैं।

 

फिर,

आज का बवंडर

या सामने खड़ा तूफ़ान,

किसी की दहाड़

या आँखों की तपिश

इनका भी क्या ठिकाना?

 

सृष्टि के विराट क्रम में

उथल-पुथल भी क्षणिक है

तो शांति भी।

 

तूफ़ान आते हैं,

गुज़रने के लिए;

क्यूंकि

समय बदलता है करवट,

पल-पल।

 

यही तो है

संसार का सबसे पुराना सत्य

कि

यहाँ कुछ भी

नही है सदा के लिए।

 ☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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