श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पाताल कोट – भाग- ५० ☆ श्री सुरेश पटवा
गढ़चिरोली की वापसी यात्रा गोंदिया, बालाघाट, सिवनी और छिन्दवाड़ा के रास्ते से सम्पन्न की। यह इलाक़ा सतपुड़ा की दक्षिणी तलहटी और ऊपरी पठार पर आबाद गोंड देवगढ़ साम्राज्य द्वारा शासित रहा है जिसके प्रमाण स्वरुप गढ़ी प्राचीरों के खंडहर अकसर दिखते हैं। पातालकोट पिपरिया से पंचमढ़ी जाते हुए मटकुली से छिन्दवाड़ा जाने वाले मार्ग पर जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से 78 किमी पहले सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र तल से जमीन के 1700 फीट नीचे बसा है। यह सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र तल से 2750-3250 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान 79 वर्ग किमी में फैला हुआ है। पातालकोट आदिवासियों की एक अलग दुनिया वाले 12 गांवों का समूह।
अपनी संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक स्थिति से इसकी वैश्विक नक्शे में अलग पहचान है तो वहीं दिन में भी रात का एहसास कराने वाला यह क्षेत्र जग प्रसिद्ध है। पिपरिया और परासिया के बीच स्थित तामिया से पतालकोट जाया जाता है। तामिया तुलतुला पर्वत श्रेणियों के बीच आकर्षक प्राकृतिक छटा के साथ स्थित है। इसके चारों तरफ ऊंची पर्वत श्रेणियां तथा घने जंगल अद्भुत शान्ति का आभास कराते हैं। यहां डाक बंगले पर पहुंच कर चारों तरफ विहंगम दृश्य नज़र आता है, तो इसका आकार एक घोड़े की नाल जैसा नजर आता है। ऐसी जनश्रुति है कि यह पाताल लोक जाने का दरवाजा है। एक समय यहां के आदिवासी बाहरी दुनिया से दूर थे, लेकिन अब सरकारी प्रयासों से वे समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं।
प्राकृतिक दृश्यावली के कारण यह बहुत मनमोहक है। पाताल से अर्थ इसका एक गहराई में बसा होना है। इसके मुहाने पर ब्रिटिश युग का बना हुआ सर्किट हाउस है, उससे जुड़ी अनेकों भूत-प्रेत कहानियाँ क्षेत्र में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस जनजाति के लोग इस स्थान पर पिछले 5000 वर्षों से निवास कर रहे है। यह स्थान प्राकृतिक रूप से एक गहरी गर्त का किला-सा बन गया है। इसकी तलहटी से आसपास की पर्वत श्रेणियां करीब 1200 फीट ऊंची हैं। इसके पाास से ही दूधी नदी नर्मदा में मिलने निकलती है। वर्तमान में नीचे जाने के मार्ग बना दिए गए हैं। इसके पूर्व यहां लोग लताओं, बेलाओं तथा पेड़ पौधों को पकड़ कर नीचे और ऊपर आया जाया करते थे। यह स्थान अपनी अमूल्य जड़ी-बूटियों के लिए विख्यात है। यहां रहने वाले आदिवासी इन्ही जड़ी बूटियों से अपने कष्टों का निवारण करते हैं। वर्तमान में शासन द्वारा भी इन्हे चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। पातालकोट की सबसे खास बात यह है कि जमीन से नीचे होने और सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरा होने से इसके काफी हिस्से में सूरज की रोशनी देर से पहुंचती है, वह भी इतनी कम कि दिन में भी रात नजर आती है। बारिश के समय बादल इस घाटी में ऐसे दिखाई देते हैं जैसे तैर रहे हो। यदि कोई व्यक्ति यहां पहुंच जाए तो उसे लगेगा कि वह धरती के भीतर बसी अलग दुनिया में आ गया है।
पातालकोट की आदिवासी जीवन शैली से पुरातन युग का एहसास होता है। भारिया और गोंड परिवार रहन-सहन, खान-पान, दवा-दारू के लिए काफी हद तक जंगल के प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। समाज की मुख्य धारा में शामिल होने के बावजूद उनका भोजन मक्का, बाजरा, कोदो-कुटकी है। जड़ी-बूटियां होने से ये तुरंत अपनी बीमारी का इलाज कर लेते हैं। अब इन जड़ी-बूटियों को देश-विदेश में भी पहचान मिलने लगी है। पहनावा भी पहले की अपेक्षा आधुनिक युग जैसा हो गया है। पातालकोट के गांव कुछ दशक पहले तक रहस्य समेटे हुए थे। वर्ष 2007 में यहां पहला आंगनबाड़ी केंद्र खोला गया। प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित पातालकोट विकास प्राधिकरण के माध्यम से यहां स्कूली शिक्षा, आईसीडीएस, प्राथमिक स्वास्थ्य जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई गई है। पातालकोट के ऊपरी गांव रातेड़ में वर्ष 2009 में तत्कालीन कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने रोमांचकारी आदिवासी खेल उत्सव की शुरुआत की थी और पर्यटकों को यहां पर्यटन के लिए आकर्षित किया था। तब से ये उत्सव हर साल नवम्बर से जनवरी के बीच हो रहे हैं। इससे पर्यटन नक्शे में पातालकोट को महत्व मिलने लगा है।
पौराणिक मान्यता हैं कि इस स्थान से रावण का पुत्र मेघनाथ, भगवान शिव की आराधना करने पाताललोक गया था। यह इलाका जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। पातालकोट के 12 गांव गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोडिय़ा, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी है, जहां एक समय जाना मुश्किल था। अब इसे पक्की सड़क से जोड़ दिया गया है। यहां की आबादी भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय की हैं, जो अभी भी काफी हद तक प्राकृतिक व्यवस्थाओं पर आश्रित हैं। दृष्टि डालने से प्राकृतिक सौन्दर्य आपको अभिभूत कर देता है। इसके उत्तर दिशा में कुछ दूरी पर एक संकरे मार्ग से नीचे उतरने पर पर्वतीय गुफा में एक शिवलिंग स्थित है। इसके पास झरने के रूप में नीचे गिरने वाला पानी एक जल प्रपात सा प्रतीत होता है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





