आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है ज्ञानवर्धक – दोहा सलिला।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९६ ☆
☆ ज्ञानवर्धक – दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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दोहा में दो पंक्तियाँ, और चरण हैं चार।
विषम और सम चरण का, तेरह-ग्यारह भार।।
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तेरह मात्रिक विषम पद, रच भर भाव अनंत।
ग्यारह मात्रिक सम चरण, गुरु-लघु से कर अंत।।
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हो मात्रिक दोहराव तो, लय रहती है ठीक।
दोहा उल्टे सोरठा, सत्य सुपावन रीत।।
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दोहे की लय गुनगुना, रखिए उसमें शब्द।
सरस सरल दोहा रचें, श्रोता रहें निशब्द।।
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मात्रा गिनना सीखिए, बोल बोल उच्चार।
अ इ उ ऋ लघु गिनें, शेष रहे गुरु भार।।
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मात्रा को कहते कला, छंद शास्त्री जान।
द्विकल त्रिकल चौकल रखें, शब्द भार अनुमान।।
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विधि हरि हर बिन हो नहीं, भव से बेड़ा पार।
द्वि कल द्वि कल के बाद है, दोहे का आधार।।
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अकल शकल से श्रेष्ठ है, नकल नहीं अधिकार।
त्रिकल त्रिकल के बाद है, परख करें स्वीकार।।
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पनघट पनघट पर जुड़ा, नयनों का संबंध।
चौकल चौकल बाद ज्यों, श्वास-आस अनुबंध।।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
५.१०.२०२६
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