श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दैवासुर संपद्विभाग  योग

(फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन)

 

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌।

दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌।।2।।

शांति अक्रोध, सत, अहिंसा और कर्मफल त्याग

मृदुता, लज्जा, धैर्य औ” जीवदया प्रतिराग ।।2।।

 

भावार्थ :  मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम ‘सत्यभाषण’ है), अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव।।2।।

 

Harmlessness, truth,   absence   of   anger,   renunciation,   peacefulness,   absence   of crookedness,  compassion  towards  beings,  uncovetousness,  gentleness,  modesty,  absence  of fickleness.।।2।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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