श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “व्यग्रता।)

?अभी अभी # 562 ⇒ व्यग्रता (Anxiety) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह एक ऐसी मानसिक अवस्था होती है, जिसमें व्यक्ति बड़ा अस्त व्यस्त और असमंजस में रहता है । किसी भी कार्य में उसे ना तो रुचि रहती है और ना ही

मन में कोई उमंग । मन हमेशा अशांत और चिड़चिड़ा रहता है । आशा से कोसों दूर, हमेशा निराशा के बादल मन में छाए रहते हैं ।

वह सन् ७० का दौर था । इसी दौर में एक लेखक हुए हैं, गुलशन नंदा, जिनका गुलशन से कोई लेना देना नहीं था ।

जरा उनके प्रेरणादायक शब्द तो देखिए, फिल्म कटी पतंग से, जो उनके ही उपन्यास पर आधारित थी ;

ना कोई उमंग है,

ना कोई तरंग है

मेरी ज़िंदगी है क्या,

इक कटी पतंग है ।।

वह पीढ़ी अमरीकन उपन्यासकार हेमिंग्वे की भाषा में lost generation कहलाती थी, कामू, काफ्का और ज्यां पॉल सार्त्रे के अवसाद भरे साहित्य का शिकार थी ।।

आशावाद ही आस्तिकता है और निराशावाद ही नास्तिकता । जीवन की व्यर्थता और खोखलेपन का बोध व्यक्ति को पलायनवादी बना देता है ।

इधर प्रेम में धोखा खाया, उधर एक देवदास निकल आया ।

इधर फिल्मी पर्दे पर राजेश खन्ना की रोमांटिक फिल्में और उधर लुगदी साहित्य की भरमार । कौन कॉलेज पढ़ने जाता था । जिन्हें सिर्फ प्रेम और राजनीति करनी होती थी, वे तो कॉलेज छोड़ना ही नहीं चाहते थे । भटकी और भ्रमित तब की युवा पीढ़ी भाग भागकर मुंबई निकल जाती थी, फिल्मों में एक्टर बनने ।।

जो उस दौर के इस कुंठा और संत्रास की बीमारी से बच गया, उसने आत्म विश्वास, आस्तिकता और सकारात्मकता की राह पकड़ ली, और अपनी जीवन नैया को आसानी से पार लगा ली । जो उसमें डूब गए, दुनिया उन्हें भुला बैठी ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/स्व. जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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