श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “पान खाए गैया हमार…“।)
अभी अभी # 720 ⇒ पान खाए गैया हमार
श्री प्रदीप शर्मा
मैं पान नहीं खाता। मैने पान नहीं खाने की कोई कसम भी नहीं खाई। जब हमारे पास कोई कारण नहीं होता, तो हमारा एक तकिया कलाम होता है, बस यूं ही ! सबकी खाने पीने की अपनी पसंद होती है। आप किसी पर अपनी पसंद थौंप नहीं सकते। बहुत से लोग चाय नहीं पीते। वे मानते हैं, चाय उन्हें नुकसान करती है। कुछ कॉफी तो कुछ ग्रीन टी पसंद करते हैं। मुझे पान पसंद नहीं।
आयुर्वेद के हिसाब से पान न केवल भोजन को पचाता है, यह मुखशुद्धि का भी काम करता है। हमारे यहां वैसे भी चाय पान का रिवाज है। पहले चाय वाय, फिर पान वान ! सरकारी दफ्तरों में तो चाय पानी का अलग ही मतलब होता है।।
पान को ताम्बुल भी कहते हैं। लक्ष्मी पान भंडार को कहीं कहीं मैने तुलसी ताम्बुल सदन भी लिखा देखा है। सभी जानते हैं, पान एक पत्ता होता है। खाते वक्त वह मीठा पत्ता हो जाता है। सबसे पहले उसका डंठल काटा जाता है, फिर उसे करीने से तराशा जाता है। इस तरीके से पान को सजाया जाता है मानो कोई मां, अपने बच्चे को स्कूल भेजने के लिए तैयार कर रही हो। थोड़े छींटे चूने के और बाद में, कत्थे का लेप। मानो बच्चे को पहले सर में तेल लगाया हो और बाद में गर्दन और चेहरे पर पावडर। उसके बाद पान का सोलह श्रृंगार शुरू।
सुपारी के भी कई प्रकार होते हैं, चौरसिया जी जानते हैं, बाबू जी कौन सी सुपारी खाते हैं। कहां बोल्डर डालना और कहां बारीक सिकी सुपारी ! पिपरमेंट, इलायची, खोपरा, गुलकंद, केसर में कोई कसर नहीं रह जाती। पान की सतहों को तह में बंद किया जाता है, एक लौंग से उसे लॉक कर दिया जाता है, और कहीं चांदी तो कहीं सोने का बरक। और हां, किमाम वालों का खास ख़याल रखा जाता है।।
जब इतना स्वादिष्ट पान खाया, चबाया जाता है, तो फिर उसे थूका क्यों जाता है ! बस इतनी सी बात पर क्या कोई पान खाना छोड़ दे। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद। मैने तो खैर कभी पान चखा ही नहीं। कई बार दोस्तों के पान के आग्रह को ठुकराकर उनके कोप का भाजन बन चुका हूं, फिर भी मुझे अक्ल नहीं आई। चूना, कत्था मेरी पसंद नहीं, ना सही, सादा पान भी बनता है, वह क्यों नहीं खाते ? बस, नहीं खाते तो नहीं खाते।
वा, नहीं खाते तो मत खाओ, हमें क्या।
लेकिन स्वच्छ भारत अभियान ने जब से थूकने पर पाबंदी लगा दी है, बेचारे पान वाले वैसे ही परेशान चल रहे थे, उसमें कोरोना के कारण और सर मुढ़ाते ही ओले पड़े। अजय देवगन की तो लग गई। दाने दाने में केसर का दम दिखने लगा। आदमी किसी भी गुट का, मुंह में उसके गुटका।।
आइए, अब गैया को पान खिलाते हैं ! हुआ यूं कि, ज्यादा बोलने की आदत तो मुझे है नहीं, क्यूंकि पान तो मैं खाता नहीं। अब किसी ने थोड़ी जबरदस्ती कर ली, तो हमने भी कह दिया, अच्छा बनवा ही लो। लो साहब, बीच बाजार में हमारा बढ़िया पान बनकर तैयार हो गया और हमने भी कोई कसम तो खाई नहीं थी, इसलिए धर्मसंकट में पड़ गए थे, अब क्या करें।
इतने में मानो वैकुंठ से हमारे लिए गौ माता का अवतरण हुआ ! एक गैया हमारे सामने खड़ी हमें निहार रही थी। बस हमने सोचा, आज ही गौ सेवा हो जाए, और हमारा वह पान हमने गऊ माता को पेश कर दिया। वे थोड़ी झिझकी, उन्होंने पहले हमें निहारा, फिर पान को सूंघा और फिर जब पान ने उनके मुखारविंद में प्रवेश किया, तो उनका भाव देखने लायक था। हमने दो पान और उन्हें समर्पित किए। वे संतुष्ट हो, हमें आशीर्वाद दे, वहां से प्रस्थित हुई। बोलिए गऊ माता की जय ! सब संतन की जय। पान के आनंद की जय।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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