सुश्री गिरिमा घारेखान

वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री गिरिमा हार्दिक घारेखान जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. ३० साल विदेश में रहकर, वहाँ की इंडियन स्कूल में शिक्षिका रह चूकी सुश्री गिरिमा घारेखान जी ने भारत वापस आने के बाद अपना पुराना शौक जागृत किया और कहानियाँ लिखना शुरू किया. १० साल में उनकी 17 किताबें प्रकाशित हुई हैं जिन में चार कहानी संग्रह के अतिरिक्त दो उपन्यास, लघुकथा संग्रह, बालसाहित्य की किताबें, चरित्र लेखन और संशोधन आधारित पुस्तकें भी हैं. उनको मात्र तीन साल में गुजरात साहित्य अकादमी के पांचो पुरस्कार मिल चुके हैं. साथ में किताबों और कहानियों को मिले पुरस्कार मिलाकर उनको लगभग २५ अलग अलग पुरस्कार प्राप्त हुए हैं. उनकी कृतियाँ गुजराती भाषा के सारे नामी सामयिकों में नियमित प्रकाशित होती रहती है. उनके दोनों उपन्यास का हिंदी में अनुवाद हुआ है और अनूदित कहानियों का संग्रह उड़िया में भी हुआ है. कहानियाँ मराठी, अंग्रेजी और मैथीली में अनुदित हुई हैं. वे गुजराती भाषा के तीन सामयिकों में संपादक के रूप में कार्यरत है. केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित फेस्टिवल ऑफ़ लेटर्स, २०२५ में उनको कहानी पठन के लिए आमंत्रित किया गया था.

☆ गुलाब, बारहमासी, मनीप्लांट और… अनुवादक: श्री रजनीकान्त एस.शाह ☆ सुश्री गिरिमा घारेखान ☆

“यदि तुम्हें कहानी को ऐसे अधूरी ही रखना हो तो लिखना शुरू ही क्यों करते हो?’’ मेरी कहानी की पहली पाठक और विवेचक मेरी पत्नी ने थोड़ी चिढ़ के साथ कहा।

“पर उसका अंत ही मुझे मालूम नहीं हो तो मैं क्या करूँ?’’

“तो लिखो ही मत।’’

“तुम्हारे लिए ऐसा कहना आसान है। पर जब कहानी का भीतर से बाहर आने का दबाव हो तब उसे रोका ही नहीं जा सकता। क्या तुम सागर की लहरों को उछलने से रोक सकती हो?’’

“तो फिर चाहे जो अंत लिख दो न?’’

“ना, यह तो हरे-भरे पौधे पर प्लास्टिक का फूल रखने जैसा लगेगा।

“तो फिर तुम जानो और तुम्हारे पाठक जाने।’’

वह वहाँ से उठकर चली गई।

अब मेरी इस कहानी को पढ़कर आप लोग उसके अंत के बारे में निर्णय करना कि मेरी बात सही है या गलत है।

* * *

हम उस घर में नए नए रहने के लिए गए थे। तीन मंज़िला घर के पहले माले पर। जाने के बाद कुछ ही दिनों में माया ने उसका स्त्रीसहज एन्टेना को काम पर लगा दिया और रात को खाना खाते वक्त उसे प्राप्त जानकारी की ऑडियो मुझे सुनाने लगी। एक दिन उसने मुझे कहा, “हमारे नीचे जो परिवार रहता है, उसमें पुरुष का स्वभाव बहुत ही खराब है। सोसायटी में सबके साथ झगड़ा करता रहता है। उसकी इस आदत के कारण उसकी पत्नी और उसकी बेटी भी किसीसे मिलजुल नहीं पा रहे। बिटिया कुसुम को उसने बारहवीं कक्षा तक पढाकर पढ़ाई छुड़वा दी है। हमें तो उन लोगों से दूर ही रहना है।’’

माया की बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ,“हमारे नीचेवाले? बगीचेवाले! मैं तो मानता था कि ऐसे सुंदर फूल उगानेवाले व्यक्ति का स्वभाव बहुत कोमल होगा। जो व्यक्ति वनस्पति को प्यार करे वह इन्सानों को तो करेगा ही ना!’’

नीचे के फ्लेटवाले को उनके घर के आगेवाली जमीन मिली थी और उसमें उन लोगों ने सुंदर बगीचा तैयार किया था। वह मुझे मेरी बाल्कनी से अच्छे से दिखाई दे रहा था।

जवाब में माया ने मात्र उसके कंधे ही उछाले थे।

नीचेवाले बगीचे का सबसे सुंदर फूल मुझे कुछ दिनों के बाद देखने को मिला। एक दिन बड़े

तड़के मेरी आँख खुल गई और मैं बाल्कनी में जाकर खड़ा रहा। ऐसे भी मुझे बगीचे का बहुत शौक है और ताजा खिले हुए रंगबिरंगी फूलों को देखकर मेरे हृदय से सुगंध के फव्वारे छूटते हैं। उस दिन भी मैं अपनी आँखों में फूलों के रंगों का अंजन करता हुआ खड़ा था। उस वक्त घर में से एक लड़की बाहर निकली। वही कुसुम ही होगी। पहले तो मुझे उसकी पीठ पर फैले हुए काले, रेशमी बाल ही दिखे, क्योंकि वह हरएक पौधे पर झुककर उसके कानों में कुछ बातें कर रही थी। कभी किसी पत्ते को हाथ से सहलाती थी और यदि पत्ता सूख गया हो तो धीरे से उसे खींच लेती थी, पवन जिस प्रकार फूल से सुगंध खींचे ऐसे। फिर उसने एक थोड़े ऊंचे खिले हुए गुलाब के एकदम निकट अपने होंठ ले जाकर उसे चूमने जैसी चेष्टा की। उस वक्त मैंने उसके चेहरे को ठीक से देखा। मैं तय नहीं कर पाता था कि उसका चेहरा ज्यादा सुंदर था या वह पूरी तरह खिला हुआ गुलाब। वह ज्यादा गुलाबी था या उसे चूम रहे होंठ! उसी वक्त उसने भी ऊपर देखा। वह थोड़ी शरमाई। नक्काशी में नजाकत जुड़ गई। मुझे लगा कि उसकी बुआ को तो एवोर्ड देना चाहिए। उसका नाम कुसुम के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता!

मुझे उसके साथ बात करने की इच्छा हुई पर माया द्वारा कही गई बात को याद करके कुछ अनिर्णीत सा था, कि घर में से एक पुरुष बाहर आया। उसे देखते ही कुसुम चपला की चमक की भांति अंदर चली गई। वह पुरुष ने मुझे बाल्कनी में खडा पाया और चिल्लाया,“क्या है?’’ उसके बाद उसके होठ कुछ फड़फड़ाए। शायद एक-दो गालियाँ बोला होगा ऐसा लगा। यदि उसकी चलती तो उसकी कौड़े जैसी आँखों के डोरों को ऊपर तक भेज देता। मुझे अपनी अच्छे से उगी हुई सुबह को खराब नहीं करना था। मैं बिना कुछ बोले अंदर आ गया। अंदर जाकर मैंने माया से बात की। उसने कहा,“अच्छा हुआ आप कुछ बोले नहीं। कीचड़ में पत्थर फेंककर क्यों हम खुद को खराब करें। अब उस लड़की की ओर देखना नहीं। और क्या?’’

“पर माया उसे मेरी उम्र तो….’’

“सुंदर जवान बेटी का बाप किसी पर भरोसा नहीं कर सकता। कल ही ऊपरवाली लताबहन कह रही थीं कि उस कुसुम की बड़ी बहन किसी नीची जाति के व्यक्ति के साथ भाग गई थी। फिर वहाँ उसने आत्महत्या कर ली। उसके बाद ही यह आदमी ऐसा हो गया है। हमें क्या? जिस गाँव जाना नहीं उस गाँव का नाम लेना ही नहीं।’’

वैसे मेरे लिए तो वह बड़ा मुश्किल था। मैंने नाम लिए बिना उस गाँव जाने का रास्ता खोज लिया। मैं बड़े सवेरे बाल्कनी में तो खडा ही रहता, पर अंदर की ओर, रेलिंग पर झुककर नहीं। सूरज की ताजा जन्मी किरणों की तरह कुसुम बगीचे में टहलती रहती। वह हर पौधे को सहलाती, फूल खिला हो तो झुककर `थेंक यू’ कहती और कलियों को नजरों से पीती रहती। वह हर पौधे को बारी बारी अच्छी तरह से नहलाती थी। जब वह झुकी हुई हो तब वह भी एक झुकी हुई लता सी लगती थी। उसके सुन्दर चेहरे को छूकर उसके लंबे खुले बाल फूलों को गुदगुदाने के लिए पहुँच जाते थे मानों देखना चाहते हो कि कौन सबसे ज्यादा मुलायम है! कभी किसीकी ईर्षा नहीं करनेवाला मैं मन ही मन इस कुसुम के पापा की ईर्षा करने लगा था। कईंबार मुझे उस लड़की से बात करने का मन होता पर उसके पापा की उस माँ-बेटी पर चीख-चिल्लाहट बारबार सुनाई देती थी l मेरे कानों में घुसी हुई ये आवाजें मुझे ऐसा करने से रोकती थीं।

एक दिन तो मानो चमत्कार ही हो गया। मैं शाम को ऑफिस से लौटा तब नीचेवाले बगीचे को मैंने मेरे घर में बैठे हुए देखा! मेरे चेहरे के हावभाव देखकर माया ने मैं पूछूं उससे पहले ही बता दिया: “कुसुम को उसके फियान्स ने मोबाइल फोन भेजा है, इस लिए आयी है।’’

“फ़ीयान्स ने!’’ मैंने आश्चर्य अनुभव करते हुए कुसुम की ओर देखा। अभी तो मुश्किल से वह बीस साल की होगी। आज के जमाने में यह जल्दी नहीं कहलाए!

माया ने आगे कहा,`उसने तो कभी ऐसे मोबाइल का उपयोग किया नहीं है। इसलिए उसकी मम्मी ने उसे मेरे पास सीखने के लिए भेजा है। मैंने उसे कहा, कि मैं मोबाइल का उपयोग करती तो हूँ लेकिन डाउनलोड करना आदि मुझे आता नहीं है। इसलिए आपका इंतजार करती हुई बैठी है l’

“पर उसके पापा!’’

“वे दो दिन के लिए बाहर गए हुए हैं।’’ माया ने मेरी ओर सूचक दृष्टि से देखकर कहा।

“पापा के पास भी सादा मोबाइल है, अंकल। वे भी मुझे सीखा नहीं सकेंगे।’’ उस पुष्प में से सुरभि महक उठी।

माया चाय चढाने के लिए अंदर गई। मैंने कुसुम का मोबाइल लेकर उसमें सिमकार्ड रखा, चार्जर के साथ जोड़ा और उसे चालू किया। इतने नजदीक से मैंने कुसुम को पहली बार देखा था और मेरे घर में उसकी मौजूदगी से एक बेटी के पिता होने की मेरी अतृप्त इच्छा मुझे ज्यादा दंशित कर रही थी। मैं उसे मोबाइल के अलग अलग फीचर्स समझा रहा था कि माया चाय लेकर आयी।

“उसे तो आप सबसे पहले वोटस्एप डाउनलोड कर दीजिये। अभी तो उसके लिए इतने की ही जरूरत है।’’

“और अंकल, फोटो खींचना भी सीखा दीजिएगा। उन्हें मेरी फ़ोटोज़ चाहिएl ”

मैंने कुसुम की ओर देखा। उसकी आवाज ऐसे सिकुड़ क्यों गई? ऐसे वक्त तो `उनको’ बोलते वक्त शब्दों में रेशम नहीं बिछाया जाए? या फिर मन ने मुझे ऐसा महसूस नहीं होने दिया? वह शादी करके चली जाएगी- यह विचार हृदय में घुसी हुई फांस की भांति मुझे क्यों पीड़ा दे रहा था?

मैंने कुसुम को वोट्सएप का उपयोग करना, फोटो और सेल्फी कैसे ली जाए –यह सब सिखाया l उसके फोन में मेरा नंबर सेव करके लिए हुए फोटोज अन्य को किस प्रकार भेजे जाए आदि भी सिखाया। मैंने उसे उसके फ़ीयान्स के बारे में पूछा पर वह तो जवाब दिये बिना नीचे देखती हुई खामोश बैठी रही। उसके चेहरे पर अचानक धुंद छा गई हो ऐसा मुझे लगा। माया ने मुझे टोका,“एक तो लड़की पहलीबार इस प्रकार विवशतावश अकेली किसीके घर आयी है, और तुम ऐसे प्रश्न पूछकर उसे ज्यादा लजाते हो।’’

सब अच्छे से समझकर कुसुम नीचे गई। मुझे लगा कि उस वक्त उसकी आँखों में दो ओसकण झलक रहे थे।

उसके बाद कुसुम मेरे घर आयी नहीं। पर एक बदलाव आया। अब मैं बाल्कनी में खडा होऊँ तब पहले एक नजर घर में देखकर ऊपर देखकर थोड़ा मुस्कुरा लेती थी- दूज के चाँद सा, थोड़ा, क्षणिक, और हाँ, अब रोज सवेरे वह उसके बगीचे के किसी एक फूल की फोटो निकालकर मुझे भेजती थी….महदांश गुलाब ही। एक दिन उसने मुझे श्वेत सदाप्रसून(बारहमासी) की फोटो भेजी थी…..एक खुशबू रहित फूल! उसे और उसके पापा की सुबहवेला में सुनायी देनेवाली चीखचील्लाहटों से कोई संबंध होगा? एक सुबह मैंने देखा कि उसके गाल पर पाँच उँगलियों के निशान थे। उस दिन उसने मुझे सूरजमुखी की फोटो भेजी थी। मुझे उसमें उसके पापा का गुस्से से तमतमाता हुआ चेहरा नजर आता रहता था। कभी उसकी गुलाबी पलकोंवाली आँखें सूजी हुई लगती थी और कमल की पंखुरी की भांति उभर आती थी। ऐसे वक्त उसने फोटो में भेजे डाली पर रहे गुलाब की कोरें धूप के कारण झुलसकर काली पड गई हो ऐसा मुझे लगता था। एकबार तो उसने मुझे एक छोटे फूल पर पर बैठे हुए काले भौंरे की फोटो भेजी थी और एकबार फिर दो डालियों के बीच बंधे हुए मकड़ी के जाले का। ऐसी फोटो देखकर मुझे कुछ फिक्र होती थी, उसे मेसेज करने का मन करता था, पर फिर विचार आता था कि हो सकता है, उसका जल्लाद बाप उसका फोन भी देखता हो और मैं अपने विचार को अपने मन में ही रहने देता था। माया मुझे कहती रहती कि “फूलों की फोटो देखकर इतनी फिक्र क्यों करनी? कुसुम के मन में तो जैसा आप सोचते हो वैसा कुछ होगा भी नहीं।’’

मैं भी चाहता था कि माया सही हो।

हम लोग गर्मियों में एक टूअर में एक महीने के लिए परदेश गए थे। पहले ही दिन मेरा फोन पानी में गिरकर खराब हो गया। टूअर में तो रिपेर करने का वक्त भी किसके पास होगा? इसलिए उसे रख दिया बेग में। माया का फोन था इसलिए काम चल गया।

टूअर से हम लोग रात को घर वापस लौट आए थे। दूसरे दिन सवेरे उठकर मैं सीधे बाल्कनी में गया। मुझे मेरे घर से ज्यादा विरह तो मानो उस बगीचे के फूलों का हो गया था। पर मैंने नीचे जो देखा उसे मानने के लिए आँखें तैयार नहीं थीं। सारा बगीचा सूख गया था! सूखी हुई डालियाँ किसीको खोज रही हो ऐसे हवा में यहाँ वहाँ व्यर्थ कोशिशें करती हिल रही थीं। उसकी प्रत्येक जोड़ के गड्ढे में मानो आँखें फूटी हुई थीं और उनमें फंसे हुए ओसकण पौधे के आँसू होकर दु:ख व्यक्त करते थे। क्या हुआ होगा? कुसुम कहाँ गई होगी? मेरा मन अनेक शंका कुशंकाओं से भर गया। अनेक सवालिये सांप मेरे मन में उगी हुई घाँस में फूत्कारने लगे। मैं विचलित हो गया। मोबाइल में कुसुम का कोई मेसेज होगा? ऑफिस गया पर काम में दिल लगा नहीं। ऑफिस जाते वक्त फोन रिपेर करने के लिए दिया था। उसे लेकर मैं वापस घर आ गया।

कपड़े बदल रहा था तब माया ने एक ही सांस में सारे समाचार सुना दिये। “कुसुम की तो

शादी हो गई। सोसायटी के कॉमन प्लॉट में ही रखी गई थी। लताबहन ने कुसुम के वर को देखा। उससे तो वह बहुत बड़ा लगता था। बड़े बडे गलमूच्छों जैसी मूछें और हबसी सा काला कलूटा। कहते थे कि विवाह के वक्त दो समधियों के बीच लेन-देन को लेकर झगड़ा भी हुआ था। कुसुम बहुत रो रही थी। ससुरालवालों ने पगफेराई के लिए भी भेजा नहीं।’’

मेरे हृदय से हरेभरे बगीचे को भी सूखा दे ऐसा निश्वास निकल गया। अरर! बेचारी लड़की! उसके बाप ने ऐसा क्यों किया होगा? पैसेवाले होंगे? तो भी क्या? सोने की चमक-दमक फूलों की ताजगी को थोडे ही बचा सकेगी? फूल को तो चाहिए नर्म जमीन और हार्दिक सेवा टहल। क्या करती होगी कुसुम? मेरा उतरा हुआ चेहरा देखकर माया ने कहा:“अब आप दु:खी नहीं होना। उसके पापा ने उसे पूछकर ही तो संबंध जोड़ा होगा न?’’

मैं बिना कुछ बोले हमारी पाँच वर्षीया फोरम के माला चढ़ायी हुई फोटो की ओर देखता रहा। स्कूल की फेन्सी ड्रेस स्पर्धा में फूलपरी बनी थी। कितनी सुंदर लग रही थी!

माया कुछ देर तक मेरा हाथ पकड़े बैठी रही। फिर चाय चढाने के लिए रसोई में गई।

मैंने अपना मोबाइल चालू किया और कुसुम की प्रोफाइल देखने लगा। उसने कभी कभी मुझे घर में रखे हुए मनीप्लांट की फोटो भेजी थी, बस। क्या उसके नए घर में बगीचा या फूलपौधे नहीं होंगे? वैसे पिछले कईं दिनों से तो मनीप्लांट की भी फोटो नहीं थी। उसे कुछ हुआ तो नहीं होगा? वह खुश तो होगी ही न? उसके बारे में सोच-सोचकर मेरा हृदय क्यों खालीपन अनुभव कर रहा था। शरीर में लहू के साथ फिक्र भी घुली जा रही हो ऐसा मुझे लग रहा था l

अब सुबह वेला में मैंने बाल्कनी में जाना बंद कर दिया था, क्योंकि जब नीचे देखूँ तब बगीचे में जड़ें डालकर बैठे हुए खालीपन के साथ कहीं कोने में पड़े हुए, सूखकर झडे हुए फूलों में मुझे कुसुम का चेहरा नजर आता था और सूखी डालियों के बीच चमक रहे ओसबिन्दुओं में उसकी आँखों के आँसू। सूरज की किरणें उन आंसुओं को भी वहाँ टिकने नहीं देती थीं। वर्षाकाल से पहले के वातावरण की उमस से भी ज्यादा उमस मेरे मन को अनुभव होती रहती थी। नीचे जाकर उसके बाप से कुसुम की खबर पूछने का मन करता था। पर किस हक से? क्या पूछूं? ऐसा भी नहीं पूछ सकते न कि आप अपने बगीचे को पानी क्यों नहीं दे रहे? सोसायटी के लोगों के साथ वह जिस तरह से गाली-गलौज करता था, यह सुनकर तो उसके सामने खड़े रहने का भी मन करता नहीं था।

बहुत इंतजार कराने के बाद बरसात होने लगी। माया ने मुझे कहा;“अब हो सकता है बगीचा ताजगी से भर जाए। किसी पौधे में जान होगी तो फिर खिल उठेगा। कईंबार ऐसा होता है कि ऊपर से सूखा नजर आए लेकिन भीतर से ताजा हो।’’

“अब एक भी पौधे में जान बची हो ऐसा तुम्हें लगता भी है?’’

“आप आजकल ऐसे क्यों हो गए हो? मेरी समझ से परे हो गया है।’’ मेरे शब्द सुनकर माया का उत्साह पत्ते पर से पानी सरक जाए ऐसे खत्म हो गया। वह उसका फोन लेकर बैठ गई।

मैं फोरम की फोटो को देखता हुआ बैठा रहा।

 एक दिन सुबह अचानक कुसुम के वोट्स एप में मैंने एक मेसेज देखा। उल्लसित होकर मैंने उसे खोला और….यह क्या? सूखकर कांटा हुए कैक्टस की फोटो थी! कैक्टस के कांटे फोटो में से निकलकर सीधे मेरे हृदय में गड़े जा रहे थे। मैं मोबाइल रखकर दो-दो सीढ़ियाँ उतरता हुआ सीधे नीचे गया। आज तो पूछ ही लेता हूँ। क्या कर लेगा उसका बाप मेरा?

 बारबार दो बार बेल बजाया फिर भी किसीने जब दरवाजा नहीं खोला तो मेरी नजर नीचे की ओर गई। दरवाजे के बाहर तो बड़ा ताला लगा हुआ था।

 बरसात के पानी से नीचे पड़े सडे हुए पत्तों की दुर्गंध मेरे अस्तित्व में फैल गई।

* * * *

अब आप ही कहो, इस कहानी का क्या अंत दिया जा सकता है?

(गुर्जर राष्ट्रविना अप्रैल- जून २०२३)

अनुवादक: श्री रजनीकान्त एस.शाह

संपर्क : २,`शीलप्रिय’,विमलनगर सोसायटी, नवाबजार,करजण.391240. जिला.वडोदरा.गुजरात.

 फोन:9924567512.E.Mail: navkar1947@gmail.com

©  सुश्री गिरिमा घारेखान

सम्पर्क –  १०,इशान बंगलोज,सुरधारा-सताधार रोड,थलतेज,अहमदाबाद-380054.फोन: ८९८००५९०९

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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