🟢 धीरज धर भरिए डग 🟢 स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव 🟢

(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

?

साहस ही संबल है,

धीरज धर भरिए डग,,,

करिए सब काम।

 

टूटै पहाड़ सर पै जो, गिरे गाज घर पै,

भंवर जाल बिंधीं नाव, भंवै जी लहर पै,

अब डूबे तब डूबे, डगमग डग डोलन हो,,,

ताकत मन की समेट, गारिये बदन तमाम।

साहस ही संबल है,,,,,

 

भटक रहे जंगल में, मंजिल मिलै नहीं,

आसमान घुप्प कठिन ऊमस, तरु डुले नहीं,

बैठिए न मार मन बढ़िए संकल्प बंधे,,,

कुदरत का चका कभी होता नहीं जाम !

साहस ही संबल है,,,

 

गारद कर जीवन को, चलता जो जीवन में,

पता संगीत जो निहाई और घन में,

मिलता मन चाहा फल केवल उस जन को ही_

भौंहों पर स्वेद बिंदु जिसके हैं आठ याम !

 

साहस ही संबल है,

धीरज धर भरिए डग,,,

करिये सब काम।

स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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