सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ व्यंग्य ☆ कुत्ता नहीं —श्वान या डाॅग बाबू ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यं अप्रियम्——– शास्त्र भी खूब हैं। सत्य, प्रिय कैसे हो सकता है। अप्रिय सत्य तो साहित्यकार भी बोलने में डरते हैं। आ बैल मुझे मार, कौन कहे।
बेशक कुत्ते को कुत्ता ही कहना पड़ता है, यही सत्य है पर यह भाषायी संस्कृति के अनुरूप नहीं है। कुत्ता शब्द गाली सा लगता है। कभी कुबेरों के विदेशी नस्ल के कुत्ते को कुत्ता बोलकर देखिए— आपको हिकारत की नज़र से न देखा जाए तो कहिएगा।
दूर क्यों जाएं S I R के लिए किसी ने “आवास प्रमाण पत्र” में कुत्ते को कुत्ता नहीं ” डाॅग बाबू” लिखा। इसे कहते हैं भाषायी संस्कार। आखिर कुत्ता प्रजाति की भी कोई इज्जत होती है कि नहीं। भाषा हाइब्रिड है तो क्या !
बात दूर तक पहुँच गई। हवा और बातें किसी से पूछकर फैलती हैं क्या?
कुत्ता कुत्ता और कुत्ता–सड़क से लेकर महाअदालत तक। कुत्ते को कुत्ता कहना बेशक अपराध न हो पर अप्रिय सत्य अवश्य हो सकता है। पर्यायवाची होते किस दिन के लिए हैं। श्वान भी तो कहा जा सकता है। मनुष्य को कुत्तों की भाषा समझती है या नहीं यह शोध का विषय है पर अपनी भाषा की भी पूरी जानकारी न होना खेद का विषय है। कुत्ते, आदमी की भाषा सीख जाते तो जाने क्या होता। वे अपने अपमान और अत्याचार को लेकर महाअदालत जाते या नहीं, कौन कह सकता है। या वे भी मनुष्य की तरह विषपायी हो चुके हैं। विष का जिनपर कोई असर होता नहीं। वैसे भी कई भाषाएं सीख लेने से समझदारी आ जाती है ऐसा कहाँ लिखा है।
भौंकना कुत्तों की नैसर्गिक भाषा है। भौंकते हैं इसलिए कुत्ता कहना न्यायसंगत नहीं। वे भौं भौं न करें तो क्या मनुष्य करेगा। हर जीव को अपनी भाषा में बात करने का पूरा अधिकार है।
अब बात कटखनेपन की। हर कुत्ता कटखना कहां होता है ! कुछ वफादार भी होते हैं। केवल अपने मालिक के लिये ही भौंकते हैं। लगातार। आठों याम। कभी थकते नहीं।
बात निकली तो आँखों के सामने अखबारों की कतरनें नाचने लगीं। सामने नमूदार हुए कुत्ताजी के “हैप्पी बर्थ डे “वाले बड़े बड़े होर्डिंग्ज। जिसपर उनके मालिक, दोस्त और अन्य शुभेच्छुओं के नाम अंकित थे। अचरज हुआ और नहीं भी। अपनी छींक और खांसी का विज्ञापन करने वाले कसमसाने लगे पर यह कसमसाहट बिजली की तरह कौंधी और विलुप्त हो गई। फिर वही ढाक के तीन पात। गली गली, हर नगर नगर, हर डगर डगर मानव प्रजाति की उपलब्धियों के दाँत चियारते हुए होर्डिंग्ज।
दिल्ली का कुत्ता काण्ड जाने किस किस बात की याद दिला रहा है। मन में विचार उठा युधिष्ठिर के साथ उनका कुत्ता भी स्वर्ग पहुँचा था। कलियुग है। अब युधिष्ठिर ही नहीं, किसी का भी कुत्ता स्वर्ग तक साथ निभा सकता है। कोई बताता भी नहीं कि उनका कुत्ता स्वर्ग में भी स्वामीभक्ति का परिचय दे रहा है।
स्वामिभक्ति से जापान के उस कुत्ते की याद आना स्वाभाविक है जो हर दिन नियत समय पर, रेलवे स्टेशन जाकर अपने मालिक की राह देखा करता था। अन्ततः उसका प्राणान्त हुआ, वह प्यार और वफ़ा की नज़ीर बन गया।
जापान ही नहीं कितने ही भारतीय कुत्तों में भी ये गुण पाए जाते हैं। सभी को एक ही लाठी से हाँकना ठीक है क्या ?
बड़ी देर से “अमीर खुसरो” भी ज़ेहन में उथलपुथल मचा रहे हैं। पनघट पर पनिहारिनों से पीने के लिए पानी माँग बैठे तो उन्होंने खीर चर्खा कुत्ता और ढोल पर कविता सुनाने की माँग कर दी। बस फिर क्या था खुसरो ने आव देखा न ताव चारों को दो लाइनों में समेट दिया–
“खीर पकाई जतन से, चर्खा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा। । “
रही बात ताजा दौर की, पनघट तो रहे नहीं। ललनाएं खीर भी कहाँ पकाती हैं। सच ये है कि उन्हें पकाना आता ही नहीं। जब पकी ही नहीं तो कुत्ता खीर खायेगा कहाँ से? चर्खा क्या होता है? पता ही नहीं तो चलाएगा कौन ? जब कुछ भी नहीं है तो ढोल बजाने के अलावा चारा ही क्या बचता है।
इति कुत्ता पुराण!
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






