image_print

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (75) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं परम्‌। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌॥   व्यास कृपा से सुन सका, स्वतः यह अद्भुत ज्ञान योगेश्वर श्री कृष्ण के मुख निसृत श्रीमान ।।75।।   भावार्थ :  श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना॥75॥ Through the Grace of Vyasa I have heard this supreme and most secret Yoga direct from Krishna, the Lord of Yoga Himself declaring it.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (74) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) संजय उवाच - इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्‌॥ संजय बोला- वासुदेव औ" पार्थ का सुना मैने संवाद जो था अद्भुत, ज्ञानमय, रोमांचक महाराज ।।74।। भावार्थ :  संजय बोले- इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्‍भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना॥74॥ Thus have I heard this wonderful dialogue between Krishna and the high-souled Arjuna, which causes the hair to stand on end.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (73) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) अर्जुन उवाच नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥   अर्जुन ने कहा- अच्युत आप की कृपा से, नष्ट मोह जंजाल कर्म ज्ञान मिला, भ्रम मिटा, धर्म सकूँगा पाल ।।73।। भावार्थ :  अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा॥73॥ Destroyed is my delusion as I have gained my memory (knowledge) through Thy Grace, O Krishna! I am firm; my doubts are gone. I will act according to Thy word.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (72) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥   अर्जुन, तुमने सुना क्या , हो एकाग्र रख ध्यान? सुनकर तेरा गया क्या - मोह और अज्ञान ?।।72।।   भावार्थ : हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?॥72॥ Has this  been  heard,  O  Arjuna,  with  one-pointed  mind?  Has  the  delusion  of  thy ignorance been fully destroyed, O Dhananjaya?   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (71) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌॥   श्रद्धावान अद्वेष हिय, सुनेगा जो भी व्यक्ति वह भी होगा मुक्त, शुभ लोक में हो अनुरक्त ।।71।।   भावार्थ :  जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा॥71॥ The man also who hears this, full of faith and free from malice, he, too, liberated, shall attain to the happy worlds of those of righteous deeds.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (70) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य )   अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥   जिसने भी होगा सुना ,यह धार्मिक संवाद ज्ञान से उसने ही पूजा मुझे हृदय रख याद ।।70।।   भावार्थ :  जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ (गीता अध्याय 4 श्लोक 33 का अर्थ देखना चाहिए।) से पूजित होऊँगा- ऐसा मेरा मत है॥70॥ And he who will study this sacred dialogue of ours, by him I shall have been worshipped by the sacrifice of wisdom; such is My conviction.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (69) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥   उससे बढ न प्रिय मेरा, हुआ न होगा कोई इस धरती पर भक्त से ,प्रिय अति मुझे न कोई ।।69।। भावार्थ :  उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं॥69॥ Nor is there any among men who does dearer service to Me, nor shall there be another on earth dearer to Me than he.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (68) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥   जो मुझमें अनुरक्त जन , को देगा यह ज्ञान वह पा मेरी भक्ति, आ मिलेगा मुझे निदान ।।68।। भावार्थ :  जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है॥68॥ He who with supreme devotion to Me will teach this supreme secret to My devotees, shall doubtless come to Me.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (67) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( श्रीगीताजी का माहात्म्य ) इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥   ये न ज्ञान देना उसे ,जो न तपी, मम भक्त जो अनेच्छु, द्वेषी मेरा, मुझमें न अनुरक्त ।।67।।   भावार्थ :  तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए॥67॥ This is never to be spoken by thee to one who is devoid of austerities, to one who is not devoted, nor to one who does not render service, nor who does not desire to listen, nor to one who cavils at Me.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर...
Read More

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (66) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अध्याय 18 ( भक्ति सहित कर्मयोग का विषय )   सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥   सब धर्मो को छोड़ कर,  आ तू मेरे पास मैं सब पापों से तुझे मुक्ति दूँगा, रख विश्वास ।।66।।   भावार्थ :  संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना चाहिए।) में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥66॥ Abandoning all duties, take refuge in Me alone; I will liberate thee from all sins; grieve not.   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
Read More
image_print