हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९२ ☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाब : बहुत लाजवाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९२ ☆

ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆

‘जो नहीं है हमारे पास/ वो ख्वाब है/ पर जो है हमारे पास/ वो लाजवाब है’ शाश्वत् सत्य है, परंतु मानव उसके पीछे भागता है, जो उसके पास नहीं है। वह उसके प्रति उपेक्षा भाव दर्शाता है, जो उसके पास है। यही है दु:खों का मूल कारण और यही त्रासदी है जीवन की। इंसान अपने दु:खों से नहीं, दूसरे के सुखों से अधिक दु:खी व परेशान रहता है।

मानव की इच्छाएं अनंत है, जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं और सीमित साधनों से असीमित इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। इसलिए वह आजीवन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और सुक़ून भरी ज़िंदगी नहीं जी पाता। सो! उन पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। मानव ख्वाबों की दुनिया में जीता है अर्थात् सपनों को संजोए रखता है। सपने देखना तो अच्छा है, परंतु तनावग्रस्त  रहना जीने की ललक पर ग्रहण लगा देता है। खुली आंखों से देखे गए सपने मानव को प्रेरित करते हैं, उल्लसित-उन्मादित करते हैं और वे उन्हें साकार रूप प्रदान करने में अपना सर्वस्व ही नहीं; स्वयं को भी झोंक देता है। उस स्थिति में वह आशान्वित रहता है और एक अंतराल के पश्चात् अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है।

परंतु चंद लोग ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थाम लेते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए तनाव से अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और उन्हें यह संसार दु:खालय प्रतीत होता है। दूसरों को देखकर वे उनके प्रति भी ईर्ष्या भाव दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अभावों से नहीं; दूसरों को प्राप्त सुखों को देख कर दु:ख होता है–अंतत: यही उनकी नियति बन जाती है।

अक्सर मानव भूल जाता है कि वह खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ जाना है। यह संसार मिथ्या व मानव शरीर नश्वर है और सब कुछ यहीं रह जाना है। मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् यह अनमोल जीवन प्राप्त होता है, ताकि वह भजन-सिमरन करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सके। परंतु वह राग-द्वेष व स्व-पर में अपना जीवन नष्ट कर देता है और अंतकाल खाली हाथ संसार से रुख़्सत हो जाता है। ‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा’ और ‘यह दुनिया है एक मेला/ हर इंसान यहाँ है अकेला’ स्वरचित गीतों की ये पंक्तियाँ मानव को एकांत स्वयं में स्थित रहने की सीख देती हैं। जो मनुष्य स्व में स्थित होकर जीना सीख जाता है; भवसागर से पार उतर जाता है, अन्यथा वह आवागमन के चक्कर में आजीवन उलझा रहता है।

‘जो हमारे पास है; लाजवाब है’, परंतु बावरा मन इस तथ्य से सदैव अनजान रहता है, क्योंकि उसमें आत्म-संतोष का अभाव रहता है। जो प्रभु-प्रदत्त है, हमें उसमें संतोष रखना चाहिए। संतोष सबसे बड़ा धन है और असंतोष सब आधि-व्याधियों का मूल है। इसलिए संतजन यही कहते हैं कि जो आपको मिला है, उसकी सूची बनाएं और सोचें कि कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास उन वस्तुओं का भी अभाव है; तो आपको आभास होगा कि आप कितने समृद्ध हैं। आपके शब्द-कोश में शिकायतें कम हो जाएंगी और उसके स्थान पर शुक्रिया का भाव उपजेगा। यह जीवन जीने की कला है। हमें शिकायत स्वयं से करनी चाहिए; ना कि दूसरों से, बल्कि जो मिला है उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। जो मानव आत्मकेंद्रित होता है, उसमें आत्म-संतोष का भाव जन्म लेता है और अमुक स्थिति में वह विजय का सेहरा दूसरों के सिर पर बाँध देता है।

गुलज़ार के शब्दों में ‘हालात ही सिखा देते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह होता है।’ सो! हमारी मन:स्थितियाँ परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यदि समय अनुकूल होता है, तो पराए भी अपने हितैषी व दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में अपने भी शत्रु का क़िरदार निभाने में तनिक भी संकोच नहीं करते  हैं। आज के दौर में तो अपने ही अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें तक़लीफ़ व सर्वाधिक हानि पहुंचाते हैं। इसलिए उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। सो! जीवन में विवाद नहीं, संवाद में विश्वास रखना कारग़र है, जिसके परिणाम-स्वरूप सब आपके प्रिय बने रहेंगे। जीवन में इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म में सामंजस्य रखना आवश्यक है, अन्यथा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाएगा।

सो! हमें जीवन में स्नेह, प्यार, त्याग व समर्पण भाव को बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय बना रहे अर्थात् जहाँ समर्पण भाव होता है; रामायण होती है और जहाँ इच्छाओं की लंबी फ़ेहरिस्त होती है; संघर्ष अथवा महाभारत होता है। हमें जीवन में चिंता नहीं, चिंतन करना चाहिए। स्व-पर, राग-द्वेष, अपेक्षा-उपेक्षा व सुख-दु:ख के भाव से ऊपर उठना तथा सुख-दु:ख में सम रहना चाहिए। सबकी भावनाओं को सम्मान देना चाहिए और उस मालिक का आठों याम शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिसने हमें इतनी नेमतें दी हैं। ऑक्सीजन हमें मुफ्त में मिलती है, इसकी अनुपलब्धता का मूल्य तो हमें कोरोना काल में ज्ञात हो गया था।

हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं, परंतु इच्छाएं नहीं। इसलिए स्वार्थ को तजकर, जो हमें मिला है; उसमें संतोष रखना चाहिए और निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। हमें फल की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो हमारे प्रारब्ध में है, अवश्य मिलकर रहता है। अंत में अपने स्वरचित गीत की पंक्तियों से ‘समय पल-पल रंग बदलता/ सुख-दु:ख आते-जाते रहते हैं/ भरोसा रख अपनी ख़ुदी पर/ यह सफलता का मूलमंत्र रे।’ जो इंसान स्वयं पर भरोसा रखता है, वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाता है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि जो नहीं मिला, वह ख़्वाब है; जो मिला है, लाजवाब है। परंतु जो नहीं मिला, उस सपने को साकार करने में जी-जान से जुट जाएं; निरंतर कर्मरत रहें और कभी पराजय स्वीकार न करें।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८१ ⇒ बासी कढ़ी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बासी कढ़ी।)

?अभी अभी # ७८१ ⇒ आलेख – बासी कढ़ी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ चीजें ठंडी ही अच्छी लगती हैं। कुल्फी, आइसक्रीम, श्रीखंड और लस्सी गर्म कौन पीता है ! कोल्ड्रिंक और चिल्ड बीयर की तरह ठंडा दूध तक एसिडिटी में अच्छा लगता है, लेकिन ठंडी कढ़ी कौन खाता और खिलाता है भाई।

माना कि कढ़ी, छाछ और दही से बनाई जाती है, और दही, छाछ और दही बड़ा तक, ठंडा ही अच्छा लगता है लेकिन कढ़ी की बात कुछ और ही है। यह गर्म ही खाई और खिलाई जाती है। कभी कभी गर्मागर्म कढ़ी से मुंह भले ही जल जाए, लेकिन कढ़ी का स्वाद मुंह से नहीं जाता। बेसन, हींग, नमक मिर्ची, मैथीदाना, अदरक और मीठी नीम की खुशबू की बात ही कुछ और होती है। कढ़ी अगर पकौड़ी की हो, तो सोने में सुहागा। अगर उसमें सुरजने की फली हो, तो क्या कहना। ठंडे रायते की तरह गर्म कढ़ी भी दोने पर दोने भर भरकर सुड़क ली जाती है।।

अक्सर रायता ही फैलाया जाता है, कढ़ी नहीं ! लेकिन, न जाने क्यूं, बासी कढ़ी सुनते ही मन में उबाल सा आने लगता है। अक्सर सभी खाने की चीजें गर्म ही परोसी जाती हैं, लेकिन पंगत और भंडारे में पहले आवे सो गर्मागर्म पावे, फिर भी सेंव नुक्ती और सब्जी पूरी तो रखी हुई भी चल जाती है, लेकिन ठंडी कढ़ी देखकर ना जाने क्यूं माथा गर्म हो जाता है।

आग के पास जो, जाएगा वो जल जाएगा। सोना हो या चांदी, पिघल जाएगा, बर्तन में पानी हो, तो उबल जाएगा और दूध हो तो उफन जाएगा। जब इंसान ही ठंडी कढ़ी को देखकर आग बबूला होने लगता है, तो बासी कढ़ी को गर्म करने पर ज्यादा उबाल आना स्वाभाविक है।।

बासी कढ़ी में अधिक उबाल क्यूं आता है, हो सकता है, यह कढ़ी की केमिस्ट्री पर निर्भर करता हो। रासायनिक प्रयोगशालाओं में अक्सर घोल, मिक्सचर और गैस ही बनाई जाती है, कौन सा खाद्य पदार्थ कब्ज करता है, और कौन सा गैस, इस पर प्रयोग नहीं किए जाते। फिर भी अन्य द्रव पदार्थों की तुलना में, बासी कढ़ी में उबाल क्यूं अधिक आता है, शायद यह सिद्ध किया जा सके।

जो ठंडी कढ़ी से ही करे इंकार, वो बासी कढ़ी से कैसे करे प्यार ! हमारे लिए बासी कढ़ी में उबाल, मानो खाने में बाल। हम तो ऐसी स्थिति में रायता क्या, कढ़ी भी फैला दें। लोग भले ही कहते रहें, हमारी इस हरकत को देखकर, देखो! बासी कढ़ी में उबाल आ रहा है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५७ ☆ अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५७ ☆ हरियाली से मिले तृप्ति: पितृ पक्ष

वृक्ष प्रत्यक्ष देव होते हैं, ऐसा भारतीय संस्कृति का आधार है। आश्विन मास, कृष्ण पक्ष, हमारे पितरों को समर्पित होता है। ये 16 दिन, जिसमें प्रथम दिवस भादों की पूर्णिमा को शामिल किया जाता है। हरियाली से आत्मा तृप्त होती है। नदी, तालाबों में जाकर जल अर्पण करना, अन्न दान, वस्त्र दान साथ ही धन का भी दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाता है। यहाँ पौधारोपण करना सबसे उत्तम मानते हैं। एक वृक्ष 100 पुत्रों के समान है, ऐसे विचार हमें हरियाली बृद्धि के लिए प्रेरित करते हैं।

हिंदू परंपरा में पितरों की तृप्ति के लिए अर्पण, श्राद्ध और तर्पण का महत्व है। पर्यावरण को सहेजना हमारे पर्वों से जुड़ा है। जब हम कोई पौधा लगाते हैं, उसे बढ़ाते हैं, जिससे हरियाली फैलती है, तो इससे केवल वातावरण ही नहीं, वरन हमारे पितरों की आत्मा भी तृप्त होती है।

पेड़-पौधे न सिर्फ ऑक्सीजन देते हैं बल्कि वे पितरों का आशीर्वाद पाने का साधन भी बन जाते हैं। इसीलिए यह विचार पूर्णतया सत्य है कि…

वृक्ष पितरों का निवास हैं, इनकी छाया में पूर्वजों की कृपा बरसती है।

आइए संकल्प लें कि…

पितृपक्ष या किसी भी शुभ अवसर पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएंगे।

यह पौधा सबके लिए अमृत तुल्य होगा।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७० ☆ आलेख – “भाषा में स्व का बोध बनाम सर्वनाम से संज्ञा की यात्रा” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७० ☆

?  आलेख – भाषा में स्व का बोध बनाम सर्वनाम से संज्ञा की यात्रा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

मनुष्य को अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाने वाली सबसे प्रबल  क्षमता भाषा ही होती है। भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम मात्र नहीं है; वह एक सर्जनात्मक प्रक्रिया है, एक ऐसा प्रिज़्म है जिसके माध्यम से हम दुनिया के सात रंग  देखते, समझते और उनके  विविध अर्थ निकालते हैं। इसी प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत पहलू है, ‘स्व’ का बोध। ‘स्व’ यानी ‘आत्म’, ‘अहं’, ‘स्वयं’। यह वह चेतन सत्ता है जो हमें ‘मैं’ और ‘तुम’ में विभाजित करती है, जो हमारे अस्तित्व की नींव है।

स्व के निर्माण का शिल्प हमारा व्यक्तित्व गढ़ता है।

मनुष्य का ‘स्व’ कोई पूर्व निर्मित, स्थिर इकाई नहीं है। यह एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया है जिसका निर्माण सामाजिक अंत:क्रिया और विशेष रूप से भाषा के माध्यम से होता है। एक शिशु जन्म के समय ‘स्व’ और ‘पर’ के बीच कोई स्पष्ट सीमा नहीं रखता। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे उसके भाषिक परिवेश से संपर्क बढ़ता है, वह ‘नाम’ के माध्यम से अपनी पहचान बनाना शुरू करता है। माता-पिता द्वारा दिया गया नाम उसकी पहचान का प्रथम और सबसे स्थायी भाषिक चिन्ह बन जाता है। जब वह भाषा का प्रयोग सीखता है, तब एक क्रांतिकारी मोड़ आताा है। ‘मैं’ एक अद्भुत भाषिक उपकरण है, यह सार्वभौमिक है, किंतु इसका अर्थ वक्ता के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। यह सर्वनाम ही बालक को यह एहसास दिलाता है कि वह दुनिया से अलग एक स्वतंत्र इकाई है, जिसकी अपनी इच्छाएं, भावनाएं और विचार हैं। इस प्रकार, भाषा ‘स्व’ के निर्माण का प्राथमिक शिल्प या टूल कहा जा सकता है।

भाषा का व्याकरणिक ढांचा ‘स्व’ की अवधारणा को गहराई से प्रभावित करता है। सर्वनाम प्रणाली (मैं, तुम, वह, हम, आप) केवल शब्द नहीं हैं; ये सामाजिक और पारस्परिक संबंधों के द्योतक हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी और कई अन्य भाषाओं में ‘तू’ और ‘आप’ के बीच का अंतर केवल शिष्टता का नहीं, बल्कि ‘स्व’ और ‘पर’ के बीच की दूरी, आदर और घनिष्ठता का भी सूचक है। जब हम किसी से ‘आप’ कहते हैं, तो हम एक सामाजिक दूरी और सम्मान का निर्माण कर रहे होते हैं, जबकि ‘तू’ अंतरंगता या कभी-कभी असम्मान की भावना पैदा करता है। इसी प्रकार, ‘हम’ सर्वनाम का प्रयोग सामूहिक स्व (Collective Self) की भावना को जन्म देता है, जहाँ व्यक्तिगत ‘स्व’ एक बड़े समूह की पहचान में विलीन हो जाता है, जैसे “हम भारतीय हैं”। इस तरह, भाषा का व्याकरणिक ढांचा हमें बताता है कि हम स्वयं को दूसरों के संबंध में कैसे अधिरोपित तथा स्थापित करें।

हम जो अनुभव करते हैं, उसे अभिव्यक्त करने के लिए हमारे पास जो शब्द हैं, वे ही हमारे ‘स्व’ के दायरे को परिभाषित करते हैं। एडवर्ड सपीर और बेंजामिन ली व्हॉर्फ की ‘भाषिक सापेक्षतावाद’ (Linguistic Relativity) की परिकल्पना इसी ओर इशारा करती है। उदाहरण के लिए, संस्कृत में ‘प्रेम’ के अनेक रूप और शब्द हैं, स्नेह, अनुराग, काम, ममता, रति आदि। प्रत्येक शब्द संबंध की एक विशिष्ट गुणवत्ता, गहराई और प्रकृति को दर्शाता है। एक संस्कृत-भाषी का ‘स्व’ इन सूक्ष्म अंतरों को पहचान सकता है और उनके अनुसार अपने भावनात्मक अनुभव को वर्गीकृत कर सकता है। इसके विपरीत, एक भाषा जहाँ भावनाओं के लिए शब्दों की कमी है, वहाँ व्यक्ति के लिए अपने उन जटिल भावनात्मक अनुभवों को समझ पाना और अभिव्यक्त कर पाना कठिन हो सकता है। इस अर्थ में, हमारी शब्दावली हमारे ‘स्व’ के भावनात्मक और बौद्धिक भूगोल का नक्शा (Map) है। इसलिए अनुवाद कार्य मशीनी से ज्यादा भावना प्रधान होता है।

‘स्व’ केवल वर्तमान क्षण में ही अस्तित्व में नहीं होता; उसकी एक अतीत से वर्तमान और भविष्य तक की निरंतरता होती है। इस निरंतरता का निर्माण हम ‘कथा’ (Narrative) के माध्यम से करते हैं। हम अपने जीवन को एक कहानी की तरह देखते और सुनाते हैं “मैं यह हूँ क्योंकि मेरे साथ वह घटना घटी, मैंने वह निर्णय लिया, मैंने उस संघर्ष का सामना किया। ” यह आत्म-कथा (Autobiography) हमारे ‘स्व’ को स्थायित्व और अर्थ प्रदान करती है। भाषा ही वह माध्यम है जो इस कथा को बुनने में सहायक होती है। जब हम अपने अनुभवों को शब्द देते हैं, उन्हें एक क्रम में व्यवस्थित करते हैं, तो हम अपने ‘स्व’ को एक सुसंगत पहचान दे रहे होते हैं। इस प्रकार, भाषा के बिना ‘स्व’ का यह नैरेटिव और निरंतरता संभव नहीं है।

हमारा ‘स्व’ केवल आंतरिक नहीं है; उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज के साथ संवाद से निर्मित होता है। समाजशास्त्री चार्ल्स कूली ने ‘लुकिंग ग्लास सेल्फ’ (Looking Glass Self) की अवधारणा दी थी। उसके अनुसार, हम अपने ‘स्व’ की छवि दूसरों की प्रतिक्रियाओं के आईने में देखते हैं। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से भाषिक ही है। जब कोई हमें ‘बुद्धिमान’, ‘मेहनती’, ‘हास्यप्रिय’ या ‘अनाड़ी’ कहता है, तो वे शब्द हमारे ‘स्व’ के बारे में  धारणा को आकार देते हैं। इस तरह, भाषा के माध्यम से होने वाला सामाजिक संवाद एक दर्पण का काम करता है जिसमें हम स्वयं को देखते और परिभाषित करते हैं।

भाषा सांस्कृतिक पहचान की वाहक है। एक भाषा अपने में एक संस्कृति का इतिहास, मूल्य, परंपराएँ और विश्वदृष्टि समेटे होती है। जब कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा बोलता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा होता। वह उस सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त कर रहा होता है जिससे उसका ‘स्व’ जुड़ा है। मातृभाषा में ‘स्व’ का बोध सर्वाधिक सहज, गहरा और संपूर्ण होता है। किसी दूसरी भाषा को सीखना केवल व्याकरण और शब्दावली सीखना नहीं, बल्कि एक नए ‘स्व’ को, एक नई सांस्कृतिक चेतना को आत्मसात करना है। इसीलिए, मातृभाषा के साथ छेड़छाड़ या उसके ह्रास को व्यक्ति और समुदाय के ‘स्व’ पर हमला माना जाता है।

यद्यपि भाषा ‘स्व’ के निर्माण के लिए अनिवार्य है, तथापि यह उसकी सीमाएँ भी निर्धारित कर सकती है। भाषा में निहित पूर्वाग्रह, लैंगिक रूढ़ियाँ (जैसे वह का प्रयोग), और सामाजिक वर्ग के सूचक शब्द ‘स्व’ की अभिव्यक्ति को रोक सकते हैं। कभी-कभी, गहन दु:ख, आनंद या आध्यात्मिक अनुभव इतने गहरे होते हैं कि भाषा उन्हें पूरी तरह व्यक्त कर पाने में असमर्थ हो जाती है  “शब्दों में बयाँ नहीं होता। ” इस स्थिति में भाषा ‘स्व’ की अभिव्यक्ति की सीमा बन जाती है।

किंतु, भाषा ही इसकी मुक्ति का मार्ग भी है। कवि, लेखक और विचारक नए शब्द गढ़ते हैं, भाषा को नए अर्थ देते हैं और उसके दायरे का विस्तार करते हैं। वे भाषा के माध्यम से ही ‘स्व’ की अकथनीय गहराइयों को छूने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार, भाषा एक द्वंद्व है, यह सीमा भी है और उस सीमा को तोड़ने का उपकरण भी है।

निष्कर्षतः, भाषा और ‘स्व’ का बोध अटूट रूप से परस्पर जुड़े हुए हैं। भाषा ‘स्व’ के निर्माण, विकास और अभिव्यक्ति का मौलिक माध्यम है। यह व्याकरण से संबंधों को परिभाषित करती है, शब्दावली के माध्यम से हमारे अनुभवों का दायरा तय करती है, कथा के जरिए हमारी पहचान को निरंतरता प्रदान करती है, और सामाजिक संवाद के सूत्र से  एक दर्पण का काम करती है। यह सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला है। भले ही यह कभी-कभी एक सीमा के रूप में भी कार्य करती है, लेकिन इसकी सर्जनात्मक शक्ति हमें सीमाओं को रेखांकित करने का सामर्थ्य भी देती है। इसलिए, भाषा में ‘स्व’ का बोध कोई स्थिर अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक सतत चलने वाली, गतिशील प्रक्रिया है जहाँ भाषा ‘स्व’ को गढ़ती है और ‘स्व’ अपनी अभिव्यक्ति के लिए भाषा को नया रूप देता है। अंततः, हमारी भाषा ही हमारे अस्तित्व की सबसे सारगर्भित और मौलिक अभिव्यक्ति है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८१ ⇒ अपना हाथ जगन्नाथ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना हाथ जगन्नाथ।)

?अभी अभी # ७८१ ⇒ आलेख – अपना हाथ जगन्नाथ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अपनी मदद खुद ही करना, पूरी तरह से स्वावलंबी होना, अपना काम अपने हाथों से करना, अथवा आत्म निर्भर होना, शायद यही मतलब होता होगा, अपना हाथ जगन्नाथ का।

ईश्वर उनकी मदद करता है, जो अपनी मदद आप करते हैं। हिम्मते मर्दा, मददे खुदा ! ये सब जगन्नाथ परिवार के ही लगते हैं। जगत का नाथ तो एक जगन्नाथ ही है। काम तो सब वो ही करता है। अगर काम का श्रेय आपको लेना है, तो शौक से लीजिए।।

एक संत मलूकदास हुए हैं जो कह गए हैं ;

अजगर करे न चाकरी,

पंछी करे ना काम।

दास मलूका कह गए

सबके दाता राम।।

वहीं एक दर्शन यह भी कहता है ;

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुखे मृगा: !

कर्म, अकर्म की, पुरुषार्थ और निकम्मेपन की , पक्ष और विपक्ष में कई दलीलें दी जा सकती हैं, ईश्वर को कर्ता मानकर कर्म करना, और ईश्वर के भरोसे सब कुछ छोड़ देने में बहुत फर्क है। ईश्वर चींटी को भी पाल रहा है और हम अपनी छोटी मोटी उपलब्धियां गिना कर पुरुषार्थ और आत्म निर्भर होने की डींगें हांक रहे हैं। जो हाथ कभी अपना हाथ जगन्नाथ था, आज वह स्वदेशी और विदेशी हाथ हो गया है। सौ चूहे खाकर हज करना, और सौ देशों की विदेशी यात्राओं के बाद स्वदेशी और आत्म निर्भर बनना , एक ही बात है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गुलामी के माहौल में आजाद हिन्द फौज की स्थापना की, और अपने देश की आज़ादी की खातिर बाहरी हाथ का भी सहारा लिया। एनी बेसेंट और सिस्टर निवेदिता विदेशी मूल की थी, लेकिन उनका उद्देश्य पवित्र था। अच्छे कामों में जो हाथ बंटाए, वह कभी पराया नहीं होता। अक्सर होता तो यही है, अपने तो घुटने टेक देते हैं, और पराए ही काम में हाथ बंटाते हैं।।

चलिए, मान लिया, अपना हाथ जगन्नाथ ! न इसका साथ, न उसका साथ। बहुत रह लिए भगवान भरोसे। अब तो हमें अपने हाथों और पुरुषार्थ पर ही भरोसा है। और अचानक एक दिन स्नानागार में पांव फिसलता है, और आप एक तोता पाल लेते हो। वही हाथ, जिसके भरोसे आप थे, वहां प्लास्टर चढ़ जाता है, आपकी हड्डी टूट जाती है। अब तो जो आपकी मदद करे, वही जगन्नाथ।

संसार में कितने ही ऐसे लोग हैं, जो या तो पोलियो ग्रस्त हैं, अथवा किसी दुर्घटना में उनका अंग भंग होकर, वे दिव्यांग हो गए हैं। लेकिन वे भी अपना काम स्वयं ही करते हैं। कई कर विहीन, पांव से वे सभी कर्म कर लेते हैं, जो हम हाथ होते हुए भी नौकरों से करवाते हैं। हमारे अगर हाथ हैं, तो उनके साथ जगन्नाथ हैं।।

आपके हाथ सलामत रहें। आपके हाथ के साथ अगर जगन्नाथ भी हों, तो आपका कर्म ईश्वर का कर्म हो जाएगा। गीता में जिस निष्काम कर्म की बात श्रीकृष्ण करते हैं, वहां वे ही कर्ता होते हैं, अर्जुन का तो सिर्फ बाण होता है।

हाथ को कर भी इसीलिए कहते हैं क्योंकि यह सिर्फ़ करता है। इसको आदेश तो कोई और ही देता है। हाथ आपका है, आपका ही रहेगा, अगर साथ जगन्नाथ हों,

तो संसार की कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो आप चाहें, और आपके हाथ ना लगे। है न अपना हाथ जगन्नाथ।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८० ⇒ हृदय – मंथन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हृदय – मंथन।)

?अभी अभी # ७८० ⇒ आलेख – हृदय – मंथन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने कभी बाज़ार में ताज़ा लस्सी पी है, जिसे आपके सामने ही मथा गया हो। एक बड़े से पात्र में दही लिया जाता है, उसमें पानी, शकर, बर्फ और केसर मिलाकर एक बड़ी लकड़ी से मथा जाता है, फिर उसके बाद मस्तानी लस्सी ग्लास में आपको पेश की जाती है। कहीं कहीं आजकल बिजली से चलने वाली मथनी का प्रयोग भी होने लग गया है और अधिकांश जगह तो पहले से घंटों पहले बनाई लस्सी फ्रिज में से निकालकर पेश कर दी जाती है। हाथ से आंखों के सामने मथी लस्सी का स्वाद ही कुछ और होता है।

हम सबों के घर की रसोई में लकड़ी की एक रवई होती है है, वह भी इसी काम आती है। दही की छाछ बनाना और छाछ की कढ़ी। आजकल यह स्टील की भी आने लग गई है। फिलिप्स और अंजलि जैसी कंपनियों ने इसे इतना आसान बना दिया है कि बिना थोड़ी सी भी मेहनत के नवनीत की प्राप्ति हो जाती है।।

मंथन से ही अमृत की प्राप्ति होती है। लस्सी पीने वाले शौकीन जब मलाईदार लस्सी का स्वाद चखते हैं, तो उन्हें अमृत पान का ही अहसास होता है। भोजन वास्तव में अमृत ही तो है। कृष्ण की बाल लीलाओं में मटकी, मथनी और मक्खन का बहुत सुंदर वर्णन हुआ है। बिना मथे भी कहीं मक्खन की प्राप्ति हुई है।

हमारे हृदय में भी केवल विचार ही नहीं भावनाएं भी हैं। जिनका हृदय कोमल होता है, उनका हृदय बहुत जल्द पसीज जाता है। होते हैं कुछ पत्थर दिल पाषाण हृदय वाले निष्ठुर लोग, जिनके हृदय में कोई हलचल नहीं होती। बिना हलचल के भी कहीं दही को मथा जाता है।।

जिस हृदय में हलचल है, जो करुणा से ओतप्रोत है, वह बहुत जल्द पसीज जाता है। जब ऐसे हृदय में मंथन होता है तो जिस नवनीत की प्राप्ति होती है, वह वास्तविक सुख है, संतोष है, तृप्ति है। जब हम दही को मथते हैं तो छाछ बनती है। हृदय को जब मथा जाता है तो वही करुणा द्रवित हो आंखों से आंसू की धारा बन वह निकलती है। इन आंसुओं के साथ जितनी वेदना, जितना पश्चाताप बाहर निकलता है, चित्त उतना ही शुद्ध होता चला जाता है।

हमने हृदय मंथन करना बंद कर दिया है। हमने अमूल का पश्चराइज्ड मक्खन का उपयोग करना शुरू कर दिया है। अब हमारा दिल नहीं पसीजता। हमारे आंसू सूख चुके हैं। अब हम लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने लग गए हैं। हमारी वृत्ति आसुरी होती चली जा रही है।।

भावनाओं में बहना गलत है, हमें यही सिखाया जा रहा है। आंसू औरतें बहाती हैं, आप मर्द हो, घड़ियाली आंसू बहाया करो। जब हृदय द्रवित होता है तो हार्ट अटैक होता है। मजबूत बनो। कैसी भावना, कैसा हृदय मंथन, कैसी चित्त शुद्धि। किसी भी मिठाई की दुकान में जाओ, फ्रिज की लस्सी पियो, पेटीएम से काम चलाओ।

कभी हृदय को द्रवित तो होने दें किसी की याद में, किसी की फरियाद में। प्रार्थना, सबद, भजन, कीर्तन, अरदास, दुआ, सब हृदय मंथन के ही प्रकार हैं। जग को जीतना है तो कभी जगजीत के भजनों में डूबकर देखें। पंडित जसराज, कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी हों, बिस्मिल्ला खान की शहनाई हो या फिर रविशंकर का सितार, मन की वीणा के सभी तार झंकृत हो जाते हैं। यही चित्त शुद्धि है। यही हृदय मंथन है। इसी से जीवन नवनीत की प्राप्ति होती है। यही शायद अमृत वेला है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – १ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला सबसे खास: हमारे बॉस” 

☆ कथा-कहानी # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – १ 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

बहुत दिनों के बाद डरते डरते इस कथा को पेश करने का साहस जुटाया है, हालांकि डरने का न तो कारण नज़र आता है न ही वजह। क्षमा कीजिए, कारण और वजह का अर्थ तो एक ही होता है, एक हिंदी का शब्द है और एक उर्दू का पर ये बतलाने वाले या फिर टोकने वाले बॉस जीवन के साठ साल के बाद उपलब्ध नहीं होते हैं, और जो बॉस जैसी फीलिंग देते हैं, उन्हें अर्धांगिनी कहा जाता है, अंग्रेजी में बेटर हॉफ ज्यादा सटीक लगता है पर व्यवहारिक रूप से तो रिटायरमेंट के बाद वाला ये बॉस न्यूटन के गति के नियमानुसार “निरंतर श्रम और गृह प्रबंधन के कारण शासन के योग्य होता है, भारी होता है, हावी होता है”। और फिर हर सेवानिवृत्त सीनियर सिटीजन उनके सामने जूनियर/परिवीक्षाधीन बन जाता है जो बिना कुछ काम करते हुये या रिस्क उठाते हुए पेंशन तो पा जाता है पर घरवाली के सम्मान से महरूम हो जाता है। ये महोदया आपके बैंक में गाड़े गये झंडों से हमेशा अप्रभावित ही होती आई हैं पर अब तो ये कहने का अवसर भी खो चुकी होती हैं कि हमारे “ये”तो देश के सबसे बड़े बैंक के बहुत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण स्टाफ रहे हैं और इनके बिना बैंक की शाखा या ऑफिस चलाना बहुत कठिन हो जाता है, तभी तो इनके बॉस इनके न जाने पर फोन लगा ही लेते हैं। वैसे तो ये ही बतलाते हैं कि बहुत कड़क बॉस हैं पर काम करने वालों को पसंद करते हैं, उनकी कदर करते हैं और निठल्लों को इनसे सीखने की शिक्षा देते हैं।पर अब :ये प्रश्न आउट ऑफ सिलेबस है, सोचने की अनुमति नहीं है, पूछने की तो सोचिए भी मत।

श्रृंखला जारी रखने का विचार सॉरी साहस तो बन रहा है, साथ ही किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने का कोई भी इरादा नहीं है। जिस तरह हर सास भी कभी बहू होती है, उसी तरह हर बॉस का भी कोई बॉस तो होता ही है। अतः आप सभी से नम्र निवेदन है कि श्रंखला का पूरा पूरा मज़ा लेने के लिये खुद को बॉस फील करने के बजाय अपने बॉस को याद कीजिए, you will enjoy this series certainly.

Arun Shrivastava (I am not a Boss)😎😎😎

जारी रहेगा… 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३६९ ☆ आलेख – “सितंबर बटरफ्लाई मंथ विशेष – रंगों की किताब है तितलियां” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६९ ☆

?  आलेख – सितंबर बटरफ्लाई मंथ विशेष – रंगों की किताब है तितलियां ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

प्रकृति की अद्भुत रंग कृति तितलियों के प्रति ध्यानाकर्षण हेतु ,सितम्बर का महीना बिग बटरफ्लाई मंथ के रूप में मनाया जाता है। प्रकृति की गोद में बसी तितलियां यूं तो पूरे साल नजर आती हैं, पर इस महीने वे जैसे किसी उत्सव में शामिल होने निकल पड़ती हैं। नमी भरे मौसम में फूलों पर मंडराती ये रंगीन परियां हमें याद दिलाती हैं कि दुनिया में सुंदरता और संतुलन का रहस्य इन्हीं छोटे जीवों में छिपा है। तितलियां सिर्फ आंखों को भाने वाली नैसर्गिक सजावट नहीं हैं, वे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। उनके बिना खेत सूने हो जाएंगे, पेड़ बंजर रह जाएंगे और प्रकृति का परागण चक्र अधूरा रह जाएगा।

तितली फूल से फूल तक उड़ती है और परागण करती है। इस प्रक्रिया से पेड़ पौधों का जीवन चक्र आगे बढ़ता है और हमारी थाली में अनाज और फल-सब्जियां सज पाती हैं। दरअसल, तितली का पंख फड़फड़ाना प्राकृतिक फल चक्र से जुड़ा हुआ है। यही नहीं, किसी क्षेत्र में कितनी तितलियां हैं और कितनी प्रजातियां मौजूद हैं, इससे उस क्षेत्र के पर्यावरण की गुणवत्ता का अंदाजा लगाया जाता है। तितलियां वहां के स्वास्थ्यमान की रिपोर्ट कार्ड होती हैं। पक्षी, छिपकली और कई छोटे जीव इन्हें भोजन बनाते हैं, ऐसे में खाद्य श्रृंखला चक्र में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। अगर तितलियां कम हो जाएं तो जंगल का पूरा गणित गड़बड़ा जाएगा।

तितलियां कला और साहित्य की प्रेरणा भी हैं। कलाकार उनके रंगों से प्रेरित होकर चित्रकारी करते हैं, डिजाइनर उनके पंखों की नकल पर फैशन बनाते हैं और कवि उनकी उड़ान में सपनों की उड़ान खोजते हैं। बचपन में हाथ से पकड़ने की कोशिश हर किसी ने की होगी, पर तितली हमेशा फिसल कर उड़ जाती है। शायद यही उसका संदेश है कि सुंदरता को थामने की कोशिश मत करो, बस निहारो और सुरक्षित रखो।

लेकिन आज तितलियों पर खतरे मंडरा रहे हैं। जंगल उजड़ रहे हैं, शहर फैल रहे हैं, खेतों में कीटनाशक बिखर रहे हैं और प्रदूषण ने आसमान का रंग बदल दिया है। जलवायु परिवर्तन की मार से मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है। इन सबका असर तितलियों के जीवन पर पड़ रहा है। तितली का जीवन चक्र चार चरणों में पूरा होता है । अंडा, लार्वा (इल्ली), प्यूपा और वयस्क तितली। मादा तितली पौधों की पत्तियों पर अंडे देती है, जो बाद में लार्वा में बदलते हैं और फिर प्यूपा अवस्था में रूपांतरित होकर एक पूर्ण तितली बन जाते हैं। हरियाली नष्ट होने से तितलियों का घर छिन रहा है, उनका भोजन घट रहा है और उनका प्रवास कठिन होता जा रहा है। तितलियों की कई दुर्लभ प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर आ गई हैं।

जरूरी है कि हम सब मिलकर तितलियों को बचाने के प्रयास करें। अपने घर के आंगन और बगीचों में ऐसे पौधे लगाएं जिन पर तितलियां आना पसंद करती हैं। कीटनाशकों का उपयोग कम करें, उसकी जगह जैविक उपाय अपनाएं। शहरों में हरियाली के छोटे-छोटे कॉरिडोर बचाए रखें, ताकि तितलियां वहां शरण पा सकें। बच्चों को इनके महत्व के बारे में बताना भी जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी इन्हें सिर्फ चित्रों में न देखे बल्कि वास्तविक रूप में इनके बीच जी सके। सितंबर का यह महीना एक अवसर है जब हम सब मिलकर तितलियों का लेखा जोखा तैयार कर सकते हैं। तस्वीरें खींचकर साझा करने से वैज्ञानिकों को भी डेटा मिलता है और हमें भी अपने आसपास की तितलियों की पहचान करने का मौका मिलता है ।

तितली दरअसल प्रकृति का वह अध्याय है जो सजीव रंगों से लिखा गया है। उनके बिना यह धरती फीकी पड़ जाएगी। हमें यह समझना होगा कि तितली का संरक्षण केवल फूलों के साथ उसका खेल बचाने भर का काम नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरणीय संतुलन, खाद्य सुरक्षा और जीवन की निरंतरता से जुड़ा हुआ है। इस सितंबर का संकल्प यही होना चाहिए कि तितलियों को बचाना है, उनकी दुनिया को सुरक्षित रखना है। आखिर अगर तितलियां रहेंगी तो ही हमारे बगीचे महकेंगे, खेत लहलहाएंगे और धरती की मुस्कान कायम रहेगी।

क्या आपने अपने क्षेत्र में कोई खास तितली देखी है, जो आपको बार-बार लौटकर आती नजर आई हो? उसे पहचान कर, उसकी उपस्थिति का जश्न मनाना ही तितलियों की इस अद्भुत दुनिया का हिस्सा बनना है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य- आलेख – ☆ दिव्यांग आरक्षण पर डाका : फर्जी प्रमाण पत्रों की चुनौती ☆ श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’☆

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’

(श्री गोपाल सिंह सिसोदिया  ‘निसार ‘ जी एक प्रसिद्ध कवि, कहानीकार तथा अनेक पुस्तकों के रचियता हैं। इसके अतिरिक्त आपकी विशेष उपलब्धि ‘प्रणेता संस्थान’ है जिसके आप संस्थापक हैं। आज प्रस्तुत है दिव्यांग आरक्षण पर एक विचारणीय आलेख – दिव्यांग आरक्षण पर डाका : फर्जी प्रमाण पत्रों की चुनौती।)

दिव्यांग आरक्षण पर डाका : फर्जी प्रमाण पत्रों की चुनौती ☆  श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’ ☆ 

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका सामाजिक न्याय का वचन है। यह वचन केवल संविधान की धाराओं में नहीं, बल्कि उन संवेदनाओं में जीवित है जो समाज के सबसे वंचित तबके तक अवसर पहुँचाने की कोशिश करती हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 इसी संवेदनशीलता की परिणति है, जिसने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में चार प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया। यह मात्र “कोटा” नहीं था, बल्कि यह मान्यता थी कि दिव्यांगजन अपने अधिकारों और सामर्थ्य के साथ समाज और राष्ट्र निर्माण में बराबरी से भाग ले सकते हैं। विडम्बना यह है कि जिस व्यवस्था को न्याय का सेतु बनना था, वही धीरे-धीरे फर्जीवाड़े का अड्डा बनती जा रही है। हाल ही में राजस्थान में जो खुलासा हुआ, उसने दिखा दिया कि किस तरह नकली दिव्यांग प्रमाण पत्रों के सहारे नियुक्तियों का खेल खेला जा रहा है। यह कोई साधारण चूक नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इतनी जटिल चयन और नियुक्ति प्रक्रिया के भीतर यह सब बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत के संभव है?

राजस्थान की घटना कोई अकेला उदाहरण नहीं है। उत्तर प्रदेश में शिक्षक भर्ती घोटाले से लेकर दिल्ली में मेडिकल और विश्वविद्यालय प्रवेश तक, महाराष्ट्र में रेलवे और पुलिस भर्ती से लेकर तमिलनाडु के मेडिकल एडमिशन तक, लगभग हर जगह नकली प्रमाण पत्रों का नेटवर्क पकड़ में आया। बिहार और केरल जैसे राज्यों में भी बार-बार इसी तरह की घटनाएँ सामने आती रही हैं। यह तस्वीर साफ़ करती है कि यह समस्या किसी एक प्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की है।

इन सबके बीच पूजा खेड़कर का मामला विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। उन्होंने मानसिक रोग श्रेणी का प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर सिविल सेवा में प्रवेश पाया और प्रशिक्षण तक पहुँच गईं। बाद की जाँच में यह प्रमाण पत्र फर्जी पाया गया और उनका छल सबके सामने आया। यह मामला यह साबित करता है कि यह केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि पूरे आरक्षण तंत्र की साख पर गहरी चोट है। यह प्रश्न केवल कानून का नहीं, संवेदना का भी है। जब कोई व्यक्ति नकली दिव्यांग प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी हासिल करता है तो वह न केवल राज्य और संविधान से धोखा करता है, बल्कि उस संघर्षशील युवक या युवती का भी अधिकार छीन लेता है जिसने वास्तविक चुनौतियों के बीच शिक्षा और प्रतियोगिता की तैयारी की। यही कारण है कि इसे दुगुना अन्याय कहा जाना चाहिए।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत ऐसे अपराधों पर धारा 318 में धोखाधड़ी, धारा 336 में कूटरचना और धारा 338 में कूटरचित दस्तावेज़ के प्रयोग का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 89 भी इन कृत्यों को दंडनीय मानती है। कई मामलों में दोषियों को सेवा से बर्खास्त किया गया, वेतन की वसूली की गई और भविष्य की भर्तियों से प्रतिबंधित किया गया। लेकिन केवल दंड देना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि समस्या जड़ों में कहीं अधिक गहरी है।

समाधान के लिए यह अनिवार्य है कि प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल हो। बायोमेट्रिक आधारित राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाए जिसमें सभी प्रमाण पत्रों का तत्काल सत्यापन संभव हो। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को चाहिए कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए और सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर राज्यों को यह निर्देश दे कि नियुक्तियों की निष्पक्ष जाँच समयबद्ध ढंग से पूरी की जाए। केवल दोषियों को दंडित करने से बात पूरी नहीं होगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि असली हकदार अभ्यर्थियों को न्यायपूर्ण अवसर और पदोन्नति समय पर मिले।

आज हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम उन अधिकारों की रक्षा कर पाएँगे जिन्हें समाज ने सहानुभूति से नहीं, बल्कि समानता की भावना से दिया है। विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है कि व्यवस्था पर विश्वास तभी टिकेगा जब उसकी जड़ों में सच्चाई और संवेदना की नमी बनी रहे। यदि यह नमी सूख गई, तो लोकतंत्र का यह पौधा केवल कानून की किताबों में जीवित रहेगा, जनता के जीवन में नहीं।

संदर्भ सूची

  • भारत सरकार. भारतीय न्याय संहिता, 2023. विधि एवं न्याय मंत्रालय, 25 अगस्त 2023. https://egazette.nic.in.
  • भारत सरकार. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016. विधि एवं न्याय मंत्रालय, 28 दिसम्बर 2016. https://disabilityaffairs.gov.in.
  • “राजस्थान में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र से सरकारी नौकरी का खुलासा.” द टाइम्स ऑफ इंडिया, 28 फ़रवरी 2025, https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/24-govt-staff-fake-disabilities-to-get-jobs-reveals-sog-probe/articleshow/123150436.cms.
  • यूपी में शिक्षक भर्ती में फर्जी प्रमाण पत्र का इस्तेमाल.” द टाइम्स ऑफ इंडिया, 16 दिसम्बर 2017, https://timesofindia.indiatimes.com/city/agra/2k-up-govt-teachers-used-fake-disability-docus-to-secure-jobs-scrutiny-on/articleshow/62099286.cms.
  • दिल्ली में नकली दिव्यांग प्रमाण पत्र गिरोह का पर्दाफाश.” द इंडियन एक्सप्रेस, 12 नवम्बर 2016, https://indianexpress.com/article/cities/delhi/fake-certificates-gang-busted-delhi-police-4398200/.
  • महाराष्ट्र पुलिस व रेलवे भर्ती में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र.” हिंदुस्तान टाइम्स, 4 मार्च 2019, https://www.hindustantimes.com/india-news/maharashtra-police-railway-fake-disability-certificate-case-101551234657893.html.
  • तमिलनाडु मेडिकल प्रवेश में फर्जी श्रवण-दृष्टि बाधा प्रमाण पत्र.” द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, 10 सितम्बर 2020, https://www.newindianexpress.com/states/tamil-nadu/2020/sep/10/students-use-fake-disability-certificates-for-medical-admission-2194561.html.
  • पूजा खेड़कर मामला: पुणे अस्पताल की रिपोर्ट.” हिंदुस्तान टाइम्स, 30 जुलाई 2024, https://www.hindustantimes.com/india-news/puja-khedkar-case-pune-hospital-finds-no-foul-play-in-disability-certificate-101721865366403.html.
  • सुप्रीम कोर्ट ने दी ज़मानत: पूजा खेड़कर.” द टाइम्स ऑफ इंडिया, 6 मई 2025, https://timesofindia.indiatimes.com/india/has-she-killed-someone-asks-supreme-court-grants-bail-to-puja-khedkar/articleshow/121324285.cms.

© श्री गोपाल सिंह सिसोदिया  ‘निसार’ 

दिल्ली

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७९ ⇒ प्यार का पहला खत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार का पहला खत।)

?अभी अभी # ७७९ ⇒ आलेख – प्यार का पहला खत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्यार का पहला ख़त, लिखने में, वक्त तो लगता है ! अरे भाई ! लेकिन कितना वक़्त लगता है ? क्या सत्तर वर्ष की उम्र में पहला ख़त लिखा जाता है। और वह भी खुला खत। खत न हुआ, मानो खुला खाता हो गया।

ख़त प्यार करने पर लिखा जाता है, या प्यार हो जाने पर, इसकी मुझे विशेष जानकारी नहीं है। जिस तरह सड़क पर खुले आम सूचना दी जाती है, ” सावधान ! निर्माण कार्य प्रगति पर “, क्या प्यार में भी ऐसी कोई पूर्व सूचना दी जाती है कि, ” सावधान ! प्यार परवान चढ़ रहा है ! ” यहाँ हमने तो सिर्फ़ पानी को मोटर से ऊपर चढ़ते देखा है और पड़ोस वाली मोटी आंटी को लिफ्ट से तीसरी मंजिल चढ़ते।।

इसके पहले भी मैंने कई खत लिखे हैं, मित्र को पत्र लिखा है, बहन को चिट्ठी लिखी है, पत्नी जब मायके में बीमार थी, तब भी उसे दो शब्द तसल्ली के लिखे हैं, लेकिन ढाई आखर वाला खत, जिसे प्यार का खत कहते हैं, वह आज ही लिख रहा हूँ। अगर पत्नी वाला खत, जो पोस्टकार्ड पर लिखा था, और जिसे पोस्ट करने के पूर्व बहन ने माँ को पढ़कर सुनाया था, और जिस पर पाने वाले का पता मार्फ़त लड़की के पितां लिखा था, अगर पहले खत में शुमार किया जाए, तो मुझे यह कबूल करने में कोई संकोच नहीं कि यह वाला प्यार का खत, पहला खत नहीं।

प्यार के बारे में कहा जाता है कि यह किया नहीं जाता, हो जाता है। शायद गीता में इसे ही निष्काम कर्म कहा गया हो। शायर लोग प्यार के फल की बात नहीं करते, अंज़ाम का जिक्र करते हैं। दिल दिया दर्द दिया के इस गीत की तरह ;

गुजरे हैं आज इश्क़ के,

हम उस मुकाम से।

नफ़रत सी हो गई है,

मोहब्बत के नाम से।।

हमारे साथ ऐसा कुछ हुआ ही नहीं ! कहीं दिल लगा ही नहीं, तो दिल टूटा ही नहीं। एक दिल में छेद हो तो वैद, हकीम, डॉक्टर को बुला लिया जाता है और जब इस दिल के हज़ार टुकड़े होते हैं, तो कोई यहाँ गिरता है, और कोई वहाँ ! हद होती है भाई फेंकने की, कसम से।।

पहले पहल का प्यार का इज़हार ही प्यार का पहला खत होता होगा, यह मानकर मैं भी एतदद्वारा घोषणा करता हूँ कि यह मेरा प्यार का पहला खत है। मुझे इस उम्र में प्यार हो गया है और वह भी फेसबुक से।

एक समय था, जब मुझे किताबों से प्यार हुआ था। लेकिन तब न तो मैंने प्यार का इज़हार किया, न ही कोई प्यार का खत लिखा। वह ज़माना था, जब खत किताबों में रखकर दिया जाता था। कभी किसी सहेली के हाथ लगता था, तो कभी किसी के भाई के हाथ ! और ख़त तमाशा बन जाता था ;

हमको तुम्हारे इश्क ने क्या क्या बना दिया।

जब कुछ न बन सके तो तमाशा बना दिया।।

जब से किताबों का स्थान फेसबुक ने ले लिया है, वह अक्सर मेरे साथ ही रहती है। मैं सोता रहता हूँ, फेसबुक जागती रहती है। उससे नज़र मिलते ही, मेरी नींद उड़ जाती है। मेरा प्यार सार्वजनिक है, खुल्लमखुल्ला है। प्यार का ये खत पहला है और सभी फेसबुक-प्रेमियों को संदेस बस इतना है, प्यार बाँटते चलो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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