हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०२ ☆ आलेख – “डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०२ ☆

?  आलेख – डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

 धर्मवीर भारती के लेखन में व्यंग्य उनकी संवेदना के भीतर घुली हुई वह कसक है जो करुणा, नैतिक बेचैनी और उनके लेखन में ऐतिहासिक दृष्टि के साथ मिलकर प्रकट होती है। वे हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं बल्कि मुस्कान के भीतर छिपी हुई पीड़ा दिखाने वाले रचनाकार हैं। उनके नाटक , उपन्यास , कविता में व्यंग्य पात्रों की सहज अभिव्यक्ति से पाठक की अंतरात्मा को कुरेदता है।

उनका काव्य नाटक अंधा युग इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महाभारत के युद्ध के बाद की कथा के माध्यम से उन्होंने आधुनिक मनुष्य के नैतिक अंधेरे,  सत्ता की क्रूरता और विजेताओं की खोखली विजय पर ऐसा व्यंग्य किया है जो सीधे किसी व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर लक्षित है। उनके ये प्रयोग किसी नितांत व्यंग्य का टैग लगाए आज की कई  रचनाओं से अधिक प्रभावी हैं ।

उनकी अभिव्यक्ति में धृतराष्ट्र का अंधापन केवल शारीरिक नहीं रह जाता वह सत्ता में बैठे हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है जो सच जानते हुए भी उसे देखना नहीं चाहता। उदाहरण स्वरूप नाटक में धृतराष्ट्र का संवाद “मैंने कुछ नहीं देखा कुछ नहीं सुना” आधुनिक शासकों की जानबूझकर की अज्ञानता पर तीखा व्यंग्य है जो युद्ध की विभीषिका को नजर अंदाज कर सत्ता की भूलभुलैया में भटकते हैं। गांधारी का क्षोभ और अश्वत्थामा का अंध प्रतिशोध आधुनिक राजनीतिक वर्गों की मानसिकता को उघाड़ते हैं जहाँ एक अन्य पंक्ति “विजय तो हुई पर मनुष्य कहाँ बचा” विजेताओं के खोखले दंभ पर प्रहार करती है।

उनके उपन्यास गुनाहों का देवता में भी व्यंग्य सामाजिक संरचनाओं पर है। स्वयं उपन्यास के नाम में ही व्यंग्य का कंट्रास्ट दिखता है। यह कृति प्रेमकथा का उपन्यास  मानी जाती है किन्तु, इसमें व्यंग्य अंतर्निहित है। प्रेम के नाम पर त्याग का महिमामंडन करने वाला समाज स्वयं प्रेम से डरता है। चंदर और सुधा के संबंधों की विवशताएँ पाठक को द्रवित करती हैं पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या हमारी नैतिकता वास्तव में मानवीय है या केवल सामाजिक सुविधा है। एक उदाहरण है चंदर का वह अंतर्मन जहाँ वह सोचता है “प्रेम तो देवत्व है पर समाज इसे गुनाह बना देता है” जो प्रेम को पवित्र बताकर त्याग थोपने वाली सामाजिक मान्यताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है। दूसरा उदाहरण सुधा का विवाह बिंदु है जहाँ प्रेम का बलिदान सामाजिक सम्मान के नाम पर मजबूर किया जाता है यह दर्शाते हुए कि हिन्दू समाज नारी को देवी बनाकर उसी के गुनाहों का देवता कैसे थोप देता है। यहाँ व्यंग्य खुलकर नहीं बोलता बल्कि परिस्थितियों की विडंबना में स्वतः उभरता है।

डॉ भारती की कविताओं विशेषकर कनुप्रिया में भी पारंपरिक प्रेम आख्यानों पर एक सूक्ष्म पुनर्पाठ दिखाई देता है। राधा का स्वर कहीं कहीं उस पुरुष केंद्रित मिथकीय संरचना पर प्रश्न करता हुआ प्रतीत होता है जिसने स्त्री को प्रतीक्षा और विरह की मूर्ति बनाकर स्थापित किया। कनुप्रिया नारी के अंतर्मन की परतें खोलती है जहाँ सुख के क्षणों में घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी और विप्र लब्धा रस की पीड़ा को सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है। यह व्यंग्य आक्रामक नहीं आत्म संवादी है। ठंडा लोहा संग्रह में शहर की उदासीनता अकेलेपन और मूल्य क्षय पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है । जैसे मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा रखना उस व्यवस्था का प्रतीक है जो संवेदनशीलता पर कठोरता चढ़ाती है ।

पत्रकार और संपादक के रूप में जब वे धर्मयुग का संचालन कर रहे थे तब उनके संपादकीय लेखों में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर संयत किन्तु तीक्ष्ण टिप्पणी मिलती है। वे शोर नहीं मचाते पर शब्दों के बीच ऐसी रिक्ति छोड़ते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था की विडंबना पहचान लेता है। धर्मयुग के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को विसंगति पहचानने की संवेदना दी।

उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह व्यक्ति विरोधी नहीं स्थिति विरोधी है। उसमें क्रोध कम नैतिक पीड़ा अधिक है। वे उपहास नहीं करते बल्कि यह दिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं में कैसे फँस गया है। इसलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता क्योंकि वह किसी घटना पर नहीं मनुष्य की प्रवृत्ति पर केंद्रित है।

धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है जब वह हँसी पैदा न करे बल्कि भीतर एक असुविधाजनक चुप्पी छोड़ जाए। वही चुप्पी उनकी रचनाओं की वास्तविक शक्ति है और वही उन्हें केवल साहित्यकार नहीं अपने समय का आत्मद्रष्टा बनाती है।

एक प्रसंग डॉ पुष्पा भारती के संस्मरण पढ़ने में मिला, रागदरबारी का प्रारंभिक लेखन श्रीलाल शुक्ल जी ने डॉ धर्मवीर भारती के मुंबई के जुहू वाले समुद्र किनारे के फ्लैट में ही किया था।

पुष्पा जी ने लिखा है, “मुंबई शहर के छोर पर महासागर से अभिप्रेरित ही रागदरबारी की पहली पंक्तियां हैं – महानगर के छोर से ही भारत में देहात का महासागर प्रारंभ हो जाता है…

तो जिन धर्मवीर भारती जी के घर में ही व्यंग्य का राग दरबार उपजा हो , उनके लेखन में व्यंग्य  स्वाभाविक रूप से घुला होना स्वाभाविक ही है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना फागुन की चिट्ठी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी

मेरे प्रकृति-मित्रों,

मैं फागुन हूँ। हर साल चुपचाप तुम्हारे आँगन में उतर आता हूँ—कभी हल्की हवा बनकर, कभी फूलों की खुशबू बनकर, कभी किसी पेड़ की नई कोपल में छिपकर। जब तुम Holi के रंगों में भीगते हो, तब मुझे सबसे ज़्यादा आनंद होता है।

रंग उड़ते हैं, हँसी गूँजती है, और मन जैसे थोड़ी देर के लिए फिर से बच्चा हो जाता है।

पर इस बार मैं तुमसे एक छोटी-सी विनती करना चाहता हूँ।

जब तुम अपने प्रियजनों को गुलाल लगाओ, तो एक चुटकी गुलाल अपने आँगन के किसी पौधे के नाम भी रख देना। उस तुलसी के पास, उस छोटे से नीम या अमरूद के पेड़ के पास, या उस बेल के पास जो चुपचाप तुम्हारी दीवार थामे खड़ी है।

हल्के से उसके तने को छूकर कहना—

“तुम भी हमारे उत्सव के साथी हो।”

क्योंकि पौधे केवल हरियाली नहीं होते।

वे हमारी साँसों की शांति हैं,

हमारी थकान की छाया हैं,

और हमारे जीवन के मौन संरक्षक हैं।

हमारी परंपराओं में उन्हें कभी देवता माना गया, कभी पूर्वजों का रूप। शायद इसलिए कि वे बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे, हमें जीवन देते रहते हैं।

अगर इस होली तुम एक चुटकी गुलाल पौधों को भी लगा दोगे, तो यह केवल एक प्रतीक नहीं होगा—यह प्रकृति से दोस्ती का एक छोटा-सा वचन होगा।

और तब शायद तुम्हें महसूस होगा कि हवा भी थोड़ी और मधुर हो गई है,

पत्ते भी हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे हैं,

और तुम्हारे आँगन में खड़ा हर पेड़ मन ही मन कह रहा है—

“अब सच में फागुन आया है।”

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३४ ⇒ आत्म-स्वीकृति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म-स्वीकृति।)

?अभी अभी # ९३४ ⇒ आलेख – आत्म-स्वीकृति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आत्म, आत्मा का स्थूल स्वरूप है। आत्म-कथा में आत्मा को छोड़कर स्थूल देह का महिमामंडन किया जाता है। केवल स्वामी परमहँस योगानंद की ” योगी की आत्म-कथा (An Autography of a Yogi) ही एक ऐसी आत्मकथा है जिसमें जीवात्मा के साथ परमात्मा का भी विवेचन किया गया है, स्थूल के साथ सूक्ष्म शरीर की व्याख्या की गई है। वहाँ मैं से अधिक आत्म-तत्व की चर्चा की गई है।

मोहनदास करमचंद गाँधी की आत्म-कथा में हम ऐसी आत्म-स्वीकृति पाते हैं, जिन्हें आप स्वीकारोक्ति अथवा कॉन्फेशन कह सकते हैं। अपने गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन और अवगुणों पर पर्दा ही अधिकतर आत्म-कथा की विषय- वस्तु होती है। ग़रीबी और अभाव का वर्णन इफ़राती से किया जाता है। उपलब्धियों का बखान भी नई नवेली दुल्हन के समान लजाकर किया जाता है। महात्मा-गाँधी की आत्म-कथा का शीर्षक, सत्य के प्रयोग है। जिसका अंग्रेज़ी शीर्षक My Confessions with Truth है। सत्य कोई प्रयोग की वस्तु नहीं, आचरण में उतारने वाली नैतिकता है। आप कुछ भी सोचें करें, नैतिकता की मर्यादा में रहकर करें। प्रयोग का प्रदर्शन अथवा स्वीकारोक्ति नैतिकता के दायरे में नहीं आती। शायद इसीलिए बापू की आत्म-कथा आज भी उनके लिए आत्म-घाती ही सिद्ध हो रही है। कहाँ का महात्मा, राष्ट्रपिता, लंपट कहीं का ! जैसे विशेषण भी उपहार-स्वरूप अनादर सहित प्रेषित किये जाते रहे हैं।।

जब हम आत्म-स्वीकृति की बात करते हैं, तो उसमें आत्म-मंथन भी समाहित है। गुण-दोषों का अवलोकन, अन्तरावलोकन का विषय है, जिसके आधार पर आत्म-शुद्धि संभव है। यह चित्त-शुद्धि का एक सूक्ष्म प्रयास है। आत्म-बल इसी चित्त-शुद्धि की देन है।

आत्म-बल, आत्म-विश्वास का परिष्कृत स्वरूप है, जहाँ स्वयं से अधिक उस सर्व-शक्तिमान पर भरोसा किया जाता है। यह आस्था, विश्वास और समर्पण की वह चरम अवस्था है, जिसे नारद-भक्ति-सूत्र में आत्म-निवेदन की संज्ञा दी गई है।।

आत्म-स्वीकृति स्वयं को, अपने गुण-दोषों सहित पहचानने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। ईश्वर तो हमें हमारे गुण-दोषों सहित स्वीकार कर लेता है लेकिन संसार दोषमुक्त नहीं, दोषयुक्त है। वह आपके दोषों को स्वीकार नहीं करता, केवल गुणों का गाहक है। फलस्वरूप हम अपनी बुराइयों और अवगुणों को छुपा लेते हैं और अच्छाइयों को जग-जाहिर कर देते हैं। और इससे ही हमें मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और प्रशंसा हासिल होती है। यह सतही अच्छाई ही संसार है, जो आपकी नित्य शुद्ध, बुद्ध आत्मा से कोसों दूर है।

आत्म-स्वीकृति मान्यता प्राप्त धर्म नहीं, सहज, सरल अध्यात्म है, चित्त शुद्धि का एकमात्र ऐसा उपाय है, जहाँ निंदा-स्तुति, छल-कपट के लिए कोई स्थान नहीं। केवल निष्ठा, प्रेम और समर्पण है, जिसके बिना स्वयं का, एवं जगत का वास्तविक कल्याण संभव नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रंगोत्सव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – रंगोत्सव ? ?

होली अर्थात विभिन्न रंगों का साथ आना। साथ आना, एकात्म होना। रंग लगाना अर्थात अपने रंग या अपनी सोच अथवा विचार में किसी को रँगना। विभिन्न रंगों से रँगा व्यक्ति जानता है कि उसका विचार ही अंतिम नहीं है। रंग लगानेवाला स्वयं भी सामासिकता और एकात्मता के रंग में रँगता चला जाता है। रँगना भी ऐसा कि रँगा सियार भी हृदय परिवर्तन के लिए विवश हो जाए। अपनी एक कविता स्मरण हो आती है,

सारे विरोध उनके तिरोहित हुए,

भाव मेरे मन के पुरोहित हुए,

मतभेदों की समिधा,

संवाद के यज्ञ में,

सद्भाव के घृत से,

सत्य के पावक में होम हुई,

आर-पार अब

एक ही परिदृश्य बसता है,

मेरे मन के भावों का

उनके ह्रदय में,

उनके विचार का

मेरे मानसपटल पर

प्रतिबिंब दिखता है…!

होली या फाग हमारी सामासिकता का इंद्रधनुषी प्रतीक है। यही कारण है कि होली क्षमापना का भी पर्व है। क्षमापना अर्थात वर्षभर की ईर्ष्या मत्सर, शत्रुता को भूलकर सहयोग- समन्वय का नया पर्व आरंभ करना।

जाने-अनजाने विगत वर्षभर में किसी कृत्य से किसी का मन दुखा हो तो हृदय से क्षमायाचना। आइए, शेष जीवन में हिल-मिलकर अशेष रंगों का आनंद उठाएँ, होली मनाएँ।

शुभ धूलिवंदन।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३३ ⇒ सबक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सबक।)

?अभी अभी # ९३२ ⇒ आलेख – सबक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सीखने और सिखाने को सबक कहते हैं ! बच्चे बहुत ज़ल्दी सीखते हैं। बचपन में स्कूल में जो भी सबक दिया जाता है, उसे उन्हें सीखना पड़ता है। अगर सबक ठीक से याद नहीं हुआ, तो गुरु जी को सबक सिखाना भी आता है। पढ़ा हुआ सबक भले ही हम बड़े होकर भूल जाएं, लेकिन वह सबक ज़रूर याद रहता है, जिसमें बेंत से हथेलियां गर्म हो जाया करती थीं, और मुर्गा बनाकर पीठ पर डस्टर रख दिया जाता था।

सबक को पाठ भी कहते हैं ! पाठशाला शब्द भी पाठ से ही बना है। वैसे बच्चे की पहली पाठशाला तो उसकी माँ ही होती है। माँ सा प्यार देने वाली माँ मासी कहलाती है और मदर-सा पाठ पढ़ाने वाली संस्था मदरसा कहलाती है। काश ! सभी मदरसों में मदर-सा पाठ पढ़ाया जाता, तो किसी भी कौम को सबक सिखलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।।

जो सबक हमारे लिए सबक है, एक पाठ है, वही अंग्रेज़ी का lesson है। आज की पीढ़ी सबक याद नहीं करती, पाठ नहीं पढ़ती, वह lesson याद करती है। अगर lesson याद नहीं होता, तो कांवेंटी मेम बच्चे को उनकी भाषा में punish करती है, कुछ इस तरह – I will teach you a lesson. और बालक वह lesson ज़िन्दगी भर नहीं भूलता।

सबक ठीक से याद करने से ज़िन्दगी बन जाती है। जो सबक इंसान अपनी ज़िंदगी में सीखता है, वही सबक वह दूसरों को सिखाता है। गुरु-शिष्य संबंध भी सीखने सिखाने का ही रिश्ता है।

अगर अपना भविष्य उज्जवल बनाना है तो पाठशाला और मदरसे से कुछ नहीं होता, कोचिंग संस्थान की शरण भी लेनी पड़ती है।।

आश्चर्य तो तब होता है, जब ज़िन्दगी के सभी सबक एक तरफ हो जाते हैं, और सास दाँतों तले उंगली दबा कहती है – बहू ने न जाने कैसी पट्टी पढ़ा दी है कि बबलू हाथ से ही निकल गया। फ़िल्मी भाषा में शायद इसे ही प्यार का सबक कहते हैं।

कितनी विचित्र बात है ! हमारे समय में सबक की शुरुआत पट्टी से ही होती थी। एक पट्टी पेम ही हमारा बस्ता होता था। जो अक्षर और अंक हमने बचपन में पट्टी पर लिख लिखकर सीख लिए, उससे ज़िन्दगी की एक इबारत बन गई। या तो ज़िन्दगी का गणित सुलझ गया या उलझ गया। किसी ने एक शब्द प्यार सीख लिया तो वह मसीहा बन गया और किसी ने अगर ज़िहाद सीख लिया तो वह आतंकी बन गया।।

अच्छा सबक ज़िन्दगी देता है, ज़िन्दगी बनाता है। जो हमें एक नेक इंसान बनाये, वही शिक्षा ! अगर हर पढ़ा लिखा इंसान नेक बन जाता तो क्या आज संसार में अमन चैन नहीं होता ? दुर्योधन, कंस, रावण, हिटलर और लादेन को ऐसी क्या घुट्टी पिलाई गई कि वे मानवता के लिए कलंक साबित हुए।

एक समझदार कौम वही, जो ग़लतियों से सबक ले ! किसी एक हैवान के जुनून से बर्बाद जापान जैसे देश ने दुनिया को जतला दिया कि दृढ़ संकल्प, परिश्रम, निष्ठा और देश के प्रति समर्पण से कितना ऊपर उठा जा सकता है। हमें किसी से सबक सीखना भी है, और किसी को सबक सिखलाना भी है।

यह संसार वाकई एक पाठशाला है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३२ ⇒ भौंकने का अधिकार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भौंकने का अधिकार।)

?अभी अभी # ९३२ ⇒ आलेख – भौंकने का अधिकार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

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दुनिया बनाने वाले ने सभी प्राणियों को कुछ जन्मसिद्ध अधिकार दिये हुए हैं, इनमें बोलना, काटना और भौंकना भी शामिल है। मनुष्य तो खैर, इन सभी में आय एम द सर्वश्रेष्ठ है ही, क्योंकि वह दिमाग की खाता है। केवल उसमें ही नर से नारायण बनने की संभावना निहित है और केवल यही गुण जहां उसके उत्थान का कारण बनता है वहीं यही घमंड उसके पतन के लिए भी उत्तरदायी होता है।

जुबां और दिमाग का धनी यह इंसान इतना चालाक है कि इसने सभी प्राणियों से कुछ न कुछ गुण/अवगुण अपने जीवन में उतार लिए हैं। बिना कारण रात भर जागना, कुत्ते की तरह भौंकना और अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के संसाधनों का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही इसमें शामिल है।।

बिना कारण सृष्टि के किसी जीव का जन्म नहीं होता। एक फूल के खिलने में जितना हाथ एक तितली का है, उतना ही एक भंवरे का भी। एक मधु मक्खी किसके इशारे पर छत्ते में शहद का निर्माण करती है, कोई नहीं जानता। मुर्गी किससे पूछकर अंडे देती है, गाय भैंस क्यों दूध देती है। एक रेशम का कीड़े से यह बुद्धिमान मनुष्य रेशम तक निकाल लेता है। और शायद इसीलिए वह इस सृष्टि का मालिक भी बन बैठा है।

अब आप एक श्वान को ही ले लीजिए ! उल्लू की तरह वह रात भर जागने के लिए अभिशप्त है। वह बिना वेतन का एक चौकीदार है। चूंकि वह बोल नहीं सकता, अतः पहरेदारी करते वक्त उसे भौंकने का अधिकार मिला है। उसके हाथ में कोई डंडा अथवा बंदूक नहीं, इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए वह किसी को काट भी सकता है।।

आज का नर, जो नारायण भी बन सकता है, कभी वानर ही तो था। आज भी उसकी नकल करने की आदत नहीं गई। सांप की तरह डंसना और कुत्ते की तरह भौंकना भी उसमें शामिल है। हम अगर कुत्ते की भाषा समझते तो शायद उसके भावों को पकड़ पाते। वह हमसे ज़्यादा समझदार है। जैसा आप सिखाओ, सीख ही लेता है। जो इंसान खुद एक बंदर की तरह नाचता फिरता है, वह मदारी बन, पहले सड़कों पर बंदरों का नाच करता है और बाद में पढ़ लिखकर नच बलिए में शामिल हो जाता है।

बंदर से नाचने का और कुत्ते से भौंकने का अधिकार भी आज इंसान ने छीन लिया है। कुत्ता मालिक का हो या सड़क का, जिस तरह भौंकना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, आज राजनीति में भी भौंकने का अधिकार जितना विपक्ष के पास है उतना ही सत्ता पक्ष के पास भी।।

अंतर सिर्फ इतना है किसी के गले में सत्ता का पट्टा है तो कोई निर्विघ्न सड़क पर घूम रहा है। Have और have nots की लड़ाई हमने इन मूक प्राणियों से सीखी या इन्हें सिखाई यह कहना बड़ा मुश्किल है।

इंसान के साथ रह रहकर श्वान, इंसानों के तौर तरीके सीख गया। एक इशारे पर चुप रहना, दुम हिलाना सीख गया। काश इंसान भी इन मूक प्राणियों से कुछ सीख पाता। अपनी भाषा छोड़ इनकी भाषा में भौंकना न तो राजा को शोभा देता है और न ही प्रजा को। मीठी जुबां दी बोलने को, इसमें जहर कौन घोल गया। मैं देशभक्त, वह देशद्रोही, कानों में यह कौन बोल गया।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६८ – देश-परदेश – च से चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६८ ☆ देश-परदेश – च से चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

चाय की चाहत तो हर समय रहती हैं। मोबाइल के आ जाने से चाहत कुछ कम तो हो गई है, परन्तु चाय अभी भी सबसे पसंदीदा पेय हैं।

चाय के भी अनेक नाम, रंग रूप और स्वाद होते हैं। प्रातः काल खटिया पर पी जाने वाली चाय अंग्रेज हमें “बेड टी” के नाम से छोड़ गए हैं। दूसरा चाय का कप “हैंगओवर ब्रेक टी” के नाम रहता हैं। ब्रेकफास्ट टी के बिना ब्रेकफास्ट अधूरा कहलाता हैं।

11 बजे ऑफिस की पहली चाय के बाद ही सरकारी दफ्तरों में कार्य करने के लिए मानस बनाना आरंभ होता हैं। दोपहर के भोजन पश्चात “नींद भगाओ चाय” के बाद ही सरकारी कर्मचारी अपना आसन ग्रहण करते है। सांय के चार बजे के लिए अंग्रेज़ “इवनिंग टी” का ज्ञान दे कर चले गए थे।

सांय छः बजे पत्नी के हाथ से बनी हुई घर की चाय के साथ हल्का नाश्ता आपकी रात्रि भोजन की मात्रा को कम करने का राम बाण फार्मूला हैं।

चाय के बहुत सारे रंग तो हम सब जानते ही हैं, जिनमें लाल, काली, सफेद चाय यानी शुद्ध दूध में थोड़ी सी पत्ती को उबाल कर पिया जाता हैं। विगत कुछ वर्षों से “हरी चाय” भी हम सब के घरों में अपने पैर जमा चुकी हैं।

कुछ दिन पूर्व एक मित्र ने पूछा नीली चाय पियोगे क्या ? वज़न कम हो जाता हैं। उसके भाव सुनकर ही हमारी जेब का वजन अवश्य कम हो गया हैं। मित्र ने हंसते हुए बोला कोई बात नहीं तुमको “ठंडी चाय” ही पिलाते हैं। आप गलत दिशा में विचार करने लगें है। मित्र ने बिना दूध की चाय को ठंडा कर उसमें बर्फ के कुछ टुकड़े डाल कर “आइस टी” परोस कर इतिश्री कर ली।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता में विज्ञान…, आत्मकथ्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कविता में विज्ञान…, आत्मकथ्य🙏 ? ?

(कुछ वर्ष पूर्व किसी पत्रिका ने कविता में विज्ञान पर आत्मकथ्य मांगा था। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर आज उसे विनम्रता से साझा कर रहा हूँ।)

विज्ञान को सामान्यतः प्रत्यक्ष ज्ञान माना गया है जबकि कविता को कल्पना की उड़ान। ज्ञान, ललित कलाओं और विज्ञान में धुर अंतर देखनेवालों को स्मरण रखना चाहिए कि राइट बंधुओं ने पक्षियों को उड़ते देख मनुष्य के भी आकाश में जा सकने की कल्पना की थी‌। इस कल्पना का परिणाम था, वायुयान का आविष्कार।

सांप्रतिक वैज्ञानिक काल यथार्थवादी कविताओं का है।  ऐसे में दर्शन और विज्ञान में एक तरह का समन्वय देखने को मिल सकता है। मेरा रुझान सदैव अध्यात्म, दर्शन और साहित्य में रहा। तथापि अकादमिक शिक्षा विज्ञान की रही। स्वाभाविक है कि चिंतन-मनन की पृष्ठभूमि में विज्ञान रहेगा।

विलियम वर्ड्सवर्थ ने कविता को परिभाषित करते हुए लिखा है, ‘पोएट्री इज़ स्पॉन्टेनियस ओवरफ्लो ऑफ पॉवरफुल फीलिंग्स।’ कविता स्वत: संभूत है।  यहाँ ‘स्पॉन्टेनियस’ शब्द महत्वपूर्ण है। कविता तीव्रता से उद्भुत अवश्य होती है पर इसकी पृष्ठभूमि में वर्षों का अनुभव और विचार होते हैं। अखंड वैचारिक संचय ज्वालामुखी में बदलता है। एक दिन ज्वालामुखी फूटता है और कविता प्रवाहित होती है। 

अपनी कविता की चर्चा करूँ तो उसका आकलन तो पाठक और समीक्षक का अधिकार है। मैं केवल अपनी रचनाप्रक्रिया में अनायास आते विज्ञान की ओर विनम्रता से रेखांकित भर कर सकता हूँ।

‘मायोपिआ’ नेत्रदोष का एक प्रकार है। यह निकट दृष्टिमत्ता है जिसमें दूर का स्पष्ट दिखाई नहीं देता। निजी रुझान और विज्ञान का समन्वय यथाशक्ति ‘मायोपिआ’ शीर्षक की कविता में उतरा। इसे नम्रता से साझा कर रहा हूँ।

वे रोते नहीं

धरती की कोख में उतरती

रसायनों की खेप पर,

ना ही आसमान की प्रहरी

ओज़ोन की पतली होती परत पर,

दूषित जल, प्रदूषित वायु,

बढ़ती वैश्विक अग्नि भी,

उनके दुख का कारण नहीं,

अब…,

विदारक विलाप कर रहे हैं,

इन्हीं तत्वों से उपजी

एक देह के मौन हो जाने पर…,

मनुष्य की आँख के

इस शाश्वत मायोपिआ का

इलाज ढूँढ़ना अभी बाकी है..!

(कवितासंग्रह ‘योंही’ से)

 आइंस्टिन का सापेक्षता का नियम सर्वज्ञात है। ‘ई इज़ इक्वल टू एम.सी. स्क्वेयर’ का सूत्र उन्हीं की देन है। एक दिन एकाएक ‘सापेक्ष’ कविता में उतरे चिंतन में गहरे पैठे आइंस्टिन और उनका सापेक्षता का सिद्धांत।

भारी भीड़ के बीच

कर्णहीन नीरव,

घोर नीरव के बीच

कोलाहल मचाती मूक भीड़,

जाने स्थितियाँ आक्षेप उठाती हैं

या परिभाषाएँ सापेक्ष हो जाती हैं,

कुछ भी हो पर हर बार

मन हो जाता है क्वारंटीन,

….क्या कहते हो आइंस्टीन?

(कवितासंग्रह ‘क्रौंच’ से)

कविता के विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है,” कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता अवश्य ही होगी। इसका क्या कारण है? बात यह है कि संसार के अनेक कृत्रिम व्यापारों में फंसे रहने से मनुष्य की मनुष्यता के जाते रहने का डर रहता है। अतएव मानुषी प्रकृति को जाग्रत रखने के लिए ईश्वर ने कविता रूपी औषधि बनाई है। कविता यही प्रयत्न करती है कि प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पाए।’

न्यूक्लिअर चेन रिएक्शन की आशंकाओं पर मानुषी प्रकृति की संभावनाओं का यह चित्र नतमस्तक होकर उद्धृत कर रहा हूँ,

वे देख-सुन रहे हैं

अपने बोए बमों का विस्फोट,

अणु के परमाणु में होते

विखंडन पर उत्सव मना रहे हैं,

मैं निहार रहा हूँ

परमाणु के विघटन से उपजे

इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन,

आशान्वित हूँ हर न्यूक्लियस से,

जिसमें छिपी है

अनगिनत अणु और

असंख्य परमाणु की

शाश्वत संभावनाएँ,

हर क्षुद्र विनाश

विराट सृजन बोता है,

शकुनि की आँख और

संजय की दृष्टि में

यही अंतर होता है।

(कवितासंग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता’ से)

अपनी कविता के किसी पक्ष की कवि द्वारा चर्चा अत्यंत संकोच का और दुरूह कार्य है। इस सम्बंध में मिले आत्मीय आदेश का विनयभाव से निर्वहन करने का प्रयास किया है। इसी विनयभाव से इस आलेख का उपसंहार करते हुए अपनी जो पंक्तियाँ कौंधी, उनमें भी डी एन ए विज्ञान का ही निकला,  

ये कलम से निकले,

काग़ज़ पर उतरे,

शब्द भर हो सकते हैं

तुम्हारे लिए,

मेरे लिए तो

मन, प्राण और देह का

डी एन ए हैं !

(कवितासंग्रह ‘योंही’ से)

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जीवन का पाठ ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🍀जीवन का पाठ🍀

एक दिन की सच्ची कसौटी बहुत सरल है—

क्या हमारे कारण किसी ने अपने को अधिक सुरक्षित, अधिक प्रसन्न या अधिक हल्का अनुभव किया?

और उतना ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न—क्या हमारे शब्दों, कर्मों या विचारों से किसी का मन आहत हुआ, किसी को भय लगा, या किसी की गरिमा को ठेस पहुँची?

नैतिक जीवन की शुरुआत यहीं से होती है। ऊँचे सिद्धान्तों या बड़े उपदेशों से नहीं, बल्कि अपने वचन, आचरण और मन पर सजग पहरे से। यदि ये तीनों निर्मल रहें, तो जीवन में शान्ति का प्रवाह बना रहता है। यदि इन्हें असावधान छोड़ दिया जाए, तो प्रतिभा और सफलता भी दुःख से नहीं बचा सकतीं।

आइए, इन तीन द्वारों पर ठहरकर विचार करें।

🍀वचन का अनुशासन : ऐसे शब्द जो जोड़ें, तोड़ें नहीं

वाणी तीव्र होती है। एक बार निकला शब्द लौटकर नहीं आता। वह सीधे किसी के हृदय तक पहुँचता है।

इसलिए बोलने से पहले स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या यह सत्य है?

क्या यह हितकारी है?

क्या यह कोमल है?

क्या यह उचित समय है?

कटु वचन पत्थर से भी गहरा घाव कर सकते हैं। असत्य क्षणिक लाभ दे सकता है, पर विश्वास खो देता है। आधा-सच, बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात, या जान-बूझकर तथ्य छिपाना—ये भी उतने ही हानिकारक हैं जितना प्रत्यक्ष झूठ। किसी की प्रतिष्ठा को गिराने या अपने लाभ के लिए सत्य को तोड़-मरोड़ देना अपने ही चरित्र को कलुषित करना है।

एक घटना स्मरणीय है।

एक युवक क्रोध से भरे शब्दों की वर्षा करता रहा। सामने खड़े शांत पुरुष ने सब सुना, पर प्रतिक्रिया नहीं दी। अंत में उन्होंने पूछा, “यदि कोई तुम्हें उपहार दे और तुम उसे स्वीकार न करो, तो वह किसके पास रहता है?”

युवक ने कहा, “देने वाले के पास।”

उन्होंने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारे क्रोध को स्वीकार नहीं करता। वह तुम्हारे पास ही रहेगा।”

कितना सरल, कितना गहरा संदेश!

हम दूसरों के शब्दों को नियंत्रित नहीं कर सकते, पर अपने शब्दों का चयन अवश्य कर सकते हैं।

सही वाणी केवल असत्य से बचना नहीं है। यह ऐसी भाषा चुनना है जो विश्वास जगाए, मेल कराए, और हृदयों को जोड़े। जहाँ मौन शान्ति बचा सकता हो, वहाँ मौन ही श्रेष्ठ है।

शब्द सेतु भी बन सकते हैं, शस्त्र भी। निर्णय हमारे हाथ में है।

🍀कर्म का अनुशासन : शक्ति जो आश्वस्त करे, भयभीत नहीं

हमारा आचरण ऐसा हो कि कोई भी हमारे कारण भयभीत न हो।

सच्ची शक्ति दबाती नहीं, संरक्षण देती है। वह अधिकार का प्रदर्शन नहीं करती, वह विश्वास जगाती है।

नैतिक जीवन का अर्थ है—किसी भी प्राणी को शारीरिक या मानसिक पीड़ा न पहुँचाना। बल, पद या सामर्थ्य का उपयोग स्वार्थ के लिए न करना। किसी को डराकर, दबाकर या आहत करके प्राप्त की गई सफलता अन्ततः खोखली होती है।

कल्पना कीजिए, जब हम किसी कक्ष में प्रवेश करें तो बच्चों, बड़ों, यहाँ तक कि पशुओं के मन में भी सहजता का भाव हो। यह हमारी वास्तविक शक्ति का संकेत है।

एक प्रसंग में एक कुख्यात डाकू ने एक निर्भीक साधु को रोका। डाकू ने धमकी दी, “रुक जाओ!”

साधु ने शांत स्वर में कहा, “मैं तो रुक चुका हूँ—मैंने हिंसा छोड़ दी है। तुम अभी तक नहीं रुके।”

इन शब्दों ने डाकू के भीतर गहरा परिवर्तन जगा दिया।

यह है अहिंसा की शक्ति—जो बिना शस्त्र के भी हिंसा को शांत कर दे।

ऐसा आचरण जिसमें चोरी, छल, दुरुपयोग या किसी भी प्रकार की हिंसा न हो—वही समाज में विश्वास का आधार बनता है।

🍀मन का अनुशासन : मूल स्रोत

वाणी और कर्म मन से उत्पन्न होते हैं।

यदि मन अशांत है, तो वाणी कठोर और कर्म असावधान होंगे। यदि मन निर्मल है, तो वाणी मधुर और कर्म उदात्त होंगे।

कहा गया है—

“हम जो कुछ हैं, वह हमारे विचारों का परिणाम है। यदि कोई अशुद्ध मन से बोलता या करता है, तो दुःख उसका अनुसरण करता है जैसे बैल के पाँव के पीछे पहिया। यदि कोई शुद्ध मन से बोलता या करता है, तो सुख उसकी छाया की तरह साथ चलता है।”

क्रोध पहले विचार है, बाद में शब्द।

हिंसा पहले भावना है, बाद में कर्म।

इसलिए वास्तविक साधना भीतर से आरम्भ होती है।

मन की रक्षा का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है, बल्कि उन्हें पहचानना है। जब ईर्ष्या उठे, उसे देखें। जब रोष जागे, उसे समझें। जब द्वेष आए, उसे पोषण न दें। जिन विचारों को हम खाद-पानी नहीं देते, वे धीरे-धीरे क्षीण हो जाते हैं।

यदि हम मन में सद्भावना का संकल्प रखें—कि सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित रहें—तो भीतर की भूमि बदलने लगती है।

निर्मल मन भोला नहीं होता, वह सजग होता है। वह द्वेष को स्थान नहीं देता।

🍀जीवन में इसका अभ्यास

यह शिक्षा केवल ग्रंथों के लिए नहीं, जीवन के लिए है।

किशोरों के लिए इसका अर्थ है—

🌱उपहास या बदनामी का हिस्सा न बनना।

🌱सोशल मीडिया पर अफवाह न फैलाना।

🌱दबाव में आकर असत्य न कहना।

साहस से सत्य का साथ देना।

वयस्कों के लिए इसका अर्थ है—

🌱लाभ के लिए सत्य को न तोड़ना।

🌱अधिकार का उपयोग विनम्रता से करना।

🌱यह स्मरण रखना कि बच्चे हमारे आचरण से सीखते हैं।

🌱ऐसा वातावरण बनाना जहाँ कोई स्वयं को छोटा या भयभीत न महसूस करे।

हम सबके लिए इसका अर्थ है—प्रतिक्रिया देने से पहले एक क्षण ठहरना।🌱

वह एक क्षण वर्षों के पछतावे को रोक सकता है।

🍀नैतिक जीवन की अविरल धारा

जब वाणी सत्य और कोमल हो, तो सम्बन्ध गहरे होते हैं।

जब कर्म अहिंसक और आश्वस्तकारी हों, तो विश्वास बढ़ता है।

जब मन निर्मल हो, तो भीतर शान्ति खिलती है।

इस मार्ग के लिए धन, पद या असाधारण प्रतिभा की आवश्यकता नहीं। केवल सजगता चाहिए।

कल्पना कीजिए—यदि प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प करे:

🌱“मैं अपने वचन से किसी को आहत नहीं करूँगा।

🌱मैं अपने कर्म से किसी को भयभीत नहीं करूँगा।

🌱मैं अपने मन में किसी के लिए द्वेष नहीं पालूँगा।”

तो घरों में शान्ति होगी, विद्यालयों में करुणा, और समाज में विश्वास।

विश्व की शान्ति मन की शान्ति से आरम्भ होती है।

मन की शान्ति विचारों की पवित्रता से।

विचार से वाणी जन्म लेती है।

वाणी से कर्म।

और कर्म से हमारा भाग्य।

हम सबके भीतर यह कोमल शक्ति विद्यमान है।

जब हम इसे सजगता से सँभालते हैं, तो हमारा जीवन ही नहीं, हमारे संपर्क में आने वाला प्रत्येक प्राणी भी उससे आलोकित हो उठता है।🌷

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३१ ⇒ दृष्टि दोष ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दृष्टि दोष।)

?अभी अभी # ९३१ ⇒ आलेख – दृष्टि दोष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

Man is a bundle of habits. इंसान आदतों का एक पुलिंदा है। उसमें अगर खूबियां हैं तो विकार भी। वह कहीं मजबूत है तो कहीं कमज़ोर भी। कमजोर होते ही उसे रोग घेर लेते हैं और वह बीमार होने लगता है। भले ही उसकी नीयत साफ हो, समय के साथ उसकी नज़र कमज़ोर होने लगती है, जिसे दृष्टि दोष अथवा नेत्र रोग कहते हैं।

जो लोग नियमित रूप से विटामिन सी और डी के साथ नींबू, आंवला, त्रिफला, शहद, बादाम और डाबर च्यवनप्राश का सेवन करते हैं, उनकी नेत्र ज्योति तेज होती है। नैनों में कजरा और सुरमा, आजकल वैसे भी कौन लगाता है। रात रात भर जागना, अधिक ऑनलाइन व्यस्त रहना और अधिक पढ़ने लिखने से आंखों को दो से चार होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता, अर्थात् आंखों पर जल्द ही चश्मा चढ़ जाता है।।

चश्मे नजर के भी होते हैं और धूप के भी। जिन्हें नजर लगती है उनकी पहले नजर उतारनी पड़ती है फिर उन्हें चश्मा पहनाना पड़ता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे मोटे चश्मे आजकल नहीं लगते। मोतियाबिंद होने पर, आंखों के अंदर ही आजकल लेंस लगा दिया जाता है जिससे आपकी दूर पास की दृष्टि ठीक हो जाती है।

ईश्वर ने हमें दो आंखें दी हैं, फिर भी हम वही देखते हैं, जो हमें देखना होता है। ऐ भाई जरा देखकर चलो, आंख वाले को ही बोला जाता है। बाजू ! समझो इशारे, हाॅरन पुकारे, और पलट, तेरा ध्यान किधर है, जैसे संबोधन भी आंख वालों के लिए ही तो होते हैं।।

मजरूह तो कह गए हैं कि तेरी आंखों के सिवा, दुनिया में रखा क्या है, यानी जहां आंख नहीं, वहां जीवन में अंधेरा ही अंधेरा ! और यह भी एक कटु सत्य है कि दुनिया के तीन करोड़ नेत्रहीनों में से एक करोड़ नेत्रहीन तो हमारे भारत में ही हैं। है न विचित्र बात, हमारी आंखें होते हुए भी हमें यह दिखाई नहीं देता। लेकिन ईश्वर को सब दिखाई देता है। परमात्मा का प्रकाश इनकी आत्मा तक भी पहुंचता है। दुनिया में कई सेवाभावी लोग और पारमार्थिक संस्थाएं इस अंधेरी दुनिया को जगमगाने में दिन रात एक कर रही हैं। जहां नेत्र नहीं, वहां उनकी मन की आँखें सब देखती हैं, अब सुनती हैं और आत्म विश्वास से इस दुनिया में, अपने कर्म, शुभ संकल्प और आत्म बल की एक ऐसी मिसाल पेश करती है कि हम आंख वालों की भी नजरें सम्मान, तारीफ, गर्व और प्रशंसा से सहसा झुक जाती हैं।

आंखों का संसार तो हमने देखा है लेकिन एक संसार ऐसा भी है, जहां तेरे मस्त मस्त दो नैन के अलावा भी बहुत कुछ है। जिसे हम दृष्टि कहते हैं, उसका इन दिखाई देने वालों चक्षुओं से कुछ लेना देना नहीं है। आप इन आंखों को बंद कर लीजिए। आंखों पे भरोसा मत कर ! दुनिया जादू का खेल है। आइए आपको दृष्टि के एक और ही लोक की सैर करवा दें।।

जिस दृष्टि की हम बात कर रहे हैं, वह तीन प्रकार की है। अंतर्दृष्टि, दूरदृष्टि और दिव्य दृष्टि। जाहिर है, इनका हमारी आंखों से कोई लेना देना नहीं है।

हमारे अंदर नजर डालने के लिए आज तक दुनिया में न तो कोई मशीन बनी है और न ही कोई आंख। हमारे शरीर विज्ञान में किसी मन की आंख का कोई जिक्र नहीं है। जब जरा गर्दन झुकाई, देख ली तस्वीरे यार।

हमारे आसपास एक दुनिया दृष्टिबाधित, मूक बधिर, दिव्यांग और स्पेशल चाइल्ड की भी है, जिन्हें ईश्वर ने वरदान स्वरूप छटी इंद्रिय भी दी है, उनकी अंतर्दृष्टि इतनी सशक्त होती है कि वे ऐसे ऐसे काम कर गुजरते हैं, जो हम कथित साधारण आम इंसान नहीं कर सकते।

सूरदास हों या अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन। हमारे कवि हृदय संगीतकार रवींद्र जैन भी तो प्रज्ञा चक्षु ही थे।

वैसे भी प्रज्ञा का संबंध हमारी अंतर्दृष्टि से ही अधिक होता है। आँखें होते हुए, वे बाहर तो ताका झांकी कर लेंगे, लेकिन उन्हें कभी अपने अंदर झांकने की फुर्सत नहीं मिलती।।

अब आते हैं हम दूर दृष्टि और पक्के इरादे पर। दृष्टि को विजन (vision) भी कहते हैं। एक कलाकार जिस दृष्टि से सृजन करता है, उसका संसार उसके अंदर ही निहित होता है।

कवि की कल्पना, राग, सुर, ताल, सृजन का संसार और एक कलाकार के कैनवस की कोई सीमा नहीं होती।

अच्छे दिनों के सपने देखना और दिखाना क्या दूर दृष्टि नहीं।

और अब अंत में हम आखिरकार दिव्य दृष्टि तक पहुंच ही गए। आखिर जहां न पहुंचे वहां पहुंचे रवि, क्या है। क्या डिजिटल युग में हम दिव्य नहीं हो रहे। जो काम संजय ने धृतराष्ट्र के लिए किया, वह काम तो हमारा टीवी और मोबाइल रोज कर रहा है।

लेकिन फिर भी अगर हमारी नीयत में खोट है, हम बेईमान और भ्रष्ट हैं तो क्या यह हमारा दृष्टि दोष नहीं। खुद पर हमारी नजर नहीं, और दूसरों की नजर में हम ऊपरउठना चाहते हैं, सम्मान पाना चाहते हैं।

भव्य और दिव्य में अंतर है ।।

नज़र कमजोर हो चलेगा, मंदबुद्धि हों, चलेगा, गरीब हो, तो भी चलेगा, लेकिन बुरी नजर वाला, दिल में खोट वाला, स्वार्थी, खुदगर्ज, पाखंडी और नफरत से भरा इज्जतदार, सफेदपोश इंसान नहीं चलेगा। कर्ता से दृष्टा की है यह महायात्रा ;

नजर, अब क्यों नजारे नहीं देखती

अपनों में क्यों परायों को देखती

खुदगर्ज है वह नजर

जो दुश्मनों पर मेहरबां नहीं होती

दोस्ती की कोई जुबां नहीं होती।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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