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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 18 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका - भाग - 18 संस्कृति अंतर्चेतना है, सभ्यता वाह्य व्यवहार। वस्त्र, खानपान, नृत्य, गीत, सब अलग पर भीतर से जुड़ा हुआ है। लोकसभ्यता, संस्कृति से अनुप्रेरित होती है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि सभ्य आदमी चम्मच से भोजन तो करने लग गया पर स्वाद से वंचित हो गया। संस्कृति को...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राजा और रजवाड़े ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार (श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख – “राजा और रजवाड़े”।) ☆ आलेख ☆ राजा और रजवाड़े ☆ श्री राकेश कुमार ☆ हमारे देश के राजवाड़े तो आज़ादी के बाद से ही समाप्त हो गए थे। उनको मिलने वाला गुजारा भत्ता( प्रिवीपर्स) भी बंद हुए कई दशक हो गए।            आज़ादी से पूर्व हमारे मालिक इंग्लैंड जिनके राज्य में सूर्यास्त भी नहीं हुआ करता था, अब थोड़े से में सिमट कर रह गए हैं। पुरानी बात है "राज चला गया पर शान नहीं गई"। वहां अभी भी प्रतीक के रूप में राज तंत्र विद्यमान हैं।      वहां की महारानी एलिजाबेथ की वर्ष 1952 में ताज पोशी हुई थी। उसकी सत्तरवी...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मानस के मोती॥ -॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम – भाग – 3 ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मानस के मोती॥ ☆ ॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम - भाग - 3 ॥ - प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆ राम के साथ लक्ष्मण वन को गये। चौदह वर्षों तक उनके साथ रह सब कष्ट सहे और बड़े भाई और भाभी की सेवा व रक्षा की। लंका में युद्ध के समय जब लक्ष्मण को मेघनाद ने शक्ति से घायल किया। वे अचेत हो गये तो राम ने उनकी प्राण रक्षा के लिये यत्नकर वैद्यराज सुषेण के कथनानुसार हनुमान जी की योग्यता से हिमालय से संजीवनी बूटी मंगवाई और उन्हें स्वस्थ करने को सबकुछ किया। दुखी राम के इस कथन से उनके हृदय में भाई लक्ष्मण के प्रति गहन प्रेम की झलक स्पष्ट दिखाई देती है जब रुदन करते हुये वे कहते हैं- सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ, बंधु सदा तुम मृदुल सुभाऊ। मम हित लागि तजेहु पितु माता, सहेहु विपिन हिम आतप वाता॥ सो अनुराग कहां अब भाई, उठहु न सुनि मम बच बिकलाई। जो जनतेऊँ वन बंधु बिछोहूं, पिता वचन मनतेहू नहिं ओहू॥ सुत बित...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 17 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका - भाग - 17 प्रकृति के साथ की इसी एकात्मता के चलते महाराष्ट्र में ‘देवराई’ अर्थात संरक्षित वनों की परंपरा बनी। कोंकण और अन्य भागों में देवराई के वृक्षों को हाथ नहीं लगाया जाता। देश के पहाड़ी अंचलों में भी ‘देव-वन’ हैं, जिनमें रसोईघर की तरह चप्पल पहन कर आना वर्जित है। राजस्थान...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 143 ☆ चिंतन – मेरी-आपकी कहानी ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक अविस्मरणीय एवं विचारणीय आलेख  “चिंतन - मेरी-आपकी कहानी”।)   ☆ आलेख # 143☆ चिंतन - मेरी-आपकी कहानी ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ वियतनाम युद्ध से वापस अमेरिका लौटे एक सैनिक के बारे में यह कहानी प्रचलित है। लौटते ही उसने सैन-फ्रांसिस्को से अपने घर फोन किया। "हाँ पापा, मैं वापस अमेरिका आ गया हूँ, थोड़े ही दिनों में घर आ जाऊंगा पर मेरी कुछ समस्या है. मेरा एक दोस्त मेरे साथ है, मैं उसे घर लाना चाहता हूँ। " "बिलकुल ला सकते हो. अच्छा लगेगा तुम्हारे दोस्त से मिलकर...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मानस के मोती॥ -॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम – भाग – 2 ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मानस के मोती॥ ☆ ॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम - भाग - 2 ॥ - प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆ इधर भरत चित्रकूट जाते हुये मन में भाई राम के प्रेम पर अटूट विश्वास था कि मिलने पर वे उन्हें क्षमा कर वापस आकर स्वत: राजा बनेंगे। अपने मन में भरत के लिये किसी प्रकार का बुराभाव नहीं रखेंगे क्योंकि बचपन से ही वे भरत को प्रेम करते हैं। न जाने माता कैकेयी ने किस दुर्बुद्धिवश सारी अयोध्या पर आपत्ति ला खड़ी की है। वे विश्वास रखते हैं- मैं जानऊं निज नाथ स्वभाऊ, अपराधिहुं पर कोह न काऊ। मो पर कृपा सनेहु विशेषी, खेलत खुनिस न कबहूं देखी॥ सिसुपन ते परिहरेहु न संगू कबहुं न कीनि मोर मन भंगू। मैं प्रभु कृपा रीति जियं जोही, हारेहु खेलजिता एहु मोही॥ आन उपाय मोहि नहिं सूझा, को जिय की रघुबर बिन बूझा॥ भरत के दल बल सहित, राम के पास जाने के कारण कईयों को आशंकायें होती हैं। पर राम का पूरा विश्वास है भरत पर- भरतहिं होई न राजमदु विधि...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 144 ☆ वारी – लघुता से प्रभुता की यात्रा – भाग – 1 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ संजय उवाच # 144 ☆ वारी - लघुता से प्रभुता की यात्रा - भाग - 1 ☆ श्रीक्षेत्र...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – आत्मानंद साहित्य #130 ☆ गरूड़ पुराण – एक आत्मकथ्य ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” ☆

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# 129 ☆ ☆ ‌आलेख – गरूड़ पुराण - एक आत्मकथ्य ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” ☆ वैसे तो  भारतीय संस्कृति मे हमारी जीवन शैली संस्कारों से आच्छादित है, जिससे हमारा समाज एक आदर्श समाज के रूप में स्थापित हो जाता है क्योंकि जो समाज संस्कार विहीन होता है, वह पतनोन्मुखी हो जाता है।   संस्कार ही समाज की आत्मा है, संस्कारित समाज सामाजिक रिश्तों के ताने-बाने को मजबूती प्रदान करता है, अन्यथा यह समाज पशुवत जीवनशैली अपनाता है और सामाजिक आचार संहिता के सारे कायदे कानून तोड़ देता हैं। ऐसा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जो हिंदू जीवन पद्धति का मूल है, जिसके कारण हमारे सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन में दया करूणा प्रेम सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्य विकसित होते हैं। इसी क्रम में हमारे जीवन में कर्म कांडों का महत्व बढ़ जाता है। क्योंकि इन सारे कर्म काण्डों के मूल में हमारे शास्त्रों पुराणों उपनिषदों तथा वेदों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कुल चार...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ ॥ मानस के मोती॥ -॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम – भाग – 1 ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ मानस के मोती॥ ☆ ॥ मानस में भ्रातृ-प्रेम - भाग - 1 ॥ - प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’☆ महाराजा दशरथ के चार पुत्र- राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न में बचपन से ही अत्याधिक पारस्परिक प्रेम था। राम सबसे बड़े थे अत: सभी छोटे भाई उन्हें प्रेम से आदर देते थे। उनकी आज्ञा मानते थे और उनसे कुछ सीखने को तैयार रहते थे। राम भी सब छोटे भाईयों के प्रति प्रीति रखते थे और उनके हितकारी थे। राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती, नाना भाँति सिखावहिं नीती। छोटे भाई उनकी आज्ञा मानने को सदा तत्पर रहते थे- सेवहिं सानुकूल सब भाई, रामचरन रति अति अधिकाई। प्रभु मुख कमल विलोकत रहहीं, कबहुँ कुपाल हमहिं कछु कहहीं॥ जनकपुर में धनुष यज्ञ के अवसर में गुरु की आज्ञा से राम ने शिव धनुष को चढ़ाया। धनुष टूट गया। राजा जनक के प्रण के अनुसार राम-सीता का विवाह हुआ। उसी मण्डप में चारों भाइयों का विवाह भी सपन्न हुआ। जनक जी के परिवार से सीता जी की अन्य बहिनों के साथ विवाह...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 16 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका - भाग - 16 लोकसंस्कृति, सृष्टि को युग्मराग मानती है। सृष्टि, प्रकृति और पुरुष के युग्म का परिणाम है। स्त्री प्रकृति है। स्त्री एकात्मता की दूत है। मायके से ससुराल आती है, माँ से, मायके से स्वाभाविक रूप से एकात्म होती है। इसी एकात्म भाव से ससुराल से एकरूप हो जाती है।...
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