हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता पारिवारिक सन्नाटा… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता पारिवारिक सन्नाटा…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, इस बार नहीं आ पाऊँगा… ऑफिस में बहुत काम है।”

कुछ पल चुप्पी रही।

“कोई बात नहीं बेटा, काम ज़रूरी है…”

फोन कट गया।

माँ ने दरवाज़े की ओर देखा – जो कई दिनों से नहीं खुला था।

पापा धीरे से बोले, “इस बार भी त्योहार… खाली ही रहेगा।”

****

आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ दो दुनियाएँ आमने-सामने हैं – एक तरफ पारंपरिक पारिवारिक संस्कार, और दूसरी तरफ आधुनिक जीवनशैली। इस टकराव में सबसे ज्यादा जो चुपचाप प्रभावित हो रहा है, वह है – परिवार का भावनात्मक ताना-बाना। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर एक अनकहा सन्नाटा धीरे-धीरे गहराता जा रहा है।

पारंपरिक परिवारों में पले-बढ़े माता-पिता के लिए बच्चे केवल जिम्मेदारी नहीं होते, वे उनका पूरा संसार होते हैं – उनकी पहचान, उनका सपना, उनका सहारा। उन्होंने बच्चों को सिर्फ बड़ा नहीं किया, बल्कि अपनी इच्छाओं, अपने समय और कई बार अपने सपनों को भी उनके नाम कर दिया। उनके लिए परिवार का अर्थ था – साथ रहना, एक-दूसरे का सहारा बनना और हर परिस्थिति में एकजुट खड़े रहना।

लेकिन समय के साथ रिश्तों की परिभाषाएँ बदलने लगीं।

आज के युवाओं के लिए जीवन का केंद्र उनके सपने, उनका करियर और उनकी स्वतंत्रता बन गए हैं। वे आगे बढ़ना चाहते हैं, अपनी पहचान बनाना चाहते हैं – और इसके लिए घर से दूर जाना भी उन्हें सही लगता है। यह बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन इसे स्वीकार करना हर माता-पिता के लिए आसान नहीं होता।

यहीं से शुरू होता है वह मौन संघर्ष, जो अक्सर शब्दों में सामने नहीं आता।

माता-पिता कई बार खुद से सवाल करते हैं –

“क्या हमने अपने बच्चों को यही सिखाया था कि वे हमसे दूर हो जाएं?”

“क्या हमारी परवरिश में कहीं कमी रह गई?”

असल में ये सवाल बच्चों से ज्यादा खुद से होते हैं – और शायद इसलिए ज्यादा पीड़ा देते हैं।

जब बच्चे अपने सपनों की ओर बढ़ते हैं, तो माता-पिता के लिए यह गर्व का क्षण भी होता है और एक गहरी खालीपन की शुरुआत भी। घर वही रहता है, दीवारें वही रहती हैं – लेकिन आवाजें कम हो जाती हैं, और खामोशी बढ़ जाती है। कभी जो घर हंसी और बातचीत से गूंजता था, वह अब सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनता है।

बदलता सामाजिक ढांचा इस स्थिति को और जटिल बना देता है। पहले संयुक्त परिवारों में कई रिश्ते साथ होते थे – जिससे भावनात्मक सहारा बना रहता था। आज के एकल परिवारों में माता-पिता अक्सर अकेले रह जाते हैं। उनके पास बात करने वाला कोई नहीं होता, और जो कहना चाहते हैं, वह भी कह नहीं पाते।

फोन पर वे हंसते हैं –

“हाँ बेटा, हम बिल्कुल ठीक हैं…”

लेकिन फोन रखने के बाद वही सन्नाटा उन्हें फिर से घेर लेता है।

****

सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यह दर्द अक्सर अनकहा रह जाता है। माता-पिता अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनना चाहते, इसलिए अपनी भावनाओं को चुपचाप दिल में ही दबा लेते हैं।

यह कहना आसान है कि “समय बदल गया है, हमें भी बदलना चाहिए” – लेकिन भावनाएँ इतनी सरल नहीं होतीं। सालों की परवरिश, जुड़ाव और उम्मीदों को एक झटके में बदलना संभव नहीं है।

फिर भी, इस बदलते दौर में संतुलन ही समाधान है।

माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चों का आगे बढ़ना उनकी परवरिश की सफलता है, असफलता नहीं। वहीं, बच्चों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके माता-पिता केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भावनाओं से भरे इंसान हैं – जिन्हें समय, संवाद और साथ की आवश्यकता होती है।

अंततः, यह टकराव परंपरा और आधुनिकता का नहीं, बल्कि समझ और संवेदना का है। अगर दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे के नजरिए को समझने की कोशिश करें, तो यह दूरी कम हो सकती है।

क्योंकि घर की खामोशी को तोड़ने के लिए बड़ी आवाज़ नहीं,

बस थोड़ा समय… और सच्चा अपनापन ही काफी होता है।

और सच तो यह है – माता-पिता का दिल कभी खाली नहीं होता, वह हमेशा अपने बच्चों से भरा रहता है…

चाहे बच्चे पास हों या दूर।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८९ ⇒ च्युइंगम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “च्युइंगम ।)

?अभी अभी # ९८९ ⇒ आलेख – च्युइंगम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

*CENTER FRESH*

आप खुशी खुशी कुछ भी चबा सकते हो,लेकिन क्या आपने कभी गम को चबाया है ! हमारे साहित्य के वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ फरमाते हैं ;

हम सब काल के दांतों तले

चबते चले जाते हैं

च्युइंगम की तरह

कच,कच कच

बड़ा कठोर सच …

और उधर सभी पीड़ाओं का संगीत से उपचार करने वालों का मानना है कि ;

जब दिल को सताये गम

तू छेड़ सखि सरगम

सा रे ग म पा …..

हमारे जगजीत सिंह बड़े भोले हैं। वे नहीं जानते आज की पीढ़ी को। जब भी किसी खूबसूरत युवा चेहरे को मुस्कुराता देख लेते हैं,बेचारे बड़ी मासूमियत से पूछ लेते हैं ;

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या गम है, जिसको चबा रहे हो !

उन्हें कौन बतलाए। आज की पीढ़ी इतनी खुश है ,इतनी खुश है, कि कभी खुशी,कभी च्युंइगम। वह मस्ती में झूमते हुए सिर्फ किशोर के ही मस्ती भरे नगमे गाना चाहती है। गम छोड़ के मनाओ रंगरेली।

जिस तरह हाथी के दांत खाने के, और दिखाने के अलग होते हैं, ठीक उसी तरह गम भी दो तरह का होता है,खाने का और चिपकाने का। ठंड में अन्य सूखे मेवों के साथ गोंद के लड्डू बड़े स्वास्थ्य वर्धक होते हैं। नवजात शिशुओं की माता को भी कई औषधीय गुणों से युक्त,शक्तिवर्धक जापे के लड्डू खिलाए जाते हैं। बचपन में हमने भी चखे हैं। हमें तो च्युइंगम से बेहतर लगे। पसंद अपनी अपनी। ।

जुगाली के भी सबके अपने अपने तरीके होते हैं। वैसे तो मुंह चलने और जबान चलने में अंतर है,लेकिन कुछ लोग इस भ्रम में रहते हैं कि च्युइंगम से मुंह तो चलता रहता है,लेकिन जबान पर ताला लग जाता है। कुछ सयाने लोग इसे जबड़ों के व्यायाम की संज्ञा भी देते हैं। चोर,चोरी से जाए,लेकिन हेराफेरी से ना जाए। पान आप उसे खाने नहीं दो,यहां वहां थूकने नहीं दो। गुटखा हमारे स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक है ही,जो इनका विज्ञापन कर रहे हैं,हमारी नजर में, वे भी कम खतरनाक नहीं। खुद तो पैसा कमाओ और हमारी आदत बिगाड़ो,यह नहीं चलेगा। हम भले ही अपनी आदत नहीं सुधार पाएं,लेकिन ठीकरा तो आपके माथे पर ही फोड़ेंगे। बॉयकॉट पद्मश्री की त्रिमूर्ति।

च्युंइगम को देख,हमें अपना बचपन याद आ गया। सुबह जब टहलने जाते थे ,तो किसी भी नीम के पेड़ की नाजुक टहनियों को तोड़,उसकी दातून बना लेते थे और फिर,बस,उसे दांतों से चबाया करते थे। मसूड़ों और दांतों का व्यायाम होता था और नीम का कसैलापन शरीर में प्रवेश कर जाता था। करैला नीम चढ़े ना चढ़े, तब तो नीम ही हमारा हकीम भी था। ।

मुखशुद्धि से मन की भी शुद्धि होती है। तन और मन अगर स्वस्थ रहे सौंफ,इलायची और लौंग का सेवन बुरा नहीं। लेकिन सिर्फ खुशी के खातिर,ऐसा भी क्या किसी गम को चबाना, जो बाद में तकलीफदेह साबित हो।

आप ही आपके चिकित्सक भी हो और निःशुल्क परामर्शदाता भी। गम को चबाना,अथवा गम को गलत करना,दोनों ही गलत है। हमारे होठों पर तो आज सिर्फ तलत है। हमारे सारे गम दूर करती सरगम। हमारी प्यारी कानों के जरिए आत्मा में प्रवेश करती असली च्युइंगम। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७६ – देश-परदेश – माँ के नाम का बाज़ार सज चुका है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७६ ☆ देश-परदेश – माँ के नाम का बाज़ार सज चुका है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

पिछले कुछ दिनों से चारों दिशाओं में “मदर्स डे” (मातृ दिवस) की चर्चा हो रही हैं। विगत एक दशक से  मदर्स डे शब्द सुनना आरंभ किया है।

बचपन से बुढ़ापे की दहलीज तक का जीवन तो बिना मदर्स डे मनाए ही व्यतीत हो गया था। अब जीवन की अंतिम पायदान पर ये सब देखने/ सुनने को मिल रहा है।

बाज़ार सज चुके है, पश्चिम में खुशियां मानने का आरंभ कार्ड भेज का शुभकामनाएं प्रेषित करने से होता हैं। नाना प्रकार के उपहार मां के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। ऑनलाइन व्यापार के चतुर खिलाड़ी भी इस रेस में अग्रणी रहते है।

“कुछ मीठा हो जाए” के नाम से ज़हर परोसने वाले भी सक्रिय हो जाते हैं। बाज़ार को भुनाने में सबसे आगे रहते है। आज भुने हुए चने की दुकान मुश्किल से मिलती है, लेकिन चॉकलेट/ केक हर दुकान पर मिल जाता  है। किसी भी दिन, कभी भी, कुछ भी हो केक काट कर खुशियां मनाया जाना अब हमारे समाज में भी एक रिवाज़ बन चुका है।

हमारी संस्कृति जहां मां अपने पूरे जीवन में बच्चों को सभी तरह की खुशियां ही नहीं देती वरन उनके सब कष्ट/दुःख का निवारण भी करती है। उसको वर्ष में एक दिन का सम्मान देना कदापि न्यायोचित नहीं हो सकता है।

प्रतिदिन प्रातः काल मां के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की हमारी परंपरा अब विलुप्तता की कगार पर है। एक दिन मां को भगवान बना देने से मातृत्व ऋण कभी भी चुकाया नहीं जा सकता हैं। इसलिए अपनी संस्कृति का अनुपालन कर जब मौका मिले मां से आशीर्वाद प्राप्त करते रहें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८८ ⇒ हमारा आदर्श समाज ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हमारा आदर्श समाज।)

?अभी अभी # ९८८ ⇒ आलेख – हमारा आदर्श समाज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

किसे पता था कि व्यावहारिक जीवन से आदर्श शब्द अचानक पलायन कर शब्दकोश में दुबककर बैठ जाएगा और उसके दर्शन केवल गीताप्रेस गोरखपुर की आदर्श नारी और आदर्श बालक जैसी पुस्तकों में ही संभव हो पाएँगे।

हमने बचपन में आदर्शों को ऐसे ही ढोया है जैसे आज की पीढ़ी कथित रूप से भ्रष्टाचार और आतंकवाद को ढो रही है। अगर मैं यह कहूँ कि उस ज़माने में लोग आदर्श ही ओढ़ते और आदर्श ही बिछाते थे, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।।

आज के समय की नर्सरी और kg 1 kg 2 तब कच्ची और पक्की पहली और अ-खण्ड, ब-खण्ड कहलाती थी। रोते हुए बच्चों को पकड़-पकड़कर स्कूल भेजा जाता था। हमारी पहली नर्सरी का नाम भी आदर्श बाल मंदिर ही था। एक आदर्श खंडहरनुमा ढाँचा स्कूल कहलाता था, जो समय के साथ विवादित ढाँचे के पहले ही ढह गया। आदर्शों का टिका रहना इतना आसान भी नहीं होता।

हमारे आदर्श शिक्षक, आजीवन नैतिकता और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति ही रहे। कई चेले शक्कर निकल गए, लेकिन गुरु गुड़ ही रह गए। उनकी ईमानदारी गूँगे का गुड़ थी, जो होते हुए भी, आँखों से नज़र नहीं आती थी। आज केवल उनके स्मरण मात्र से ही आँखें नम हो जाती हैं।।

गाइड और ट्यूशन जैसे शब्द शिक्षा में प्रचलित नहीं थे। शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श शिशु विहार, आदर्श कन्या विद्यालय

और आदर्श महाविद्यालय, शिक्षा के आदर्श केंद्र थे। हम आदर्श नगर में ही रहते थे और एक आदर्श को-ऑपरेटिव सोसाइटी में ग़बन भी हमारे ही सामने हुआ था।

आदर्श का इतना बोलबाला था कि आदर्श पुस्तक भंडार, आदर्श किराना स्टोर तो ठीक, रहने के लिए आदर्श लॉज और खाने के लिए आदर्श भोजनालय तक उपलब्ध था।।

बीच में आदर्श से थोड़ी राहत मिली ज़रूर, जब अंग्रेज़ी ने सर उठाया। फिर दौर चला आइडियल कॉफ़ी हाउस और आइडियल पैथोलॉजी का।

शिक्षा का आरंभ भी आइडियल प्रिपप्रेटरी स्कूल से होने लगा। लेकिन आइडियल शब्द आदर्श का विकल्प नहीं बन पाया।

नैतिकता, ईमानदारी और आदर्श को आप अलग अलग नहीं कर सकते। पुस्तकों के ज्ञान ने हमेशा सच बोलने को बाध्य कर दिया। झूठ बोलने से पाप लगता है, यह डर, कई बार झूठ बोलने के बाद जाता रहा। पाप के डर से नहीं, पकड़े जाने के डर से कभी चोरी करने की हिम्मत नहीं हुई और हम शरीफ बनकर रह गए।

नैतिकता साहस का काम है। जिनमें दुस्साहस होता है, वे आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी को ताक में रख देते हैं ! जब सम्पन्न, सुखी और इज़्ज़तदार बन जाते हैं, तब टोपी और कोट की तरह आदर्श और नैतिकता ओढ़कर समाज में प्रकट हो जाते हैं। समाज उन्हें चिंतक, विचारक और समाज सुधारक जैसे विशेषणों से अलंकृत एवं पुरस्कृत करता है। उनके सम्मान में फलाने आदर्श पुरुष के नाम से अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन होता है।

सफलता के रास्ते में आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी बड़े बड़े स्पीड ब्रेकर हैं। जो इनमें उलझकर पिछड़ गया, वह समय से पिछड़ गया। आगे बढ़ने वाले कब ऐसे अवरोधक से घबराते हैं। वे समय के साथ चलते हैं, और अपनी मंज़िल पर पहुँच ही जाते हैं। समय के साथ चलना ही समझदारी है।।

क्या आपने इतना उन्नत समाज पहले कभी देखा है ? चुनाव घोषित होते ही आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है। इतने आदर्श चुनाव 70 साल में पहले कभी नहीं हुए। हिंसा, बूथ पर कब्ज़ा और बोगस वोटिंग से पूरी तरह छुटकारा। अब आप अपने आदर्श उम्मीदवार को बिना भय और लालच के मत दे सकते हैं। इससे अधिक आदर्श वातावरण की तो शायद आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

अब हम विकासशील देश नहीं रहे। पूरी तरह विकसित हो गए हैं। क्यों न बरसों से ताक में रखा ईमानदारी का तावीज़ पुनः गले में पहन लिया जाए। यह हमारी बेईमानी और भ्रष्टाचार से रखवाली तो करेगा ही, हमें एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद भी करेगा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३४ – कर्मण्येवाधिकारस्ते! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३४ कर्मण्येवाधिकारस्ते! ? श्री संजय भारद्वाज ☆

एक युवा व्यापारी मिले।  बहुत परेशान थे। कहने लगे, “मन लगाकर परिश्रम से अपना काम करता हूँ  पर परिणाम नहीं मिलता। सोचता हूँ काम बंद कर दूँ।” यद्यपि उन्हें  काम आरम्भ किए बहुत समय नहीं हुआ है। किसी संस्था के अध्यक्ष मिले। वे भी व्यथित थे। बोले,” संस्था के लिए जान दे दो पर आलोचनाओं के सिवा कुछ नहीं मिलता। अब मुक्त हो जाना चाहता हूँ इस माथापच्ची से।” चिंतन हो पाता, उससे एक भूतपूर्व पार्षद टकराए। उनकी अपनी पीड़ा थी। ” जब तक पार्षद था, भीड़ जुटती थी। लोगों के इतने काम किए। वे ही लोग अब बुलाने पर भी नहीं आते।”

कभी-कभी स्थितियाँ प्रारब्ध के साथ मिलकर ऐसा व्यूह रच देती हैं कि कर्मफल स्थगित अवस्था में आ जाता है। स्थगन का अर्थ तात्कालिक परिणाम न मिलने से है। ध्यान देने योग्य बात है कि स्थगन किसी फलनिष्पत्ति को कुछ समय के लिए रोक तो सकता है पर समाप्त नहीं कर पाता।

स्थगन का यह सिद्धांत कुछ समय के लिए निराश करता है तो दूसरा पहलू यह है कि यही सिद्वांत अमिट जिजीविषा का पुंज भी बनता है।

क्या जीवित व्यक्ति के लिए यह संभव है कि वह साँस लेना बंद कर दे?  कर्म से भी मनुष्य का वही सम्बंध है जो साँस है। कर्मयोग की मीमांसा करते हुए भगवान कहते हैं,

‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।’

कोई क्षण ऐसा नहीं जिसे मनुष्य बिना कर्म किए बिता सके। सभी जीव कर्माधीन हैं। इसलिए गर्भ में आने से देह तजने तक जीव को कर्म करना पड़ता है।

इसी भाव को गोस्वामी जी देशज अभिव्यक्ति देते हैं,

‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा।’

जब साँस-साँस कर्म है तो उससे परहेज कैसा? भागकर भी क्या होगा? ..और भागना संभव है क्या? यात्रा में धूप-छाँव की तरह सफलता-असफलता आती-जाती हैं। आकलन तो किया जाना चाहिए पर पलायन नहीं। चाहे लक्ष्य बदल लो पर यात्रा अविराम रखो। कर्म निरंतर और चिरंतन है।

सनातन संस्कृति छह प्रकार के कर्म प्रतिपादित करती है- नित्य, नैमित्य, काम्य, निष्काम्य, संचित एवं निषिद्ध। प्रयुक्त शब्दों में ही अर्थ अंतर्निहित है। बोधगम्यता के लिए इन छह को क्रमश: दैनिक, नियमशील, किसी कामना की पूर्ति हेतु, बिना किसी कामना के, प्रारब्ध द्वारा संचित, तथा नहीं करनेवाले कर्म के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

इसमें से संचित कर्म पर मनन कीजिए। बीज प्रतिकूल स्थितियों में धरती में दबा रहता है। स्थितियाँ अनुकूल होते ही अंकुरित होता है। कर्मफल भी बीज की भाँति संचितावस्था में रहता है पर नष्ट नहीं होता।

मनुष्य से वांछित है कि वह पथिक भाव को गहराई से समझे, निष्काम भाव से चले, निरंतर कर्मरत रहे। अपनी कविता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ उद्धृत करना चाहूँगा-

भीड़ का जुड़ना,

भीड़ का छिटकना,

इनकी आलोचनाएँ,

उनकी कुंठाएँ,

विचलित नहीं करतीं

तुम्हें पथिक..?

पथगमन मेरा कर्म,

पथक्रमण मेरा धर्म,

प्रशंसा, निंदा से

अलिप्त रहता हूँ,

अखंडित यात्रा पर

मंत्रमुग्ध रहता हूँ,

पथिक को दिखते हैं

केवल रास्ते,

इसलिए प्रतिपल

कर्मण्येवाधिकारस्ते!

 

विचार कीजिएगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७५ – देश-परदेश – जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना ? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७५ ☆ देश-परदेश – जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना ? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

बचपन से ये ही सब सुनते आ रहें हैं।सयाने कहा करते थे,उस गली का रास्ता क्यों पूछना, जहां जाना ही नहीं हैं ? अपने काम से मतलब रखो, अपने उद्देश्य की तरफ ध्यान लगाओ आदि।

विगत कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार से संपूर्ण विश्व से पल पल की खबर कुछ क्षणों में हम सबकी स्क्रीन पर रहती हैं।

आज चुनाव परिणाम आने हैं, सभी लोग टीवी पर  बड़ी खबर / ब्रेकिंग न्यूज सुन सुन कर अपने आप को अपडेट कर रहें हैं।

सड़कों पर भीड़ बिल्कुल भी नहीं है, सरकारी दफ्तर/ बैंक आदि खुले है,परंतु ग्राहक नगण्य हैं।दोपहर में जब सब्जी के ठेले पर पहुंचे, तो विक्रेता गिड़गिड़ाने लगा, बोला सुबह से बोहनी नहीं हुई हैं। सस्ते भाव में सब्जी खरीद लेवें, गर्मी से सब्जी खराब हो जाएगी। हमने भी उसकी आपदा से अवसर निकाल कर आवश्यकता से अधिक सब्जी खरीद ली है।

 सुबह एक मित्र को फोन किया तो बोला कल बात करना आज चुनाव परिणामों में व्यस्त हैं। एक अन्य मित्र को फोन किया, वो तुनक कर बोला तुम्हे कोई काम नहीं है, क्या ? आज चुनाव का मज़ा लो।हमने उसको बताया एक अन्य मित्र की तबियत बहुत नाज़ुक बनी हुई है, उसकी कुशल क्षेम पूछने अभी चलते हो क्या  ? उसने आज के लिए मना कर दिया।

आज के चुनाव परिणाम पूर्व और दक्षिण के दो दो राज्यों के आने हैं। हम यहां उत्तर भारत में रहते हैं। उन चारों राज्यों में हमारा कोई संबंधी भी नहीं रहता है। हम जीवन में कभी वहां गए भी नहीं हैं, फिर वहां के परिणामों से हमें क्या लेना देना ? मोहल्ले के एक परिचित कुछ समय से बीमार हैं, वहां कभी झांका तक नहीं है। बाकी पूरी दुनिया की ख़बर हमें रहनी चाहिए।

मुकेश जी का पुराना गीत “जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा, उस गली से हमें गुजरना नहीं” के बोल अब बेमानी हो चुके हैं। आजकल तो हम लोग किसी भी गली में जाकर नया बलमा बना लेते है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८५ ⇒ संगत पंगत की ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संगत पंगत की ।)

?अभी अभी # ९८६ ⇒ आलेख –  संगत पंगत की  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

संगत पंगत की कर लीजे ! संतों का सत्संग तो हमने बहुत कर लिया, संतों का रंग भी हम पर चढ़ भी गया, और इतना चढ़ा कि हमें धर्म और राजनीति दोनों की समझ आ गई।

आज के संत पलायन वादी नहीं, वे पहाड़ों में कंदराओं में जाकर नहीं बैठ जाते, वे दीमक को मौका ही नहीं देते, कि वे मधुमक्खी की तरह देह से चिपककर, उनके तपस्वी, ओजस्वी, आभायुक्त और विरक्त शरीर का अलंकार बनें।

वे भी निष्काम कर्म का पालन करते हुए, इस मायावी जगत में रहकर मानव मात्र के कल्याण के लिए कृत संकल्पित रहते हैं।

ग्राम्य सभ्यता ने ही हमें समय पर उठना बैठना, चलना फिरना सिखाया। हम प्रकृति के इशारों पर सूर्योदय के पहले ही सुख की नींद त्याग, दिशा मैदान के लिए निकल जाते थे। चलते चलते ही नीम और बबूल की पतली टहनी तोड़ी और कोलगेट टूथ ब्रश तैयार।

रफ और टफ वातावरण में नित्य कर्म, हमारी दैनिक दिनचर्या का ही एक अंग था। बुजुर्गों के साथ, प्रसाधन का संसाधन, मात्र धोती लोटा होता था, कुएं, बावड़ी और नदियों की कोई कमी नहीं थी।।

बस समझिए, वहीं से पंगत की संगत शुरु हो गई थी।

संयुक्त परिवार के सभी बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते थे। नानी, दादी और ताऊजी हमें उंगली पकड़कर शादियों में जीमने ले जाते थे। अपना लोटा ग्लास ही हमारा निमंत्रण पत्र होता था।

नर्सरी केजी, की ट्रेनिंग के पश्चात् हम शहर आ गए, गली, मोहल्लों और बाड़ों में बस गए। सिगरी न्यौते के बुलावे के लिए, नाई घर पर आता था। बाहर साइकिल पर से ही मौखिक निमंत्रण दे, चला जाता था। समय, स्थान और प्रयोजन। हमें तो सिर्फ जीमने से मतलब था।।

घरों में तब रसोई गैस का आगमन नहीं हुआ था। चूल्हे के साथ सिगड़ी का भी उपयोग शुरू हो चुका था। सिगरी न्यौते का अर्थ, घर में उस रोज सिगड़ी नहीं जलेगी। घर के सभी सदस्य, जिनमें अतिथि देव, साले बहनोई सभी शामिल होते थे, सादर आमंत्रित थे।

आज जिसे हम भंडारा कहते हैं, वही पहले पंगत कहलाती थी। जब तक एक पंगत नहीं उठ जाती थी, दूसरी नहीं लगती थी।

बाकायदा पानी और बुहारी से धर्मशाला के फर्श को स्वच्छ किया जाता था। फिर बारी आती थी, पत्तल दोने की। पत्तल उल्टी सीधी होती थी, उसे परखकर सीधा किया जाता था। दोने फूटे ना हों, इसका विशेष खयाल रखा जाता था। पहले रायता फैलता था, आजकल जान बूझकर फैलाया जाता है।।

पंगत का अपना एक मेनू होता था। आलू का साग, पूड़ी, नुक्ती सेंव और लड्डू। मौसम के हिसाब से खीर अथवा रायता। आप जितना खाते, उतनी ही अधिक आपकी मनुहार होती। जो ठूंस ठूंस कर खाते थे, उनकी तो बात ही कुछ और थी, लेकिन जो नहीं खाते थे, उन्हें भी ठूंस ठूंस कर खिलाया जाता था। लेकिन तब के लोग कुछ अलग ही मिट्टी के बने थे, वे पंगत में ना करना जानते ही नहीं थे।।

पंगत का एक अनुशासन होता था। नमः पार्वती पतये हर हर महादेव के जयघोष के साथ, पहले अन्नदेव को प्रणाम किया जाता था, उसके बाद ही पंगत शुरू होती थी। सामूहिक संगत का आनंद आता था पंगत में। पंगत के बीच में से नहीं उठा जाता था। जब सबका भोजन हो जाता था, उसके बाद ही पंगत से उठकर हाथ धोया जाता था।

लगता है, अब पंगत और संगत के दिन लद गए। बफैलो की तरह खड़े खड़े खाना ही हमारी नियति बन गया है। सात्विक भोजन का स्थान मोमोज, मंच्यूरीअन, पिज्जा और पास्ता ने ले लिया है। हम कहते हैं गिद्ध भोज, और उसमें शामिल भी होते हैं।

कितने बदल गए आजकल मजबूरी में महात्मा गांधी।।

वैसे जब आयोजन बड़े बड़े रिजॉर्ट और पंच सितारा होटलों में होंगे, तो काहे की पंगत। लेकिन हां, वहां संगत के लिए कॉकटेल पार्टियां हैं न। वैसे भी लाखों की ज्वैलरी, हजारों के सूट, टाई और चमचमाते जूते पहन, कौन किसी पंगत का रुख करता है। यह मन्नू भंडारी का महाभोज है, किसी पंगत की संगत नहीं ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८५ ⇒ खाली स्थान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खाली स्थान।)

?अभी अभी # ९८५ ⇒ आलेख – खाली स्थान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो भरा हुआ है, वह तो हमें दिखाई दे जाता है, लेकिन क्या जो खाली है, वह भी हम देख सकते हैं। हमें बैठना है, और सभी कुर्सियां जब भरी होती हैं, तब हमें एक खाली कुर्सी की तलाश होती है। जब हॉल में कोई नहीं होता, सभी कुर्सियां खाली ही होती हैं।

जब हम पढ़ते थे, तब खाली स्थानों को हमें भरना होता था। एक वाक्य के बीच में कुछ शब्दों की जगह खाली स्थान होता था, जिसे हमें अर्थपूर्ण शब्दों से भरना होता था।।

अर्थ और व्यर्थ की तरह खाली और भरा हुआ दोनों का अपना अपना महत्व है। पहले जो खाली होता है, उसको भरने की कोशिश की जाती है, और बाद में उसे ही खाली करने का प्रयास किया जाता है।

अगर हमें प्यास लगी है, तो एक खाली ग्लास हमारे किसी काम का नहीं। एक भरा हुआ पानी का ग्लास ही हमारी प्यास बुझा सकता है। हम पानी पी जाते हैं, ग्लास फिर खाली हो जाता है।

ग्लास कभी भरकर नहीं रखा जाता। खाली रहना ही उसकी नियति है। अगर वह भरेगा तो खाली होने के लिए ही। हमारे लिए एक खाली ग्लास का कोई महत्व नहीं। जब कि ग्लास को पीकर खाली हमने ही किया है। हम बड़े चतुर हैं, हम खाली स्थान का उपयोग अपने लिए ही करते हैं। बस, उसे भरते रहते हैं, खाली करते रहते हैं।।

हम जब भीड़ में होते हैं, तो एकांत ढूंढते हैं, और जब अकेले होते हैं, तो किसी का साथ तलाशते हैं। पेट खाली है, भूख लग रही है, पेट में फिर भी चूहे दौड़ रहे हैं। पेट को पहले भरा जा रहा है। भूख शांत हुई, हम संतुष्ट हुए। लेकिन कब तक ! बहुत हुआ, सुबह हो गई, अब पेट खाली करना है। सोचते रहिए अन्न का अर्थ और व्यर्थ का अर्थ।

खाली दिमाग शैतान का घर ! क्या किया जाए, कुछ सकारात्मक सोचा जाए, चिंतन मनन किया जाए। एक दिल सौ अफसाने। किस किसकी सुनें, किस किसकी मानें।

सोच सोचकर, चिंतन कर करकर, व्यर्थ की चिंता और बढ़ा ली। बहुत सोचते हो आप। अगर इसी तरह सोचते रहे तो अवसादग्रस्त हो जाओगे। ध्यान करो, चित्त को शांत करो, विचार शून्य रहने की कोशिश करो।।

इस धरती पर दो तिहाई पानी है, फिर भी इंसान की प्यास नहीं बुझती। कहीं वह जरूरत से अधिक भरा हुआ है तो कहीं अंदर से पूरा खाली है। जहां पैसा है, वहां चैन नहीं और जहां पैसा नहीं, वहां भी बैचेनी है। हर जगह एक खाली स्थान अभाव का है, जिसे हर प्राणी भरने की कोशिश करता है।

हम शून्य को भरने की कोशिश करते हैं। खाई में भी शून्य होता है। अमीरी गरीबी की खाई तो हम भर नहीं सकते, अपने अंक के आगे तो कई शून्य लगा सकते हैं। अपना अभाव दूर होते ही हमारा भाव भी बदल जाता है। एक संपन्न, भरा पूरा, सुखी परिवार।।

राजनीति में बहुत खाली स्थान है और हर खाली स्थान एक शैतान का घर है। हमारा मन भी एक चतुर, चंचल राजनीतिज्ञ ही है, उसके चुनाव पर किसी आयोग का कोई अंकुश नहीं। उसे विवेक के अधीन कर दीजिए, वह शांत हो जाएगा।

हमारे आसपास का शून्य तो हमें दिखाई नहीं देता, और हम अंदर से भरे भरे रहते हैं। शून्य खालीपन नहीं, अवसाद नहीं, असफलता नहीं, शून्य में सभी संभावनाएं हैं।

ग्लास अगर आधा खाली है तो आधा भरा भी है। सबके ग्लास भरे रहें, बूंद बूंद ही सही प्रेम और करुणा रस रिसता रहे।

कोई स्थान खाली ना हो, अमृत रस बरसता रहे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३३ – स्टैच्यू..! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३३ स्टैच्यू..! ?

संध्याकाल है। शब्दों का महात्म्य देखिए कि प्रत्येक व्यक्ति उनका अर्थ अपने संदर्भ से ग्रहण कर सकता है। संध्याकाल, दिन का अवसान हो सकता है तो जीवन की सांझ भी। इसके सिवा भी कई संदर्भ हो सकते हैं। इस महात्म्य की फिर कभी चर्चा करेंगे। संप्रति घटना और उससे घटित चिंतन पर मनन करते हैं।

सो अस्त हुए सूर्य की साक्षी में कुछ सौदा लेने बाज़ार निकला हूँ। बाज़ार सामान्यत: पैदल जाता हूँ। पदभ्रमण, निरीक्षण और तदनुसार अध्ययन का अवसर देता है। यूँ भी मुझे विशेषकर मनुष्य के अध्ययन में ख़ास रुचि है। संभवत: इसी कारण एक कविता ने मुझसे लिखवाया, ‘उसने पढ़ी आदमी पर लिखी किताबें/ मैं आदमी को पढ़ता रहा।’

आदमी को पढ़ने की यात्रा पुराने मकानों के बीच की एक गली से गुज़री। बच्चों का एक झुंड अपने कल्लोल में व्यस्त है। कोई क्या कह रहा है, समझ पाना कठिन है। तभी एक स्पष्ट स्वर सुनाई देता है, ‘गौरव स्टेच्यू!’ देखता हूँ एक लड़का बिना हिले-डुले बुत बनकर खड़ा हो गया है। . ‘ ऐ, जल्दी रिलीज़ कर। हमको खेलना है’, एक आवाज़ आती है। स्टैच्यू देनेवाली बच्ची खिलखिलाती है, रिलीज़ कर देती है और कल्लोल जस का तस।

भीतर कल्लोल करते विचारों को मानो दिशा मिल जाती है। जीवन में कब-कब ऐसा हुआ कि  परिस्थितियों ने कहा ‘स्टैच्यू’ और अपनी सारी संभावनाओं को रोककर  बुत बनकर खड़ा होना पड़ा! गिरना अपराध नहीं है पर गिरकर उठने का प्रयास न करना अपराध है। वैसे ही नियति के हाथों स्टैच्यू होना यात्रा का पड़ाव हो सकता है पर गंतव्य नहीं। ऐसे स्टैच्यू सबके जीवन में आते हैं। विलक्षण होते हैं जो स्टैच्यू से निकलकर जीवन की मैराथन को नये आयाम और नयी ऊँचाइयाँ देते हैं।

नये आयाम देनेवाला ऐसा एक नाम है अरुणिमा सिन्हा का। अरुणिमा, बॉलीबॉल और फुटबॉल की उदीयमान युवा खिलाड़ी रही। दोनों खेलों में अपने राज्य उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी थी। सन 2011 में रेलयात्रा करते हुए बैग और सोने की चेन लुटेरों के हवाले न करने की एवज़ में उन्हें चलती रेल से नीचे फेंक दिया गया। इस बर्बर घटना में अरुणिमा को अपना एक पैर खोना पड़ा। केवल 23 वर्ष की आयु में नियति ने स्टैच्यू दे दिया।

युवा खिलाड़ी अब न फुटबॉल खेल सकती थी, न बॉलीबॉल। नियति अपना काम कर चुकी थी पर अनेक अवरोधक लगाकर सूर्य के आलोक को रोका जा सकता है क्या? कृत्रिम टांग लगवाकर अरुणिमा ने पर्वतारोहण का अभ्यास आरम्भ किया।  नियति दाँतो तले उँगली दबाये देखती रह गयी जब 21 मई 2013 को अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट फतह कर लिया। अरुणिमा सिन्हा स्टैच्यू को झिंझोड़कर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचने वाली पहली दिव्यांग पर्वतारोही बनीं।

चकबस्त का एक शेर है,

कमाले बुज़दिली है, पस्त होना अपनी आँखों में

अगर थोड़ी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं।

स्टैच्यू को अपनी जिजीविषा से, अपने साहस से स्वयं रिलीज़ करके, अपनी ऊर्जा के सकारात्मक प्रवाह से अरुणिमा होनेवालों  की अनगिनत अद्भुत कथाएँ हैं। अपनी आँख में विजय संजोने वाले कुछ असाधारण व्यक्तित्वों की प्रतिनिधि कथाओं की चर्चा उवाच के अगले अंकों में करने का यत्न रहेगा। प्रक्रिया तो चलती रहेगी पर कुँवर नारायण की पंक्तियाँ सदा स्मरण रहें, ‘हारा वही जो लड़ा नहीं।’..इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – आजाद देश की पहचान। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।

☆ आलेख ☆ जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

अलग परवरिश और बढ़ता अहंकार, क्यों टूट रहे हैं आज के रिश्ते

आज के समय में महानगरों में रहने वाले युवाओं और नवविवाहित जोड़ों के बीच रिश्तों में बढ़ती खटास एक गंभीर सामाजिक चिंता बनती जा रही है। आए दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, मनमुटाव, फिर दूरी और अंततः तलाक जैसे मामलों में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि समस्या कहीं गहरी है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

सबसे बड़ा कारण है कि आज के युवा यह समझने में असफल हो रहे हैं कि पति-पत्नी दोनों अलग-अलग परिवारों और संस्कृतियों में पले-बढ़े होते हैं। उनकी सोच, आदतें, जीवनशैली और अपेक्षाएं अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब दोनों में से कोई भी एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने की बजाय यह साबित करने में लग जाता है कि “मैं सही हूं” और “तुम गलत हो”।

पहले के समय में संयुक्त परिवारों का चलन अधिक था। माता-पिता और बुजुर्ग घर में मौजूद रहते थे और वे रिश्तों को संभालने, समझाने और संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वे अनुभव के आधार पर छोटी-छोटी बातों को बढ़ने नहीं देते थे और समय रहते समाधान निकाल लेते थे। लेकिन आज के समय में अधिकांश युवा अपने माता-पिता से दूर, महानगरों में अकेले रह रहे हैं। ऐसे में जब कोई विवाद होता है, तो उसे सुलझाने वाला कोई नहीं होता, और छोटी बात भी बड़ा रूप ले लेती है।

एक और बड़ी समस्या है अहम (ego) और हावी होने की प्रवृत्ति। आज के कई रिश्तों में यह देखने को मिलता है कि दोनों ही अपने-अपने तरीके से चीजों को चलाना चाहते हैं। कोई झुकना नहीं चाहता, कोई समझौता नहीं करना चाहता। हर दिन किसी न किसी बात पर बहस होना, एक-दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश करना, धीरे-धीरे रिश्ते में कड़वाहट घोल देता है। नतीजा यह होता है कि घर में बातचीत कम होती जाती है, सन्नाटा बढ़ता है और अंततः रिश्ते टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं।

रिश्ते कोई प्रतिस्पर्धा (competition) नहीं होते, जहां जीत-हार तय करनी हो। यह एक साझेदारी (partnership) है, जहां दोनों को मिलकर चलना होता है। अगर हर दिन लड़ाई ही “जीवन का हिस्सा” बन जाए, तो वह रिश्ता टिक नहीं सकता।

आज जरूरत इस बात की है कि युवा यह समझें कि रिश्ते समझ और सहयोग से चलते हैं, न कि अहंकार और जिद से। एक-दूसरे की बात सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और उनके नजरिए को स्वीकार करना बेहद जरूरी है। हर बात पर प्रतिक्रिया देने की बजाय कई बार चुप रहना और स्थिति को शांत होने देना भी एक समझदारी है।

इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि हम यह स्वीकार करें कि पुरुष और महिला दोनों अलग-अलग सोच रखते हैं। उनकी भावनाएं व्यक्त करने का तरीका अलग होता है। यही बात प्रसिद्ध पुस्तक “Men Are from Mars, Women Are from Venus” भी बताती है कि दोनों के बीच अंतर स्वाभाविक है। इसलिए यह अपेक्षा करना कि सामने वाला व्यक्ति बिल्कुल हमारे जैसा सोचने लगे, न तो सही है और न ही संभव।

समाधान बहुत कठिन नहीं है।

सबसे पहले, एक-दूसरे को बदलने की कोशिश बंद करनी होगी।

दूसरा, खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना होगा।

तीसरा, छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखना होगा। और

सबसे महत्वपूर्ण, रिश्ते को “जीतने” की जगह “बचाने” की सोच अपनानी होगी।

अंततः, यह समझना जरूरी है कि विवाह सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे को समझने, स्वीकार करने और सहयोग देने का वादा है। अगर आज के युवा इस सच्चाई को समय रहते समझ लें तो रिश्तों में बढ़ती दूरियों को रोका जा सकता है और एक खुशहाल जीवन की ओर बढ़ा जा सकता है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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