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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – # 63 ☆ मानस प्रश्नोत्तरी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ संजय उवाच –  🙏🏻 मानस प्रश्नोत्तरी🙏🏻 ☆ प्रश्न- श्रेष्ठ मनुष्य बनने के लिए क्या करना चाहिए? उत्तर- पहले मनुष्य...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 62 ☆ वक्त, दोस्त व रिश्ते☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय  आलेख वक्त, दोस्त व रिश्ते। इस गंभीर विमर्श  को समझने के लिए विनम्र निवेदन है यह आलेख अवश्य पढ़ें। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )      ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 62 ☆ ☆ वक्त, दोस्त व रिश्ते☆   'वक्त, दोस्त व रिश्ते हमें मुफ़्त में मिलते हैं। पर इनकी कीमत का पता, हमें इनके खो जाने के पश्चात् होता है और वक्त, ख्वाहिशें और सपने हाथ में बंधी घड़ी की तरह होते हैं, जिसे उतार कर...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 15 ☆ मजदूरों पर बढ़ता बेरोजगारी का संकट ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ ( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख  मजदूरों पर बढ़ता बेरोजगारी का संकट”. ) ☆ किसलय की कलम से # 15 ☆ ☆ मजदूरों पर बढ़ता बेरोजगारी का संकट ☆ दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति संपन्न नहीं हो सकता। समय एवं परिस्थितियाँ नौकर-मालिक या राजा-रंक की दशा बदल देती हैं। भले हम कहें कि श्रम व समर्पण सुपरिणाम देते हैं लेकिन कभी-कभी विपरीत परिस्थितियाँ सब उलट-पुलट...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विशेष – पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) – वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।  आज दिनांक 18 सितम्बर 2020 से पुरुषोत्तम मास (अधिक मास ) प्रारम्भ हो रहा है।  इस सम्बन्ध में प्रस्तुत है इस सन्दर्भ में श्री आशीष कुमार जी द्वारा लिखित विशेष आलेख  “पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) - वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व ”। )  ☆ विशेष आलेख ☆ पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) - वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व ☆ इस वर्ष पुरुषोत्तम मास आ रहा है, हरिद्वार समय के अनुसार 18 सितम्बर 2020 को प्रातः 01: 29 से अधिकःमास प्रारंभ हो जायेगा जो कि 16 अक्टूबर कि रात्रि 11: 15 तक रहेग।  पुरुषोत्तम मास के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक  महत्व को समझने का प्रयास करते है। कहते हैं कि दैत्याराज हिरण्यकश्यप ने अमर होने के लिए तप किया ब्रह्माजी प्रकट होकर वरदान मांगने...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 43 – राजभाषा विशेष – महात्मा गांधी और राष्ट्र भाषा ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.  आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति ...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राजभाषा विशेष – हिन्दी का वर्तमान ☆ श्री विजय नेमा ‘अनुज’ 

श्री विजय नेमा 'अनुज'  (आदरणीय  श्री विजय नेमा 'अनुज' जी का ई- अभिव्यक्ति में स्वागत है। श्री विजय नेमा जी संस्कारधानी जबलपुर की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था 'वर्तिका' के संयोजक हैं। आज प्रस्तुत है हिंदी दिवस के अवसर पर आपका आलेख हिन्दी का वर्तमान। ☆ राजभाषा विशेष - हिन्दी का वर्तमान ☆ हिन्दी हमारे देश  के व्यापक समाज की मातृभाषा है, देश की राजभाषा है और हमारी संस्कृति के गौरव की भाषा है।   हिंदी  अब पूरी दुनिया में प्रचलित होकर विश्वभाषा बनने की ओर उन्मुख है। अनेक देश के लोग हिन्दी लिखते और बोलते हैं। हमारे देश मैं सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी ही है, यही नहीं हमारे देश की जनसंख्या के साथ से भी हिन्दी सर्वोपरि एवं शीर्ष पर है, और सदा आगे भी रहेगी। आजतक हिंदी के नाम पर जो सियासत होती रही हैं, वो अब नहीं होनी चाहिए और उसके विकास पर बहुत  तेजी से कार्य होने चाहिए। हिंदी इस देश की माटी से अंकुरित हुई भाषा है, इसमें हमारे देश...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ राजभाषा दिवस विशेष – राष्ट्रभाषा : मनन-मंथन-मंतव्य  ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ संजय दृष्टि  ☆ राजभाषा दिवस विशेष - राष्ट्रभाषा : मनन-मंथन-मंतव्य ☆ (विकिबुक्स ने हिंदी भाषा सम्बंधी लेखों के संकलन में इस लेख को प्रथम क्रमांक पर रखा है। लेख का शीर्षक ही संकलन को भी दिया है।) भाषा का प्रश्न समग्र है। भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है। भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राजभाषा दिवस विशेष – हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों की विकास यात्रा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज राजभाषा दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक विचारणीय आलेख हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों की विकास यात्रा।  राजभाषा दिवस पर  प्रस्तुत इस अलेख के लिए श्री विवेक रंजन जी का हार्दिक आभार। ) ☆ राजभाषा दिवस विशेष - हिन्दी भाषा और संबद्ध बोलियों की विकास यात्रा ☆   एक छोटा बच्चा भी जो कोई भाषा नही जानता चेहरे के हाव भाव व स्पर्श की मृदुलता से हमारी भावनायें समझ लेता है. विलोम में अपनी मुस्कान. रुदन या उं आां से ही अपनी...
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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ राजभाषा दिवस विशेष – हिंदी दिवस ☆ – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर  (श्री सदानंद आंबेकर जी की हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में विशेष अभिरुचि है। गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर प्रवास। आज प्रस्तुत है श्री सदानंद जी  का राजभाषा दिवस के अवसर पर एक विशेष रचना " हिंदी दिवस "। इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्री सदानंद जी की लेखनी को नमन । )  ☆ राजभाषा दिवस विशेष - हिंदी दिवस ☆ दृश्य  एक - "साथियों, हिंदी को हमारी व्यवस्था ने राजभाषा  बना दिया राष्ट्रभाषा  नहीं, इसलिये आज भी देश भर में उसे दूसरा दर्जा मिला हुआ है। आज भी हम अंग्रेजी बोलकर अपने आप को शिक्षित एवं विकसित दिखाते  हैं इसलिये हमें अपनी इस मानसिक गुलामी को तोड़ कर हिंदी को अपने दिल से स्वीकारना होगा।" इस भाषण  को सुनकर श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट बरसा दी। आज के हिंदी दिवस पर राजेश  को विद्यालय में भाषण में पहला पुरस्कार दिया गया। ख़ुशी  से झूमता हुआ राजेश  अपने घर पहुंचा और माँ पिताजी को अपनी उपलब्धि बताई...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राजभाषा दिवस विशेष – यांत्रिक युग में भौतिक कलेवर में फंसी हिंदी ☆ डॉ.राशि सिन्हा

डॉ.राशि सिन्हा (राजभाषा दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है डॉ राशि सिन्हा जी का एक विचारणीय आलेख यांत्रिक युग में भौतिक कलेवर में फंसी हिंदी।)   ☆ राजभाषा दिवस विशेष - यांत्रिक युग में भौतिक कलेवर में फंसी हिंदी ☆ डॉ.राशि सिन्हा ☆  अभिव्यक्ति के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं व सृजनात्मक संभावनाओं का सरलीकरण कर किसी राष्ट्र की विद्यमान जीवन-स्थिति को व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान कर देश की सामाजिक, सांस्कृतिक व समस्त विविधताओं को आत्मिक स्वरुप प्रदान कर देश को एकसूत्र में बाँधने में किसी देश की भाषा का योगदान सबसे बड़ा होता है।  संदर्भगत हॉवेल की उक्ति सार्थक प्रतीत होती है, किसी भी देश और समाज के चरित्र को समझने की कसौटी केवल एक है और वह यह है कि उस देश और समाज का भाषा से सरोकार क्या है"। इन्हीं कारणों से अभ्यंतर अभिव्यक्ति को सर्वाधिक सशक्त  अभिव्यक्ति मानते हुए 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को संविधान  के अधिकारिक राजभाषा के रुप में स्वीकृत किया गया, ताकि वसुधैव कुटुंबकम की भावना पर आधारित...
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