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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 41 ☆ सन्दर्भ वर्तिका – साहित्यिक विकास में संस्थाओ की भूमिका ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक आलेख  “सन्दर्भ वर्तिका - साहित्यिक विकास में संस्थाओ की भूमिका”।  श्री विवेक जी ने वर्तिका के सन्दर्भ में साहित्यिक विकास में संस्थाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला है। अग्रज साहित्यकार स्व साज जबलपुरी जी से मेरे आत्मीय सम्बन्ध रहे हैं और उनके साथ जबलपुर की संस्था साहित्य परिषद् में कार्य करने का अवसर भी प्राप्त हुआ।  स्व साज भाई द्वारा रोपित वर्तिका आज वटवृक्ष का रूप धारण कर लेगी इसकी उन्हें भी कल्पना नहीं होगी।  इसका सम्पूर्ण योगदान...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 22 – महात्मा गांधी: आज़ादी और  भारत का विभाजन ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.  आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #44 ☆ रंगमंच और मुखौटे (कोरोनावायरस और हम – 5) ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 44 – रंगमंच और मुखौटे  ☆ 'कोरोनावायरस और हम'  शृंखला का भाग-5 'ऑल...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 40 ☆ परदेश में कोरोना पर दौहित्र को एक नाना की खुली चिट्ठी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक भावनात्मक पत्र    “परदेश में कोरोना पर दौहित्र को एक नाना की खुली चिट्ठी”।  मानवता के अदृश्य शत्रु  से युद्ध में  हम सभी  परिवार के सदस्य / मित्र गण तकनीकी रूप  (ऑडियो / वीडियो )  से पहले से ही नजदीक  थे किन्तु भौतिक रूप से ये दूरियां बढ़ गई हैं । हम अपने घर /देश में कैद हो गए हैं।  आशा है कोई न कोई वैज्ञानिक हल शीघ्र  ही निकलेगा और हम फिर से पहले  जैसा जीवन जी...
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हिन्दी साहित्य ☆ आलेख ☆ मानवता का सफरनामा – डरा सो मरा ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’  (डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध। आज प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर ' जी का लम्बा किन्तु , विचारणीय एवं पठनीय आलेख  ” मानवता का सफरनामा - डरा सो मरा“।  वास्तव में  यह संस्मरणात्मक आलेख मानवता के अदृश्य शत्रु के कारण सारे विश्व में व्याप्त भय के वातावरण में अनुशासन ही नहीं अपितु, इस भय से भी लाभ कमाने वालों को नसीहत देता दस्तावेज है।  मानवता के इस सफरनामे  के माध्यम से डॉ गंगाप्रसाद जी ने अपने संवेदनशील हृदय की मनोभावनाओं को रेखांकित किया है। डॉ गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर ' जी  के इस सार्थक एवं समसामयिक आलेख के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  )   ☆ संस्मरणात्मक आलेख - - मानवता का सफरनामा - डरा सो मरा ☆ दिनांक -26-03- 2020 दिन-गुरुवार, समय 2:42 सुबह-सुबह मेरे ड्राइवर ने आकर दस्तक दी। आते ही जुमला उछाला,...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 36 – प्राण गीता ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण आलेख  “प्राण गीता”। ) Amazon Link – Purn Vinashak ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 36 ☆ ☆ प्राण गीता ☆ भगवान हनुमान ने उत्तर दिया, "मेरे प्यारे मित्र, हमारा मस्तिष्क चार मुख्य भावनाओं से बंधा हैं, और ये काम या वासना, क्रोध, लोभ और मोह या मैं और मेरे का अनुलग्नक हैं । हर मानव मन इन चार भावनाओं में ही घूमता रहता है । कुछ में अन्य भावनाओं की तुलना में एक अधिक और अन्य कम अनुपात में होती है, अन्य मनुष्यों के पास दूसरी अधिक और अन्य कम और इसी तरह । उदाहरण के...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समष्टि और व्यष्टि (कोरोनावायरस और हम- भाग-4) ☆ श्री संजय भारद्वाज

  श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – समष्टि और व्यष्टि ☆ (कोरोनावायरस और हम- भाग-4) "अलग कमरा है, बड़ा बेड है, तैयार भोजन मिल रहा है, टीवी है, अख़बार है, फोन है, सारी सुख सुविधाएँ हैं..,और क्या चाहिए? आराम से पड़े रहो, अपने दिन काटो..!", वृद्धजन अपनी युवा संतानों या अन्य परिजनों से प्राय: ऐसी बातें सुनते हैं। कोरोना संक्रमण के कारण देशव्यापी लॉकडाउन में अब युवा घर...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ चिंतन करे पर चिंता मुक्त रहकर परिणाम सुनहरे होंगे ☆ श्री कुमार जितेन्द्र

श्री कुमार जितेन्द्र   (युवा साहित्यकार श्री कुमार जितेंद्र जी  कवि, लेखक, विश्लेषक एवं वरिष्ठ अध्यापक (गणित) हैं। आज प्रस्तुत है उनका एक विचारार्थ आलेख उनकी एक समसामयिक आलेख चिंतन करे पर चिंता मुक्त रहकर परिणाम सुनहरे होंगे। ) ☆ चिंतन करे पर चिंता मुक्त रहकर परिणाम सुनहरे होंगे☆  चिंता और चिंतन - ओह चिंता शब्द पढ़ते ही चिंता में डाल दिया है। क्या लिखे, क्या नहीं लिखे, क्या करे... क्या नहीं करे.. और जो लिखे या कुछ ऎसा करे वो किसी अनुकूल हो सकता है। अगर नहीं हुआ तो परिणाम क्या होगा। ऎसे हजारों अनगिनत प्रश्नों की मन में बौसार लग जाती है। यही चिंता है जिसका परिणाम भयंकर होता है। दूसरी तरफ किसी बात या कार्य को करने से पहले उस पर चिन्तन किया जाए तो परिणाम कुछ और होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि दोनो शब्दों में बहुत बड़ा फ़र्क है। वैसे फर्क होना भी स्वाभाविक है। तो आईए मित्रों आज हम कुमार जितेन्द्र "जीत" के साथ चिंता और चिन्तन...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 21 – महात्मा गांधी : आज़ादी का ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.  आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कोरोना वायरस और हम- 3 (घर बैठे क्या करें ) ?☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – कोरोना वायरस और हम- 3☆ घर बैठे क्या करें? भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर देश ने 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू का जिस तरह समर्थन किया वह अभूतपूर्व था। इस समय भारत के कुछ राज्यों में लॉकडाउन है। इसके सिवा देश के विभिन्न राज्यों के 76 जिलों में भी लॉकडाउन घोषित हो चुका है। पंजाब...
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