हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९२ ☆ “सम्मान–पथ…” – लेखक… श्री अमरेंद्र नारायण ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अमरेंद्र नारायण  जी द्वारा लिखित  “सम्मान–पथ…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९२ ☆

☆ “सम्मान–पथ…” – लेखक… श्री अमरेंद्र नारायण ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पुस्तक चर्चा

“सम्मान–पथ”( प्रेरक उपन्यास)

लेखक.. अमरेंद्र नारायण

प्रकाशन.. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन

चर्चा  विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

यह उपन्यास सुप्रसिद्ध चिंतक और वरिष्ठ लेखक अमरेन्द्र नारायण जी का समाज और व्यक्ति के बीच के रिश्ते को सम्मान, प्रेम और मूल्य चेतना के आधार पर पुनर्गठित करने का आग्रह है। इसमें लेखक समकालीन युवा की भटकी हुई आकांक्षाओं, भोगवाद और नैतिक संकट को केवल नियमों से नहीं, बल्कि “मन के शिक्षण” और सामाजिक सह अनुभूति से बदलने की बात करते हैं।

श्री अमरेन्द्र नारायण

लेखक ने यह शाश्वत सत्य प्रतिपादित किया है कि मन और विचार ही मानव जीवन का केन्द्र हैं। मन ही जीवन में सुख दुख, सफलताअसफलता और नैतिकता अनैतिकता की दिशा तय करता है। यदि मन को ज्ञान, विवेक और सकारात्मक अनुभवों से संयमित नहीं किया जाए, तो वही ऊर्जा स्वार्थ, हिंसा और विकृति में बदल जाती है। इसलिए मन का शिक्षण, चरित्र–निर्माण की पहली सीढ़ी माना गया है। उदाहरण के तौर पर लेखक बताता है कि आज के कई युवा ऊँचे पद और अधिक धन तो चाहते हैं, परन्तु अपने कर्तव्य, श्रम और समाज के प्रति जिम्मेदारी को गौण मान लेते हैं, जिससे उनके जीवन में खालीपन और असंतोष बढ़ता जाता है।

आधुनिक युवा पीढ़ी ऐसी सामाजिक स्थितियों से घिर गई है कि वह भोगवादी संकट से गुजर रही है।

पुस्तक में आज के युवा को तकनीक समृद्ध, परन्तु लक्ष्य विहीन और मानसिक रूप से अस्थिर बताया गया है, क्योंकि उसने “अदृश्य सुख” को ही जीवन लक्ष्य मान लिया है। वह उस मरीचिका के पीछे भाग रहा है। लेखक कथानक इस प्रकार बुनता है कि पाठक के सम्मुख स्पष्ट चित्र बनते चलते हैं। करियर, प्रतियोगिता और उपभोग के दबाव में युवा अपने भीतर की नैतिक शक्ति को भूल कर केवल तात्कालिक लाभ की दौड़ में शामिल होता दिख रहा है। वे संकेत करते हैं कि कुछ युवा तेज़ी से पैसा कमाने के लिए अनैतिक साधन अपनाते हैं, जबकि वही ऊर्जा, यदि समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण या सृजनात्मक कामों में लगाई जाए, तो वे स्वयं भी संतुष्ट होंगे और समाज का भी कल्याण होगा। अमरेंद्र जी युवाओं में व्यवहारिक प्रेम, लज्जा और सामाजिक अनुशासन के उदाहरण देते हुए अपना मंतव्य कुशलता से पाठकों के सम्मुख रखते हैं।

किताब में कई सांस्कृतिक धार्मिक प्रसंगों और लोक परम्पराओं के उदाहरण से बताया गया है कि समाज पहले प्रेम, लज्जा और आपसी सम्मान से ही स्व नियंत्रित रहता था। एक स्थान पर नवरात्र या अन्य पर्वों के संदर्भ में वर्णन आता है कि किस तरह पूरा गाँव स्वच्छता, सादगी और सामूहिक पूजा अनुष्ठान के माध्यम से एक दूसरे के प्रति संवेदनशील और अनुशासित होता था। वहाँ नियमों से अधिक “संकोच” और “आपसी नज़र” लोगों को गलती से रोकती थी। एक अन्य प्रसंग में भजन कीर्तन और लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियों की परस्पर भागीदारी, सामूहिक श्रम और साझा उत्सव का चित्रण है, जो दिखाता है कि संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मूल्य संरक्षण का माध्यम भी है।

सम्मान पथ जीवन के समाधान का रास्ता सुझाता प्रेरक उपन्यास बन पड़ा है।

लेखक के अनुसार वर्तमान वैश्विक संकट की जड़ यह है कि युवा पीढ़ी ने “आत्मिक कार्य भाव” खो दिया और केवल निजी लाभ को छोड़ किसी बड़े उद्देश्य से नहीं जुड़ पा रही।

सच है आजादी के आंदोलन में अपनी जान दांव पर लगा देने वाली तत्कालीन युवा पीढ़ी ही तो थी।

इस उद्देश्य हीनता से सारी पीढी स्वयं हताश है और समाज में अपराध, हिंसा और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। इसलिए “सम्मान पथ” का मंतव्य है, अपने प्रति सम्मान, दूसरों के प्रति करुणा और समाज के प्रति कर्तव्य बोध को फिर से जन जीवन केन्द्र बनाना। लेखक ऐसे नागरिक की कल्पना करता है जो अपनी निजी सफलता के साथ साथ गाँव की सफाई, नशामुक्ति अभियान, स्त्री सम्मान या शिक्षा प्रसार जैसे कार्यों में भी सक्रिय रहे। उसके लिए यही वास्तविक “आत्म सम्मान” और “राष्ट्र सम्मान” है।

साहित्य का दायित्व और पाठक की भूमिका संप्रेषित करने में उपन्यास पूर्णतः सफल हुआ है।

पुस्तक इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि सिर्फ प्रश्न उठाने से समाज नहीं बदलता। साहित्य का दायित्व है कि वह दिशा भी दिखाए और पाठक के भीतर परिवर्तन की इच्छा जगाए। इसीलिए लेखक ने लेख, संस्मरण, धार्मिक प्रसंग और लोक गीतों का मिश्रण रचती शैली में स्वयं को अभिव्यक्त किया है। लेखक चाहता है कि पाठक केवल बौद्धिक बहस न करे, बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़कर अपने जीवन में सम्मान, प्रेम और नैतिकता को सर्वोच्च जगह दे। इस अर्थ में “सम्मान पथ” प्रेरक और मूल्य केन्द्रित कृति है, जो आज के भटके हुए सामाजिक वातावरण में मनुष्य को फिर से मनुष्य बने रहने की राह दिखाने की कोशिश करती है।

किताब हर साहित्य प्रेमी को पढ़नी और गुननी चाहिए।

स्कूल, कॉलेज, ग्राम पंचायतों, सार्वजनिक पुस्तकालयों, हेतु किताब संग्रहणीय बन पड़ी है, जो प्रत्येक पाठक के मर्म को स्पर्श कर उसमें स्व परिवर्तन के भाव जगा सकेगी। भारतीय समकालीन संदर्भों में उपन्यासकार एक सामाजिक चेतना जगाने की महत्वपूर्ण भूमिका में कलम चलाते नजर आते हैं। बधाई।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३० – पुस्तक समीक्षा : मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप – लेखिका: सुश्री विमला रस्तोगी  ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है सुश्री विमला रस्तोगी जी द्वारा लिखित मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३०

पुस्तक समीक्षा :  मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप – लेखिका: सुश्री विमला रस्तोगी  ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

पुस्तक का नाम: मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप

लेखिका: विमला रस्तोगी 

पृष्ठ: 132

मूल्य: ₹400

संस्करण: 2025

प्रकाशक: अनुराग प्रकाशन, 23 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

– मुस्कराते बचपन की मार्गदर्शिका: मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप –

बचपन की मुस्कानें तभी खिलती हैं जब उन्हें समझने वाले माँ-बाप हों—विमला रस्तोगी की यह पुस्तक “मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप” इसी भावभूमि पर रची गई एक विचारशील कृति है, जो बाल मनोविज्ञान, अभिभावकत्व और सामाजिक बदलावों के बीच एक सेतु और मार्गदर्शिका का कार्य करती है।

लेखिका ने अपने अनुभव, संवेदना और सामाजिक दृष्टि से समृद्ध लेखों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का बचपन केवल खिलौनों और किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तकनीक, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबावों के बीच जूझता हुआ बचपन है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें एक मार्गदर्शक, सहचर और संवेदनशील श्रोता की भूमिका भी निभानी होती है।

पुस्तक में लेखिका ने जिन विषयों को उठाया है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है —जैसे ‘बच्चे अपनाते हैं बड़ों की आदतें’, ‘हादसों के असर से बच्चों को उबारें’, ‘बच्चों को प्रकृति से जोड़ें’, ‘काल्पनिक खेल और बच्चे’, ‘आत्मकेन्द्रित बच्चे’—वे न केवल सामयिक हैं, बल्कि हर उस अभिभावक के लिए मार्गदर्शक हैं जो अपने बच्चे के सर्वांगीण विकास की चिंता करता है।

लेखिका की भाषा सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय है। कहीं भी उपदेशात्मकता नहीं है, बल्कि अनुभवजन्य उदाहरणों और संवेदनशील दृष्टिकोण के माध्यम से पाठक को सोचने के लिए प्रेरित किया गया है। विशेष रूप से ‘सेविन-सेविन-सेविन’ जैसे आधुनिक शहरी जीवन के उदाहरणों के माध्यम से लेखिका ने यह दिखाया है कि बच्चों को समय देना केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि एक सजीव संवाद की आवश्यकता है।

इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि उनके माता-पिता, शिक्षकों और बाल साहित्यकारों के लिए भी एक दर्पण है—जो उन्हें यह दिखाता है कि वे अपने व्यवहार, समय और दृष्टिकोण से बच्चों के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं।

विमला रस्तोगी जी का यह प्रयास निश्चय ही बाल साहित्य और अभिभावक विमर्श के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह पुस्तक हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए जो बच्चों के साथ जीवन को समझना और जीना चाहता है।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

30/1/12025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ओ मेरी तुम – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ कृति चर्चा – डॉ. सुरेन्द्र साहू ‘निर्विकार’☆

डॉ. सुरेन्द्र साहू ‘निर्विकार’ 

☆ ओ मेरी तुम – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ कृति चर्चा – डॉ. सुरेन्द्र साहू ‘निर्विकार’ ☆

कृति विवरण –

ओ मेरी तुम, गीत-नवगीत संग्रह,

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

प्रथम संस्करण विक्रम संवत २०७८ (ईस्वी २०२१)

पेपरबैक बहुरंगी आवरण

पृष्ठ ११२

मूल्य ३००/-

समन्वय प्रकाशन, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष : ९४२५१८३२४४ 

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

☆ ओ मेरी तुम – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ कृति चर्चा – डॉ. सुरेन्द्र साहू ‘निर्विकार’ ☆

साहित्य विशेषकर काव्य में अंतर्निहित श्रेष्ठ भाव, विचार एवं कल्पना रूपी आत्मा की संप्रेषणीयता पाठक को ज्ञात-आज्ञात रस और लय से भिगोकर बाँधती है। वे शाब्दिक अभिव्यक्तियाँ रस, छंद व अलंकार के आभूषण धारण कर लें तो सोने में सुहागा हो जाता है। रचनाकार की भावभूमि की उदात्तता उसके द्वारा किए गए शब्द-चयन और भाषा शैली से काफी हद तक जानी-समझी जा सकती है। यह रचनाकार की मन: स्थिति का भी संकेत करती है। एक ओर जहाँ किशोरावस्था एवं युवावस्था में लिखी गई प्रेम और सौन्दर्य संबंधी कविताओं की भाव-भूमि, प्रेम के सतत अभिलाषी मन की वासंती, फागुनी एवं सावनी अविकल चाह, कल्पना लोक का इंद्रधनुषी सप्तवर्णी वैभव, प्रतीकों, उपमानों एवं बिंबों का चित्रण, एक अलग ही वायवीय, एंद्रियतारहित भव्य-दिव्य-नव्य लोक की रचना करती अभिव्यक्त होती है जिनमें बौद्धिकता एवं दैहिक अनुभव से रहित इंद्रियातीत प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को भाव्यभिव्यक्ति में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर प्रौढ़ अवस्था में सृजित होनेवाली रचनाओं में प्रेम का आलंबन व उद्दीपन बौद्धिक एवं अनुभवज्ञ होने के कारण इनमें प्रयुक्त होनेवाले प्रतीक, बिंब एवं उपमान यथार्थ जगत से ग्रहीत होकर तदनुरूप शब्दावली एवं भाषा का आकार लेकर अभिव्यक्त होती-ढलती है। इन दोनों प्रकार की रचनाओं को सामान्यत: एक सजग-सुधि पाठक पढ़कर सहज ही समझ सकता है।

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का गीत-नवगीत संग्रह ‘ओ मेरी तुम’ भी इसका अपवाद नहीं है। उन्होंने अपने पुरोवाक् में स्वयं ही लिखा है- ”ओ मेरी तुम के गीत-नवगीत गत सुधियों में विचरण करते समय मन की अनुभूतियों का शब्दांकन हैं।” उनके मन में विचरण करनेवाली प्रियतम और कोई नहीं उनके जीवन को पूर्णता प्रदान करनेवाली जीवन संगिनी एवं सहचरी ‘धर्मपत्नी’ ही हैं जी कवि के मन को आह्लादित करती, अविस्मरणीय अनुभूतियों के साथ रची-बसी हैं। इसी भावातिरेक से जन्म होता है ‘ओ मेरी तुम’ के गीतों-नवगीतों का। अनुभूत प्रेम और सौंदर्य के भाव बोध को नए तरीके से कहने का आग्रह एवं चाह अमिधा, व्यंजनतथ्य लक्षणा के चमत्कार का आश्रय लेती शब्दावली, वृहद शब्द-भंडार उनके गहन अध्ययन एवं बौद्धिकता को संवेदनाओं में आरोपित करती, अनुभूत प्रेम को पाठकों के मन में पुनर्जाग्रत करती ये गीति रचनाएँ उनके अभिव्ययक्ति कौशल का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। अपने गीतों में छंदबद्धता एवं लयता लाने के लिए उन्हें अन्य भाषाओं के शब्दों को मुक्त हस्त प्रयोग करने में कोई आपत्ति नहीं है।

सलिल जी अपने नवगीतों में दैनंदिन जीवन में उपयोग आनेवाली वस्तुओं का सहज प्रयोग करने में सिद्धहस्त हैं जो उनकी उपलब्धि कही जा सकती है। चूँकि इन रचनाओं का मूल स्वर उनकी धर्मपत्नी के आसपास चहुँ ओर पल्लवित होता है, इसलिए इनमें विषय विविधता के स्थान पर धर्मपत्नी साधना जी के विभिन्न रूपों यथा ग्रहिणी प्रेयसी, प्रियतम, अभिसारिका आदि की आकर्षक छवियों का वर्णन ही विविधता है जो  दैनिक जीवन से ग्रहीत प्रतीकों, उपमानों तथा बिंबों से सजकर तदनुरूप शब्दों व भाषा में आकार लेती अभिव्यक्त हुई है। यह कवि की काव्य-कर्म-कुशलता को दर्शाती है।

अपने व्यक्तिगत जीवनानुभवों से व्युत्पन्न इन प्रणय रचनाओं की नायिका काल्पनिक न होकर उनकी धर्मपत्नी ‘साधना जी’ हैं जो सहचरी बनकर उनके जीवन में आईं या वे लेकर आए। ‘सरहद’ शीर्षक रचना में इसका विस्तार से यथार्थपरक वर्णन है। वे सद्गुणों और संस्कारों का दहेज सहेजकर, अपनेपन की पतवारों से ग्रहस्थी की नैयय खेतीं, मतभेदों व अंतरों की खाई पाटतीं-पर्वत लाँघतीं प्रशस्त होती हैं। एक-दूसरे में खोकर, धैर्य से बाधाओं को पारकर, जीवन को मिलन और समर्पण से मधुर बनाती, सपनों को पूरा करतीं, कवि के जीवन को सार्थक करतीं हैं-

”भव सागर की बाधाओं को

मिल-जुलकर था हमने झेला

धैर्य धरकर, धरा नापने

नभ को छूने बढ़ीं कदम बन

तुम स्वीकार सकीं मुझको जब

अँगना खेले मूर्त खिलौने।”

कवि अपने भाव-सुमन इस स्नेह-सिक्त शब्दावली में अभिव्यक्त कर अपने को धन्य अनुभव करता है। वे कवि के जीवन में ‘अकथ प्यार’ लेकर कवि के मधुर स्वपनों को सकार करती, मूर्त रूप देती हैं-

”तुम लाए अकथ प्यार

महक उठे हरसिंगार….

…. सहवासों की ध्रुपद चाल

गाएँ ठुमरी-मल्हार” 

ऐसे प्रसंगों में सलिल जी सर्वथा नूतन व मौलिक बिंबों के साथ पाठक के मन में भी खनक उत्पन्न कर उसे रसानन्द में निमग्न कर सके हैं।

प्रेयसी का मनोवांछित संसर्ग से आनंदित कवि अपने भाग्य को सराहते हुए बरबस ही कह उठता है-

”भाग्य निज पल-पल सराहूँ

जीत तुमसे मीत हारूँ

अंक में सर धर तुम्हारे

एकटक तुमको निहारूँ।।”

प्रेम पाने का हर्ष अपने साथ उसे खो देने की आशंका भी लाता है। कवि अपने अंतर्मन की आकुलता की अभिव्यक्ति करने में नहीं हिचकता-

”प्रणय का प्रण तोड़ मत देना

चाहता मन आपका होना”

‘सुवासिनी, सुहासिनी, उपासिनी, नित लुभावनी सद्यस्नाता प्रेसऊ का रूप कवि को ”सावन सा भावन’ प्रतीत होता है। रूपसी की अनिंद्य रूप-राशि पर रीझकर कवि कह उठता है ”मिलन की नव भोर का स्वागत करो रे!”। ”मन-प्राणों के सेतु-बंध का महाकुंभ है” में कवि नवाशाओं की वल्लरियों पर सुरभित स्नेह-सुमन खिलाता है।

प्रियतमा कवि-मन पर पूर्णाधिकार कर ले, यह स्वाभाविक ही है। प्रियतमा पर पूरी तरह विश्वास करता कवि कह उठता है-

”तुम पर

खुद से अधिक भरोसा

मुझे रहा है”

इस गीत-वगीत संग्रह के शीर्षक गीत ‘ओ मेरी तुम’ में कवि का भ्रमर-मन अपने बाहुपाश में बँधी प्रियतम को मृगनयनी, पिकबयनी आदि विशेषणों  से संबोधित करते हुए प्रणय राग छेड़ मकरंद का रसपान करता है-

”बुझी पिपासा तनिक

देह भई कुसुमित टहनी ”

इस गीत की आगामी पंक्तियों में पारिवारिक नातों के प्रतीकों का चित्रण विस्मयकारी है। यहाँ कवि गीत के मूल भावों से भटकता-बिखरता प्रतीत होता है। ‘ओ मेरी तुम’ के अधिकांश गीतों में कवि ने जीवन-संगिनी के मनोहारी रूप-सौंदर्य की सटीक उपमानों, प्रतीकों तथा बिंबों से सुसज्जित  छवि प्रस्तुत की है। ‘तुम रूठीं’ शीर्षक से दो गीत संकलन में हैं, दोनों की पृष्ठभूमि और भावभूमि पृथक है। ”तुम रूठीं तो /  मन-मंदिर में  / घंटी नहीं बजी / रहीं वंदना / भजन प्रार्थना / सारी बिना सुनी” कहकर कवि अपने जीवन में प्रेयसी के महत्व को रेखांकित करता है। इसी शीर्षक से दूसरे गीत के चार अंतरों में कवि ने ‘कलश’ चित्र अलंकार का अनूठा प्रयोग किया है। 

कवि प्रेयसी के प्रेम में इस कदर डूब है कि उसे वह हर बार मिलने पर निपट नवेली ही प्रतीत होती है।  प्रेयसी जीवन-बगिया में मोगरा की तरह प्रवेश कर उसे महका देती है। प्रियतम की आह्लादकारी स्मृतियाँ ‘याद पुरानी’ तथा ‘खिला मोगरा’ शीर्षक गीतों में कवि-mन को महकातीं, श्वास-श्वास में शहनाई जैसी गूँजती लगती हैं। कवि का मरुस्थली मन प्रेयसी को देखते ही हरा-भरा हो जाता है (तुमको देखा)। ”हो अभिन्न तुम” मानते हुए भी कवि ‘तुम बिन’ शीर्षक गीत में नायिका बिन जीवन को सूना पाता है- ”तुम बिन जीवन/  सूना लगता / बिन तुम्हारे / सूर्य उगता / पर नहीं होता सवेरा । चहचहाते / पखेरू पर/ डालता कोई न डेरा” कहकर कवि बीते पलों की सुधियों में खोकर विरह-व्यथा जानी सूनेपन की अभिव्यक्ति करता है।

जीवन संगिनी की मोहक मुस्कान पर कवि आसक्त है। जहाँ ‘तुम मुस्काईं १’ गीत में कवि प्रेयसी के मुस्कुराने पर ऊषा के गाल गुलाबी होते हुए अनुभव करता है, वहीं ‘तुम मुस्काईं २’ शीर्षक गीत में ‘सजन बावरा / फिसल हुआ बवाल’ कहकर प्रेमाकुल मन की अधीरता प्रगट करता है। ‘हरसिंगार मुस्काए’ शीर्षक नवगीत में कवि ने हरसिंगार के विविध समानार्थी शब्दों (विविध क्षेत्रों में प्रचलितनामों) का सहारा लेकर, नारी-देह के विविध अंगों की कांति के उपमान गढ़े हैं। ऐसा अभिनव प्रयोग अन्यत्र देखने में नहीं आया।

इसी तरह ”फागुन की / फगुनौटी के रंग / अधिक चटख हैं / तुम्हें देखकर” में प्रकृति भी नायिका को देख, उससे स्पर्धा कर और अधिकहरित, हर्षित, मुखरित व उल्लसित होने लगती है। ‘आ गईं तुम’ शीर्षक गीत में नायिका अपने साथ ही ऊषा की शत किरणें लेकर आती है तो परिंदे आगत के स्वागत में स्वयमेव ही चहकने लगते हैं। 

”तुम सोईं तो / मुंदे नयन कोटर में / सपने लगे विहँसने” में नायिका अपने अंदर भाव, छंद, रस और बिंब समेटे, महुआ जैसी पुष्पित होती- गमकती अपने सपने सजाकर ‘मकान’ को ‘घर’ बनाती है। यह सुंदर भावपूर्ण अच्छी रचना है जो मनोहर है, कवि शब्दों के विभिन्न प्रकार के संयोजन-नियोजन से भाषा में शब्दों में चमत्कार पैदा करने में निष्णात है। ‘नील परी’ में प्रयुक्त शब्दों में नैन-बैन, बाँह-चाह, रात-बात आदि का बहुवर्ती प्रयोग बहु अर्थीय प्रयोग चमत्कारी और मनोहारी है। कवि ”जब से / तू  सपनों में आई / बनकर नील परी / तब से सपने / रहे न अपने / कैसी विपत परी” कहकर भाव प्रकट करता है परंतु वास्तव में नील परी का सपने में जाकर आना तो उसके लिए सुखद घड़ी है या होना चाहिए। इन गीतों-नवगीतों में प्रयुक्त किए गए प्रतीक उपमान और बिंब परंपरागत न होकर यथार्थ जगत से लिए गए हैं। इनमें  पारिवारिक रिश्तों से लेकर रसोई की सामग्रियों, तीज-त्योहार, प्रकृति और राजनीतिक शब्दावली जैसे सांसद, जुमला, आदि का सटीक-सारगर्भित प्रयोग कथ्य के अनुरूप भाव संप्रेषित करता है।

कवि सौंदर्य के प्रतीकों, उपमानों तथा बिंबों को प्रेयसी और प्रकृति के अन्योन्याश्रित स्वरूप में रचता है, कहीं प्रकृति उपमा बन जाती है तो कहीं उपमान। यही हाल नायिका का भी है। प्रकृति कवि के मन में रची-बसी है। इन गीतों में में ‘ऊषा’ विभिन्न कुसूमों, वल्लरियों, फलों, पक्षियों, वृक्षों आदि के नामों का प्रचुर प्रयोग किया गया है। कवि को ‘हरसिंगार’, मोगरा, महुआ तथा ‘टेसू’ के फूल तथा गौरैया पक्षी विशेष प्रिय हैं। जिनका सटीक-सार्थक प्रयोग कवि ने इन गीतों में प्रचुरता से किया है। प्राकृतिक सौंदर्य और नायिका के रूप को विभिन्न स्तरों पर  अलंकृत करती यह रचनाएँ पाठकों को सुखद अनुभूति देने में सफल हैं। वर्तमान समय में समाज के हर क्षेत्र में बिना गहन अध्ययन-चिंतन एवं मनन-मंथन के विचारों और भावों को अनर्गल रूप में बोलने कहने या लिखने का चलन बढ़ रहा है। साहित्य का क्षेत्र भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। आज चारों ओर साहित्यकारों-कवियों के समूह गिरोह बन गए हैं जो आपस में ही एक दूसरे को श्रेष्ठ घोषित कर प्रतिष्ठित हो रहे हैं, साथ ही नए के नाम पर असंगत, असंबद्ध, प्रतीकों एवं उपमानों के मनमाने प्रयोग कर, स्वयं के कार्यों को आरोपित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है जो चिंतनीय हैं क्योंकि लिखे हुए शब्दों का असर दूरगामी होता है। सलिल जी इस कुप्रवृत्ति से बचे हुए हैं। 

इस संग्रह की अधिकांश रचनाएँ दैनिक-सांसारिक अनुभूति के आस-पास केंद्रित हैं परंतु कहीं-कहीं इनमें द्वैत से अद्वैत की यात्रा का आध्यात्मिक फुट भी सांकेतिक रूप में विद्यमान है। इनमें मिलन की सुखद झलकियां हैं तो विरह की तीस भी ध्वनित हुई है। स्नेह-सिधयोन से आप्लावित कवि-मन नायिका के प्रति अपने प्रेम को निरंतर प्रकट करता, सौंदर्य के मादक समुद्र में गोते लगाता दिखता है। प्रस्तुत संग्रह के गीत-नवगीत दोहा, सोरठा आदि छंदों में लिखी गई हैं। कवि इन सभी विधाओं में निष्णात है। कवि का भाषा की शुद्धता के प्रति कोई आग्रह नहीं है। गीतों में रचनाओं में तुक, मात्रा-भार, गति-यति, लय,  खनक और चमत्कार के प्रयोजन को साकार करने के लिए अन्य भाषाओं अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी तथा क्षेत्रीय आंचलिक बोलियों बुंदेलखंडी, भोजपुरी आदि का प्रयोग कवि बेहिचक करता है। इसे हिंदी का समावेशी उदारवादी स्वरूप माना जाए या भाषाई अपमिश्रण? इसका निश्चय तो विद्वत साहित्यकार ही कर सकते हैं।

संग्रह की कुछ रचनाएँ अधि प्रभावश्यकी है जबकि कुछ अन्य कम सशक्त एवं प्रभावशाली प्रतीत हों, यह स्वाभाविक भी है और पाठक की अपनी पसंद पर भी निर्भर है। ऐहिकजीवन की अनुभूतियों से उपजी के रचनाएँ सुधियों में गुदगुदाती,  यादों में गुनगुनाती, प्रेम के द्वार की कुंडी खटकाती, चाँदनी में नहलाती, मन्मथ के मादक स्पर्श से सहलाती, कंगन खनखनाती, नूपुर छमछमाती, गौरैया सी चहचहाती,  महुआ सी मदमाती, सपनों में थपथपाती, हरसिंगार सी मुस्काती प्रेयसी को शब्दों के भुज-हार पहनाती, कोमल भाव जगाती, तोता-मैना का किस्सा सुनाती, शब्दों और भावों में भटकती उलझाती-सुलझाती यह रचनाएँ अपनी नई अभिव्यक्ति शैली तथा चमत्कारिक कौंध के कारण पाठकों को सहज ही आकर्षित करती, पठनीय-स्मरणीय बनाती हैं। ‘बाँह में है और कोई, चाह में है और कोई’ तथा  ‘लिव-इन’ के वर्तमान दौर में जीवन संगिनी की मधुर सुधियों में वर्षों बाद विचरते, बौद्धिक भूमि पर अवस्थित संवेदनाओं से ओत-प्रोत, संपृक्त शब्दों का स्वरूप लेती, अनायास और सायास रूप से नि:सृत-सृजित ये गीत-नवगीत पाठकों को उनकी अपने प्रेमानुभूतियों को पुनरजागृत कर,  रास रचाते रहने को प्रेरित करते हैं।  निश्चय ही यह प्रेमपरक रचनाएँ  पाठकों को सहज स्वीकार्य होंगी।

समीक्षा – आचार्य प्रताप

संपर्क- आर १९ शिवनगर, दमोह नाका, संकारधानी गैस अजेंसी के सामने, जबलपुर, चलभाष: ७३८९०८८५५५, ९४२५३८४३८४

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “खड़तल कहणा ओक्खा सै (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री मंगतराम शास्त्री ‘खडतल’ ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है श्री मंगतराम शास्त्री ‘खडतल’ जी द्वारा लिखित पुस्तक “खड़तल कहणा ओक्खा सै (काव्य संग्रह)पर चर्चा।

“खड़तल कहणा ओक्खा सै (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री मंगतराम शास्त्री ‘खडतल’ ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆

पुस्तक चर्चा

किताब – खड़तल कहणा ओक्खा सै 

कवि- मंगतराम शास्त्री खडतल

समीक्षक- मनजीत सिंह 

प्रकाशन -मनुराज प्रकाशन,जींद

कीमत-320 रुपए भारतीय 

☆ समता के हित की सरोकार कविताएं  – श्री मनजीत सिंह 

मंगतराम शास्त्री जी की किताब” खड़तल कहणा ओक्खा सै”, मिली । खड़तल शब्द अपने आप में एक परगतिशीलता का प्रतिनिधित्व करता है। जिसका मतलब खरी खोटी कहना। सबसे पहले महावीर सिंह दुखी का जिसके परामर्शक से किताब छपी। किसी वस्तु या विषय को देखने की पद्धति में ही कवि की जीवन-दृष्टि और काव्य-दृष्टि छुपी रहती है। प्रगतिशील काव्यधारा इस दिशा में ग्रामीण परिदृश्य और जिला जींद एवं तहसील के नितान्त करीब की बोली दिखती है। अपनी बोली में लिखना और प्रगतिशील धाराप्रवाह के कवि ऐसे प्रतीकों से चित्र गढ़ते हैं कि प्रसंग प्राणवाण हो उठता है। गाँव-देहात का अकृत्रिम जीवन, जीर्ण स्वास्थ्य, ठेठ दृश्यावली हर कोई देखता है, पर कुछ पंक्तियां –

आपणा खोट छुपाणा सीख,औरां कै सिर लाणा सीख ।

सारे यार करैंगे प्यार, चिकणी चुपड़ी लाणा सीख ‌।

कवि‍ को ये लोग अभाव, भूख, कुपोषण, शोषण के भुक्तभोगी दिखते हैं। बिम्ब में व्यंग्य का दंश तीक्ष्णतर करने में उन्हें सिद्धि प्राप्‍त है। किसी वस्तु या विषय को देखने की पद्धति में ही कवि की जीवन-दृष्टि और काव्य-दृष्टि छुपी रहती है। जो शास्त्री जी की कविताओं में झलकता है ‌।

हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्‍च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो… जो हमें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।” यही नहीं, प्रेमचन्द को पूर्व में ही आभास हो गया था कि ‘आने वाला जमाना अब किसान और मजदूरों का है।

किसान मजदूर को समर्पित पंक्तियां-

जिंदगी भर छान म्हं ढकते रहे सिर, उन कमेर्यां नै तेरे बंगले चिणे सैं।

बोझ नीच्चे बीत गी जिनकी जवान्नी,वें बडेरे नींव के पत्थर बणे सैं ‌‌।

नागरिक जीवन के दुख-दुविधा, सुख-सुविधा की समझ, जमाखोरी का विरोध, स्थापित समाज व्यवस्था की रूढ़ियों और जड़ मनस्थितियों का खण्डन, राष्ट्र एवं विश्‍व के प्रति सजग दृष्टि; नीति मूल्य, जीवन-मूल्य, मानव-मूल्य, सम्बन्ध मूल्य की मौलिकता की समझ; जीवन की सहजता बाधित करने वाली जर्जर मान्यताओं, पद्धतियों का तिरस्कार, प्रगति और परिवर्तन के प्रति चेतना, समाज को मानवीय और नैतिक बने रहने, अधिकार-रक्षण हेतु संघर्षोन्मुख रहने की प्रेरणा, स्पष्ट सम्प्रेषण के प्रति सावधानी… प्रगतिशील काव्यधारा के ये कुछ मूल स्वभाव इनकी रचनाओं में आसानी से दिखते हैं। यहाँ नए के प्रति बेवजह आग्रह नहीं है, पुराने के प्रति बेवजह घृणा नहीं है। पूरी तरह संयमित विवेक के साथ प्रगतिवाद का प्रवेश और आह्वान हुआ जैसे –

लाट्ठी देक्खी गोली देक्खी, बिफता औली सौली देक्खी ‌।

यह कविता सरसरी तौर पर सपाट लग सकती है, पर कवि की बड़ी जिम्मेदारी होती है। राष्ट्रीय संकट की घड़ी में ओछी लिप्सा त्यागकर प्रगतिशील कवियों ने अपना दायित्व जिस निष्ठा और समझ-बूझ के साथ निबाहा, वह इस कवि ने हरियाणवी कविता, ग़ज़ल, नज़्म,सांग नाटक आदि में देखने को मिलता है।, हरियाणवी साहित्य और हरियाणा की राज्य स्तरीय अस्मिता के लिए अप्रतिम उदाहरण है। शायद यही कारण है कि आज की समकालीन कविता में भी इनकी चेतना और समझ बूझ की पद्धति जीवित है। शास्त्री जी की एक ओर पर्यावरण संरक्षण पर कविता

खाद-पाणी के बिना ज्यू रूख नी फलदा। न्यू ए बात्ती-तेल बिन दीवा नहीं बल्दा ।।

आग नफरत की जलावै सै घरां नै तो सिर्फ तात्ते पाणियां तै घर नहीं जलदा।

क्यूं कबुत्तर की तरां तू आंख भीच्चै सै आंख मीच्चण तै कदे खतरा नहीं टलदा।

आदमी म्हं जहर इतना हो लिया इब तो आसतीन्नां म्हं भी डरदा सांप नी पलदा।

सांझ – तड़का सै जमीं की चाल का नीयम बादलों के छाण भर तै दिन नहीं ढल्दा।

खड़तल कहणा ओक्खा सै को किताब का रूप देने वाली प्रकाशन मनुराज का शुक्रिया और जिन्होंने इस किताब में किंचित मात्र भी सींच करी किसी भी रूप में उन सबका भी धन्यवाद करता हूं।

जै बडेरी नै संभालणियें घरां होन्दे तो खटोल्ली म्हं पड़ी का गात नी गलदा।

बख्त पै माणस रलै सै आसरा बण कै आंट म्हं ‘खड़तल’ कै कोये और नी रल्दा।

यह आज के युवा के लिए एक बेहतर किताब है सभी ने एक बार इस किताब को पढ़ना चाहिए। बदलते दौर की कठिनाइयां को कविताओं में ढालने का काम किया है ‌।

चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९० ☆ ~ न्यूयार्क से ~ “समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है सुश्री संध्या जी द्वारा लिखित पुस्तक  “समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवालपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९० ☆

☆ ~ न्यूयार्क से ~ “समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

समय के आईने में

रचनाकार ..संध्या अग्रवाल

चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इस आलेख संग्रह में लेखिका ने जीवन के रोजमर्रा के क्षणों को न केवल दर्ज किया है बल्कि उन्हें एक ऐसे चश्मे से परखा है जो हमें बेहतर तरीके से बताता है कि हम कौन थे, कौन हैं और किन भूलभुलैयों में फँसते जा रहे हैं। पुस्तक का अंदाज़ सीधे-साधे संवाद से दूर है, वह दर्पण की तरह मिलता-जुलता, कभी क्रूर और कभी नम्र, पर हमेशा सच के निकट रहने की जिद पर टिका रहता है। लेखिका ने अपनी दीर्घदृष्टि में छोटे-छोटे अनुभवों को ऐसा पिरोया है कि पाठक को बार-बार वही पुराना सवाल सालता है, क्या हमने समय को समझा, या समय ने हमें समझाने की अपनी कला में हमारी असफलता की लंबीं सूची बना दी।

रचनाकार का शिल्प सूक्ष्म अवलोकन और सटीक भाषा का मेल है। वर्णन में रफ्तार ऐसी है कि वह हमें बीच-बीच में पढ़ना रोककर सोचने पर मजबूर कर देती है। किसी पात्र की एक अदायगी, किसी घटना का एक मामूली संवाद, हर छोटी चीज़ एक बड़े प्रश्न की तरफ संकेत करती है। अभिव्यक्ति के ताने-बाने में जो अर्थ छिपे हैं, उन्हें समझने के लिए पाठक को वही ध्यान देना पड़ता है जो लेखक ने पाठ में दिखाया है। यही वजह है कि पढ़ते समय बार-बार ऐसा लगता है कि लेखक केवल कोई घटना सुनाकर नहीं रह गया, वह हमें स्वयं का पुनर्मूल्यांकन करने का निमंत्रण दे गया है।

पुस्तक का एक प्रमुख गुण इसकी समयबद्धता है। समय यहाँ चलता-फिरता पात्र है जो अपने साथ समाज के मानक, परंपराएँ, और रोज़मर्रा की मोह भंग स्थिति लाता है। लेखिका ने पुराने और नए दोनों समय के चेहरों को एक मंच पर खड़ा कर के उनकी बातचीत करवाई है। यह बातचीत कभी तीखी व्यंग्य बनकर उठती है, तो कभी मद्धम, पर हमेशा चिंतन का आव्हान देती जाती है। समय के साथ टकराव में पैदा होने वाले अभाव और आश्चर्य दोनों का ही लेखिका ने समुचित रूप से विवेचन किया है। पाठक के लिए यह केवल कथा का आनंद नहीं रह जाता, बल्कि वह समय के प्रति अपने स्वभाव का निरीक्षण भी करने लगता है।

रचना में पात्रों का जीवंत उल्लेख है। वे किसी नाटक का बाहरी सेट नहीं, बल्कि हमारी कहानियों के भीतर जीते हुए लोग हैं। उनकी छोटी-छोटी आदतें, उनके शब्द, उनकी असफल प्रेमकथाएँ और नौकरी, त्यौहार, सब कुछ मानो हमारे आसपास की सड़कों, चाय की ठेलियों और सरकारी दफ्तरों की कतारों से उठाकर लाया हुआ है। इस वास्तविकता ने पाठक को किताब के पन्नों से फिर फिरवजुड़े रहने पर विवश किया है। लेखिका की संवेदना पात्रों के भीतर झांकते हुए समाज की विसंगतियों को भी उजागर कर देती है। कहीं पर यह व्यंग्य बनकर निकलता है, कहीं पर यह करुणा का रूप धारण कर लेता है, पर अंततः यह मानवता के प्रति सजगता ही साबित होता है।

भाषा कभी-कभी लोकोक्ति की मिठास के संग है, दार्शनिक विचलन कम है पर वैचारिकता लगातार बनी रहती है। लेखिका कहीं भव्य शब्दों में भटकती नही, वह सीधे उस मसले की गांठ खोलकर रख देती है जिसे हम अनदेखा करते आए हैं।

कथ्य संरचना में पहली दृष्टि में अलग दिखने वाले किस्से धीरे-धीरे एक दूसरे से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं और अंततः एक व्यापक सामाजिक चित्र बनाते हैं। यह ब्रह्माण्डीकरण पाठक को थका कर नहीं छोड़ता, इसके विपरीत, यह तार्किक है। हर छोटा उपकथ्य अंततः मुख्य विषय की परिभाषा में योगदान देता है। इस तरह की रचना में लेखिका का नियंत्रण स्पष्ट है। वह जानती है कब अभिव्यक्ति की रफ़्तार बढ़ानी है और कब ठहरकर तत्कालीन भावना का स्वाद चखाना है।

पुस्तक की गंभीरता के बीच भी हास्य भी है। यह हास्य न केवल पाठक को हंसाता है, बल्कि उसे किसी कटु सत्य से अवगत कराता है जिसे स्वीकार करना हम टालते हैं। व्यंग्य कहे तो उसे साहित्य के भीतर एक सक्षम हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जो सामाजिक बेरुखी और मानवीय दोहरावों पर वार करता है, पर कभी अपमानजनक नहीं होता। यह संतुलन ही लेखक की पकड़ की असली कसौटी है।

पठन के बाद मन में एक शेष भाव रहता है, समय के आईने में जो प्रतिबिंब उभरता है, वह स्थिर नहीं होता। वह बदलता रहता है और बदलते रहने की अपनी मजबूरी में हमें भी लगातार बदलने का आह्वान करता है। लेखिका ने यह नहीं कहा कि परिवर्तन आसान है, पर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि बदलाव से इन्कार करना स्वयं को धोखा देना है। पुस्तक का अंतिम भाव पाठक को एक तरह की जागरूकता और जिम्मेदारी देता है, समय की धारा के साथ समझदारी से तैरने का, और अपनी छोटी-छोटी असमानताओं को पहचानने का आग्रह।

कुल मिलाकर यह कृति सोचने-समझने वालों के लिए एक समृद्ध बौद्धिक उपहार है। यह केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, एक संग्रह योग्य संवाद है। समय से, समाज से और अंततः स्वयं से बातें हैं।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

~ न्यूयार्क से ~ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “मेरी परछाई (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री सुनील सैनी सीना ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है श्री सुनील सैनी सीना जी द्वारा लिखित पुस्तक “मेरी परछाई (काव्य संग्रह)पर चर्चा।

“मेरी परछाई (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री सुनील सैनी सीना ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – मेरी परछाई 

कवि – सुनील सैनी सीना 

समीक्षक- मनजीत सिंह 

 सहायक प्राध्यापक उर्दू कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

प्रकाशन- वैदिक प्रकाशन हरिद्वार 

कीमत- 250 रूपए 

☆ समता के हित की सरोकार कविताएं  – श्री मनजीत सिंह 

सुनील सैनी सीना की किताब मेरी परछाई भाग -2 की कविताएं हमारी सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक और सामाजिक चेतना की ऐसी प्रखर धारा हैं कि समय के प्रवाह ने उन पर कोई प्रभाव नहीं डाला है और हमारा अस्तित्व उनके बहुमूल्य लेखन से आलोकित और संरचित होता रहा है। उनकी वैज्ञानिक और साहित्यिक उपलब्धियाँ अब भी अध्ययन का विषय बन रहीं हैं और उनसे संबंधित कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रहतीं है। जिन्होंने बहुआयामी जीवन के हर रंग को स्वीकार किया और सामूहिक जीवन को प्रभावित करने वाले हर पहलू पर न केवल अपने विचार व्यक्त किए, बल्कि उसके संबंध में एक दूरगामी रणनीति भी तैयार की। जो पुस्तकें सामने आई हैं, उनके स्रोत मुख्यतः गौण है। सुनील सैनी सीना की कविता जो देश प्रेम से ओतप्रोत है कि पंक्ति 

इश्क़ हमको अपनी आजादी और वतन से हैं, जलाने का शौक़ अंगारों पर अपने बदन को है।

वो जज़्बा वो हौसला ना कभी परस्त होगा, खिलेगा गुल कोई ऐसा आस जिसकी सारे चमन को है। ।

वार करेंगे सीने पे वार रहेगा “सीना”, दान कर देंगें अपने जीवन को शिक्षा मिली हमको कर्ण से है।

इश्क़ हमको अपनी आजादी और वतन से है, क्रांति रूपी विरासत के अनमोल रत्न से है। ।

इनकी कविताओं में साहित्य, धर्म, इतिहास, नीतिशास्त्र, अध्यापन, संपादन, राजनीति, समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र, धर्मसुधार, दर्शन, पत्रकारिता, कृषि आदि पर उनका महत्वपूर्ण प्रभाव देखा जा सकता है। इन्होंने दुष्ट दहेज के नाम से जो कविता लिखी उम्दा है।

बन गया आज अभिशाप दहेज, दान से बना आज पाप दहेज। इसे मारना है तो कसम खाओ, करेंगे हमेशा हम दहेज से परहेज। ।

दहेज के कारण उत्पन्न होते, मामले इतने सनसनीखेज। मारते-जलाते गृहलक्ष्मी को, दहेज के लोभी बन दुष्ट-चंगेज। । बन गया आज अभिशाप दहेज, दान से बना आज पाप दहेज। ।

इनकी कविताओं में देश प्रेम से ओतप्रोत सांस्कृतिक विरासत को बचाएं रखने वाली कविताएं हैं सलाम-ए-मंच की कविता की कुछ पंक्तियां 

पहचान दी, नाम दिया। जीने का मुकाम दिया। डर नहीं किसी बात का, वो जोश भरा जाम दिया। ।

जिन्दगी जीना है खुलकर बुजदिलों से वास्ता नहीं।

खुले आसमान में

शामियाना तान दिया

इसको सलाम है।

इस मंच ने हमें निखार दिया इसको सलाम है। ।

इस दरी ने

इसको

आवाज अब बुलन्द होगी, भीषण यह जंग होगी।

और बढ़ेगा कारवां शंखनाद से, रफ्तार अब नहीं तक मंद होगी। ।

इनकी कविताओं में सृजनात्मक, सृजनशीलता की भूमिका है। कहीं जीवन का कड़वा सच उजागर हाता है कविता में प्रगतिशीलता और जनवादी के स्तर पर पहुंचाने की पूरी कोशिश की है। कविता के अंदर कविता की की आत्मा को देखा जा सकता है। कवि की कविता जीवन जीने और आगे बढ़ने की बात कहतीं हैं। बहुत से सामयिक विषयों को छुआ है ‌कविता धोखा, मजबूर, इंसान, किसको ख़तरा, कहानी जिंदगी की, एक बदनसीब कहानी, जर्जर दिया, कल सबको पता चल जाएगा, ओ मां, गुरुदेव प्रणाम तुम्हे, रब जाने, मेरी पहचान, मुकाम जीने का, मजबूर इंसान, सोचो आदि कविताएं सहरानीये है। कहीं प्रकृति का अनुसरण सौन्दर्य, कहीं रिश्तों और सम्बन्धों का तालमेल दिखता है, तो कहीं देशप्रिय ओत-प्रोत रचनाएं, कहीं अन्तर्मन की आवाज़ सुनाई देती है, तो कहीं कल की उड़ान, कहीं उनकी रचनाएं समाज को शिक्षित करती हैं, कहीं कारे समाज को आईना दिखा जाती हैं, कहीं पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता। अभिव्यक्त करती हैं, तो कहीं भावों का समन्दर अन्तर्मन की गहराइयों को जाता है। सुन्दर आकर्षक और बेहद खूबसूरत रचनाओं का गुलदस्ता है मैंने परखा जिसको बेहद खूबसूरती से सजाया गया है। जिसके लिए वैदिक प्रकाशन को कोटि कोटि धन्यवाद।

चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “जहर जो हमने पिया” – संपादक – अशोक कुमार गर्ग/मनोज छाबड़ा/राजकुमार जांगड़ा ☆  श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है जहर जो हमने पिया पर  श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ “जहर जो हमने पिया” – संपादक – अशोक कुमार गर्ग/मनोज छाबड़ा/राजकुमार जांगड़ा ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक – जहर जो हमने पिया

लेखक —  महिला सफाईकर्मी

संपादक — अशोक कुमार गर्ग/मनोज छाबड़ा/राजकुमार जांगड़ा

कीमत — ₹250/-(पेपरबैक)

प्रकाशक — यूनिक पब्लिशर्स कुरुक्षेत्र ।

Mbl — 90501-82156

☆ जहर पीकर भी ज़िन्दा हैं – श्री जयपाल ☆

हरियाणा में महिला सफाई-कर्मियो की आप -बीती की एक पुस्तक इन दिनों  में बहुत चर्चित है। जिसका शीर्षक है– ‘जहर जो हमने पिया’ । दरअसल यह  हरियाणा के हिसार मंडल की महिला सफाई कर्मियो की आप-बीती की दास्तान है जिसे उन्होंने स्वयं लिखा है । इस पुस्तक को हिसार मंडल के कमिश्नर श्री अशोक कुमार गर्ग,  प्राचार्य /लेखक श्री मनोज छाबड़ा और अध्यापक/लेखक श्री राजकुमार जांगड़ा जी ने संपादित किया है । प्रकाशित किया है, यूनिक-पब्लिशर्स कुरुक्षेत्र ने । इस पुस्तक में लगभग इकतालीस महिला सफाई कर्मियो की जीवन की पीड़ा दर्ज है ।

इन महिलाओं की आप-बीती सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । दरअसल इन महिलाओं ने हमारे समाज की पोल खोलकर रख दी है। सुविधा-संपन्न विशेषाधिकार प्राप्त ऊंची  कही जाने वाली जातियों के पढ़े लिखे लोग अक्सर कहते सुने जाते हैं कि  समाज में जाति अब कहाँ है…!  लेकिन इन महिलाओं के बयानों से पता चलता है कि ऊपर से हमारा समाज भले ही ठीक-ठाक दिखाई देता हो लेकिन जाति की सडांध अभी भी उसके भीतर समाई हुई है, विशेष कर दलित समाज के प्रति घृणा की भावना। जिन लोगों को जाति का दंश नहीं झेलना पड़ता वे लोग ही यह कहते हैं कि अब जातीय भेदभाव समाप्त हो गया है लेकिन असलियत इसके ठीक विपरीत है …जाति है कि जाती ही नहीं।

अशोक कुमार गर्ग और उसकी टीम ने एक ऐतिहासिक कार्य का आगाज कर दिया है । इसका दूरगामी असर हमारे समाज पर पड़ेगा । जो लोग दलित जातियों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं, उन्हें भी सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि इतनी तरक्की कर लेने के बाद भी हम उनके प्रति  अपने व्यवहार को बदलना क्यों नहीं चाहते !! वर्ण व्यवस्था और मनुस्मृति की बात करते हुए आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि ऐसी कोई व्यवस्था अब भारतीय समाज में लागू नहीं है लेकिन ये महिलाएं अपने साथ बीती घटनाओं से यह साबित कर रही है कि वर्ण व्यवस्था और मनुस्मृति आज भी उनके उनके सिर पर बैठी हुई है ।

‘जिल्लत की रोटी’  में ‘सूरजमुखी’ कहती है–माँ-पिता ज़मींदार के सीरी थे।  तारों की छाँव में जाते थे । तारों  की छाँव में लौटते थे । मेरी पांच बहने और और चार भाई थे। गरीबी इतनी थी कि पढ़ाई की कभी सोच ही नहीं पाए..

.’..यदि कभी गलती हो जाए तो मालिक जाति की गाली देता,कभी ‘डेढ़’ तो कभी ‘चूहड़ा’ तो कभी मादर…’ ..’खाना खाने के वक्त एक-आध रोटी ज़्यादा खायी जाती तो फुसफुसाहट सुनाई देती– सेर अनाज खाकर भी पेट नहीं भरता । भूखे लोग हैं.. अपनी जात दिखा देते हैं ।’

सूरजमुखी भगवान से पूछती है– ‘तूं कैसा भगवान है..!! जी-तोड़ मेहनत के बाद भी भरपेट खाना नहीं देता !! तूं मिले तो मैं पूछूं कि बता मेरी खता क्या है ..!!’ अभी मेरी उम्र 12 बरस  की थी ।शादी की समझ नहीं थी ।लेकिन घरवालों ने बड़ी बहन के साथ ही उसके देवर के साथ मेरी शादी कर दी ।

इसी तरह ‘रेखा’  कहती है– “जब बारात आई तो उसमें एक की जगह  दो दुल्हे थे’ हम हैरानी में पड़ गए । एक लड़की की शादी है , दो दुल्हे क्यों..!! आखिरकार दादा जी ने बताया कि उसने ज़ुबान दी है कि मैं अपनी बेटी के साथ-साथ अपनी पोती की शादी दूल्हे के छोटे भाई से करूँगा ।’

‘कमलेश’कहती हैं..’ एक दिन एक आदमी काई लगी बाल्टी में से टॉयलेट के डिब्बे से पानी पिलाने लगा । हमने वहाँ पानी नहीं पिया ।

बबीता’कहती है…’ हम तीनो भाई-बहनों की बहुत दुर्गति हुई…किसी के भी मम्मी- पापा नहीं मरने चाहिए उनके बगैर बच्चों की जिंदगी खराब हो जाती है’ ।

मीना कहती है..’गंदगी बुरी लगती हैं पर पेट भरने के लिए सब करना पड़ता है…वे नंगे बदन, नंगे पैर सीवर में उतरते थे..पैरों में कांच भी थे..बहुत बार इन कर्मचारियों की मौत हो जाती थी क्योंकि उन्हें तुरंत उपचार नहीं मिलता..कई बार सांप,बिच्छू जैसे जहरीले जीव भी काट लेते हैं.. सीवरेज के पास से लोग निकलते हैं,उन्हें इतने से ही बहुत बदबू आ जाती है । लेकिन सीवरेज में सफाई का काम करते हुए  गंदगी, मुंह व आँखों में चली जाती है..काम के दौरान भूख लगने पर  गंदे हाथों से खाना पड़ता है..कोई पानी तक नहीं देता।

मेरी सास कहती थी–‘ज़मींदारों के घर काम करने से तो ये आठ हजार की नौकरी ठीक है’..

‘मीना’ भगवान से पूछती है…’ हमने तो अपनी जिंदगी में ऐसे बुरे काम भी नहीं किये…यह कैसा भगवान है.. जो मेहनत करने वालों के साथ न्याय नहीं कर पाता …कहीं मिले तो मैं उससे पूछूं कि हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है,जो हम इतना बुरा जीवन जीते हैं..सुना है कि तुम खूब दयालु हो..पर क्या तुम्हें हम पर दया नहीं आती..!!!

 इसी प्रकार से अन्य महिला कर्मियों के भी ऐसे ही अनुभव है जो दलित समाज के प्रति हमारे अमानवीय व्यवहार को बेनकाब करते हैं जिन्हें हम लीपापोती करके छुपाते रहते हैं और महान देश के महान नागरिक बने रहते हैं। आप-बीती की इन दास्तानों से यह पता चलता है कि दलित स्त्री को दोहरे शोषण का शिकार होना पड़ता है । एक दलित होने के कारण दूसरा पितृसत्तात्मक तानाशाही रवैये के कारण । एक तरह से वह महादलित है ।

नगर पालिका में काम करने वाली महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता ।ठेकेदार उनके साथ मनमानी करते हैं ।समय पर वेतन नहीं मिलता। कच्चे और पक्के कर्मचारियों में वेतन का भारी अंतर रहता है । उनके बच्चे उनकी इस हालत के कारण अनपढ़ रह जाते हैं । उनके चरित्र पर ताने कसे जाते हैं। स्कूल में अध्यापक भी इन बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते ।आज भी उन्हें लोग टूटी डंडी वाला कप देते हैं । पानी पिलाने से परहेज करते हैं । दूर बिठा देते हैं, सड़ चुकी या खराब चीजें खाने को देते हैं। इन चीजों को भी वे दूर से उनके हाथों में पटक देते हैं । 

घर में सास,पति,ननद देवरानी,जेठानी, बड़े बुजुर्गों और घर के  बाहर ज़मींदारों / ठेकेदारों /  पड़ोसियों/मालिको/दुकानदारों द्वारा इन इनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जाता है । इतना विकास होने पर भी सीवरेज की सफाई के लिए सरकार के पास कोई उचित प्रबंध नहीं है । दलित मरते हैं तो मरें..किसी को क्या फर्क़ पड़ता है…!!

यह पुस्तक यही सवाल उठाती है कि समाज की दुर्गन्ध/गंदगी को दूर करने के लिए जो लोग आपने सारे जीवन को होम कर देते हैं, उन्हें हम सम्मान क्यों नहीं देते…!!उन्हें इंसान क्यों नहीं माना जाता..!!

महिला सफ़ाई कर्मचारियों की ये आप बीती कहानियां  इन कर्मियों द्वारा स्वयं लिखी गयी है । इसलिए इनके लेखन में भले ही एक  लेखक जैसी  कसावट और प्रवाह न हो  लेकिन इनमें जिस मासूमियत, निश्छलता औेर सादगी से इन महिला सफाई कर्मियों ने अपनी बात कही है, वह आत्मा को झकझोर देने के लिए काफी है । ये बहुत ही मार्मिक और भावुक कर देने वाले पल हैं जिन्हें इन्होंने अपने आत्म कथ्य में बहुत ही सिद्दत से पिरोया है।

पुस्तक को निश्चित रूप से पढ़ा जाना चाहिए ताकि अपने आप को श्रेष्ठ ,पवित्र, ऊंचे, और महान बताने वाले कुलीन वर्ग को इन कथाओं में अपने असली चरित्र का पता चले । ये कहानियां हमारे समाज को आईना दिखाने का काम तो करती ही है साथ इस गली-सड़ी व्यवस्था को बदलने के लिए प्रेरित भी करती हैं। पुस्तक के संपादकों–अशोक कुमार गर्ग,मनोज छाबड़ा ,राजकुमार जांगड़ा तथा प्रकाशक विकास सालयान को इस महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए सलाम..!!

समीक्षा – जयपाल

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

?कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम : कौन रोया रात भर?

विधा : कविता

कवयित्री : डॉ. ज्योति कृष्ण

प्रकाशन : क्षितिज प्रकाशन, पुणे

 

? अनुभव में पगी नवोदित रचनाएँ  श्री संजय भारद्वाज ?

‘कौन रोया रात भर’ कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होनेवाला दूसरा संग्रह है। चूँकि उनका पहला और दूसरा कविता संग्रह एकसाथ ही प्रकाशित हुए हैं, अत: एक अर्थ में वे नवोदित हैं। दूसरा पहलू यह कि वे दीर्घकाल से लेखन कर रही हैं, अत: उनकी रचनाओं में जीवन का अनुभव उतरा है। फिर वे मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हैं, फलत: मनोभावों को बेहतर अनुभव करना और अनुभूति को कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति देना, इस कविता संग्रह में प्रखरता से दृष्टिगोचर होता है।

अनुभव जब शब्दों में उतरता है तो कुछ इस तरह अभिव्यक्त होता है-

वक़्त अपने साथ भी बिता लीजिए,

फ़ुर्सत मिले तो कुछ गुनगुना लीजिए।

अनुभव की एक और बानगी देखिए-

पार उतरने वालों ने मूल्य नहीं दिया,

अब स्वयं दे रहा नदी पर पहरा पानी है।

आयु के साथ चेहरे पर झुर्रियों का आना प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में अनुभव से उपजे दर्शन के दर्शन कुछ यूँ होते हैं-

दुखी मत होना ख़ुुद को आईने में देखकर,

सारे सिलवटें तब्दील हो जाएँगी राख में।

सिलवटों का राख होना जीवन की नश्वरता का प्रतीक हो सकता है। साथ ही यह आशावाद का उदाहरण भी हो सकता है। कारण स्पष्ट है कि विसर्जन के बाद ही सृजन होगा।

अनुभवी जानता है कि समय अपना लेखा-जोखा यहीं पूरा कर लेता है। कविता में कुछ इस तरह उतरा है यह लेखा-जोखा-

किसने क्या किया और क्यों किया,

सबसे सवाल-जवाब कर लेगा।

हमें ज़रूरत नहीं है जोड़ने-घटाने की,

व़क्त  सारा हिसाब कर लेगा।

शिक्षित होने का अर्थ केवल साक्षर होना नहीं होता। नेह, अपनत्व न हो तो निरा अक्षर ज्ञान किसी काम का नहीं।

शिक्षित होने का इतना प्रमाण काफ़ी है मुझे,

मेरे मानस पर तुम्हारा स्नेह का हस्ताक्षर हो।

दाम्पत्य का प्राणतत्व है प्रेम। इसमें अनुकूलता, प्रतिकूलता, सहमति, असहमति सबका इंद्रधनुष अंतर्निहित होता है । इस इंद्रधनुष के अनेक रंगों को अपनी लेखनी की स्याही में भरकर कवयित्री कुछ चित्र उकेरती हैं-

1)

अपने मज़बूत इरादों से तुम हामी भरवा ही लेते हो,

लेकिन अब इच्छा है मेरी आनाकानी तुम तक पहुँचे।

2)

सोचा था कि कुछ पढ़ूँगी देर रात तक जाग कर,

और उनकी ख़्वाहिश थी कि बंद करके किताब रख दूँ।

सामान्यतः दो ध्रुवों का आत्मीय समन्वय होता है दाम्पत्य। यही दाम्पत्य का आकर्षण है और सहधर्मिता का सौंदर्य भी। इसकी यह बानगी देखिए-

बंधन होता है अगर सात जन्मों का, तेरे मेरे साथ का ये पहला जनम है।

जब तक साथ है, हाथों में ये हाथ है, हाथ ये छुड़ा ले नहीं किसी में भी दम है।

शब्दों का अपना सामर्थ्य है, अपने अर्थ हैं, अपनी अभिव्यक्ति है, तथापि मौन की मुखरता का आयाम  विस्तृत होता है।

अंतर्मन के द्वंद्व को, समझ सका है कौन।

वाणी जब सकुचा गई, मुखर हो गया मौन॥

फिर स्त्री का मानिनी रूप अपनी ख़ामोशी को मनवाना भी चाहता है।

जिन्हें फ़र्क पड़ता हो मेरी ख़ामोशियों से,

मना लेें वे मुझे आकर, रूठे हुए हैं हम।

प्रेम की विशेषता है रूठना, मनाना, एक दूसरे की भावना को समझना और उसे मान देना। राधा रानी रूठती थीं तो कृष्ण मनाते थे। सिक्के का दूसरा पहलू है कि कृष्ण मनाते थे तो राधा रानी रूठती थीं।

हम इक्कीसवीं सदी का नागरिक होने का कितना ही ढोल पीट लेें पर घर-परिवार, समाज में स्त्री को उसका समुचित स्थान और सम्मान देने में हमारा हाथ तंग ही रहा है। इस विसंगति की अभिव्यक्ति कवयित्री के शब्दों में कुछ इस तरह से स्थान पाती है-

परिवार को अपनी ममता और स्नेह से बाँध रखा,

रिश्तों की इस गर्माहट के प्रति रही है सर्द दुनिया।

सामूहिक थे तो परिवार थे, एकल हुई तो ‘फैमिली’ हो गए। समूह से एकल होने की यात्रा ने विश्व के किसी भी अन्य समुदाय की अपेक्षा भारतीय समाज को अधिक प्रभावित किया है। ऐसे में सामूहिकता का आनंद और सुरक्षा चक्र देख चुकी कवयित्री का युवाओं को स्पष्ट संदेश है-

घोसलों में अपने लौट कर परिंदे भी आते हैं,

भूल मत कभी करना, घर अलग बसाने की।

एकल होना यानी जड़ों से कटना, अपनों से कटना। जो अपनों का ना हो सका, उसका किसी अन्य से जुड़ सकने का विचार ही अतार्किक है। 

दूसरों में क्या जुड़ेंगे, जुड़ न पाए अपनों से जो,

बढ़ रहा है सामर्थ्य लेकिन भावनाएँ घट रही हैं।

एकल से एकाकी होता है मनुष्य। फिर इच्छा जागती है कि कोई जाने, पूछे उसके दुख को। इस पीड़ा की यह अभिव्यक्ति देखिए,

हमें भी ख़्वाहिश है कि मन के बोझ को हल्का करें,

पूछोगे तो बता देंगे कि क्यों इतने उदास हैं।

स्त्री को दो घरों की ज्योति यूँ ही नहीं कहा जाता है। डॉ ज्योति कृष्ण का मायका बिहार है जबकि उनकी ससुराल उत्तर प्रदेश है। दोनों राज्यों के भौगोलिक और सांस्कृतिक दर्शन पर उनकी कविताएँ इस संग्रह में हैं। यह सम्बंधों के लिए उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है तो मायके और ससुराल के प्रति उनके ममत्व को भी अभिव्यक्त करता है।

इस संग्रह में प्रकृति की सुंदरता, उसकी अठखेलियोेंं का वर्णन है। कहीं वसंत का ख़ुमार शब्द पाता है, कहीं वर्षा की बयार की सौंध से कहन महक उठती है। कहीं काम की तलाश में गाँव से शहर की ओर होते पलायन का चित्रण है तो कहीं पर्यावरण पर चिंता शब्दों में ढलती है। इस संग्रह में माँ से सम्बंधित कविता है, पिता पर आधारित कविता है, अपने मकान से मध्यम वर्ग के जुड़ाव को दर्शाया गया है। संग्रह में मनुष्य की वाणी के महत्व पर रचना है तो देशभक्ति की वीणा की झंकार भी है।

पेड़-पौधों लता-गुल्मों से पर्यावरण हरा रहे,

विनाश से बची रहे, दीर्घायु धरा रहे।

सामूहिक हो या एकल, रिश्तो में वह प्रगाढ़ता नहीं रही जिसके चलते रिश्तों को रिश्ता कहा जाता था। सांप्रतिक स्थिति का यह सटीक बिम्बात्मक वर्णन देखिए-

रिश्तों की रौनकें आबाद अगर रहतीं,

घरों में मकड़ियों के जाले नहीं होते।

कहा जाता है, ’बेसिक्स नेवर चेंज।’ कितनी ही प्रौद्योगिक उन्नति हो जाए, सुख, सुविधा के साधन आ जाएँ, मूलभूत कभी नहीं बदलता। इसकी यह बानगी देखिए-

ज़िंदगी एक मोड़ पर थक कर बैठ जाती है,

अगर चलते रहना है तो पाँव से रिश्ता रखना।

‘य: क्रियावान स पंडित:।’ बिना उद्यम, बिना श्रम के कभी कोई परिणाम नहीं मिलता।

सोचा बहुत कुछ, किया कुछ नहीं,

तभी हाथ मेरे, लगा कुछ नहीं॥

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शक है। कवयित्री को संविधान की प्रस्तावना मानो कंठस्थ है। इस संदर्भ में वे कहती हैं-

संविधान की हर पंक्ति सर आँखों पर,

प्रस्तावना के शब्द ज़बानी याद रहेें।

सृजन मनुष्य को विचार देता है। विचार मेेंं मनुष्य को चमत्कृत करने की क्षमता छिपी होती है। उसके चिंतन और मनन का कैनवास बड़ा हो जाता है। इस संदर्भ में शब्दों का यह चमत्कार देखिए-

जाने कौन चुपके से, ख़्वाब अपने रखकर गया,

चौकसी करनी पड़ेगी अब हमें सिरहाने की।

डॉ. ज्योति कृष्ण की कविता यात्रा जीवन के सारे खट्टे- मीठे अनुभवों को जोड़कर चलती है।  उनकी रचनाएँ स्वयं को जलाकर रोशनी करने की मानिंद हैं।

एक छंद मिला उस पार नदी के,

एक पर्वत के पार मिला।

पुष्प-पराग से अक्षर निकले,

शब्दों को शृंगार मिला॥

*

भाव मिले सागर के अंदर,

भाषा स्वर्ण खदानों से।

सब जोड़ा तब जाकर कवि के,

अंतस को उद्गार मिला॥

प्रस्तुत पुस्तक का मुखपृष्ठ प्रसिद्ध चित्रकार संदीप राशिनकर ने बनाया है। यह चित्र शीर्षक को बहुआयामी बनाता है।

जीवन के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित हुए कवयित्री के अंतस के उद्गारों के इस संग्रह के लिए कहा जा सकता है कि ‘देर आयद, दुरुस्त आयद।’ कामना है कि उनका यह संग्रह उन्हें साहित्य के क्षेत्र में समुचित प्रतिष्ठापना दे।

© संजय भारद्वाज  

नाटककार-निर्देशक

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अंतःकरण की आवाज है – सोल  वायस (Soul Voice: the voice within – by Swati Varma)☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ अंतःकरण की आवाज है – सोल  वायस ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(Soul Voice: the voice within – by Swati Varma)

हाल में ही श्रीमती स्वाति वर्मा का एक लघु काव्य संग्रह “सोल वायस” का प्रकाशन हुआ है जिसमें उनके द्वारा हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में रचित 25 उत्कृष्ट कविताएं शामिल की गई हैं। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि अपने इस काव्य संग्रह के माध्यम से स्वाति वर्मा साहित्य जगत से अपना परिचय एक समर्थ कवियत्री के रूप में कराने में सफल हुई हैं। यद्यपि यह स्वाति वर्मा का प्रथम काव्य संग्रह है परन्तु इसमें संग्रहीत सभी रचनाएं उनके सिद्धहस्त कवियत्री होने का प्रमाण देती हैं। एक ओर जहां उनकी कुछ कविताओं में उनकी विद्वता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है तो दूसरी ओर अंग्रेजी में लिखी उनकी कुछ कविताएं पाठकों को भावुक कर  सकती हैं। वर्तमान परिवेश को विषय वस्तु बना कर लिखी गई कविताओं को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि आज कल  के उथल-पुथल भरे माहौल ने उनके मन को  उद्वेलित किया है । स्वाति वर्मा की कविताओं से उनके अंतर्मन का आक्रोश और व्याकुलता की अनुभूति तो होती है लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनकी  कविताएं उनके  सुधारवादी दृष्टिकोण की परिचायक हैं । सहज सरल भाषा में लिखी गई उनकी कुछ कविताओं में आप कल्पना की उड़ान नहीं देख सकते क्योंकि सीधे दिल में उतर जाने वाली ये यथार्थ के धरातल पर लिखी गई हैं यही कारण है कि स्वाति वर्मा की कविताएं पाठक  को सोचने पर मजबूर करती हैं।यही कवि की सफलता है।स्वाति वर्मा की कविताएं जहां एक ओर समाज को प्रकृति के प्रति अपने उत्तर दायित्व का अहसास कराती हैं वहीं दूसरी ओर नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट और सामाजिक सरोकारों की उपेक्षा से उपजी पीड़ा भी उनकी कविताओं में उजागर होती है। स्वाति वर्मा अपनी समय सापेक्ष रचनाओं के माध्यम से यह संदेश देने में सफल रही हैं कि समाज में अगर कहीं  कुछ ग़लत हो रहा है तो साहित्यकार मूकदर्शक बना नहीं रह सकता। उनकी कलम में गलत को ग़लत कहने का साहस है परन्तु वे निराशावादी नहीं हैं घने अन्धकार में भी वे उम्मीद की किरण देख ही लेती हैं –

सुनसान अंधेरों में जैसे कुछ

रोशन सितारे दिखते हैं

सफेद पोशाक पहने वैसे कुछ

गिने चुने फ़रिश्ते हैं।

अपनी एक कविता में वे समाज को यह संदेश दे रही हैं कि हमारा अतीत कितना भी सुंदर क्यों न रहा हो लेकिन हमारे पास केवल हमारा वर्तमान है उसे ही हमें सुंदर बनाना है –

एक बस आज है हमारे पास,

चल इस आज को खास बनाते हैं।

कवि का मानना है कि यदि  मनुष्य के अंदर मिट्टी का कर्ज चुकाने की भावना समाप्त हो जाए तो इससे बड़ी कृतघ्नता और कोई नहीं हो सकती।” मिट्टी ” शीर्षक कविता में स्वाति वर्मा ने अपनी मन की पीड़ा को इस तरह उजागर किया है –

करती रही वो पोषण हमारा,

और हम उसमें जहर मिलाते चलें।

“हुड़दंगों का मेला” शीर्षक कविता में उन्होंने समाज विरोधी ताकतों पर तीखा प्रहार किया है-

हुड़दंगों का मेला लगा है,

सबके हुड़दंग की एक एक दुकान।

“मेरा नटखट लाल” शीर्षक कविता वात्सल्य रस से सराबोर सराहनीय रचना है।

स्वाति वर्मा ने अंग्रेजी में भी काफी कविताएं लिखीं हैं । उनमें से कुछ चुनिंदा कविताओं को इस काव्य संग्रह में शामिल किया गया है जो इस बात का प्रमाण हैं कि उन्हें अंग्रेजी भाषा में भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति में प्रभावी अभिव्यक्ति में हासिल है। स्वाति वर्मा ने “Love is” शीर्षक कविता में प्रेम को जिन उपमानों के  माध्यम से परिभाषित किया है वे सर्वथा उपयुक्त हैं-

A Mountain of feelings,

An Ocean of emotions,

A River of excitement,

The Tree of commitment.

स्वाति वर्मा ने अपने इस काव्य संग्रह में अपनी जिन अंग्रेजी कविताओं को शामिल नहीं किया है उन्हें पढ़कर ऐसा प्रतीत है कि उन्हें अपनी अंग्रेजी कविताओं का एक संकलन अलग से प्रकाशित करना चाहिए। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि उनके पास अपने मन की उदात्त भावनाओं की मर्म स्पर्शी अभिव्यक्ति  के लिए पर्याप्त शब्द भंडार है  और  पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देने की शैली में भावप्रवण सृजन की सामर्थ्य भी उनके अंदर मौजूद है।

 —————-

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “आपको दिक्कत क्या है..?” – श्री ईशम सिंह ☆  श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है  श्री ईशम सिंह के काव्य संग्रह आपको दिक्कत क्या है..?और उन पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ “आपको दिक्कत क्या है..?” – श्री ईशम सिंह ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक-आपको दिक्कत क्या है..?

लेखक– ईशम सिंह

कीमत–225/- पेपर-बैक

प्रकाशक–न्यू वर्ड पब्लिककेशन, नई दिल्ली-1100032

☆ दलित विमर्श पर केंद्रित प्रतिरोधी कविताएं – श्री जयपाल ☆

आपको दिक्कत क्या है..? ईशम सिंह का इसी वर्ष न्यू वर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है । पुस्तक का शीर्षक–आपको दिक्कत क्या है ? इन कविताओं का मुख्य सवाल है । दरअसल हिंदू समाज में जाति प्रथा और उसमें भी  अस्पृश्यता का सवाल एक विचित्र प्रश्न है जो भारत को छोडकर अन्य कहीं नहीं पूछा जाता। ये कविताएं बार-बार पूछती हैं सवर्ण समाज से, अपने आप को श्रेष्ठ समझने वाली जातियों से, छोटी-छोटी मामूली बातों पर अपमानित करने वालों से, धर्मग्रंथों, देवी-देवताओं, भगवानों आदि से, जो बात-बात में दलित समाज को प्रताडित, लांछित और अपमानित करते हैं ।

आधुनिक बताए जाने वाले भारत में भी दलित जाति के व्यक्तियों को मल-मूत्र पिलाए जाने, पीट-पीटकर मार देने, माबलिंचिंग, गांए,देवता, मंदिर,धर्म-स्थानों के नाम पर प्रताड़ित करने/ बहिष्कार करने से कवि हैरान होता है और सवाल करता है कि आखिर आपको दिक्कत क्या है..?? अर्थात  क्या आप मानसिक रोगी  हैं या आपको किसी पागल कुत्ते ने काटा है या आप किसी असाध्य बीमारी से ग्रस्त हैं .?..? जो हमारे साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार करते हैं ।

कवि सवाल करता है कि उन्हें दिक्कत क्या है, घुड़चढ़ी से, नई पोशाक से, हमारे अंगूठों से अम्बेडकर की उंगलियों से,हमारी गर्दन से, मूंछों से..आखिर में कवि सीधा सवाल करता है—

अच्छा सच बताओ

 हमारे होने से

आपको दिक्कत क्या है..??

अधिकांश कविताएं दलित समाज की  दबा दी गई पीड़ा पर केंद्रित हैं लेकिन बहुत सारी कविताएं किसान, मजदूर, भिखारी , ट्रांसजेंडर, लैंगिक-भेदभाव, आनर-किलिंग, स्कूल कालेज के विद्यार्थी, विद्यार्थी जीवन के एकतरफा/दोतरफ़ा/असफल  प्रेम ,भ्रूण हत्या, सोलोगेमी, दिव्यांग, एसिड अटैक, बहिष्कार की पीड़ा और समाज में अन्य हाशिया-गत वंचित समाज की  प्रताड़ना और पीड़ा को  बहुत ही मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं ।

दलित कविताओं–यूं ही तो नहीं, पदचिन्ह, डिफाल्टर, फिर आरक्षण..सर्विस बुक, आपको दिक्कत क्या है ?, चमार का पर्यायवाची,जाति,पोलिंग बूथ, प्रदूषण, गहरे पानी पैठी, मनु, तुम मिलावटी हो, टोकन, जय सियापति की, हमें गांव में नहीं रहना, मेरे गाँव का विद्रोह, पूर्वाग्रह’, माबलिंचिंग आदि में सदियों के संताप की पीड़ा है। शेष कविताएं भी मानवीय संघर्ष का उद्घोष है । मानवीय शोषण के विरुद्ध हैं । इंसानियत के पक्ष में ये कवितायें अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रही हैं।

कुछ कविताओं के कुछ हिस्सों का ज़िक्र करना यहां उचित होगा–

सर्विस बुक ने मुझसे

मेरी पहचान छीन कर

एक नई पहचान दी

…शेड्यूल कास्ट

 

चमार का है क्या ?

चल मर साले !

 

कोई तो होगा जिम्मेदार

हमारी इस स्थिति का

 

हो सकता है, अब फिर हो धृतराष्ट्र अंधा

मगर नहीं बंधी होगी पट्टी

गांधारी की आंखों पर

 

बियाबान जंगल सा हूं

अब यहां कोई शकुंतला नहीं आती

अपने दुष्यंत को पुकारने

 

मनु विचरण करता है आज भी

उसी यौवन अवस्था में

 

जो तुमने हमारी पीठ पीछे झाड़ू बांधा था न

उसी के प्रत्युत्तर में लिखी है कविता

 

असल में युद्ध सीमाओं पर नहीं

औरतों की छाती पर खेले जाते हैं

 

मत दिखाओ मुझे झूठी आजादी का सपना

जिसको जश्न है आजादी का, वो फहराए झंडा

क्योंकि मेरी मां मैला ढोती है

आज भी महाजन के घर

मेरा बाप सीरी है ज़मींदार के घर

हमें नहीं बनना मिट्टी का माधो

नहीं रहना हमें तेरे गांव में

 

हमारे पशुओं को भी नहीं बख्शा

शायद चमार थे वो भी

तभी पता चला मुझे

कि पशुओं की भी जात होती है

जैस जाट की भैंस जाट

‘आपको दिक्कत क्या है’–कवि का प्रथम कविता-संग्रह है । इन कविताओं में कवि कौशल कुछ कमतर दिखाई दे सकता है लेकिन कवि का विचार पक्ष किसी भी तरह से कमतर नहीं है। इस विचार के पीछे दर्द का एक दरिया है। विशेषकर दलित विमर्श की कविताओं में कवि की स्वानुभूति बेहद संवेदनशील और मार्मिक है। इन कविताओं में वर्ण-व्यवस्था के प्रति आक्रोश और विद्रोह के साथ नकार का तीखा स्वर है । श्रेष्ठता,कुलीनता और पवित्रता की कुंठा पर सीधा-सीधा प्रहार है।

सदियों के अन्याय और शोषण के खिलाफ कविता में आवाज उठाने वाले इस उभरते युवा कवि ईशम सिंह को सलाम !!

 

© श्री जयपाल 

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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