हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # ३०० – प्रायमरी का मास्टर…५ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…५।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०० ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…५ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

मान होता है मशीनों का

और मास्टर

 

मर-मर के जीता है।

तो मैं कह रहा था कि

शिक्षक के मन में

राशन या रकम का

प्रश्न प्रमुख नहीं है।

 

उसे हार्दिक सम्मान दीजिये

उसके लेखे

इससे बड़ा कोई सुख नहीं है।

 

मैं नहीं कहता कि

वो दूध का धुला है,

या उसमें कोई कमी नहीं है।

 

वो गल्ती करता है जरूर

पर हुजूर

क्या वो आदमी नहीं है ?

 

आप कहेंगे

तो मैं नौकरी छोड़ दूँगा।

मुझे कोई मोह नहीं है।

मैनें साफ बात कही है

ये कोई विद्रोह नहीं है।

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९७ – “पूज्य पिता जी…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत पूज्य पिता जी...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “पूज्य पिता जी...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

बेटों ने तय की एक खटिया,

पूज्य  पिता जी को ।

देख रही है चुपके बिटिया,

पूज्य पिता जी को ॥

 

जो आगन में पड़ी हुई

है , टूटी- टाटी सी ।

वैसे वो है बची पलंग से

बेढंग काठी सी ।

 

जिसमें पड़े  रहेंगे बेबस

उनके पूज्य पिता ।

बेटों का बस यही समर्पण

पूज्य पिता जी को ॥

 

पड़े पड़े देखा करते है

उसी झिंगोले में ।

सिर्फ निराशा बची दिखे

आँखों के गोले में ।

 

किन्तु अभी भी कुछ आशा

रोटी पा जाने की ।

यही एक विश्वास वचाये

पूज्य पिताजी को ॥

 

कितना खाँसे और खँखारे

कोई नहीं सुनता ।

लुढ़क जाये पानी का डबला

किसको है चित्ता ?

 

बेटों का यह ढोंग

“बहुत सेवा करते हैं वे ।”

वही आज तक रहे बचाते

पूज्य पिताजी को ॥

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

06-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हिंदी का मान करें…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – हिंदी का मान करें…!

☆ ॥ कविता॥ ☆

☆ हिंदी का मान करें…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

हिंदी का मान-सम्मान करें हम,

गौरव-गान, अंभिमान करें हम।

*

निज भाषा में  ज्ञान-ग्रहण करें,

ह्रदय  को  अधिष्ठान करें हम।

*

अपनी जुबां पर गुमां, गर्व करें,

नई शुरुआत, विहान करें हम।

*

इसकी खुशबू से जग महकाएँ,

सतरंगी जीवन उद्यान करें हम।

*

विकास का उत्तुंग  शिखर छुएँ,

नित नूतन अनुसंधान करें हम।

*

राष्ट्र-भाषा उत्थान की खातिर,

अपना सर्वस्व कुर्बान करें हम।

*

इसका परचम जग में फहराएँ,

उन्नत-भाल अवधान करें हम।

*

अन्य भाषा में ज्ञान ग्रहण करें,

पर स्व-भाषा उत्थान करें हम।

☆*

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७९ ☆ # “अंधकार…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अंधकार…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७९

☆ # “पलकों ने खता की…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

पलकों ने खता की

आंखों ने सजा पाई

दिल से हाय निकली

आंखें हैं डबडबाई

 

कुछ टूट गया अंदर

कुछ टूट गया बाहर

टूटते हुए रिश्तों ने

हकीकत है समझाई

 

चेहरे पर रोष है

इरादों में जोश है

बहते हुए लावे ने

हर भीख है ठुकराई

 

शब्दों के हंसी फंदे

सब लूटने के धंधे

बहेलियां ने मुखौटे में

सूरत है छुपाई

 

अंगारों पर चल रहे हैं

मुफलिसी में पल रहे हैं

यह चुप्पी यह खामोशी

यह किस्मत कहां ले आई

 

अब टूट रहा है सब्र

बन जाए यहीं पर कब्र

सरमायेदारों के खिलाफ

“श्याम” तुमने आवाज है उठाई

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२३ – हमें तेरा ही सहारा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता हमें तेरा ही सहारा।)

☆ अभिव्यक्ति # १२३ ☆

☆ हमें तेरा ही सहारा☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

मुझे तेरा ही सहारा, भगवान,

और कोई जग में नहीं,

 

हम तो तेरे ही भरोसे, भगवान,

भरोसा कोई और नहीं,

हमें तेरा ही सहारा,

 कोई और न हमारा,

तेरी कृपा हो कृपा निधान,

 और कोई जग में नहीं,

 

तू है करुणा का सागर,

 मेरी छोटी सी है गागर,

छलके न करुणा निधान,

और कोई जग में नहीं,

 

 तूने दुनिया बनाई,

 इसमें प्रीत जगाई,

 जुदाई न रहे भगवान,

और कोई जग में नहीं,

 

मुझे तेरा ही सहारा भगवान,

और कोई जग में नहीं.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “चित्रांकित” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – चित्रांकित… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

एक दिन दिल में आया, कि..

ज़िंदगी की तस्वीर बनाऊँ

कूची उठाई

कुछ रंग सहेजे

और..

काग़ज के सीने पर

एक रास्ता बनाया

उसमें कुछ गड्ढ़े

कुछ पत्थर

कुछ कांटे बनाए।

फिर एक दरख़्त बनाया

हरा-भरा..

उसकी छांव बनाई

और बस, यूँ लगा कि

लो हो गई ज़िंदगी की कल्पना

चित्रांकित…!!!!!

 

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९२ – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सामयिक गीत – पुरुष दिवस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९२ ☆

☆ हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

 भारती भाषा प्यारी की।

आरती हिन्दी न्यारी की…  

लोककी भाषा है हिंदी,

तंत्रकी आशा है हिंदी।

करोड़ों जिव्हाओं-आसीन

न कोई सकता इसको छीन।

ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की

आरती हिन्दी न्यारी की।।

वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार,

पाँच वर्गों बाँटे उच्चार।

बोलते जो वह लिखते आप-

वर्तनी स्वर-व्यंजन अनुसार।

नागरी लिपि सुविचारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

० 

एकता पर हिंदी बलिहार

वचन दो लिंग क्रिया व्यापार।

संधियाँ काल शक्ति हैं तीन-

विशेषण हैं हिंदी में चार।

पाँच अव्यय व्यवहारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

वर्ण हिंदी के अति सोहें,

शब्द मानव मन को मोहें।

काव्य रचना सुडौल सुन्दर

वाक्य लेते सबका मन हर।

छंद-सुमनों की क्यारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

समेटे ज्ञान-नीति-विज्ञान,

सीख-पढ़-लिख हों हम विद्वान।

विषय जो कठिन जटिल नीरस-

बना देती हिंदी रसवान। 

विश्ववाणी गुणकारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ कुछ अग्निधर्मा क्षणिकाएं… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कुछ अग्निधर्मा क्षणिकाएं… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

🌹रोग

*

कौन कहता है

आत्ममुग्धता एक रोग है

बला है।

निरंतर विज्ञापित होते रहना

भी तो एक कला है।।

*

🌹अध्यात्म

*

मौतों से

विचलित नहीं होते

पत्थर

वे अगले ही पल

शान से वाॅक

कर सकते  हैं

रैम्प पर।।

*

🌹आसमां

*

आसमां छुआ जा

सकता है

बाँटने की फितरत न हो

तो जमीं पर

रहकर भी

आसमां हुआ जा सकता है।।

*

🌹आमद

*

ए आई की आमद पर

नाचो गाओ जश्न मनाओ

अंग्रेजी की खातिर

हिन्दी दिवस

मनाओ।।

*

🌹मावस

*

दिन का भेष बदलकर

आई है रात मावस की

उसने जमा लिया है

डेरा

दिल जलाकर उजाला करो

फैला है

घुप्प अंधेरा।।

*

🌹दुहाई

*

देखते ही देखते

मौत भी आदत बन गई

कुछ कीजिएगा

लोकतंत्र की दुहाई

नहीं दीजिएगा।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४४ – कविता – ख़्वाहिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ख़्वाहिश“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४४ ?

? कविता – ख़्वाहिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

चादर बड़ी करूँ मैं या ख़्वाहिश दफ़न करूँ

फाक़ाकशी में कैसे मैं पूरे सपन करूँ

=2=

हौसला इतना मुझे परवरदिगार दे

ले ज़ान हथेली पे मैं सर पे कफ़न करूँ

=3=

मन मेरा मेहताब सा ठण्डक लिए रहे

दिल में हमेशा आफ़ताब सी तपन करूँ

=4=

देश की माटी की हिफ़ाज़त के वास्ते

मैं बर्फ़ खुद को तो कभी खुद को अगन करूँ

=5=

जो मुझको ज़ख्म दे मैं लगाऊँ उसे गले

ये भूल बार-बार मैं तो आदतन करूँ

=6=

लीज में तुम मुझको अपना दिल ये सौंप दो

ताकि यारा प्यार का मैं उत्खनन करूँ

=7=

आने की तेरे दिल में जो गली है तंग है

मैं चाहकर भी किस तरह आवागमन करूँ

=8=

जिस माटी में जन्मे पले बढ़े बड़े हुए

उस मादरे वतन को मैं निश-दिन नमन करूँ ll

=9=

‘राजेश’ अपनी ग़लतियाँ दोहराऊँ न कभी

मुझसे न दिल दुखे किसी का, ये जतन करूँ ll

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१८ ☆ मुक्तक – ।। हो गये साठ के पार अभी असली इम्तिहान बाकी है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१८ ☆

☆ मुक्तक ।। हो गये साठ के पार अभी असली इम्तिहान बाकी है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

सफर जारी पर अभी तो आने को मुकाम बाकी है।

किया जा चुका बहुत कुछ पर अभी काम बाकी है।।

साठ   के   पार    हो   चुके    तो  कोई  बात   नहीं।

अभी तो नापी है ज़मीं अभी  आसमान   बाकी है।।

=2=

अभी अदा करने को शुक्रिया वह हर इन्सान बाकी है।

पूरे  जो  कर  नहीं  पाए  वह  हर  अरमान  बाकी  है।।

अभी  तो  शुरू  ही   हुई  है  जीवन  की  दूसरी  पारी।

जान लो कि  जिन्दगी का असली इम्तिहान बाकी है।।

=3=

अभी  भी  दुनियादारी  का  कुछ   लगान   बाकी  है।

कर नहीं पाए इस्तेमाल वह साजो सामान बाकी है।।

रुकना  नहीं   थमना  नहीं  तुम्हें  इस बीच   दौड़  में।

अभी  भी   जीतने   को   हर  तीर  कमान   बाकी  है।।

=4=

सेवा निवृत हो गए पर अभी अनुभव का सम्मान बाकी है।

कुछ नया करने सीखने को जज्बा और तूफ़ान बाकी है।।

अब  तो  वरिष्ठ  नागरिक  का  दायित्व  भी  है  कंधों पर।

अभी  देखने  घूमने  को  भी  पूरा    जहान   बाकी   है।।

=5=

चुप  रह  गई  जो  अब  तक  अभी   वह  जुबान बाकी है।

ऊपरवाले ने भी दिए काम  अभी  वह फरमान बाकी है।।

पूरा  करना  है  हर  काम   इसी   एक  ही  जिन्दगी   में।

भागते रहे जिंदगी भर अब जरा सा चैन आराम बाकी है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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