हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५० ☆ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रब का वो आसरा नहीं पाता“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५० ☆

✍ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

धूप औ छाँव क्या नहीं पाता

कर्म का फल बता नहीं पाता

तेज कितना भी सूर्य तपता हो

फिर भी सागर सुखा नहीं पाता

 *

इश्क़ कैसा है बेवफ़ा को भी

चाहकर मैं भुला नहीं पाता

 *

साथ बरसों का है मेरा उससे

क्या है दिल में हवा नहीं पाता

 *

इंतिहां इंतज़ार की है अब

सब्र का फल पका नहीं पाता

 *

डर  हो क़ानून का भला कैसे

सच्चा मुज़रिम सज़ा नहीं पाता

 *

रौनकें रह की देख जो बहके

वो सही रासता नहीं पता

 *

दीन दुखियों के जो न काम आए

रब का वो आसरा नहीं पाता

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४८ – बुन्देली कविता – ”सजनइ होन लगी गुड़ियों की” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४८ ☆

☆  बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सजनइ होन लगी गुड़ियों की

गुँथन लगी माला गुरियों की

 *

जे नन्हे नटखट कम नइयाँ

नकल करत बुढ़वा-बुढ़ियों की

 *

साहुन में सज गईं दुकानें

छला – फूँदरा उर चुरियों की

 *

होत बाम्हनों में कइ पातें

दुबे, तिवारी, चनपुरियों की

 *

ऐंसी भइ बरसात हनक कै

धार न टूटन दइ उरियों की

 *

रंग-बिरंगे फूल झरे हैं

जेजम बिछ गइ पंखुरियों की

 *

भगवतचुगली सें घर फोरत

कमी नोंइ विष की पुड़ियों की

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कलम मेरी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “कलम मेरी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

मैं कागज़ की श्वेत धरा बनूँ,

तुम स्याही की धार बन जाना,

मैं सपनों की रेखा खींचूँ,

तुम उनका विस्तार बन जाना।

 *

मैं मन के भाव सजाऊँ जब,

तुम अक्षर-अक्षर खिल जाना,

मेरी हर मौन पुकारों में,

तुम स्वर बनकर मिल जाना।

 *

मैं शब्दों का सागर बनूँ,

तुम लहरों की तान बन जाना,

मैं रचना की राह दिखाऊँ,

तुम उसका सम्मान बन जाना।

 *

जब थक जाए ये कलम मेरी,

तुम ऊर्जा बन बह जाना,

मैं कागज़ का रूप धारण करूँ,

तुम मुझमें जीवन भर जाना।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद एवं पाठयपुस्तक लेखिका 

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – असहाय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – असहाय  ? ?

आकाश आज

फिर उतरा था

ज़मीन पर,

जाति संघर्ष में

पति और

दो मासूम बच्चों की

चिता जलाती

असहाय औरत के लिए

धरती छोटी पड़ गई थी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२० – कर्तव्य भाव का बोध ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कर्तव्य भाव का बोध। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२० ☆

☆  कर्तव्य भाव का बोध श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

सेना करे कमाल देखिए।

दुश्मन की हर चाल देखिए।।

*

सीमा पर चौकस रहते हैं।

राष्ट्र भक्ति की ढाल देखिए।।

*

जो भी कदम मिला कर बढ़ते।

उनका ऊँचा भाल देखिए।।

*

अनुशासन में पगे हुए सब।

दुश्मन है बेहाल देखिए।।

*

करें सुरक्षा हम सबकी वे।

रखें हमारा ख्याल देखिए।।

*

कर्तव्य भाव का बोध सदा।

इस पर नहीं सवाल देखिए।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

7/2/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दिक्षा दिन ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

☆ कविता ☆

☆ दिक्षा दिन ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

 

छूकर

मेरे मस्तिष्क को

दिया आपने

अनुग्रह…

 

दिशाहीन

भटक रहा था

सन्मार्ग दिखाया

पालनहार..

 

निश्चिंत हूँ 

पार यह सागर

आपके चरणों मे

समा जाऊँगा…

 

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८४ – मत समझ हमको पराया…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८४ – मत समझ हमको पराया…२ ✍

दोस्त! तू भोला भाला था

क्या नहीं तुझको पता था

यह जमाने का पुराना सिलसिला है

चाहने पर क्या मिला है?

मन जिसे चाहे जहाँ

वह वहाँ

मिलता नहीं है,

सड़क

में कीचड़ बहुत होता

पर कमल खिलता नहीं है।

भुला दे दुख दर्द अपना

छोड़ दे रोना कल्पना

एक शायर ने कहा है-

मोहब्बत के अलावा भी और गम है।

एक तेरी ही नहीं

दूसरी भी आँख नम हैं।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८३ “मकड़जाल में…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत मकड़जाल में...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “मकड़जाल में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

सुनो चतुर्भुज !

जो मशाल थी –

सुबह जलायी

वही गई बुझ ॥

 

जो भी रण था

जीत गये तुम ।

फिर भी क्यों     

टेढ़ी तेरी दुम ।

 

साज सँवार

और सामग्री –

राजकोट से जा

पहुँची भुज ॥

 

दिन का तार –

तम्य है ढीला ।

समझ चुका है

समय हठीला ।

 

कितने दस्तों*

में बाँधोगे ?

खुल न जायें सब

उनके जुज **॥

 

कहीं कहीं अस –

हज प्रवृत्ति सा ।

खड़ा हुआअव –

रोध भित्ति सा ।

 

फिर पहाड़ से

नीचे आकर ।

मकड़जाल में –

उलझा तन्तुज ॥

 

* एक निश्चित संख्या में इकट्ठे कागज

** पुस्तकाकार छापे जाने के लिये छोटे छोटे समूह में कागज

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

14-05–2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – स्पंदन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – स्पंदन ? ?

उसने

अपने ह्रदय का स्पंदन

घोषित कर रखा है मुझे,

और

बावरी मुझसे ही कहती है,

जानते हो,

तुम्हारा ख़्याल आने भर से

मेरी धड़कनें बढ़ जाती हैं! 

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

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संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “”तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!!” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – “तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!! ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

(हिंदी वर्णमाला के अक्षरों के क्रम पर एक कविता लिखने के मेरे प्रयास का पठन और समीक्षा कीजिये – मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग)

अकस्मात

आना उसका,

इतराते हुए

ईमान को झकझोरनते हुए

उसका वो

ऊंची आकांक्षाओं में खेलना

ऋषभ(श्रेष्ठ) का बिंब बनकर उभरना

एतबार को झुठलाते हुए

ऐसी विवशता में डालते हुए

ओस की शीतलता में सराबोर

औचित्य को चुनौती देती

अंक में भर के अनुराग लिये

अ: को विभेदन अत: से करती

कब अवतरित हुई

खनकती ध्वनि के संग

गरज के न बरसती

घटा बन के घिर आई

चपल हिरनी की तरह

छल से आग्रह करतीं

जब सामने हो साक्षात ही

झरती धारा के रूप में

टपकती बूंद बनकर

ठहर जाती हो हृदय की पाती पर

डालकर पहरा नज़रों का

ढाल दी है कोई मूरत साक्ष्य की

तब भी थकती न थी कोई प्रतीक्षा

दसों अरमान लिए

धड़कनों की ज़ुबाँ को झुठलाती

नूर बनके इस चांदनी में

प्रणय को स्वीकारना

फूलों के इस चमन में

बहार हो, ठहरो ज़रा

भंवरे को रिझाती

मुझे तरसाती

ये तुम ही थीं

रातों की स्याही में

लौ बनकर जुनून की

वन जैसी निस्तब्धता में

शीशे से मेरे दिल को

षोडश (सोलह) श्रृंगार से चूर करतीं

सदा देकर मुझे

हद से गुज़रने को  उकसाती

क्षितिज पर बना

त्रिकाल (भूत,वर्तमान, भविष्य) का

ज्ञानसागर की “तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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