आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना अशआ‘र।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८२ ☆
☆ पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
☆
पर्यावरण है दोस्त लेकिन आदमी दुश्मन बना।
आज खतरा आदमी को आदमी से हो गया।।
०
पर्यावरण का दोस्त हो तो, आदमी महफूज हो।
यह हकीकत आदमी को, कब समझ में आएगी?
*
पाँव पर अपने कुल्हाड़ी, मारता खुद आदमी?
काटता है वृक्ष घटती आक्सीजन जान ले।।
*
पर्वतों को खोदकर, तालाब-नदियाँ पाटता।
काटता जंगल हरे, क्यों कब्र अपनी खोदता?
*
मारता-मरता जमीं के नाम पर जब आदमी।
ग़मजदा पर्यावरण हो, अश्रुधार बहा रहा।।
☆
© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
५.६.२०२६
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,
चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈














