हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८२ – पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना  अशआ)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८२ ☆

☆ पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

पर्यावरण है दोस्त लेकिन आदमी दुश्मन बना।

आज खतरा आदमी को आदमी से हो गया।।

पर्यावरण का दोस्त हो तो, आदमी महफूज हो।

यह हकीकत आदमी को, कब समझ में आएगी?

*

पाँव पर अपने कुल्हाड़ी, मारता खुद आदमी?

काटता है वृक्ष घटती आक्सीजन जान ले।।

*

पर्वतों को खोदकर, तालाब-नदियाँ पाटता।

काटता जंगल हरे, क्यों कब्र अपनी खोदता?

*

मारता-मरता जमीं के नाम पर जब आदमी।

ग़मजदा पर्यावरण हो, अश्रुधार बहा रहा।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

५.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ – कभी गाँव था – ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ कविता – कभी गाँव  था

कभी गाँव था अब नगर हो गया

नदी बह रही थी ज़हर हो गया

*

यहाँ बांग देने न मुर्गे रहे

घडी बोल बैठी गजर हो गया

*

नहीं भोर होती नशा रात भर

नशे का यहाँ तो कहर हो गया

*

नहीं मानता वो खुदा की दुवा

बुरा मैकदे का असर हो गया

*

नई नस्ल काफी परेशान हैं

खुशी में हमारा सफ़र हो गया

*

नशे में युवा तो यहाँ मर रहे

वहाँ नौजवाँ तो अमर हो गया

*

पढाया लिखाया पिताने मगर

जवाँ दिल किसी की नज़र हो गया

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ – पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ ☆

☆ पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

वृक्ष काटते निशदिन मानव, होगा क्या परिणाम रे।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे।

जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे।।

निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे।

धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे।।

रौद्र रूप जब धारे माता, होगा क्या परिणाम रे।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।

वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।

दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।

भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।

हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बनें अभिराम रे।।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३ – कविता – कॉकरोच… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “कॉकरोच“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३?

? कविता – कॉकरोच… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

फैले हैं कितने-कहाँ कॉकरोच पता कर

इनकी कहाँ तलक है एपरोच पता कर

= 2 =

मरे हुए पे रोते हैं, ज़िन्दा को रुलाते

कब मरा ज़मीर निःसंकोच पता कर

= 3 =

पेट्रोल गैस डीजल की किल्लतों से उफ़्फ़

सत्ता को कुछ आई क्या खरोंच पता कर

= 4 =

लीकेज़ किसने किया युवा पूछ रहा है

नीट से लड़ाई किसने चोंच पता कर

= 5 =

कौन कर रहा है अच्छे दिन के नाम पर

ये लूटमार-छीन-झपट-नोंच पता कर

= 6 =

क़िरदार जा टकराया एपस्टीन शिला से

तब भी तनिक न आई क्यों मोच पता कर

= 7 =

कंकाल ले बहन का पहुँचा बैंक में बंदा

क्यों ऐसा दाँव-पेंच किसकी सोच पता कर

= 8 =

ख़्वाहिश तो बादशाह की भी रहती अधूरी

सियासती लोचे में क्यूँ ये लोच पता कर

= 9 =

‘राजेश’ हर मशीनरी निढाल पड़ी है

कानून को किसने लिया दबोच पता कर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०६ ☆ ।। मुक्तक ।। बढ़ रहा तापमान, हो रहा पर्यावरण का नुकसान ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०६ ☆

☆ ।। मुक्तक ।। बढ़ रहा तापमान, हो रहा पर्यावरण का नुकसान ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

= 1 =

नदी ताल में कम हो रहा जल हम

पानी यूँ बहाते जा रहे हैं।

ग्लेशियर पिघल रहे और समुन्द्र

तल यूँ बढ़ाते जा रहे हैं।।

काट कर सारे वन कंक्रीट के कई

जंगल बसा दिए विकास ने।

अनायस विनाश की ओर कदम

दुनिया के चलाते जा रहे हैं।।

= 2 =

पॉलीथिन के ढेर पर बैठकर हम

पॉलीथिन हटाओ नारा दे रहे हैं।

प्रक्रति का शोषण कर के सुनामी

भूकंप काअभिशाप ले रहे हैं।।

पर्यवरण प्रदूषित हो रहा दिन रात

आधुनिक संस्कृति के कारण।

भूस्खलन,भीषण गर्मी,ओलावृष्टि

नाव बदले में आज खे रहे हैं।।

= 3 =

ओज़ोन लेयर छेद,कार्बन उत्सर्जन

अंधाधुंध दोहन दुष्परिणाम है।

वृक्षों की कटाई बन गया आजकल

विकास प्रगति दूसरा नाम है।।

हरियाली समाप्त करने की बहुत

कीमत चुका रही है दुनिया।

इसी कारण ऋतुचक्र,वर्षा चक्र नित

असुंतलन आज आम है।।

= 4 =

सोचें क्या देकर जाएंगे हम अपनी

अगली पीढ़ी को विरासत में।

शुद्ध जल और वायु को ही कैद कर

दिया जीवन शैली हिरासत में।।

जानता नहीं कि आदमी कुल्हाड़ी

पेड़ पर नहीं पाँव पर चल रही।

प्रकृति ही नहीं संपूर्ण मानवता नष्ट हो

जाएगी दानवी हिफाज़त में।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६९ ☆ कविता – शिक्षा की महत्ता… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – शिक्षा की महत्ता…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६९

☆ शिक्षा की महत्ता…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

शिक्षा ही देती इस जग में, सबको समुचित ज्ञान है

शिक्षा से ही संभव इस जीवन में हर कल्याण है।

शिक्षा के बिन अंधकार है, फीका हर व्यवहार है

शिक्षा से ही पाता मानव धन उन्नति सम्मान है ।।1।।

*

सदा सुशिक्षित विनयशील का युग करता गुणगान है

अपने विद्वानों पर ही होता सबको अभिमान है।

दूर दूर इससे ही जाते शिक्षा पाने लोग हैं

सुख दुख में सब साथ निभाती विद्या मित्र समान है ।।2।।

*

शिक्षा ही इस जग में सचमुच हर विकास का प्राण है

शिक्षा से ही संभव गहराई का अनुसंधान है।

शिक्षा सचमुच अक्षय धन है, शिक्षा सुख की खान है

शिक्षा बिन भटकाव बहुत हैं, मुश्किल निज अधिकार है ।।3।।

*

सुलभ कामना पूर्ति मंत्र-शिक्षा पर केन्द्रित ध्यान है

ज्ञानवान ही कर सकता भावी का कुछ अनुमान है।

मिली न शिक्षा सही अगर तो पग-पग पर कठिनाई है

संकट की रक्षा करने को सही ज्ञान भगवान है ।।4।।

*

शिक्षा बिन अंधा सा औ’ निर्बल जैसा इन्सान है

शिक्षा के प्रकाश से होती हर मुश्किल आसान है।

शिक्षा ने ही सुलभ कराई सुविधाएं विज्ञान कीं

शिक्षा से ही हुआ विश्व का चतुर्मुखी उत्थान है ।।5।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९६ – नवगीत – प्रभु श्री राम जी की महिमा… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतप्रभु श्री राम जी की महिमा

? रचना संसार # ९६ – गीत – प्रभु श्री राम जी की महिमा…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

राम तुम्हारी महिमा सारे,

जग ने देखो गाई है।

राम कथा लिखकर तुलसी ने,

जन -जन में पहुँचाई है।।

*

अवतारे हैं राम अवध में,

देव पुष्प बरसाते हैं।

ढोल नगाड़े घर -घर बजते ,

ऋषि मुनि भी हर्षाते हैं।।

ऋषि वशिष्ठ से शिक्षा पाकर,

प्रेमिल -गंग बहाई है।

*

उनकी पत्नी भी जगजननी ,

जनक दुलारी सीता थीं।

तीन लोक में यश था उनका

देवी परम पुनीता थीं।

राज-तिलक की शुभ बेला पर

दुख की बदरी छाई है।

*

कुटिल मंथरा की चालों से,

राम बने वनवासी थे।

लखन जानकी संग चले वन,

क्षुब्ध सभीपुरवासी थे।।

चौदह साल रहे प्रभु वन में,

कैसी विपदा आई है।

*

सीता हरण किया रावण ने,

वह तो अत्याचारी था।

गर्व राम ने उसका तोड़ा,

जग सारा आभारी था।

वापस लेकर सीता आये,

बजी अवध शहनाई है।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१३) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१३) ? ?

तुम चुप रहो

तो मैं कुछ कहूँ..,

इसके बाद

वह निरंतर

बोलता रहा

मेरी चुप्पी पर..,

अपनी चुप्पी की

सदाहरी कोख पर

आश्चर्यचकित हूँ!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 8:23 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२४ ☆ भावना के गीत – प्रेम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के गीत – प्रेम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के गीत – प्रेम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

प्रेम हवा का मंद झोंका

छूकर मन को जाता है

 जीवन में सुरभित पत्तों सा

हरियाली भर जाती है।

 *

मन में प्रेम के भाव लिए

 प्रेम भाव जगाता है

दुख की तपती राहों में,

शीतल छाँव पाता है।

 *

मीरा बनता प्रेम कभी

कभी राधा का गीत।

प्रेम छुपा माँ ममता में,

कभी सखी का गीत।

 *

प्रेम केवल प्रेम नहीं,

प्रेम मन का  पावन गान।

प्रेम है उपवन में छाया

मधुर मधुरिम बाहर।।

 *

जहाँ प्रेम के दीप जले,

मिटे वहाँ अंधियार।

प्रेम कटुता दूर करे,

महके हर परिवार।।

 

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०६ ☆ कविता – शिव संरचना… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – शिव संरचना आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०६ ☆

कविता – शिव संरचना☆ श्री संतोष नेमा ☆

रास्ते में चूने की

लाइन खींचते देख

हमने पूछा भैया क्या

कोई नेता आ रहे हैं….?

बोला नहीं मंदिर

के रास्ते चूने की

लाइन डाल रहे हैं …!

लोगों को भगवान की

राह दिखा रहे हैं …!

हमने कहा लोगों को

क्या मदिर की राह

का ज्ञान नहीं…?

बोला मंदिर क्या

भगवान का ही भान नहीं…!

 

अब तो वह भी भक्तों

को तरसते हैं…?

भक्त है कि भगवान पर ही 

फ़िल्मी स्टाइल में बरसते हैं …!

बोलते हैं आज खुश तो

बहुत होगा तू…जैसा

अहसान सा करते हैं…!

 

फिर भी भोले शंकर

सब के दुःख हरते हैं …!

कुछ तो शिवरात्रि की आड़ में

खुलकर नशा करते हैं…!

पीकर गांजा-भंग

खूब मज़ा करते हैं…!

अब त्यौहार भगवान

के किये कम अपने लिए

ज्यादा हो गए हैं …!

भक्त स्वादानुसार

खान-पान पर

आमादा हो गए हैं …!

“संतोष” भोले को

भोला समझने की भूल

न करना …!

हर अति के अंत की

है शिव संरचना …!

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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