हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – मेरी स्मृतियों में – मेरे पिता ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं डॉ  राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी की दूसरी पुण्यतिथि पर संस्मरण – मेरी स्मृतियों में- मेरे पिता)

☆ संस्मरण – मेरी स्मृतियों में – मेरे पिता ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

द्वितीय पुण्यतिथि पर शत-शत नमन🙏🙏

पिता केवल एक संबंध नहीं होते, वे जीवन की वह दृढ़ पहचान होते हैं जिन पर व्यक्तित्व की पूरी इमारत खड़ी रहती है। मेरे पिता मेरी जान थे, मेरी पहचान थे और वो मेरे जीवन का अभिमान थे । उनका अस्तित्व मेरे लिए केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी सदा जीवित रहेगा।

 

उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रखर था-बिना शोर किए, बिना स्वयं को सामने रखे। वे उस वटवृक्ष की भाँति थे जिसकी जड़ें गहराई में छिपी रहती हैं, पर छाया सबको मिलती है। जीवन की आँधियाँ, तपन और बारिश वे स्वयं झेलते रहे, किंतु संतान को उसका आभास तक नहीं होने दिया। अंतर्मन  की पीड़ा, अनगिनत आहें और असह्य मौन—सब कुछ उन्होंने अपने भीतर समेट लिया। पिता का यही मौन उनका सबसे बड़ा त्याग था।

मेरे जीवन की शान, आत्मविश्वास और संस्कार पिता से ही बढ़े। वे हर समय तट पर खड़े उस प्रहरी की तरह थे, जो भले ही दिखाई न दे, पर उसकी उपस्थिति से ही यात्रा सुरक्षित हो जाती है। आज वे भौतिक रूप से पास नहीं हैं, किंतु उनकी स्मृति हर क्षण दिलासा देती है-

“बेटा, हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं. हमने तुम्हारा हाथ पकड़ा है।”

मेरे पिता का साहित्य से गहरा नाता था। घर में साहित्यकारों का आना-जाना, विचारों की चर्चा, कविताओं में रस का बस जाना-यह सब मेरे संस्कार का हिस्सा बना। उन्होंने शब्दों के प्रति सम्मान सिखाया, विचारों को उड़ान दी और अभिव्यक्ति को पहचान। उनके सान्निध्य में कविता केवल रचना नहीं रही, वह जीवन का स्वभाव बन गई। जो पहचान मुझे साहित्य में मिली, वह माता- पिता के दिए संस्कारों की ही देन है।

पिता ने कभी उपदेश नहीं दिए, उन्होंने जीवन जिया-और वही जीवन मेरी सबसे बड़ी शिक्षा बना। उनका प्यार आशीर्वाद की तरह था, जो बिना कहे, बिना जताए हर क्षण साथ रहा। आज उनकी पुण्यतिथि पर मन पीड़ा से भरा है, पर साथ ही गर्व से भी-कि ऐसे पिता मिले, जो जीवन भर खजाने की तरह संजोए जाने योग्य रहा।

पिता नहीं हैं, पर उनका व्यक्तित्व, उनके संस्कार और उनकी स्मृतियाँ आलोक की तरह हमारे साथ सदा रहेगा  यह शाश्वत है –

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ गाँव से शहर तक ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ संस्मरण ☆ गाँव से शहर तक ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

तब मैं गाँव के स्कूल से पढ़कर नया-नया शहर कालेज की पढ़ाई करने पहुँचा था। चूंकि मुझे कविताएं लिखने का शौक था, इसलिए मैं शहर आने के बाद विभिन्न अवसरों पर कविताएँ लिखकर अखबारों -पत्रिकाओं में छपने भेजने लगा। ऐसे ही  क्रिसमस पर मैंने ईसामसीह पर कविता लिखकर “करुणा के मसीहा- ईसामसीह” अखबारों को छपने भेज दी। जो ठीक क्रिसमस के दिन प्रकाशित हुई, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।

शाम को मुझे उसी शहर के चर्च के फादर का अर्जेंट बुलावा आया। इस पर मैं चिंतित हुआ कि कहीं मुझसे कोई मिस्टेक तो नहीं हो गई। तो मैं डरता-झिझकता शाम को चर्च के फादर से मिलने पहुंचा। वहां मेरे पहुंचते ही फादर ने पूछा कि तुम मिस्टर खरे हो। मेरे हां करते ही वे बोले आपने ही ईसा मसीह जी पर कविता लिखी है। मेरे हां कहते ही वे बोले वेरी नाइस। आपने बहुत ही शानदार कविता लिखी है। आपको यहाँ अभी होने जा रहे कार्यक्रम में सम्मानित करने बुलाया गया है। आपको अपनी कविता स्टेज से सबके सामने पढ़ना है, और सम्मान भी लेना है।

स्टेज से मैंने कविता सबको तरन्नुम में सुनाई, सबसे खूब वाहवाही मिली, और बुके के साथ मोमेंटो भी मिला, जो ईसा की कांच के शो-केस  में मढ़े ईसा मसीह की फायबर की मूर्ति थी।

यह सम्मान पाकर मैं हर्ष में भर गया। आज भी उस क्रिसमस की याद आने पर मैं झूम उठता हूं। इस तरह मेरा गाँव से शहर आना मेरे लिए बहुत बड़ा वरदान बन गया।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया का युवा, शिक्षा और फैशन ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया का युवा, शिक्षा और फैशन ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆ 

दक्षिण कोरिया के सियोल स्थित हांकुक विश्वविद्यालय, सियोल में मेरी अतिथि प्रोफेसर के रूप में डेप्युटेशन में नियुक्ति हुई थी वहाँ जाने से पहले मुझे सियोल से एक छात्र का फोन आया था। उसने मुझे कहा कि “मैं आपका सहायक बोल रहा हूँ… और आप अपने आने का सारा विवरण दें ताकि हम आपको लेने के लिए वहाँ आ जाए।” उसका नाम मुन इल दो था और भारतीय विभाग में हम सब उसे समीर नाम से संबोधित करते थे। उसका व्यवहार, उसकी विनम्रता, भारत और हिंदी के प्रति उसका प्रेम उल्लेखनीय था। प्रारंभ में हम सभी भारतीय प्रोफेसरों के लिए वही एक जरिया था जिसके सहारे हम कोरिया को जान रहे थे। मुन इल दो हम सबकी स्मृति का एक अटूट हिस्सा रहा है। दक्षिण कोरिया के युवाओं का प्रारंभ में वही प्रतिनिधि था..बाद में फिर कई युवा छात्रों से मिली… नाम याद नहीं रहें… पर उनकी बातचीत उनका व्यवहार…मेरी स्मृति का आज भी हिस्सा है।

शिक्षिका होने के कारण मैं हमेशा युवाओं के बीच रही। युवाओं के साथ युवा बनी और उनके माध्यम से अपने सपने, अपनी आकांक्षाओं को साकार होते देखा। किसी भी देश के युवा हों, उनके प्रति मेरे मन में हमेशा स्वीकार्यता और जिज्ञासा का भाव रहा है। उनका उत्साह, कुछ कर गुजरने की आकांक्षा मुझे आकर्षित करती रही है। यही भाव कोरिया में रहते हुए युवाओं को समझने में मेरे लिए सहायक बना। एक बात तो तय हैं कि युवा बच्चों को सीख अच्छी नहीं लगती, उपदेश अच्छे नहीं लगते..इससे बचकर अगर हम उनके साथ रहेंगे तो उनकी दुनिया को जान सकते, समझ सकते हैं। उनसे काफी कुछ सीख सकते हैं। विश्वविद्यालय के परिसर में ही युवाओं को पढ़ते, लिखते, खेलते, गाते, खाते, पीते देखा तो लगा कि यही तो है कोरिया का वर्तमान और भविष्य भी! चमकती आँखों में आत्मविश्वास, हाथों में स्मार्टफोन, कानों में हेडफोन, और कदमों में एक अद्भुत तेजी जैसे समय से आगे चलने की आकांक्षा उनके व्यक्तित्व का स्वभाव बन चुकी हो। दक्षिण कोरिया का युवा एक जीवंत संस्कृति, एक तकनीकी चेतना और एक अनुशासित जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।

आज से लगभग पंद्रह साल पहले जब मैं कोरिया पहूँची थी तो यह देश उस समय भी अत्याधुनिक हा था। मैंने देखा था कि यहाँ लोग बहुमंज़िला अपार्टमेंट्स में रहते हैं, जहाँ स्मार्ट होम सिस्टम, हाई-स्पीड इंटरनेट, डिजिटल उपकरण और अत्याधुनिक सुविधाएँ उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्टवॉच और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उनके लिए केवल उपकरण नहीं, बल्कि जीवन की भाषा हैं। इसलिए इस देश का युवा ऑनलाइन पढ़ता है, काम करता है, संवाद करता है और मनोरंजन करता है। डिजिटल दुनिया उसके लिए वास्तविक दुनिया का विस्तार बन चुकी है। किन्तु इस तकनीकी आधुनिकता के बीच भी कोरियाई युवा अपने सांस्कृतिक मूल्यों से कट नहीं जाता। परिवार उसके जीवन का केंद्र बना रहता है। माता-पिता और बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान, सामूहिक हितों को प्राथमिकता देना उसकी सामाजिक चेतना का अभिन्न अंग है। कन्फ्यूशियस दर्शन से प्रभावित कोरियाई समाज में आज भी अनुशासन, शिष्टाचार और पारिवारिक मर्यादा को अत्यंत महत्त्व दिया जाता है। युवा पीढ़ी आधुनिक जीवन जीते हुए भी इन मूल्यों को अनदेखा नहीं करती, बल्कि उन्हें अपने जीवन में नए रूप में समाहित करती है। मैंने हमेशा देखा है ये बच्चे अपने प्रोफेसर के प्रति बहुत श्रद्धा रखते हैं। हमेशा झुककर अभिवादन करना, बोलना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है।

मैंने इनमें  अनुकरणीय ऐसा अनुशासन देखा है। उनका दिन एक सुव्यवस्थित कार्यक्रम के अनुसार चलता है। सुबह जल्दी उठना, विद्यालय या विश्वविद्यालय जाना, अतिरिक्त अध्ययन या प्रशिक्षण लेना, पार्ट-टाइम काम करना, कोई कोई तो रात में भी काम कर लेते हैं। मुझे एक छात्र याद आता है जो दिन में विश्वविद्यालय की कक्षाओं में उपस्थित रहता और शाम को एक कैफ़े में अंशकालिक कार्य करती था। एक दिन बातचीत में उसने बताया कि वह अपनी उच्च शिक्षा के लिए स्वयं आर्थिक रूप से तैयार होना चाहता है ताकि परिवार पर बोझ न पड़े। उसकी आँखों में थकान अवश्य दिखती थी, पर उससे कहीं अधिक दृढ़ता और आत्मनिर्भर बनने का संकल्प दिखाई देता था। उस क्षण मुझे लगा कि इन युवाओं के लिए करियर केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान अर्जित करने की प्रक्रिया भी है।  समय का सदुपयोग उनके लिए सफलता की शर्त है। वे जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में समय ही सबसे बड़ा संसाधन है। आत्म-विकास की प्रवृत्ति कोरियाई युवाओं के जीवन का केंद्रीय तत्व है। वे केवल शैक्षणिक सफलता तक सीमित नहीं रहते, बल्कि व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य, तकनीकी दक्षता और सामाजिक कौशल पर भी ध्यान देते हैं। जिम जाना, भाषा सीखना, ऑनलाइन कोर्स करना, करियर स्किल्स विकसित करना, ये सब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। ऐसा लगता है मानो उनके लिए जीवन एक निरंतर परियोजना है, जिसे हर दिन बेहतर बनाना आवश्यक है।

इन सब अनुभवों के बीच मुझे बार-बार यह एहसास होता रहा कि कोरियाई युवाओं के जीवन का मूल आधार केवल शिक्षा या अनुशासन नहीं, बल्कि उनका विशिष्ट मूल्य-तंत्र है। दक्षिण कोरिया के युवाओं के मूल्य-बोध में सामूहिकता का विशेष स्थान है। वे स्वयं को समाज का अंग मानते हैं। परंतु आधुनिकता के प्रभाव से व्यक्तिवाद की प्रवृत्ति भी उभर रही है। युवा सफल होना चाहता है, पर समाज से कटना नहीं जहाँ कोरियाई युवा सामूहिक अनुशासन में सुरक्षा खोजता है, वहीं भारतीय युवा विविधता में स्वतंत्रता तलाशता है। मुझे लगा कि दोनों देशों के युवाओं के जीवन में एक ही द्वंद्व उपस्थित है, परंपरा और आधुनिकता का, किंतु उसकी अभिव्यक्ति भिन्न है।

कोरिया में रहते हुए एक बात मैंने यह महसूस की यहाँ शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। पढ़े लिखों का बहुत सम्मान और आदर भी होता है। यहाँ शिक्षा को भविष्य की कुंजी, सामाजिक उन्नति का साधन और जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। संभवतः कन्फ्यूशियस परंपरा से प्रभावित समाज में ज्ञान को नैतिक श्रेष्ठता से जोड़ा जाता हो। शिक्षित व्यक्ति को केवल कुशल नहीं, बल्कि नैतिक रूप से श्रेष्ठ भी माना जाता है। एक बात और ध्यान के थी कि हमारे यहाँ विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त करने के लिए NEET JEE, CET आदि  परिक्षाएं पास करनी होती हैं और बच्चे उसके लिए पहले से ही तैयारी करते रहते हैं, वैसे ही कोरिया में विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (CSAT) (सुंगुन) को जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। अच्छे विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि पूरे परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। युवा जानते हैं रोजगार सम्मान और स्थिर जीवन प्रदान कर सकता है। इसी कारण वे अत्यधिक मानसिक दबाव, तनाव और थकान के बावजूद पढ़ाई से पीछे नहीं हटते। जहाँ तक मुझे याद है यह परीक्षा हर वर्ष नवंबर के महीने में होती है और इस दिन  पुरे देश में छुट्टी रहती है। यह मात्र एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक चेतना का प्रतीक बन चुका है। यह आठ घंटे तक चलने वाली परीक्षा देश के लाखों युवाओं के भविष्य का निर्धारण करती है और इसलिए इस दिन दक्षिण कोरिया के लिए किसी राष्ट्रीय पर्व या ऐतिहासिक आयोजन से कम नहीं होता। इस दिन पूरा देश मानो एक ही लक्ष्य के लिए धड़कता है कि परीक्षा शांत, व्यवस्थित और बिना किसी बाधा के संपन्न हो। शिक्षक, अभिभावक और वरिष्ठ छात्र परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थियों को प्रेरणा देते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं और उन्हें मानसिक रूप से तैयार करते हैं। राजनीतिक नेता, प्रसिद्ध कलाकार और विद्वान लोग मीडिया के माध्यम से छात्रों के लिए संदेश जारी करते हैं, मानो राष्ट्र स्वयं अपने युवाओं के साथ खड़ा हो।  परीक्षा के दिन सामाजिक जीवन की गति धीमी पड़ जाती है। कई बैंक और दुकानें देर से खुलती हैं या बंद रखी जाती हैं। पुलिस प्रशासन विशेष रूप से सक्रिय रहता है, यातायात नियंत्रण किया जाता है, सड़कों को सुगम बनाया जाता है, और देर से पहुँचने वाले छात्रों को पुलिस वाहन उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि उनका भविष्य किसी छोटे व्यवधान से प्रभावित न हो। परीक्षा के श्रवण (Listening) खंड के दौरान शांति बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। छात्रों की एकाग्रता में कोई व्यवधान न पड़े, इसके लिए हवाई यातायात तक को नियंत्रित कर दिया जाता है। सुना था कि देश भर में उड़ानों को भी उस दिन स्थगित कर दिया जाता है, ताकि आकाश की गड़गड़ाहट भी परीक्षा कक्षों तक न पहुँचे।

मैंने यह सब देखा तो लगा कि  यह परीक्षा केवल शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय संकल्प का उत्सव है। कोरियाई समाज शिक्षा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार मानता है। जहाँ एक ओर यह परीक्षा युवाओं के लिए अत्यंत कठोर और तनावपूर्ण अनुभव है, वहीं दूसरी ओर यह समाज के उस अद्वितीय अनुशासन और एकजुटता का प्रतीक भी है, जो आधुनिक कोरिया की पहचान बन चुका है। यह तो तय बात है कि परीक्षा केवल ज्ञान का मूल्यांकन नहीं होती, बल्कि किसी समाज की मानसिकता, मूल्य-व्यवस्था और भविष्य-दृष्टि का प्रतिबिंब होती है। दक्षिण कोरिया की (CSAT, सुंगुन) परीक्षा और भारत की प्रतियोगी परीक्षाएँ दोनों ही अपने-अपने देशों में युवाओं के जीवन को दिशा देने वाली निर्णायक घटनाएँ हैं, किंतु इनके स्वरूप, सामाजिक प्रभाव और सांस्कृतिक अर्थ में गहरा अंतर दिखाई देता है

हालाँकि इस शिक्षा-प्रणाली के भीतर कई अंतर्विरोध भी छिपे हैं। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा युवाओं को मानसिक रूप से थका देती है। कई युवा अपनी रुचियों और रचनात्मक क्षमताओं को दबाकर केवल परीक्षा-केंद्रित जीवन जीने को मजबूर होते हैं। उनके सामने विकल्प सीमित होते हैं या तो सफल होना, या पीछे रह जाना। इस स्थिति में शिक्षा स्वतंत्रता का माध्यम कम और सामाजिक दबाव का साधन अधिक प्रतीत होती है। फिर भी, कोरियाई युवा शिक्षा को केवल बोझ नहीं मानते। उनके लिए यह आत्म-विकास का मार्ग भी है। मैंने एक बार क्लाय में पूछा था कि आप आगे क्या करेंगे.. तो छात्र मुझसे बोला कि वह भले ही हिंदी और अंग्रजी की पढ़ाई कर रहा है, पर उसका मन संगीत में अधिक रमता है। उसने मुस्कराकर कहा—“मैम, करियर दिमाग चुनता है और शौक दिल।” तो एक ने कहा मैं तो लॉजिस्टिक का काम करूँगा…वहाँ पैसा अधिक है..। उनकी यह बातें मेरे मन में लंबे समय तक गूँजती रहीं थी। यह युवा केवल सामाजिक अपेक्षाओं से ही नहीं, बल्कि अपने भीतर चल रहे द्वंद्व से भी जूझता है, और इसी संघर्ष में उसकी परिपक्वता आकार लेती है। वे अध्ययन के माध्यम से वे स्वयं को बेहतर, सक्षम और आत्मविश्वासी बनते हुए देखते हैं। शिक्षा उन्हें यह विश्वास देती है कि वे अपने भविष्य को स्वयं गढ़ सकते हैं।

मेरी कक्षा में कुछ छात्र ऐसे थे जो एकदम से हट्टे कट्टे, कदकाठी में लंबे… छात्रों से अधिक पुरूष ही लगते। उनको देखकर तो मैं पहली बार झिझक ही गयी थी…उनके सामने तो मैं यूँ पिद्दी सी लगती। पर उनका मेरे प्रति अच्छा व्यवहार था। समय रहते जब मैं सहज हो गयी थी तब मुझे पता लगा था कि वे अपना सैन्य प्रशिक्षण समाप्त कर आए हैं। वहाँ अनिवार्य सैन्य सेवा (Mandatory Military Service) को युवा जीवन की एक ऐसी परीक्षा माना जाता है, जो व्यक्ति को बाल्यावस्था से परिपक्व नागरिकता की ओर ले जाती है। लगभग हर युवा पुरुष को दो वर्ष के लिए सैन्य प्रशिक्षण आवश्यक है। सैन्य प्रशिक्षण का यह अनुभव उसके व्यक्तित्व, सोच और जीवन-दृष्टि को गहरे रूप में रूपांतरित कर देता है। दक्षिण कोरियाई युवाओं के लिए सैन्य सेवा केवल दायित्व नहीं, बल्कि गौरव का विषय है। वे इसे केवल कानूनी बाध्यता के रूप में नहीं देखते, बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता और सम्मान के रूप में स्वीकार करते हैं। कोरियाई युद्ध और उत्तर कोरिया के साथ निरंतर तनाव की ऐतिहासिक स्मृति ने सैन्य चेतना को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बना दिया है। इसलिए सेना में सेवा करना वहाँ सामाजिक सम्मान और नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक माना जाता है। इसमें कुछ अंतर्विरोध भी हैं। दो वर्षों की सैन्य सेवा कई युवाओं के करियर और शिक्षा की निरंतरता को बाधित करती है। कुछ युवा इसे अपने सपनों से दूरी के रूप में भी महसूस करते हैं। फिर भी, अधिकांश कोरियाई युवा इसे जीवन का अनिवार्य चरण मानकर स्वीकार करते हैं, क्योंकि उनके लिए राष्ट्र के प्रति कर्तव्य व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर है। आधुनिक तकनीक और वैश्विक संस्कृति के बीच जीने वाला कोरियाई युवा जब सैन्य सेवा से गुजरता है, तो वह केवल आधुनिक नागरिक नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र की चेतना से जुड़ा हुआ उत्तरदायी नागरिक बन जाता है।

जहाँ मैं यह सब देख रही थी वहीं मैं उन युवाओं को भी देख रही थी जो चित्र विचित्र हेअर स्टाईल में आते थे। उनकी हेअर स्टाईल अजिबोगरीब होती.. मैं अचंबित होती.. कैसे? पर धीरे धीरे कोरिया की कुछ बातें खुलती गयीं। मैंने लडकों को हमेशा हुडी.. कार्गो पैंट.. ओवर साईज्ड शर्ट और स्निकर्स, क्रॉस-बॉडी बैग, चेन नेकलेस, और सिल्वर इयररिंग्स पहने देखा… साथ ही मैंने ऐसे युवाओं को भी देखा है जो सुटेड बुटुडे भी थे… मुझे आश्चर्य लगता कितना ही तो अंतर्विरोध है यहाँ…। एक बार मेरी कक्षा में एक छात्र आया जिसके बाल आधे गुलाबी और आधे सुनहरे रंग में रंगे हुए थे। पहले तो मुझे यह अटपटा लगा और अनायास ही मेरी दृष्टि बार-बार उसी की ओर चली जाती रही। एक और छात्र था जिसने अपने बालों के बीच में ही स्पाईक्स् रखे थें और सिर के दोनों ओर के बाल एकदम नही थे। ये कैसी फैशन है..मेरे मन में सवाल आता…पर जब वही छात्र अत्यंत गंभीरता से कक्षा में चर्चा करते  और विषय पर गहरी समझ प्रस्तुत करते, तब मुझे एहसास हुआ कि बाहरी रूप केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, व्यक्तित्व का मापदंड नहीं। उस दिन मैंने समझा कि कोरियाई युवा फैशन को केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान और आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में अपनाता है ।वैसे भी आज सौंदर्य और मेकअप उद्योग अरबों डॉलर का उद्योग बन चुका है। परंपरागत रूप से यह उद्योग केवल महिलाओं से जुड़ा माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में मेकअप ने लैंगिक सीमाओं को पार कर लिया है। पुरुषों और महिलाओं के लिए सौंदर्य और मेकअप की जो कठोर और अलग-अलग सीमाएँ निर्धारित थीं, वे अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही हैं। आज अधिक संख्या में पुरुष भी मेकअप में रुचि लेने लगे हैं। परिवर्तन  की कड़ी में दक्षिण कोरिया सबसे आगे ही होगा। वैसे भी आज कोरियाई पॉप संस्कृति (के-पॉप)  ने  वैश्विक स्तर पर ‘कोरियाई लहर’ को जन्म दिया, कोमल पुरुषत्व (फ्लावर बॉय) की अवधारणा को दुनिया भर में तेजी से फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘फ्लावर बॉय’ ऐसे पुरुष को कहा जाता है जिसकी बाहरी छवि कोमल हो, त्वचा चिकनी हो, व्यवहार सभ्य हो और जो फैशनेबल कपड़े तथा मेकअप पहनता हो। एक सामान्य फ्लावर बॉय, पितृसत्तात्मक समाज के ‘कठोर’ पुरुष की छवि के विपरीत होता है। मैंने वहाँ रहते वहाँ के युवावर्ग को देखा है… जो अपनी ऐसी छवि बनाने में भी लगे हैं। पर ऐसा हम सामान्यतः नहीं कह सकते।  मैंने युवाओं के फैशन और जीवन-शैली में भी अद्भुत अंतर्विरोध देखा। एक दिन विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैंने देखा कि कुछ छात्र पारंपरिक कोरियाई परिधान हनबोक या जागोरी- बाजी ( जैकेट और ठिली पैंट)  में आए थे, जबकि वही छात्र सामान्य दिनों में अत्याधुनिक पश्चिमी परिधान पहनते थे। मुझे यह देखकर आश्चर्य भी हुआ और प्रसन्नता भी कि आधुनिकता को अपनाने के साथ-साथ वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को अवसर मिलने पर गर्व से प्रदर्शित करते हैं। उस क्षण लगा कि उनके लिए फैशन केवल ट्रेंड नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुसार अपनी जड़ों से जुड़ने का माध्यम भी है। कुछ युवा पारंपरिक अनुशासन में भी ढले थे, तो कुछ के-पॉप संस्कृति से प्रभावित आधुनिक शैली में। पर यह भी एक सच ही है कि ‘फ्लावर बॉय’ जैसी अवधारणा ने पुरुषत्व की पारंपरिक छवि को चुनौती दी है।

मैं यही सोच रही थी कि यह युवा पीढी केवल आधुनिक तकनीक का उत्पाद नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन साधने वाला एक जीवंत व्यक्तित्व है। वह अनुशासन और स्वतंत्रता, सामूहिकता और व्यक्तिवाद, परंपरा और परिवर्तन इन सबके बीच अपनी पहचान गढ़ रहा है। …और शायद यही दक्षिण कोरिया के युवाओं की सबसे बड़ी शक्ति है।

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©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आज से सात वर्ष पहले 2 फरवरी 2019 का एक संस्मरण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आज से सात वर्ष पहले 2 फरवरी 2019 का एक संस्मरण ? ?

रात के 2:37 का समय है। अलीगढ़ महोत्सव में कविता पाठ के सिलसिले में हाथरस सिटी स्टेशन पर कवि मित्र डॉ. राज बुंदेली के साथ उतरा हूँ। प्लेटफॉर्म लगभग सुनसान। टिकटघर के पास लगी बेंचों पर लगभग शनैः-शनैः 8-10 लोग एकत्रित हो गए हैं। आगे की कोई ट्रेन पकड़नी है उन्हें।

बाहर के वीराने में एक चक्कर लगाने का मन है ताकि कहीं चाय की कोई गुमटी दिख जाए। शीतलहर में चाय संजीवनी का काम करती है। मित्र बताते हैं कि बाहर खड़े साइकिल रिक्शावाले से पता चला है कि बाहर इस समय कोई दुकान या गुमटी खुली नहीं मिलेगी। तब भी नवोन्मेषी वृत्ति बाहर जाकर गुमटी तलाशने का मन बनाती है।

उठे कदम एकाएक ठिठक जाते हैं। सामने से एक वानर-राज आते दिख रहे हैं। टिकटघर की रेलिंग के पास दो रोटियाँ पड़ी हैं। उनकी निगाहें उस पर हैं। अपने फूडबैग की रक्षा अब सर्वोच्च प्राथमिकता  है और गुमटी खोजी अभियान स्थगित करना पड़ा है।

देखता हूँ कि वानर के हाथ में रोटी है। पता नहीं ठंड का असर है या उनकी आयु हो चली है कि एक रोटी धीरे-धीरे खाने में उनको लगभग दस-बारह मिनट का समय लगा। थोड़े समय में सीटियाँ-सी बजने लगी और धमाचौकड़ी मचाते आठ-दस वानरों की टोली प्लेटफॉर्म के भीतर-बाहर खेलने लगी। स्टेशन स्वच्छ है तब भी एक बेंच के पास पड़े मूंगफली के छिलकों में से कुछ दाने वे तलाश ही लेते हैं। अधिकांश शिशु वानर हैं। एक मादा है जिसके पेट से टुकुर-टुकुर ताकता नन्हा वानर छिपा है।

विचार उठा कि हमने प्राणियों के स्वाभाविक वन-प्रांतर उनसे छीन लिए हैं। फलतः वे इस तरह का जीवन जीने को विवश हैं। प्रकृति समष्टिगत है। उसे व्यक्तिगत करने की कोशिश में मनुष्य जड़ों को ही काट रहा है। परिणाम सामने है, प्राकृतिक और भावात्मक दोनों स्तर पर हम सूखे का सामना कर रहे हैं।

अलबत्ता इस सूखे में हरियाली दिखी, हाथरस सिटी के इस स्टेशन की दीवारों पर उकेरी गई महाराष्ट्र की वारली या इसके सदृश्य पेंटिंग्स के रूप में। राजनीति और स्वार्थ कितना ही तोड़ें, साहित्य और कला निरंतर जोड़ते रहते हैं। यही विश्वास मुझे और मेरे जैसे मसिजीवियों को सृजन से जोड़े रखता है।

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया की महिलाएं ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया की महिलाएं ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆ 

सियोल के इंनचॉन एअरपोर्ट से बाहर आते ही जो सर्द हवा चेहरे को छूकर गुज़री, उसके स्पर्श में ही मैंने आधुनिकता और अनुशासन का संगीत महसूस किया था। लंबी साफ सुथरी सड़कें संवरे हुए मन की तरह स्वच्छ, भीड़ में भी व्यवस्था और चेहरों पर एक गहरा एकाग्र भाव। पहली नज़र में लगा, यह देश जैसे समय से आगे चल रहा है। पर उसकी चमक के भीतर, जीवन की गहराइयाँ हैं… यह बात यहाँ रहते रहते पता चली थी।

यूँ तो यहाँ रहते रहते मैं जिन कोरियाई महिलाओं से मिली उन्होंने मुझपर एक छाप छोड़ दी। शिक्षिका होने के कारण सह शिक्षिकाओं, छात्राओं, ऑफिस स्टाफ, काम करनेवाली महिलाएँ.. आदि से मिलना होता ही था। साथ ही जब शाम को वॉक के लिए जाती थी तो आते जाते कुछ चेहरे परिचित हो गए थे.. किसी के साथ कभी कॉफ़ी या फिर चॉकलेट का रिश्ता भी अपने आप बन ही गया था…इन महिलाओं को देखकर मैं जितना जान पायीं.. समझ पायीं..उस पर आधारित ही मेरे ये शब्द हैं।

सियोल की सड़कों पर प्रत्येक स्त्री तेज़ कदमों से चलती है, जैसे समय की लय से उसके कदम बँधे हों। भारत की सड़कों पर चलती स्त्री के चेहरे पर जैसे थोड़ी बातचीत छिपी होती है कोरिया की स्त्रियों की नज़रें संयम और चैतन्य से भरी दिखतीं हैं। उनकी चाल में गति अधिक है, पर स्वर धीमे। शायद स्त्री का यह धीमा मौन ही  उसके जीवन का दस्तावेज़ होता है।

कोरिया की स्त्रियाँ एक अद्भुत विरोधाभास को जीती हैं। एक तरफ़ वे विकसित, शिक्षित, विशाल बाज़ारों और तकनीक के बीच घूमती, पढ़ती–लिखती, नई पहचान रचती नज़र आतीं हैं तो दूसरी तरफ़, परंपरा और पितृसत्ता के सूक्ष्म तंतुओं से बंधी सी प्रतीत होतीं हैं। यह द्वंद्व मुझे भारत की स्त्रियों के जीवन में दिखने मिलता है। हालाँकि दोनों देशों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं, पर जीवन की अंतर्धारा कहीं गहरी समानता रचती है।

कोरिया के विश्वविद्यालयों में पढ़ती लड़कियाँ विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। उनका सौंदर्य केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि अपने देश की एक सांस्कृतिक उपस्थिति है। के–ब्यूटी की छवि, चेहरे की चमक, सुव्यवस्थित पोशाकें, नपे–तुले कदमों से चलना—सब एक कला की तरह है। सुबह विश्वविद्यालय की ओर भीड़ में जाती छात्राएँ अक्सर बेहद सजी सवंरी होतीं हैं। देखने में यह एक सौंदर्य–उत्सव जैसा लगता।

परंतु धीरे–धीरे जाना कि यह उत्सव कई बार दबाव में बदल जाता है। दक्षिण कोरिया में सुंदरता के कड़े मानदंड हैं—गोरा रंग, आकर्षक चेहरा, पतला शरीर! यह सौंदर्य केवल व्यक्तिगत चुनाव नहीं, सामाजिक मांग भी है। लड़कियाँ बतातीं कि यह सुंदरता उन्हें अवसर देती भी है, और बाँधती भी। उनकी आँखों में चमक होती हैं, पर कभी–कभी थकान भी। अपनी क्षमता साबित करने के ऊपर सौंदर्य का होना एक और बोझ बनकर रहता है। भारत में भी सुंदरता को महत्व दिया जाता है, पर इस हद तक नहीं। वहीं कोरिया में यह पहचान का मूल तत्व बनता जा रहा है। मैंने अक्सर इतने ज़ाडे में भी लडकियों को जैकट, टोपी पहने देखा है पर अक्सर वे स्कर्ट, फ्राक, या छोटी जिन्स में होती… उनकी पतली निथरी टांगे उनके सौंदर्य का मानदंड है यह मुझे बाद में पता चला था… और मैं उन लडकियों को देखकर दंग रह जाती कि ये इतनी कडाके की ठंड में ये इतने आराम से कैसे रह सकती है.. मैंने एकाध बार पूछ भी लिया था.. पर जबाव में उनकी मात्र मुस्कुराहट थी..सौंदर्य बोध के मेरे अज्ञान पर वे मुस्कुराती होगीं।

दक्षिण कोरिया में ‘presentable’ होना केवल उचित पहनावे तक सीमित नहीं है; शारीरिक रूप-रंग को भी सम्मान और परिश्रम का प्रतीक माना जाता है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तित्व-छवि के माध्यम से प्रदर्शित करना चाहता है। कुछ पेशों में विशेष रूप से फ्लाइट अटेंडेंट के लिए आवेदकों से स्पष्ट रूप से ‘शारीरिक आवश्यकताओं’ का उल्लेख किया जाता है। जिसने भी कभी कोरियन फ्लाइट में यात्रा की होगी, उसे यह अवश्य याद होगा कि सभी फ्लाइट अटेंडेंट के चेहरे-मोहरे लगभग एक जैसे हते हैं, त्वचा बेदाग होती है, और वे एक-सी वर्दी में सजी होती हैं, जो उनके सुघड़, पतले शरीर पर सटी हुई प्रतीत होती है।

इसके विपरीत कोरिया की गलियों–मोहल्लों में मुझे बिल्कुल अलग स्त्री–जगत दिखा..जहाँ चमक कम थी, पर जीवन अधिक था। फुटपाथों पर अनेक माँएँ एक हाथ से बच्चे की गाड़ी धकेलतीं और दूसरे हाथ में घर का सामान उठाए चलतीं। उनका चेहरा शांत, पर आँखों में गहरी थकान। लगता कि जीवन का पूरा बोझ उनके कंधों पर है, पर उनके कदमों में अदम्य आत्मबल भी था। उनमें कोई नाटकीयता नहीं थी बस सादगी और श्रम था। यह दृश्य मुझे भारत की गलियों–बाज़ारों में चलती महिलाओं की याद दिलाता—एक हाथ में बच्चा, दूसरे में थैला—जीवन की अनेक डोरियाँ सँभालती हुईं। मातृत्व की कोमलता और कठोरता दोनों इन स्त्रियों में थी।

दक्षिण कोरिया की स्त्रियों का सबसे बड़ा संघर्ष विवाह, मातृत्व और करियर के त्रिकोण में नज़र आता है। वहाँ महिलाओं की शिक्षा और क्षमताओं में कोई कमी नहीं; पर मातृत्व अक्सर करियर को सीमित कर देता है। बच्चा होने के बाद अनेक महिलाएँ नौकरी छोड़ देती हैं, या छोटे पदों तक ही सिमट जाती हैं। “डबल बर्डन” यानी घर और नौकरी दोनों की ज़िम्मेदारी स्त्रियों को थका देती है। भारत में संयुक्त परिवार स्त्री को कुछ सहारा देते हैं, पर कोरिया में न्यूक्लियर परिवार होने से यह बोझ अक्सर अकेले उसके कंधों पर आ गिरता है। आज भारत में भी कहीं कहीं यह परिदृश्य नज़र आता है।

फिर भारत लौटने के बाद मैंने अखबारों में पढ़ा कि वर्ष 2018 के आसपास कोरिया में #MeToo आंदोलन ने चुप्पी की दीवार तोड़ी। सालों से दबे–दबे स्वर पहली बार मुखर हुए। राजनीति, मीडिया, कला, शिक्षण हर क्षेत्र में स्त्रियाँ आगे आईं। आवाज़ें काँपती थीं, पर निर्णय दृढ़। भारत की तरह वहाँ भी विरोध हुआ, पर नई चेतना भी जन्मी। इस आंदोलन ने मुझे यह बताया कि स्त्री–स्वर जब उठते हैं, तो ऐतिहासिक होते हैं।

भारत और कोरिया, दोनों देशों में स्त्री के संघर्षों में समानता है। भारत में विवाह और परिवार सामाज केंद्रित हैं, कोरिया में व्यक्ति केंद्र में है, पर बोझ फिर भी स्त्री पर ही टिक जाता है। दोनों देशों में स्त्री अपने सपनों के साथ, परिवार, समाज और अपने भीतर के संशयों से जूझ रही है। भारत में प्रेम और सामूहिकता कुछ सहारा देते हैं जबकि कोरिया में अनुशासन और आत्मसंयम! पर संघर्ष दोनों में समान है..सम्मान और पहचान की खोज।

कोरिया में मैं सबसे पहले मिलनेवाली महिला थी प्रोफेसर वू जो किम! गोरी, छरहरी, आँखों पर चष्मा, अच्छे से कटे, सधे बाल…काले वेलवेट का स्कर्ट ब्लाउज.. स्कीन कलर के टाइट मोजे…ऊंची एडी के चमचमाते काले शूज  और अपनी ड्रेस से मैच करती कीमती पर्स हाथ में लिए वे मेरे क्वार्टर्स आयी थीं.. साथ में थे प्रो. सो हेंगे जो…..उनको पहली बार मिलते ही मै जान गयी थीं कि वे अनुशासन प्रिय है।  उन्होंने अपना कार्ड मेरे हाथ में दिया और कहा.. ज़रूरत पड़े तो अवश्य फोन करना… हमारा सारा वार्तालाप शुद्ध हिंदी में था। वैसे प्रोफेसर वू जो–किम से मिलना, कोरिया–समाज को देखने का एक पहला और नया द्वार था। उनका व्यक्तित्व सौम्यता, बुद्धिमत्ता और गहन चिंतन का अद्भुत संगम था। सादगी, अनुशासन, अनुसंधान-निष्ठा और मानवीय संवेदनशीलता—ये चार विशेषताएँ उन्हें एक आदर्श शिक्षक और प्रभावशाली अकादमिक व्यक्तित्व बनाती हैं। पर बाद में उनके साथ रहते यह जाना यह महिला भले ही बाहर से सख्त दिखती हैं… पर भीतर से बहुत ही मुलायम और स्नेहिल है। वैसे कोरिया के लोग अपने घर में बहुत कम आमंत्रित करते हैं.. पर वु जो किम जी ने मुझे अपने घर बुलाया अपने हाथों से खाना बनाया ओर खिलाया… उनका घर कोरियाई पद्धति से सजा था… पर कई जगह पर भारत के निशान थे… जिससे पता चलता कि वे भारत को अपने में बसाए रखती है। सबसे अच्छी बात यह लगी थी उनके घर का छोटा सा पुस्तकालय.. जहाँ… हिंदी कोरियाई और अंग्रेजी के उत्कृष्ट साहित्य की पुस्तकें करीने सजी हुई थी। पुस्तक प्रेम वैसे कोरिया के लोंगों में है ही.. कारण मैंने मेट्रो में सफर करते हुए कई कोरियाई लोगों में हाथ में मोटी मोटी पुस्तकें लिए पढ़ते देखा था।

कवयित्री किम यांग–शिक से मुलाक़ात, मेरे लिए कोरिया का दूसरा गहरा परिचय था। उनके घर की दीवारों पर लगे रवीन्द्रनाथ टेगोर का तैलचित्र, संस्कृत के उद्धरण, और कोरिया की काव्य–परंपरा से जुड़े प्रतीक साथ–साथ विराजमान थे। ऐसा लगा, जैसे भारत और कोरिया की आत्माएँ उनके कक्ष में एक ही धारा में बहती हों। वे अद्भुत अपनत्व से बातें करतीं, जैसे वर्षों का परिचय हो। उनकी वजह से ही मैं कोरियाई साहित्यकारों से मिल पायीं… कवयित्रियों के साथ घूम पायी और कोरियाई कविता का आनंद ले सकीं। वे मानती थीं कि स्त्री का जीवन, कविता की तरह, कदापि रैखिक नहीं होता—उसमें अनेक मोड़, अनेक रंग, अनेक ध्वनियाँ होती हैं। किम यांग–शिक भी अपने भीतर के मौन को कविता में बदल देती हैं। उनसे मिलकर लगा कि स्त्री–अनुभव की जड़ें दोनों देशों में एक–सी हैं—बस उनकी पत्तियाँ अलग–अलग ऋतुओं में खिलती हैं।

एक और स्त्री थी..नाम आज मेरी स्मृति में धुंधुला गया है, पर उसकी उपस्थिति मेरी स्मृति-यात्रा का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। कुछ नाम समय के साथ मिट जाते हैं, पर कुछ चेहरे, कुछ क्षण—मन की गहराइयों में रह जाते हैं। एक दिन अचानक मुझे फोन आया। फोन के उस पार से एक स्त्री की आवाज़ थी..संकोच भरी, पर दृढ़। उसने कहा कि वह मुझसे मिलना चाहती है…वह हिंदी सीखना चाहती थी। मैंने सहज भाव से उसे घर आने का निमंत्रण दे दिया। निश्चित दिन वह आई। दरवाज़ा खुला तो सामने छोटे बाल, छरहरी देह, अधेड़ उम्र की एक स्त्री खड़ी थी.. जिसकी आँखों में एक अनोखी फुर्ती थी, जैसे जीवन से थककर भी जीवन से हार न मानने की ज़िद। वह खाली हाथ नहीं आई थी। उसके हाथ में कुछ फूल थे और एक छोटा-सा केक। यह देखकर मन भीतर तक छू गया। विदेशी धरती पर, एक अनजान घर में इतनी आत्मीय तैयारी…यह केवल शिष्टाचार नहीं था, यह किसी रिश्ते की पहली ईंट थी। परिचय हुआ। चाय रखी। कुछ औपचारिक बातें हुईं।

फिर मैंने सहज जिज्ञासा से पूछा—“आप क्या करती हैं?” उसने बिना किसी हिचक के कहा—“मैं रंगरेज़ हूँ…मकानों को पेंट करने का काम करती हूँ।” एक क्षण के लिए मैं चौंक गई। अपने देश में ऐसे काम अक्सर पुरुषों से जुड़े होते हैं। पर उसके चेहरे पर न गर्व था, न संकोच—बस एक सहज स्वीकार था, जैसे वह कह रही हो—यह मेरा काम है, और यही मेरी पहचान है। उसी क्षण उसके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई परत जुड़ गई। वह केवल हिंदी सीखने आई हुई कोई विदेशी महिला नहीं रही..वह श्रम की गरिमा की प्रतिमूर्ति बन गई। वह कभी-कभार मुझसे मिलने आती। भारतीय चाय पीती। शायद उसके स्वाद में उसे अपने जीवन की थोड़ी गर्माहट मिलती होगी। अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में अपने छोटे-छोटे सुख और बड़े-बड़े दुःख बाँट लेती। कोई शिकायत नहीं, कोई आत्मदया नहीं—बस जीवन को जैसा है, वैसा कह देने की सादगी। कुछ देर बैठती, मुस्कुराती, और फिर उसी सहजता से चली जाती, जैसे आई थी। आज उसका नाम याद नहीं आता, पर उसका होना याद आता है। उसका वह छोटा-सा केक, फूलों की वह चुप भेंट, और श्रम से रंगे हुए हाथ—सब मेरी स्मृति में अब भी जीवित हैं। वह स्त्री मुझे यह सिखा गई कि सम्मान पदों से नहीं, डिग्रियों से नहीं, बल्कि उस साहस से जन्म लेता है जिससे कोई स्त्री अपने जीवन को अपने तरीके से रंगती है। और शायद…वह रंगरेज़ आज भी कहीं किसी दीवार पर रंग चढ़ा रही होगी—और अनजाने में, किसी के जीवन को थोड़ा उजला कर रही होगी।

इसके बाद विश्वविद्यालय में की कई छात्राओं से मिलीं… युवा… सुंदर… अल्हड… जागरुक… तकनीक से लैस, विनय से भरी… और हमेशा मदद के लिए तैयार! कोरिया की इन स्त्रियों को देखते हुए मुझे बार–बार लगा कि स्त्री कहीं भी हो, उसका मूल एक है.. वह अपने भीतर एक निरंतर एक यात्रा छिपाए रहती है..एक खोज की, एक धुन की, एक तड़प की…।

यहाँ कि करिअर ओरिएंटेड स्त्रियाँ मुझे बहुत भायी। उनका लेवल ऑफ कान्फिडन्स अलग ही है। वे आधुनिकता सशक्त प्रतीक हैं। वे अत्यंत अनुशासित, मेहनती और लक्ष्य-केंद्रित होती हैं। कोरिया जैसे प्रतिस्पर्धी समाज में उन्होंने शिक्षा, तकनीक, कॉरपोरेट, चिकित्सा और रचनात्मक क्षेत्रों में अपनी स्पष्ट पहचान बनाई हैं। कार्यस्थल पर वह दक्षता, समयबद्धता और पेशेवर नैतिकता के लिए जानी जाती है। मुझे याद पड़ता है… एक छात्रा की क्लास रात के आठ बजे मेरे घर पर होती थी…वहाँ ऐसा सिस्टम है कि आप अपनी और विद्यार्थी की सुविधा के अनुसार क्लास कभी भी ले सकते है। हमने तय किया था कि हर बुधवार को रात आठ बजे मेरे घर क्लास होगी.. कारण पोस्ट ग्रैजुएट में उस समय केवल एक ही छात्रा थी। उस दिन काफी ज्यादा बारिश थी। तापमान 6 तक आ गया था। बाहर काफी ज्यादा ठंड थी। मैंने सोचा शायद ये नहीं आएगी… पर ठीक आठ बजकर पांच मिनट पर वह कडाके ठंड में मेरे घर पहूँच गयी थी। मुझे उनकी यह समय प्रतिबद्धता बडी भाती थी। यही बात मैंने अस्पताल में भी देखी थी। वहाँ की नर्सेस स्नेहिल और कन्सर्न है। यही बात डॉक्टर्स की भी हैं।

कोरिया में रहते मेरे पैर में चोट आयी थी और मुझे प्लास्टर लगवाना पड़ा था… मैं लंगडाती जाती… आते जाते कुछ चेहरे परिचित हो गए थे..उन्हीं में से एक महिला मुझे रोज़ रोकती और कोरियाई भाषा में पूछती..बाल आपायो? जिगुम् ओत्तेयो? जिगुमुन ओत्तेयो?  (अर्थात् पैर में दर्द है? अब कैसा है? अपना ध्यान रखिए?) उसके हाव भाव से मैं उसकी भावनाओं को समझती… और हंसते हंसते हात मिलाते हुए हाँ हाँ (ye. Ye.) कहती। ये महिला मुझे अपनी गली की कोई मासी, मामी, चाची सी लगती।

किम यांग–शिक की कविता, प्रो. वू जो–किम का चिंतन, विश्वविद्यालय की छात्राओं का सौंदर्य और स्वप्न, और फुटपाथ की माताओं का मौन श्रम—इन सबने मिलकर मेरे भीतर कोरिया का एक अद्भुत चित्र बना दिया। ये स्त्रियाँ केवल इतिहास की पंक्तियों में नहीं रहतीं। वे रोज़मर्रा जीवन की धड़कनों में हैं। कोई शब्दों से दुनिया बनाती है, कोई प्रश्नों से, कोई अपनी आँखों की चमक से, और कोई अपने श्रम से। इन सभी में एक साझा सूत्र है—दृढ़ता।

वास्तव मे स्त्री अपनी मौन में भी साधना रचती है। वह घर में हो या कक्षा में, सड़क पर हो या नौकरी के दफ़्तर में, वह हर जगह जीवन गढ़ रही है और इस रचना में वह अपनी पहचान ढूँढती, गढ़ती और फिर उसे सौंप देती है..अपनी अगली पीढ़ी को। कोरिया से लौटते समय मेरे मन में केवल स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि एक नई समझ थी—स्त्री का संघर्ष, उसकी संवेदना और उसका आत्म–प्रकाश किसी भूगोल से बंधा नहीं—वह सार्वभौमिक है। कोरिया की स्त्रियों में मैंने भारत की स्त्रियों को देखा, और कहीं–कहीं अपने–आप को भी। मुझे लगा, स्त्री–जीवन संसार भर में एक ही बात कहता है— “मैं हूँ, और यही मेरी पहली और अंतिम सच्चाई है।”

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©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – सुप्रसिद्ध साहित्य साधिका – श्रीमती गायत्री तिवारी जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

?  सुप्रसिद्ध साहित्य साधिका – श्रीमती गायत्री तिवारी जी ? श्री यशोवर्धन पाठक  

सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार श्रीमती गायत्री तिवारी जी की पुण्य तिथि पर प्रति वर्ष के अनुसार इस वर्ष भी आज 27 दिसम्बर को कला वीथिका भवन में उनकी स्मृति में एक वृहद कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।

श्रीमती गायत्री तिवारी जी का समाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श शिक्षिका के रुप में उन्होंने अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निष्ठा पूर्वक निर्वाह किया तो सामाजिक गतिविधियों में भी उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें मान सम्मान से महिमा मंडित किया।

जबलपुर में हिन्दी साहित्य के विकास में महिला साहित्यकारों की सक्रिय भूमिका रही है। गद्य हो या पद्य सभी में यहाँ की महिला साहित्यकारों ने संस्कारधानी को राष्ट्रीय क्षितिज पर गौरवान्वित किया है। जबलपुर के साहित्यिक जगत को अपनी लेखनी से गौरवान्वित करने में श्रीमती गायत्री तिवारी जी ने भी सृजन धर्म का सक्रियता पूर्वक निर्वाह किया था। गद्य और पद्य दोनों में ही उन्होंने अपनी कलम चलाई और साहित्यिक क्षेत्र को उल्लेखनीय और पठनीय रचनाएँ दी। । उन्होंने जहाँ प्रभावी और उद्देश्य परक कहानियों की रचना की वहीं उन्होंने भावनात्मक रूप से कविताओं का भी सृजन किया। उनका  लिखा उपन्यास कोबरा मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग से पुरस्कृत और सम्मानित भी किया जा चुका है। जबलपुर और प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास के लिए श्रीमती गायत्री तिवारी जी ने समर्पित भाव से महत्वपूर्ण  भागीदारी निभाई और त्रिवेणी परिषद और महिला लेखिका संघ के विभिन्न पदों पर कार्य करते हु साहित्यिक क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए प्रशंसनीय प्रयास किये। साहित्य और पत्रकारिता क्षेत्र के सशक्त हस्ताक्षर के रुप में सर्वत्र प्रतिष्ठित श्रद्धेय डा राजकुमार जी सुमित्र की सफलता और सक्रियता के पीछे उनकी जीवन संगिनी श्रीमती गायत्री तिवारी जी का सराहनीय योगदान था। अपनी साहित्य साधना , शिक्षकीय जीवन और पारिवारिक गतिविधियों के साथ सुमित्र जी के जीवन में प्रत्येक सुख और दुख की साथी के रुप में उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया और यही कारण था कि सुमित्र जी ने अपने साहित्यिक और सामाजिक जीवन में एक प्रेरणा दायक और उल्लेखनीय कीर्तिमान स्थापित किया।

साहित्य साधक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने कथा कृति कोबरा में श्रीमती गायत्री तिवारी के पारिवारिक, सामाजिक और शैक्षणिक जीवन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उनके साहित्य सृजन का विश्लेषण कुछ इस प्रकार किया है-

प्रातः सूरज के अर्घ्य से दिन को प्रणाम करते हुए, गृहस्थी के श्रृंगार के साथ शिक्षण कर्म में संलग्न श्रीमती गायत्री तिवारी ने हर सांझ तुलसी पर दिया रखकर घर के आंगन को प्रकाशित किया है।

तमस और चांदनी के नैरन्तर्य को कर्म और विश्वास के बोध के साथ जीवन की इबारत रचने वाली कथा लेखिका का सृजन जीवन का तत्व दर्शन है।

नारी जीवन के अंधेरे उजालों के मध्य दरकते मनके व्याकरण को कथाकार ने अपनी कहानियों के माध्यम से आलोक दिया है। कोबरा की कहानियां जीवन चेतना को व्यंजित करने वाली श्रेष्ठ कहानियां हैं।

आज श्रीमती गायत्री तिवारी जी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियां हमारे मानस पटल पर सदा अमिट रहेंगी। कविवर श्री जयशंकर प्रसाद की ये प्रेरक काव्य पंक्तियां शायद ऐसी ही नारी शक्ति के लिए लिखी गई है –

नारी तुम केवल श्रद्धा हो

विश्वास रजत नग पग तल में

पीयूष स्त्रोत सी बहा करो

जीवन के सुन्दर समतल में

शत शत नमन🙏

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया में मेरी पहली बर्फ ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया में मेरी पहली बर्फ ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆ 

कोरिया की सर्द शामें वैसे तो अपने आप में ही खास होती हैं। यहाँ तापमान कई बार –15 डिग्री तक भी उतर जाता है। मैं भारत के दक्षिणी भाग से हूँ, जहाँ सर्दी बस एक हल्की-सी दस्तक देती है। ऐसे में इतनी कठोर ठंड का अंदाज़ा भी नहीं था। शुरुआत में कोरिया की यह सर्द हवा मेरे लिए प्रहार जैसी लगती थी..पर समय बीतते-बीतते शरीर ही नहीं, मन भी इस मौसम के साथ तालमेल बिठाने लगा। धीरे-धीरे मुझे भी इस ठंडी हवा का राग सुनाई देने लगा।

यहाँ एक सुंदर परंपरा है..पहली बर्फ, “फर्स्ट स्नो” का उत्सव। लोग इसे शुभ मानते हैं, उत्साह से जीते हैं, और अक्सर एक-दूसरे को बुलाकर साझा भी करते हैं। मुझे याद है, ऐसी ही एक कड़कड़ाती रात में मैं गहरी नींद में थी। तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई। पहले तो मैं घबरा ही गई कि इस समय कौन हो सकता है। मैंने आई-होल से झाँककर देखा—सामने वाले फ्लैट में रहने वाली अंग्रेजी की प्रोफेसर खड़ी थीं।

दरवाज़ा खोला तो मेरे चेहरे पर सवाल थे और उनके चेहरे पर बच्चों-सा उत्साह। बिना कुछ समझाए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और लगभग खींचते हुए बोलीं, “Come! This is the first snow of the year!”

मैं हड़बड़ाई हुई उनके साथ बाहर आई। तभी देखा—एक-एक कर पूरे फ़्लोर के लोग बाहर निकल रहे थे। सबके चेहरे पर वही आश्चर्य, वही खुशी, वही मासूम चमक थी… जैसे अचानक पूरी इमारत किसी त्यौहार में बदल गई हो।

आसमान से हल्के, चमकते हुए कण गिर रहे थे। पहले तो मुझे लगा जैसे कोई धुंध का गुबार उड़ रहा हो। फिर एहसास हुआ…यह बर्फ थी… सियोल की मेरी पहली बर्फ।

सफ़ेद फुहारे हवा में तैरते हुए धीरे-धीरे नीचे उतरते थे, मानो शहर को किसी कोमल, पारदर्शी स्वप्न में ढक रहे हों। पेड़ों की शाखाओं पर रुई-सी परत जमने लगी थी। सड़कें और पुल किसी धीरज भरे मौन में बदल गए थे। ठंड चुभ रही थी, पर वातावरण का सौंदर्य हर एहसास को हल्का कर रहा था।

कुछ ही देर में वह साधारण-सी रात उत्सव में बदल गई…अंग्रेज़ी गीत बजने लगे, सबने तालियाँ बजाईं, नाच किया, और हँसी-खुशी उस पहली बर्फ का स्वागत किया। मेरे हाथ ठंड से सुन्न हो रहे थे, पर दिल में एक गर्माहट भर रही थी…ऐसी गर्माहट जो केवल आत्मीयता से मिलती है।

फिर किसी ने सुझाव दिया, “Let’s eat ice cream! It’s fun in the snow!” मैंने सोचा था मज़ाक है, पर सचमुच… हम सबने उसी बर्फ में खड़े होकर आइसक्रीम खाई। पहली बर्फ पर आइसक्रीम…यह अनुभव जितना अजीब लगता है, उतना ही अनोखा और अविस्मरणीय था।

उस रात ऐसा लगा मानो मैं किसी विदेशी देश में नहीं, बल्कि किसी ऐसे परिवार का हिस्सा हूँ जो मौसम की पहली कोंपल पर भी साथ मिलकर खुश होना जानता है। पहली बर्फ की वह चमक, वह ठंड, वह हँसी आज भी मेरी स्मृति में उसी तरह ताज़ा है, जैसे उस रात आसमान से गिरती हर बर्फ की फुहार। रात में मैंने अपने कमरे की खिडकी से देखा था कि सफ़ेद फुहारे हवा में तैरते हुए धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे, मानो पूरा शहर किसी पारदर्शी स्वप्न में डूबता जा रहा हो। काफ़ी देर तक अकेले ही उसका आनंद लेती रही फिर मैं भी लिहाफ ओढकर सो गयी। सुबह कॉलेज जाना था। भले ही कितनी ही बर्फ हो या ठंड यहाँ कोई अपनी ड्युटी से मूँह नहीं फेरता…इनका वर्क कल्टर अनुकरणीय।

सुबह जब मैं तैयार होकर कॉलेज जाने के लिए बाहर निकली देखा पेड़ों की शाखाएँ रुई-सी परतों से लकदक हो रही थीं। सड़कें धीमे-धीमे चाँदी-सी चमक रही थीं। कारों की छतें, बोनट, विंडशील्ड सब पर बर्फ की मुलायम चादर जमती जम गयी थी। मानो हर कार रातभर में बूढ़ी होकर सफ़ेद बालों वाली हो गई हो।

रात की बर्फ बारी में सड़कें इतनी ढँक गईं कि रास्ता ही मिट चुका था। लोगों के घरों के सामने की सीढ़ियाँ, पोर्च, फुटपाथ सब बर्फ से भरे पड़े थे। सुबह होने पर इन्हें साफ़ करना होता है—सब अपने-अपने घरों के सामने नमक का पाउडर डालते हैं। नमक बर्फ को पिघला देता है, और धीरे-धीरे नीचे की काली सड़क फिर दिखने लगती है। कई बार पड़ोसी मिलकर इसे साफ करते हैं—कोई झाड़ू से बर्फ हटाता है, कोई लोहे की फावड़ी से कुरेदता है, और कोई पीछे से नमक बिखेरता जाता है। उस समय सबके बीच एक अनकहा-सा सहयोग, एक सौहार्द बहता रहता है।

मैंने देखा कि पूरी कॉलोनी, पूरा इलाका एक ही रंग में ढल जाता है—सफेद। छतें सफेद, पेड़ सफेद, कारें सफेद, यहाँ तक कि छोटी-सी झाड़ी भी। ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने रातोंरात दुनिया को किसी श्वेत चित्र में बदल दिया हो।

सबसे अजीब बात यह होती है कि इतनी ठंड के बावजूद हवा में एक हल्की-सी गरमाहट महसूस होती है। जैसे बर्फ गिरते समय हवा थोड़ी थम जाती है… उसकी नुकीली ठंडक सुस्त पड़ जाती है। वातावरण शांत, स्थिर और किसी गहरे सुख में डूबा हुआ लगता है। जैसे शहर ने एक लंबी, धीमी साँस भर ली हो।

रात की बर्फबारी ने माहौल को उत्सव में बदल दिया था—हँसी, संगीत, आइसक्रीम और पहली बर्फ का जादू। पर अगली सुबह दृश्य अलग ही था। छोटे-छोटे बच्चे बर्फ के गोले बनाकर एक-दूसरे पर उछाल रहे थे। उनकी हँसी हवा में किसी चाँदी की झंकार की तरह फैल रही थी। पल भर को लगा कि मुझे भी उनके साथ बच्चा बनकर खेलना चाहिए… बर्फ को हाथ में लेकर उसे हवा में उछाल दूँ, जैसे रात ने मुझे सिखाया हो कि आनंद उम्र का मोहताज नहीं होता।

पर फिर घड़ी ने याद दिलाया—सुबह 7:20 की बस लेनी थी, और दो घंटे की यात्रा कर के योंगिन कैंपस पहुँचना था। पहला ही लेक्चर था… जिम्मेदारी पुकार रही थी।

मेरे हाथ ठंड से सुन्न हो रहे थे, पर दिल में एक कोमल-सी गर्माहट घुली हुई थी—वह गर्माहट जो पहली बर्फ के जादू से आती है, जो अनजान देश को अपना-सा बना देती है, जो थोड़ी देर के लिए जीवन की गंभीरता को पिघला देती है।

बस में बैठकर मैंने खिड़की का शीशा हल्के से पोंछा। बाहर पूरा शहर सफेद चादर में लिपटा था—सड़कें, छतें, कारें, पेड़, कुछ भी अपने असली रंग में नहीं था। सब कुछ बर्फ के रंग में एकाकार हो गया था। और मैं उस श्वेत संसार को, उस स्वप्निल सुबह को, अपने भीतर समेटती जा रही थी।

रात की उत्सवभरी बर्फबारी और सुबह की शांत यात्रा… दोनों मिलकर मेरे मन में एक ही तस्वीर बना रहे थे— कि कभी-कभी जीवन अपनी सबसे कोमल अनुभूतियाँ उसी क्षण में देता है, जब आप किसी बिल्कुल अनजानी भूमि पर होते हैं।

सियोल की वह पहली बर्फ… मेरी स्मृति में आज भी उतनी ही उजली, उतनी ही चमकदार है। हर फुहार में उस रात की हँसी और उस सुबह की शांति अब भी धीरे-धीरे मन में गहराती है।

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©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया की संस्कृतिक लय और मेरी शाम ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया की संस्कृतिक लय और मेरी शाम ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆ 

शाम —केवल दिन का अंत नहीं, बल्कि जीवन की लय का विस्तार होती है। दक्षिण कोरिया में रहते मैं लगभग हर रोज़ शाम के समय हुडी पहनकर या विंटर कोट पहनकर लंबे वॉक के लिए चली जाती थी। कान में हेड फोन लगाकर हिंदी गाने सुनते जाना अच्छा लगता था। कभी किसी लंबी सडक पर तो कभी पास ही के एक विश्वविद्यालय के परिसर में या फिर मार्केट में पैदल चली जाती। या कभी किसी छुट्टी के दिन मेट्रो से हान नदी के पुल पर चली जाती या इथेवॉन के इंडियन शॉप चली जाती। भले ही मेट्रो से चले जाए पर पैदल चलना होता ही था जिससे आसपास के मौहोल का आनंद भी लिया जा सकता था। यहाँ की शामें मुझे  धीरे-धीरे खुलती हुई, लय में डूबती हुई, और भीतर कहीं गहराई तक उतरती हुई। यह संस्मरण उन्हीं शामों का है —जो नोरेंबैंग के शोर, हान नदी की शांति, सोजू के स्वाद, और साइकिल पर पैडल करते युवा बच्चे की गति में बसी हैं।

शाम होते ही सियोल की सड़कें जैसे फिर से जीवंत हो उठती हैं। कार्यालयों से लौटते लोग थके हुए नहीं लगते—बल्कि “पल्ली-पल्ली” (जल्दी-जल्दी) संस्कृति में दिनभर की तेज़ी के बाद भी उनके चेहरों पर एक सहज शांति रहती है। मेट्रो, बसें, दफ़्तर, कैफ़े—हर जगह एक तेज़, पर सुंदर लय बहती रहती है। काम से लौटते लोग थके नहीं लगते, बल्कि जैसे दिन का बोझ पीछे छोड़ते हुए किसी नई ताजगी की ओर बढ़ रहे हों। हान नदी के किनारे टहलने वालों की भीड़ होती है। मेट्रो में लोग चुपचाप बैठे रहते—किताब पढ़ते हुए, संगीत सुनते हुए, या सिर्फ खिड़की से शाम को बहते शहर को निहारते हुए।

कोरिया की एक चीज़ जिसने मुझे हमेशा प्रभावित किया, वह है सम्मान की संस्कृति—विशेषकर बुज़ुर्गों के लिए। उनके लिए मेट्रो में सीट तुरंत छोड़ देना, बातचीत में हल्का झुकना,  यह सब उनके सामाजिक व्यवहार की नींव है। कई बार ऐसा होता कि मैं मेट्रो में खड़ी होती और कोई बुज़ुर्ग मुझे देखकर मुस्कुरा देता… उस मुस्कान में ऐसा स्नेह और अपनापन होता कि अपने आप विदेशी होने का अजनीबीपन गायब हो जाता। यह सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, सांस्कृतिक संवेदना है—और कोरिया के जीवन में यह संवेदना हर कदम पर दिखाई देती है।

कभी कभी लगता कि सियोल साइकिलों की गति से साँस लेने वाला शहर है। पुलों के नीचे, नदी किनारे बने खास ट्रैक्स पर परिवार, युवा, विद्यार्थी—सब साइकिल चलाते मिल जाते हैं। यहाँ साइकिल चलाना जीवन के संतुलन का अभ्यास ही लगता है। कोरियाई लोग कहते हैं— शरीर को गतिमान रखो, मन स्थिर रहेगा। यह दर्शन शाम की हवा में साफ़ महसूस होता है। और हाँ.. साईकिले यहाँ मुख्य सड़क पर नहीं चलाई जाती बल्कि यह मुख्य सडक के किनारे बने फुटपाथ पर ही चलायी जाती है… या फिर बगीचों में साईकिल चलाने के लिए ट्रैक्स हैं। यहाँ रोड के रुल्स बहुत सख्त हैं.. जिनका सारे लोग अनुसरण करते हैं। कहीं भी धक्का मुक्की नहीं।

सियोल के विश्वविद्यालय केवल सीखने की जगह नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक केंद्र हैं। शाम को जैसे ही सूरज ढलता है, कैंपस एक अलग ही दुनिया बन जाता है—कहीं युवा समूह संगीत का अभ्यास करते, कहीं कोई नृत्य का रियाज़ कर रहा है, कहीं छात्र फोटोशूट में व्यस्त। जब मैं विश्वविद्यालय के परिसर में टहलती, तो मुझे लगता मानो भविष्य की धड़कन मेरे आसपास स्पंदित हो रही है। उनकी ऊर्जा, उनकी हँसी, उनकी जिज्ञासा—कैंपस को एक उष्मा देती, और मेरे भीतर भी एक नई लहर जगाती।

कोरिया में कैफ़े केवल कॉफी पीने की जगह नहीं वे पढ़ने, काम करने, बातचीत करने और स्वयं से मिलने की एक जगह हैं। कई कैफ़े 24 घंटे खुले रहते हैं—मद्धम रोशनी, धीमा संगीत, लैपटॉप पर काम करते युवा… शहर की यह शांत रचनात्मकता दिल को छू जाती है।

इनका वर्क कल्चर प्रशंसनीय है। अतः दिनभर यहाँ लोग काम में डूबे रहते हैं, पर शाम होते ही वे अपनी आत्मा को खुली हवा में सांस लेने देते हैं। हर कदम के साथ जैसे वे अपने भीतर से तनाव की एक एक परत उतार देते हैं। कभी-कभी बुज़ुर्ग जोड़े मिलते हैं  जो एक दूसरे का हाथ थामे चुपचाप चलते हैं। उनके चेहरे पर न कोई जल्दी, न कोई चिंता — बस एक स्थिर मुस्कान, जैसे जीवन का अर्थ उन्होंने पा लिया हो।

शहर का दूसरा चेहरा रात में खुलता है। जहाँ दिन में अनुशासन और जिम्मेदारियाँ हैं, वहीं रात में जीवन की सहजता। छोटे-छोटे कमरों में जगमगाती रोशनी — यही हैं ‘नोरेंबैंग” कराओके रूम। एक बार मेरे सहकर्मी मुझे वहाँ ले गए। हम एक दो लोग नहीं थे बल्कि हम भारतीय प्रोफेसर कुछ कोरियाई प्रोफेसर और कुछ छात्रों के साथ गए थे। अच्छा खासा जमघट था। जब हम अंदर गए तो हमारे एक कुलिग ने कहा… “आप गाइए”.. मैंने कहा, “मैं तो अच्छा नहीं गा सकती। ” वे हँस पड़े — “यहाँ गाना अच्छा नहीं, दिल से गाना ज़रूरी है। ” कुछ देर बाद जब सब मिलकर कोरियाई और अंग्रेज़ी गीतों पर झूमने लगे, तो हम भी उनमें शामिल हो गए। संगीत ने भाषाओं की सीमाएँ मिटा दीं। हर व्यक्ति, चाहे उसका पेशा कुछ भी हो, उस क्षण केवल एक गायक होता है — आज़ाद, निश्चिंत, और जीवन से भरपूर। नोरोबैंग दक्षिण कोरिया की लोकप्रिय संस्कृति का एक हिस्सा है। यह एक छोटा, सुकूनभरा और साउंडप्रूफ कमरा होता है जहाँ लोग अपने दोस्तों, परिवार या सहकर्मियों के साथ बैठकर मनचाहे गीत गा सकते हैं। इसके अंदर आमतौर पर एक आरामदायक सोफ़ा, गानों की बड़ी सूची वाला डिजिटल सिस्टम, माइक्रोफ़ोन, स्पीकर और एक बड़ी स्क्रीन होती है जिस पर गानों के बोल चलते रहते हैं। कमरे में हल्की–फुल्की LED रोशनी, रंगीन माहौल और कभी-कभी डिस्को लाइटें भी होती हैं, जिससे एक छोटा-सा निजी संगीत–मंच जैसा अनुभव मिलता है। यहाँ हाथ में ज्यूस, सोजू लेकर ये लोग तनाव मुक्त होकर हँसते गाते झूमते हैं। नोरोबैंग सिर्फ गाने की जगह नहीं है—यह तनाव मुक्त होने, मज़े करने, और साथ में यादें बनाने का एक बहुत खास कोरियाई तरीका माना जाता है। यहाँ संगीत की बीट पर स्टेप्स् करने के विडियों भी होते और सभी उसके अनुसार गाते और नाचते है। खुश होकर अपनी शाम बिताते हैं।

नोरेंबैंग से निकलते ही लगभग हर वीक एंड या किसी खास अवसर पर इन युवाओं की शाम ‘हॉपिंग ड्रिंक’ में बदल जाती है। सड़क के किनारे छोटे-छोटे ‘पोजांगमाचा” (खाने पीने की टपरीनुमा ठेले) रोशनी से जगमगाते हैं। लोग एक जगह नहीं रुकते —एक बार से दूसरे बार, फिर तीसरे, हर जगह थोड़ा खाना, थोड़ा सोजू, और बहुत सारी बातें और हँसी के फव्वारें। सोजू एक प्रकार की शराब है जो कोरिया के सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा है। “गनबे!” कहकर जब गिलास टकराए जाते हैं, तो यह केवल औपचारिक ‘चीयर्स’ नहीं, बल्कि दोस्ती का स्वीकार होता

कई बार ये लोग कभी परिवार के साथ या मित्रों के साथ हान नदी के किनारे जाकर बैठ जाते है साथ में होता है पीज़्ज़ा, बर्गर, और क्रीस्पी चिकन के साथ सोजू या ज्यूस की बोतलें। ये लोग बहुत कम पानी पीते हैं.. अक्सर कोई ज्यूस या आईस कॉफी इनका फेवरिट पेय होता है। पुलों की झिलमिलाती रोशनियों में नदी की लहरें चमकती हैं। ये लोग बातें करते, हँसते, और कभी-कभी बस चुप रहते हैं। उनकी चुप्पी में भी एक मुखरता दिखाई देती है। दोस्ती का सबसे गहरा क्षण वह होता है जब शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

चेरी ब्लॉसम की गुलाबी शामें, शरद की सुनहरी हवा, सर्दियों में सड़क किनारे भुने आलू की खुशबू हर मौसम सियोल को नया व्यक्तित्व दे देता है। यह शहर हर ऋतु में जैसे एक नया गीत गाता है।

एक रविवार को हमारी साथी प्रोफेसर ने मुझे कहा कि, “आज  आप हमारे साथ चलिए, कोरिया का एक और अनुभव कराते हैं आपको। ” और वे वह मुझे एक ‘जिमजिलबांग’ ले गई — एक विशाल सार्वजनिक स्नानगृह। अंदर दृश्य ही अलग था — भाप के कमरे, गर्म और ठंडे जल के स्नान-टब, और लोग — परिवार, मित्र, बच्चे — सब साथ में..हाँ पुरूषों और महिलाओं के अलग अलग कक्ष थे…यहाँ कहीं कोई मसाज ले रहा है, कहीं कोई टीवी देखता हुआ अंडे खा रहा है। शुरुआत में मैं हैरान ही रह गई, वहाँ के उस खुलेपन में मैं सहज ही नहीं हो पायी। यह केवल स्नान नहीं था, यह सामूहिक विश्रांति गृह था। लोग अपने शरीर के साथ-साथ अपने मन को भी धो रहे थे — थकान, तनाव और औपचारिकता से मुक्त होकर। कोरिया की संस्कृति में यह “सामूहिक स्नान” व्यक्तिगत स्वच्छता से आगे जाकर सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन गया है। वहाँ एक साथ नहाते हुए लोग जैसे एक दूसरे के बोझ को भी हल्का करते हैं। किंतु मैं वहाँ  कुछ मिनट भी रुक नहीं सकी.. लौट आयी थी और बाद में मुझे मेरे सहकर्मियों ने इसके बारे में बताया था।

आधुनिक सियोल के बीच भी कोरिया की पारंपरिक कला जीवित है। एक शाम हमने ‘पानसोरी’ सुना … एक गायक, एक ढोल के साथ अपनी भावनाओं के महासागर को राह दे रहा था। प्रेम, पीड़ा, संघर्ष सब उसकी आवाज़ में समाया था। यह केवल संगीत नहीं, कथा का अभिनय था। फिर ‘तालचुम’ — मुखौटा नृत्य। ये कलाकार समाज की बुराइयों पर व्यंग्य करते हैं, राजा, पुजारी, व्यापारी — सब हँसी के पात्र बन जाते हैं। दर्शक हँसते हैं, पर भीतर कुछ सोचते भी हैं। उतनी साहित्यिक कोरियाई भाषा मैं समझी नहीं पर उनके हावभाव से कुछ को पल्ले पड़ा ही था। यह हमारे प्रहसन जैसा ही लगा।

जब रात गहराती है, तो सियोल का दूसरा जीवन शुरू होता है। सड़क किनारे भुने आलू और उबले मक्के की खुशबू, कॉफ़ी कैफ़े में किताबों के बीच बैठे युवा, और पार्कों में गिटार बजाते प्रेमी। शहर जैसे खुद से संवाद कर रहा हो।

कोरिया की यह सामूहिकता अनोखी है —लोग साथ रहते हैं, पर एक-दूसरे को अपना अकेलापन भी जीने देते हैं। यहाँ ‘साथ होना’ और ‘स्वतंत्र रहना’ विरोध नहीं, संतुलन है। शायद यही संतुलन उन्हें इतनी शांति और जीवंतता देता है।

अब जब मुझे कोरिया से लौटकर भी एक अरसा बीत गया है  फिर भी कभी-कभी आँखें बंद करते ही हान नदी की हवा मेरे चेहरे को छू जाती है। नोरेंबैंग की हँसी, जिमजिलबांग की गर्म भाप — सब एक स्मृति बनकर भीतर उतर गए हैं।

देश हो या विदेश जीवन चाहे कितना भी व्यस्त क्यों न हो, हर दिन कुछ पल ऐसे होने चाहिए जहाँ हम अपने भीतर लौट सकें। वॉक, साइकिल, मेट्रो का अकेला सफर, गीत, या नदी किनारे की चुप्पी — ये सब उसी आत्म-यात्रा के पड़ाव हैं। और शायद यही कारण है कि कोरिया की शामें अब मेरे लिए किसी देश की नहीं रहीं — वे मेरे भीतर बस गई हैं, एक स्थायी रोशनी बनकर। यह संस्मरण केवल कोरिया की संस्कृति का चित्र नहीं, बल्कि उस आत्मीय अनुभव का है जिसमें व्यक्ति अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर किसी और जीवन की लय में खुद को खोजता है।

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©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया के सांस्कृतिक उत्सव ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया के सांस्कृतिक उत्सव ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆ 

हर संस्कृति की आत्मा उसके उत्सवों में बसती है। उत्सव केवल तिथियों या परंपराओं के प्रतीक नहीं होते, वे जीवन की गति, सामाजिक संबंधों की ऊष्मा और मानवीय संवेदना के स्पंदन हैं। भारत जैसे बहुरंगी देश में जन्म लेने के बाद जब मुझे दक्षिण कोरिया जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में कुछ वर्ष बिताने का अवसर मिला, तब मैंने महसूस किया कि संस्कृतियाँ भले भिन्न हों, पर उत्सवों का मर्म एक ही होता है, मानवीय सौहार्द! यह संस्मरण उन्हीं दिनों का है, जब मैं अपने देश के त्योहारों को याद करते हुए कोरिया के पर्वों में उस आत्मीयता की तलाश कर रही थी जो हर उत्सव को अर्थ देती है।

भारत उत्सवों का देश है। जैसे ही श्रावण समाप्त होता है, वैसे ही पर्वों और उत्सवों की श्रृंखला प्रारंभ हो जाती है। लगभग हर महीने कोई न कोई त्योहार हमारे जीवन को रंगीन बना देता है। किंतु जब मैं कोरिया में थी, तो मुझे अपने देश के इन परिचित त्योहारों की याद बार-बार आती थी। वहाँ रहकर मैं अपने देसी त्योहारों को तो मिस करती ही थी, पर साथ ही कोरियाई संस्कृति के उत्सवों में सम्मिलित होकर एक नया, मनोहर अनुभव भी अर्जित कर रही थी।

कोरियाई संस्कृति को समझने का सबसे सुंदर तरीका वहाँ के लोगों के साथ रहना, उनके साथ उठना-बैठना और उनके बीच जीना है। हांकुक यूनिवर्सिटी ऑफ फोरन स्टडीज़, सियोल में अध्यापन के दौरान हमारे छात्र-छात्राएँ हमें इस दिशा में कई अवसर प्रदान करते थे। उनके साथ किसी उत्सव में जाना या शहर के किसी सांस्कृतिक आयोजन में भाग लेना, न केवल मनोरंजक होता था बल्कि यह उनकी संस्कृति को भीतर से समझने का अवसर भी देता था।

वैसे कोरिया की यात्रा और वहाँ रहना सुविधाजनक है — हर जगह मेट्रो से पहुँचा जा सकता है। मेट्रो का नक्शा समझ लो तो पूरा सियोल शहर मानो आपकी मुट्ठी में आ जाता है।

तीन वर्षों के प्रवास के दौरान मैं अपने घर के प्रमुख त्योहार गणेश चतुर्थी और दीपावली पर भारत नहीं लौट सकी। हालांकि, सियोल स्थित भारतीय दूतावास में दीपावली का भव्य आयोजन होता था। पटाखे फोड़ने के लिए कोरिया सरकार विशेष स्थान उपलब्ध कराती थी। विदेश में रहते हुए भी दीपावली का उत्सव वहाँ की सर्द हवा में एक गरमाहट भर देता था, परंतु कोरिया के अपने उत्सव भी किसी आनंद-उत्सव से कम नहीं थे।

एक दिन विश्वविद्यालय पहुँची तो देखा पूरा परिसर उत्सव के रंग में डूबा है। छात्र-छात्राएँ तरह-तरह के परिधान धारण किए हुए थे.. कोई कार्टून चरित्र बना था, कोई मुखौटा लगाए नाच रहा था। सबसे आकर्षक था – पांडा, टेडी बेयर और मिकी माउस का वेश। मैं जैसे ही कैंपस में दाख़िल हुई, एक पांडा आगे आया और बोला, “हेलो केसोनिम!” (नमस्ते, मैडम!) मैं पल भर को पीछे हटी, फिर हँस पड़ी। मेरे साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. आर सी. शर्मा और प्रो. खन्ना थे… प्रो. शर्मा जी को फोटोग्राफी काफी शौक है… वे अपने साथ हमेशा डिजीटल कैमेरा लिए चलते थे… उस दिन उन्होंने यह पल कैमरे में कैद कर दिए थे। बाद में पता चला कि यह सब ‘एंडोंग इंटरनेशनल मास्क फेस्टिवल’ के उपलक्ष्य में था — एक ऐसा आयोजन जिसमें लोकनृत्य, मुखौटे और सांस्कृतिक परंपराएँ मिल-जुल जातीं और हमें अनुभवसंपन्न बना देती थी। वसंत और पतझड़ के मौसम में दक्षिण कोरिया में लगभग हर सप्ताहांत किसी न किसी स्थान पर कोई उत्सव होता ही रहता है। यह पर्व विशेष रूप से मुखौटे-नृत्य की परंपरा और रंगों की छटा के लिए प्रसिद्ध है।

परंतु जो उत्सव मेरे मन में सबसे गहराई तक अंकित हुआ, वह था ‘सियोलाल’ कोरिया का ‘चंद्र नववर्ष’। मैं औj मोशा अपने कुछ छात्रों के साथ उस रात उस उत्सव का जानने के लिए गए थे। हमने गर्म जैकेट और टोपी पहन ली थी.. हैंडग्लोज भी पहन लिए थे… रात का समय था…ठंड काफी थी… पर हमने कहा चलते हैं और चल भी पड़ें… मोशा के रहते मैं निश्चिंत रहती थी… यह पर्व पारिवारिक पुनर्मिलन और पैतृक संस्कारों का है। उस दिन मैंने सियोल के बोकसुन घंटाघर चौक में लोगों का उमड़ता सागर देखा। ठंडी रात में लोग रंगीन ‘हानबोक’ पहने एकत्र हो रहे थे। बच्चों की आँखों में उत्साह की चमक थी, बुज़ुर्गों के चेहरे पर एक निरीह शांति थी। जैसे ही मध्यरात्रि का समय हुआ, घंटा जोर से बज उठा — उसकी गूँज पूरे चौक में फैल गई। लोग एक-दूसरे को “सेबे” करते हुए नववर्ष की शुभकामनाएँ देने लगे। ‘सेबे’ का अर्थ है..झुककर सम्मानपूर्वक अभिवादन करना। यह मुख्य रूप से बुज़ुर्गों या परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को नववर्ष की शुभकामनाएँ देने के लिए किया जाता है।

उस रात सबके बीच एक अनकही भाषा थी — मुस्कान, हाथ मिलाना, नए साल की खुशी — शब्द कम थे पर भाव गहन गहरे थे। यह क्षण इतना आत्मीय था कि लगा, जैसे किसी अदृश्य सूत्र से सबके हृदय बँधे हों। जहाँ तक मुझे याद है…शायद किसी छात्रा ने ही मुझे यह बात बतायी थी.. इस रात में चंद्रमा की रौशनी और झरती बर्फ में रात के समय कोई खास महल है उसके प्रांगन में प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे से प्रेम का इज़हार करते हैं तो उनका प्रेम सफल हो जाता है… इस लिए कई प्रेमी युगल उस रात उस महल के पास गलबाहियाँ डाले पहुंचते हैं….पता नहीं यह कितना सच है… मुझे इस प्रकार की कहानियाँ सुनने के बाद अक्सर लगता कि.. देश हो या विदेश इस प्रकार की कहानियाँ तो मिल ही जाती हैं… अंततः मनुष्य की भावभूमि तो एक ही है न!

कुछ ही महीनों बाद मेरी सहकर्मी मोशा ने कहा — “मेरे छात्रों ने ‘चुसोक’ के लिए हमें उनके घर निमंत्रित किया है, तुम भी चलो।” चुसोक कोरिया का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है — कुछ वैसा ही जैसा भारत का पितृपक्ष या इसाइयों का थैंक्सगिविंग। उस समय पूरे देश में छुट्टियाँ होती हैं और हर व्यक्ति अपने गाँव लौटता है। मैं ने ‘हाँ’ कही.. और उसके साथ जाने के लिए तैयार हो गयी। हम कैब से उनके गाँव पहुँचे। गाँव कहने को था, पर सुविधाओं में किसी शहर से कम नहीं। वहाँ हमें छात्रों के परिवार ने आत्मीयता से अपनाया। घर में सब ‘सोंगप्योन’ (चावल के अर्धचंद्राकार केक) बना रहे थे। हम भी उनके साथ बैठ गए — चावल के आटे में मीठी दाल और तिल भरते हुए मुझे अपनी दिवाली की रातें याद आ गयीं, जब हम घर पर गुजिया बनाते थे।

दूसरे दिन हम सब फल (खास कर नाशपाति), सोंगप्योन, वाइन, मांस आदि साथ लेकर एक छोटी-सी पहाड़ी पर गए। वहाँ उस परिवार के पूर्वजों की कब्रें थीं। पर्व के एक दिन पहले घर के पुरुषों ने वहाँ जाकर साफ-सफाई कर दी थी। हम जब पहुँचे तो कब्रें फूलों से शोभायमान थीं। वहाँ लायी हुई चीजें पूर्वजों की कब्र के सामने रख दी गईं। शांति से प्रार्थना की गई; भोग चढ़ाया गया; अगरबत्तियाँ और मोमबत्तियाँ जलाई गईं। सर्वत्र श्रद्धा थी, आत्मीयता थी, बहुत कुछ था जिसे शब्द कम कह पाते हैं। जहाँ गंभीरता थीं वही एक सुखद भाव भी था। इसमें हर छोटा व्यक्ति बड़े व्यक्ति के सामने झुककर अभिवादन कर रहा था… वहाँ सबसे बड़ी बात यह लगी रिश्तों में एक गरिमा थी.. बड़ों के प्रति आदर और सम्मान था… कहीं भी फूहड़ता नज़र नहीं आ रही थी।

यह त्योहार मुझे अपने पितृपक्ष की पूजा जैसा लगा था। यह देखने के लिए, अनुभव करने के लिए, और समझने के लिए था कि कैसे कोई संस्कृति अपने पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करती है, और उस आभार को उत्सव में बदल देती है।

वसंत ऋतु में सियोल की गलियाँ जब हज़ारों दीयों से जगमगाने लगती हैं, तब मन को शांति और प्रकाश का अनुभव होता है। Yeondeunghoe योंदुन्ह्वे या योंदेंगहोए यह शब्द “लैम्प फेस्टिवल” (दीप उत्सव) के लिए प्रयोग होता है, जिसमें बुद्ध के जन्म दिवस पर हज़ारों लालटेनें जलाई जाती हैं। इसका अनुभव कराने के लिए एक कोरियाई कवि ‘ली  यंगची’ ने हमें निमंत्रित किया था और मैं प्रो.गर्गेश जी के साथ लोटस लैंटर्न फेस्टीवल देखने के लिए गयी थी। उस दिन लोग रंग-बिरंगे कमलाकार दीप बनाकर सड़कों पर लगाये थे। मैंने देखा था, छोटे बच्चे अपने हाथों में दीप लेकर बुद्ध मंदिरों की ओर जा रहे थे; उनके चेहरों पर आनंद की अनोखी आभा थी। उस क्षण लगा कि यह त्योहार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मा को आलोकित करने वाला उत्सव है। सारा शहर ऐसे दीपों से सजा था। रात के समय जब दीपों की लालिमा फैली थी,  ऐसा लगा जैसे कोरिया की शहरी रफ्तार भी ठहर गयी है और हम सब दीपों की रोशनी में कुछ और उजास भरे हो गये हैं। जिस तरह भारत में दीपावली के समय शहर में रोशनाई होती है लगभग वैसे ही… पर यहाँ विशेषकर कमल दीप होते हैं.. जो सड़कों पर ऊपर लगे रहते हैं।

इन सब त्योहारों में आनंद देनेवाला एक और उत्सव था चेरी ब्लॉसम! दरअसल, दक्षिण कोरिया में वर्ष भर अनेक उत्सव होते रहते हैं। वसंत में आनेवाले इस Cherry Blossom Festival में पूरा कोरिया गुलाबी-सफेद फूलों से भर जाता है। यह कोरिया का सबसे बड़ा वसंत उत्सव है, जो हर साल लाखों से ज़्यादा टुरिस्ट्स को आकर्षित करता है। ‘बुसान’ और ‘जिन्हे’ में यह उत्सव अत्यंत सुंदर होता है। कहते हैं कि जेजु द्वीप पर ये फूल सबसे पहले खिलते हैं। पुरा पेड गुलाबी रंग से सज जाता है। एक भी हरा पत्ता नज़र नहीं आता। सियोल में ‘हान’ नदी के किनारे हज़ारों चेरी के पेड़ खिलते हैं। शाम को, पेड़ों पर रोशनी की जाती है, जिससे यह एक रोमांटिक नज़ारा बन जाता है। कोरियाई संस्कृति में, चेरी ब्लॉसम नवीनीकरण और वसंत के आगमन का प्रतीक हैं।  इनके खिलने का छोटा सा समय जीवन की क्षणिक सुंदरता को दर्शाता है, जो लोगों को हर पल का आनंद लेने के लिए प्रेरित करता है। कोरिया में चेरी ब्लॉसम का इतिहास सौंदर्य, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा है। प्राचीन सिल्ला राज्य के समय से वसंतोत्सवों में यह फूल जीवन के क्षणभंगुर सौंदर्य का प्रतीक रहा है। कोरिया में जापानी उपनिवेश काल में जापान ने चेरी ब्लॉसम वृक्षों को अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में लगाया था, जिससे यह विवादित प्रतीक बन गया।  अतः कई जगहों पर जापानियों ने लगाए वृक्षों को काट दिया गया। किंतु स्वतंत्रता के बाद कोरियाई वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया कि इन फूलों की प्रजाति वास्तव में जेजू द्वीप की स्वदेशी प्रजाति है, जिससे यह फूल पुनः कोरिया की पहचान बन गया। आज सियोल के योइदो, जिन्हे, ग्योंगजू और जेजू में होने वाले इस उत्सव में वसंत, पुनर्जन्म और प्रेम के उत्सव बन चुके हैं, जहाँ लाखों लोग गुलाबी-सफेद फूलों की वर्षा में जीवन की नई शुरुआत का आनंद लेते हैं।

दक्षिण कोरिया के गुॠ (Gurye) क्षेत्र की यात्रा मेरे लिए स्मरणीय बन गई। हम उस सप्ताहांत पर कवि किम यांग-शिक और कुछ कोरियाई कवयित्रियों के साथ एक साहित्यिक कार्यक्रम में गए थे। उसी दिन तय हुआ था कि पास ही स्थित जिरिसान (Jirisan) पर्वत की तलहटी में, सैंडोंग-म्यॉन (Sandong-myeon) के गाँवों के बीच बसे उस प्रसिद्ध मानबोकदै (Manbokdae) पहाड़ी तक भी जाएंगे, जो हर वसंत ऋतु में सांसुयू (Sansuyu) — यानी Cornelian cherry — के पीले फूलों से ढलानों तक ढक जाती है। जब हमारी कार उस ओर मुड़ी, तभी खिड़की से झाँकते ही मेरी दृष्टि उस सुनहरी पहाड़ी पर ठहर गई। पूरा पर्वत मानो पीले फूलों की चादर ओढ़े किसी दिव्य आलोक में नहा रहा था — मन एक क्षण को ठिठक गया। ऊपर पहुँचने पर पहाड़ी का वह लुभावना दृश्य और भी सजीव हो उठा। वहीं समीप कुछ पुरानी समाधियाँ थीं, और उनके पास एक कोरियाई कलाकार ने पारंपरिक हानबोक के सफेद परिधान में नृत्य प्रस्तुत किया। उसकी गतियाँ हल्की और लयपूर्ण थीं, किंतु उसके नृत्य के गीतों में एक मर्मस्पर्शी शोक-ध्वनि थी, जैसे फूलों के इस उल्लास के बीच इतिहास का कोई मौन दुःख बह रहा हो। उस क्षण में नृत्य, फूल, पहाड़ी और शांति सब मिलकर एक गहरी, अव्यक्त अनुभूति बन गए, जो आज भी मन के किसी कोमल कोने में वैसे ही खिले हैं, जैसे उस दिन पहाड़ी पर सांसुयू के पीले फूल।

एक और मज़ेदार बात… कोरिया में प्रेम के उत्सव भी कितने सुसंस्कृत और सूक्ष्म भावनाओं से भरे होते हैं। फरवरी का महीना जैसे ही आता, शहर की गलियों में चॉकलेट की सुगंध और लाल पैकिंग पेपरों की चमक फैल जाती। वैलेंटाइन डे के दिन लड़कियाँ अपने प्रिय को चॉकलेट और उपहार देकर अपने स्नेह का इज़हार करतीं हैं और फिर एक महीने बाद, अर्थात् 14 मार्च को श्वेत दिवस ( व्हाईट डे) पर वही लड़के सफ़ेद रिबन से सजे उपहार देकर उस प्रेम का प्रत्युत्तर देते हैं। पर मुझे सबसे रोचक लगा 14 अप्रैल को मनाया जानेवाला ‘ब्लैक डे … जिन्हें किसी ने चॉकलेट नहीं दी, वे सभी एक साथ हँसते हुए ‘जाजांगम्योन’ यानी ब्लैक बीन नूडल्स खाते। ब्लैक डे सिंगल्स के लिए खुद को सेलिब्रेट करने का दिन है। ये लोग अपने सिंगल होने का जश्न मनाते हुए दोस्तों के साथ मस्ती भरा समय बिताएँगे। काले कपड़ों में, हल्की हँसी और नूडल्स की भाप के बीच, जैसे सब यह स्वीकारते कि अकेलापन भी उत्सव का एक रूप हो सकता है।

इन उत्सवों ने मेरे प्रवास को और समृद्ध किया न सिर्फ संस्कृतियों को देखने का अनुभव बल्कि उनकी बहुविधता को महसूस करने का अवसर मिला।

इन सब अनुभवों के बीच मैंने महसूस किया कि चाहे भारत हो या कोरिया उत्सवों का सार एक ही है: परिवार, प्रेम, कृतज्ञता और आत्मीयता। कोरिया ने मुझे यह सिखाया कि संस्कृतियाँ भले अलग हों, पर मनुष्यता का उत्सव हर जगह एक-सा होता है।

जब भी मैं दीपावली के दीए जलाती हूँ, मुझे सियोल की गलियों में जगमगाते कमलदीप याद आते हैं दोनों की रोशनी एक ही बात कहती है: प्रेम, प्रकाश और मानवता की डोर सबसे बड़ी संस्कृति है। मेरे कोरिया-भ्रमण ने यह अनुभव मुझे दिल से दिया कि हम सभी, चाहे किसी भाषा-भूमि, संप्रदाय, देश से हों, उसी उत्सव-मंजरी के हिस्सेदार हैं जहाँ हम मानवता के लिए झूमते हैं।

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©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – स्वाद, स्मृति और संस्कृति ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – स्वाद, स्मृति और संस्कृति ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

दुनिया के हर कोने में भोजन केवल भूख मिटाने का साधन नहीं होता, वह मनुष्य की स्मृतियों, परंपराओं और संस्कृति की सबसे गहरी परतों को भी जोड़ता है। जब मैं दक्षिण कोरिया पहुँची, तो मेरे भीतर केवल नए देश की उत्सुकता नहीं थी — बल्कि यह जिज्ञासा भी थी कि वहाँ की जीवन शैली कैसी होगी.. वहाँ स्वाद मुझे कैसे लगेगा… मैं अडजस्ट कर पाऊँगी भी या नहीं… पर दक्षिण कोरिया ने मेरे मन में हमेशा  के लिए एक स्थान बना लिया है… एक विशिष्ट स्थान। यह तो सभी जानते हैं कि भोजन किसी भी संस्कृति की आत्मा होता है, और शायद इसीलिए कोरिया के स्वाद ने मुझे वहाँ के समाज, अनुशासन और आत्मीयता से गहराई से परिचित कराया।

मैं जब दक्षिण कोरिया पहुँची थी, तब मेरे मन में वहाँ के भोजन को लेकर एक अजीब-सी जिज्ञासा और थोड़ी झिझक भी थी। क्योंकि कोरिया आने से पूर्व वहाँ के खान पान के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। किसी भी देश की संस्कृति का सबसे जीवंत परिचय उसके भोजन से ही होता है। कोरिया का भी भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक संबंध और आत्मिक अनुशासन का हिस्सा है। मुझे आज भी याद है—सियोल की एक ठंडी सुबह थी, जब मेरे कोरियाई सहकर्मियों ने मुझे पारंपरिक खाने के लिए निमंत्रित किया था। हम कोरियाई रेस्टारेंट में पहूँचे और वहाँ एक छोटे बैठे मेज़ के आस पास हम सब बैठ गए… एक एक कर कई सारे व्यंजन आए.. जिनके नाम तक मैं नहीं जानती थी…सुंदर सिरेमिक के बर्तनों से गरम गरम बाफ वाले व्यंजन जैसे सूप, सुपिया नूडल्स, कितने ही साईड डिश रखी गयी थीं…वैसे मैं कट्टर मांसाहारी नहीं हूँ… अधिकतर तो शाकाहार ही पसंद करती हूँ….मुझे जो खाना था वह मैंने खुशी से खा लिया… उस दिन मैंने देखा था कि कोरियाई अपनी खाद्य संस्कृति को लेकर काफी सतर्क और गंभीर होते हैं।

दक्षिण कोरिया का खान-पान “हंसिक” (Hansik) कहलाता है। यह केवल व्यंजन का नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। कोरियाई मानते हैं कि “भोजन ही औषधि है”..उनका सिद्धांत यही कहता है कि प्रकृति के पाँच तत्व (लकड़ी, अग्नि, पृथ्वी, धातु और जल) और पाँच स्वाद (मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा और तीखा) के बीच संतुलन से शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। जब मैंने पहली बार यह सिद्धांत जाना, तो मुझे भारतीय आयुर्वेद की याद आई जहाँ “सत्त्व, रज और तम” के संतुलन को भोजन से जोड़ा गया है। शायद पूर्वी सभ्यताओं में भोजन के प्रति यह गहरी आस्था ही साझा धरोहर रही होगी।

मेरे पहले कोरियाई भोजन में किम्ची (Kimchi) थी, पत्तागोभी, मूली या अन्य सब्जियों का किण्वित (fermented) रूप देखकर मुझे अचार की याद आई, पर जैसे ही मैंने पहला कौर लिया, तीखापन और खटास का एक ऐसा संगम मिला कि मेरी आँखें नम हो आईं। लेकिन कुछ दिनों बाद मैंने महसूस किया कि किम्ची कोरियाई जीवन की आत्मा है। यह हर घर की शान है, हर मौसम में परोसी जाती हैं। सर्दियों से पहले किमजंग (Kimjang) नामक त्योहार मनाया जाता है, जब पूरा परिवार मिलकर किम्ची तैयार करता है। उसमें मिलती है पारिवारिक निकटता की गरमाहट जैसे भारत में अचार डालते समय घरों में रौनक होती है। किम्ची उनके जीवन में इतनी घुल मिल गयी है कि जब फोटो लिया जाता है तो ‘ओ किम्ची’ कहकर मुस्कुराते हैं.. जैसे हम ‘चीज़…’ कहते हैं। मेरा सौभाग्य था कि हम भारतीय शिक्षकों को एक बार किम्ची तैयार करनेवाले कारखाने की सैर करने का मौका मिला था.. वहाँ बनाने की सारी विधि अत्याधुनिक, साफ सुथरी थी…बनानेवाले लोगों ने सफेद कपड़े पहने थे ओर उनके हाथों में ग्लोवज् थे और फूर्ति से पर शांति से अपना काम कर रहे थे.. हमें देखकर प्रसन्न होकर झुककर “अन्योंग हासियो” कहते…यह कोरियाई अभिवादन है.. जैसे हम नमस्ते कहते हैं।

कोरिया में भोजन अक्सर साझा थालियों में परोसा जाता है। बंचान (Banchan) कहलाने वाले छोटे-छोटे व्यंजन मेज़ पर एक साथ रखे जाते हैं, सबके लिए समान रूप से। जब मैंने पहली बार यह व्यवस्था देखी, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ।  भारत में जहाँ हर व्यक्ति की थाली अलग होती है, वहीं कोरिया में साझा करना आत्मीयता का प्रतीक है। उस क्षण मुझे लगा कि कोरियाई भोजन केवल स्वाद नहीं बाँटता, वह एकता का संदेश भी देता है कि परिवार, मित्र, सहकर्मी सब एक ही मेज़ के हिस्सेदार हैं।

कोरियाई लोग चावल को “भोजन का हृदय” मानते हैं। बाप (Bap) शब्द का अर्थ ही ‘भोजन’ और ‘जीवन’ दोनों होता है। मैंने देखा कि किसी का हाल पूछते समय वे कहते हैं, “क्या तुमने खाना खाया? “बाप मोगोस्योयो?” यह प्रश्न केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आत्मीयता का भी प्रतीक है। वहाँ के पारंपरिक रेस्तराँ में बिबिम्बाप (Bibimbap) परोसा जाता है, चावल के ऊपर सजी रंग-बिरंगी सब्जियाँ, मांस और लाल मिर्च की चटनी, वह थाली मुझे किसी रंगीन चित्र-फलक जैसी लगी।

द. कोरिया में भोजन का सौंदर्यबोध भी महत्वपूर्ण है। बर्तन, रंग-संयोजन और परोसने की विधि तक में सौंदर्य का अनुशासन झलकता है। वे चॉपस्टीक्स का उपयोग कर जितनी फूर्ती से और तरीके से खाते है.. वह देखते ही बनता है। मैंने देखा कि पारंपरिक रेस्तराँ में व्यंजन इस तरह सजाए जाते हैं कि मेज़ एक कला-कृति ही सजीव हो उठती है। भोजन शुरू करने से पहले “जल मोक्गेस्सुम्नीदा” (Jal meokgesseumnida) कहा जाता है अर्थात् “मैं विनम्रता से भोजन करूँगा या करूंगी।” यह वाक्य उस संस्कृति का दर्पण है, जहाँ भोजन को ‘कृतज्ञता’ से जोड़ा गया है, न कि उपभोग से। जैसे हमारे यहाँ खाने से पूर्व प्रार्थना की जाती है…स्कूल में अथवा किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में.. “वदनी कवळ घेता….अन्न हे पूर्णब्रह्म” मराठी में प्रार्थना की जाती है…।

कोरियाई संस्कृति में अकेले खाने को अच्छा नहीं माना जाता; मिल-बैठकर भोजन करना सामाजिक और आत्मिक संवाद का माध्यम है। इसलिए वे परिवारोंवालों के साथ, मित्रों के साथ मिलकर खाते हैं। वहाँ एक कहावत प्रचलित है “एक कटोरा चावल भी एक रिश्ता है।” यह कहावत कोरियाई जीवन-दर्शन को व्यक्त करती है — अगर किसी के साथ हमने एक कटोरा चावल भी साझा किया है, तो वह भी एक विशेष संबंध है। यह संबंधों की पवित्रता, भोजन के माध्यम से जुड़ाव, और साथ खाने के सांस्कृतिक मूल्य को दर्शाती है।उनके लिए भोजन केवल शरीर का नहीं, आत्मा का पोषण है — एक ऐसा दर्शन जो कहता है, “जैसे तुम खाते हो, वैसे ही तुम जीते हो।” जब मैं हमारे विश्वविद्यालय की अंग्रेजी के प्रोफेसर से बात कर रही थी.. जो लंबे समय से कोरिया में रह रही थी तो उन्होंने मुझे कहा था कि कोरियाई भोजन में होंग-सिओंग-सा’ (संतुलन, सामंजस्य और शुद्धता) की भावना प्रबल है। प्रत्येक थाली — हान-सिक’ — में पाँच रंगों (नीला, लाल, पीला, सफेद और काला) और पाँच स्वादों (मीठा, नमकीन, खट्टा, तीखा और कड़वा) का मेल होता है, जो पंचतत्वों और संतुलित दर्शन सिद्धांत (यिन-यांग सिद्धांत) का प्रतीक है। वैसे भारतीय शाकाहारी भोजन में भी यह संतुलन है।

कोरिया का खान-पान मौसम के अनुसार बदलता रहता है। सर्दियों में सामग्येतांग (Samgyetang) जिनसेंग और चिकन का सूप ऊर्जा देता है। गर्मियों में नैंगम्यन (Naengmyeon) ठंडी नूडल्स, शरीर को संतुलित रखती हैं। वसंत में ताजे फूलों और जड़ी-बूटियों से बने व्यंजन परोसे जाते हैं। यह लय मुझे भारतीय पर्वों की याद दिलाती है, जहाँ होली, मकर संक्रांति, पोंगल या ओणम के अवसर पर मौसम और भोजन का तालमेल देखने को मिलता है।

मुझे याद है एक रविवार के दिन मेरी एक अमेरिकन कुलिग मुझे अपने साथ एक चर्च लेकर गयी थी…वहाँ सुबह की प्रार्थना खतम होने के बाद भोजन का भी प्रबंध किया गया था… हम दोनों भोजन के लिए चली गयीं… वहाँ का वह देसी भोजन मुझे सबसे अच्छा लगा था… एक सुंदर बाऊल में स्टिकी चावल, एक प्लेट में किम्ची, एक प्लेट में सिरके वाले प्याज, गोल गोल काटी हुई मुली और बडे बडे से लहसून… और साथ में एक टोकरी नुमा प्लेट में ठेर सारे हरे हरे पत्ते थे… जो यहाँ के कद्दु के पत्तों की तरह थे… अब मेरी समझ के ये परे था इनका क्या करना है… फिर देखा हमारे साथ बैठे कोरियाई लोग उन हरे पत्तो को एक हाथ में लेते और उसमे एक कौर जितना स्टीकी चावल चॉपस्टीक से  उठाते उस पत्ते में रखते फिर उसमें किम्ची और एक लाल चटनी जिसे हम सिजवान चटणी कहते हैं… लगभग वैसी ही वह चटणी होती है… उस चावल पर रख देते..चावल पर पत्ता अच्छे से लपेटा जाता और फिर वह खाया जाता साथ में सिरके की मुली, लहसून, या  फिर प्याज…. वह इतना अच्छा शाकाहारी भोजन था कि मैं बहुत पसंद कर गयी… आज भी वह सारा दृश्य मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों चित्रित है। वह सादा सा भोजने करने में भी कोरयाई लोगों का अनुशासन होता है… नज़ाकत होती है… हडबडी नहीं होती… हाँ.. जब वे चॉपस्टीक से गरम गरम नूडल्स सूडप सूडप कर खाते हैं… तो हम भारतीयों को अजीब ज़रूर लगता है। सियोल के आधुनिक रेस्टोरेंट्स में मैंने देखा कि पुराने स्वाद नए रूप में लौट आए हैं। कई युवा शेफ़ पारंपरिक व्यंजनों को आधुनिक प्रस्तुति में परोस रहे हैं, जैसे किम्ची टाको, गोचुजांग पास्ता या सोया सॉस आइसक्रीम। यहाँ का टोफू मुझे हमेशा पनीर की याद दिलाता था।

एक शाम हमने हान नदी किनारे बैठे हुए सड़क किनारे के ठेलों पर टॉकबोकी (Tteokbokki) खाई..मिर्चीदार चावल केक की वह सादी थाली मुझे किसी उत्सव जैसी लगी। साथ ही वहाँ एक युवा गायक गिटार बजा रहा था, भोजन और संगीत का वह संगम कोरियाई जीवन की आत्मा जैसा था।

कोरियाई भोजन में भावनाएँ बहती हैं। जब मैंने एक छात्रा की माँ के साथ घर पर खाना खाया, तो उसने बड़ी आत्मीयता से मेरे लिए किम्बाप (Kimbap) तैयार किया। किम्बाप यानि समुद्री शैवाल में लिपटा चावल, सब्जियाँ और अंडा — भारतीय रोल या सुशी जैसा। उसने कहा, “इसमें प्यार है, क्योंकि यह घर पर बना है।” मुझे लगा जैसे मुझे मेरी माँ के हाथ की रोटी मिली हो। भोजन का यह भावनात्मक रिश्ता हमें सिखाता है कि स्वाद केवल जीभ से नहीं, दिल से महसूस होता है।

कोरियाई भोजन के दौरान कुछ नियम हैं..वरिष्ठ व्यक्ति पहले खाना शुरू करते हैं, और सब उनका अनुसरण करते हैं। भोजन समाप्त होने पर सभी “जल मोगऑस्सुम्नीदा” कहते हैं, “धन्यवाद, मैंने अच्छा भोजन किया।” मुझे यह शिष्टाचार बहुत भाया, क्योंकि इसमें दूसरों के प्रति सम्मान का भाव है।

एक बार मैं विश्वविद्यालय के रात्रि-भोज में शामिल हुई थी, टेबल पर लगभग दसों प्रकार के व्यंजन थे, पर किसी ने हड़बड़ी नहीं की। हर कोई संयम और सामंजस्य के साथ खा रहा था। भोजन का यह अनुशासन मुझे भारतीय पारिवारिक संस्कारों की तरह ही लगा, जहाँ “सबके साथ खाना” ही सच्चा आनंद है। कोरियाई भोजन मुझे धीरे-धीरे समझ आया। उसमें  सादगी, संतुलन और सम्मान की त्रिवेणी धारा बहती है। हर व्यंजन के पार्श्व में अच्छे स्वास्थ्य का तत्व है और यह तत्व जीवन को सन्तुलन और साझा भावना का प्रतीक है। यह दर्शन शायद इसी कारण विकसित हुआ कि कोरिया सदियों तक प्रकृति के निकट रहा, और कठिन परिस्थितियों में भी सामूहिक जीवन को प्राथमिकता देता रहा।

भारत से आई हुई मैं जहाँ मसालों की विविधता और स्वाद का विस्फोट होता है कोरियाई भोजन की सूक्ष्मता देखकर चकित थी। भारतीय भोजन जहाँ “प्रकट भाव” है, वहीं कोरियाई भोजन “अंतर्यात्रा” जैसा है..धीरे-धीरे खुलने वाला, जैसे एक सुगंध जो समय के साथ गहराती जाती है।  कोरियाई भोजन का स्वाद लेने के लिए स्वाद को विकसित करना होता है… तभी उसका आनंद लिया जा सकता है।

यदि कोरिया के भोजन का दिल घरों और रेस्तराँ में है, तो उसकी आत्मा ग्रामों और गली कूचों में धड़कती है। सर्दियों की ठंडी शामों में जब मैं सियोल में मेट्रों के आसपास घूमती थी, तब स्टेशन के पास या नुक्कड़ से उठती भूने आलू, उबले मक्के और शक्करकंद की खुशबू मुझे अपने बचपन की स्मृतियों में ले जाती थी। सड़क किनारे लगे छोटे ठेले, लाल तंबुओं के नीचे बैठे लोग, और भाप उड़ाते तवे पर पकता भोजन वह दृश्य भारत की ‘खाऊ गली’ से कम नहीं लगता। एक हाथ में गर्म गुनगुना मक्का, दूसरे में हॉट्टोक (मीठी सिरप भरी रोटी) या भुना गोगुमा (शक्करकंद) लिए चलो तो वह स्वाद जैसे सर्दी की रात में किसी पुराने गीत की गर्माहट देता। इन गलियों में चलते हुए मैंने समझा कि भोजन साझा भाषा का माध्यम है जहाँ अनजान लोग भी एक-दूसरे के साथ मुस्कुराकर देखते हैं।

कोरियाई भोजन की दुनिया में शाकाहार और मांसाहार दोनों ही संतुलित रूप से उपस्थित हैं। भारत से आने के कारण मुझे मांसाहारी व्यंजनों को लेकर हिचक थी। कोरियाई लोग बार्बेक्यू शैली में भूना गया पोर्क बड़े चाव से खाते हैं। एक बार जब हम सारे टिचर्स छात्रों के साथ पिकनिक पर गए थे तो देखा की छात्रों ने अंगिठी जलायी और पोर्क का बार्बेक्यू करना शुरु हुआ… छात्र और शिक्षक मिलकर सोजू (कोरियन शराब) के साथ पोर्क का आनंद उठा रहे थे। तब मुझे लगा कि वहाँ मांसाहार का स्वाद वे कितने खुशी से लेते है। लोग मेज़ के चारों ओर बैठकर मांस को स्वयं ग्रिल करते हैं, फिर उसे पेरिला या लेट्ट्यूस के ताजे पत्तों में लपेटकर खाते हैं साथ में थोड़ा स्टीकी राइस (चिपचिपा चावल), किम्ची, और लहसुन-मिर्च की तीखी चटनी।

सर्दियों में सबका प्रिय किम्ची जिजिगे (Kimchi Jjigae),  यानी किम्ची का गरम सूप। कड़ाही में किम्ची, टोफू, हरे प्याज़ और मसाले उबलते हैं जिसकी एक सुगंध फैल जाती है। कोरियाई मित्र कहते थे, “यह सूप आत्मा को गरम कर देता है।” यह सूप केवल पेट नहीं भरता, बल्कि भावनाओं को सहेजता है जैसे भारत में माँ दाल का छौंक लगाकर कहती है, “थोड़ा और ले लो।”

कोरियाई खान-पान की यात्रा तब अधूरी रहती है जब तक मक्गोली (Makgeolli) की बात न की जाए। यह चावल से बनी हल्की, दूधिया रंग की पारंपरिक शराब है, जो प्राचीन काल से किसानों का पेय रही है। यहाँ एक शिष्टाचार है कि अगर कोई बुजुर्ग आपको मक्गोली के लिए पूछता है तो उसे नकारा नहीं जाता उसके सम्मान में उनके सामने ही उसका कम स कम एक घूँट तो पीना ही है। मैंने अक्सर छात्रों को अपने शिक्षक के सामने मक्गोली की घूँट लेते देखा पर वह लेने का तरीका अलग होता वे एक ओर चेहरा कर अपनी हथेली की आड में उसका घूँट लेना  है. मुझे अजीब लगता पर बाद में उनके इस शिष्टाचार का पता चला। जब सब लोग एक मेज़ पर बैठकर भोजन साझा करते हैं तब सूप के प्याले या चावल की मक्गोली की एक घूँट ऐसी सामूहिकता बनती है जो शब्दों से परे है।

दक्षिण कोरिया में भोजन केवल स्वाद नहीं, एक संस्कृति-संवाद है, जहाँ हर निवाला अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ता है। और शायद इसी कारण कोरियाई खाद्य संस्कृति मेरे भीतर एक गहरा भाव उठाती है कि स्वाद, स्मृति और संस्कृति ये तीनों जीवन के सबसे सुंदर रूप हैं, और मैंने उन्हें कोरिया में रहते गहरे तक अनुभूत किए हैं।

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©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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